हिंदू लॉ पर हाथ नहीं डालना चाहता मुस्लिम पक्ष
सुहेल वहीद
लखनउ। अयोध्या विवाद पर हाईकोर्ट के फैसले पर आस्था के हावी होने का हल्ला मचाने वालों को शायद पता ही नहीं है कि धार्मिक आस्था भारतीय कानून में एक तथ्य है। आस्था को कानूनी जामा पचास के दशक में पहनाया जा चुका है, तो फैसला आस्था की बुनियाद पर ही होना था और मुद्दा भी आस्था ही थी। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने जान बूझकर अदालत में रामलला को पार्टी नहीं बनाया। बोर्ड वकील जफरयाब जीलानी का तर्क है कि हम विवादित स्थल पर रामलला के वजूद को ही नहीं मानते। समाचार पत्र नवदुनिया से चर्चा में वह कहते हैं कि जिस दिन हम वहां रामलला को स्वीकार कर लेंगे मुकदमा हार जाएंगे। उधर हिंदू पक्ष के एक पक्षकार श्रीराम जन्मभूमि पुनरूद्धार समिति की वकील रंजना अग्निहोत्री ने अदालत में तर्क दिया था कि जब सुन्नी वक्फ बोर्ड ने रामलला को पार्टी ही नहीं बनाया तो वह एडवर्स पजेशन का दावा किससे कर रहे हैं। विवादित जगह वह मांग किससे रहे हैं। मुस्लिम पक्ष ने जान-बूझ कर रामलला को पार्टी नहीं बनाया, क्योंकि रामलला को पार्टी बनाने का मतलब हिंदू लॉ को छेड़ना था और मुस्लिम पक्ष इसे छेड़ना नहीं चाहता, क्योंकि इस पर हाथ डालने का मतलब है कि बात मुस्लिम पर्सनल लॉ तक पहुंच जाएगी।
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बुधवार, 13 अक्टूबर 2010
भारतीय पुरातत्व एवं तोजो इंटरनेशनल की विश्वसनीयता
अयोध्या प्रकरण पर प्रयाग उच्च न्यायालय की विशेष पीठ द्वारा 30 सितम्बर को दिये गये निर्णय पर अपने-अपने चश्मे के अनुसार विभिन्न दल, समाचार पत्र, पत्रिकाएं तथा दूरदर्शन वाहिनियां बोल व लिख रही हैं। इस निर्णय में मुख्य भूमिका भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और उसकी उत्खनन इकाई ने निभाई है।
1992 में बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद 1993 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा ने सर्वोच्च न्यायालय से यह पूछा था कि क्या तथाकथित बाबरी मस्जिद किसी खाली जगह पर बनायी गयी थी या उससे पूर्व वहां पर कोई अन्य भवन था ? इस प्रश्न पर ही यह सारा मुकदमा केन्द्रित था।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रश्न से बचते हुए अपनी बला प्रयाग उच्च न्यायालय के सिर डाल दी। उच्च न्यायालय ने इसके लिए तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ बनाकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का सहयोग मांगा। पुरातत्व विभाग ने कनाडा के विशेषज्ञों के नेतृत्व में तोजो इंटरनेशनल कंपनी की सहायता ली। उसने राडार सर्वे से भूमि के सौ मीटर नीचे तक के चित्र खींचे। इनसे स्पष्ट हो गया कि वहां पर अनेक फर्श, खम्भे तथा मूर्तियां आदि विद्यमान हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इसके बाद वहां कुछ स्थानों पर खुदाई करायी। इससे भी वहां कई परतों में स्थित मंदिर के अवशेषों की पुष्टि हो गयी। इस रिपोर्ट के आधार पर तीनों माननीय न्यायाधीशों ने एकमत से यह कहा कि वहां पहले से कोई हिन्दू भवन अवश्य था। अर्थात राष्ट्रपति जी के प्रश्न का स्पष्ट और निर्विवाद उत्तर प्राप्त हो गया।
इसके साथ मुकदमे में जो सौ से अधिक प्रश्न और उभरे, अधिकांश विद्वानों का मानना है कि उन पर तीनों न्यायाधीशों ने अपनी वैचारिक, राजनीतिक तथा मजहबी पृष्ठभूमि के आधार पर निर्णय दिया है।
इसके बाद भी रूस, चीन तथा अरब देशों के हाथों बिके हुए विचारशून्य वामपंथी लेखक फिर उन्हीं गड़े मुर्दों को उखाड़ रहे हैं कि वहां पशुओं की हड्डियां मिली हैं और चूना-सुर्खी का प्रयोग हुआ है, जो इस्लामी काल के निर्माण को दर्शाता है; पर वे उन मूर्तियों तथा शिलालेखों को प्रमाण नहीं मानते, जो छह दिसम्बर, 92 की कारसेवा में प्राप्त हुए थे। उनका कहना है कि उन्हें कारसेवकों ने कहीं बाहर से लाकर वहां रखा है।
इन अक्ल के दुश्मनों से कोई पूछे कि बाबरी ढांचा इस्लामी नहीं तो क्या हिन्दू निर्माण था ? सभी विद्वान, इतिहास तथा पुरातत्व की रिपोर्ट पहले से ही इसे कह रहे थे और अब तो तीनों न्यायाधीशों ने भी इसे मान लिया है; पर जो बुद्धिमानों की बात मान ले, वह वामपंथी कैसा ? चूना-सुर्खी का प्रयोग भारत के लाखोंं भवनों में हुआ है। सीमेंट तथा सरिये से पहले निर्माण में चूना-सुर्खी का व्यापक प्रयोग होता था। इस आधार पर तो पांच-सात सौ वर्ष पुराने हर भवन को इस्लामी भवन मान लिया जाए ?
जहां तक छह दिसम्बर की बात है, तो उस दिन दुनिया भर का मीडिया वहां उपस्थित था। क्या किसी चित्रकार के पास ऐसा कोई चित्र है, जिसमें कारसेवक बाहर से लाकर मूर्तियां या शिलालेख वहां रखते दिखाई दे रहे हों ? इसके विपरीत प्रायः हर चित्रकार के पास ऐसे चलचित्र (वीडियो) हैं, जिसमें वे शिलालेख और मूर्तियां ढांचे से प्राप्त होते तथा कारसेवक उन्हें एक स्थान पर रखते दिखाई दे रहे हैं। हजारों चित्रकारों के कैमरों में उपलब्ध चित्रों से बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है ?
न्यायालय के मोर्चे पर पिटने के बाद अब वामपंथी इस बात को सिर उठाये घूम रहे हैं कि प्रमाणों के ऊपर आस्था को महत्व दिया गया है, जो ठीक नहीं है और इससे भविष्य में कई समस्याएं खड़ी हो जाएंगी, जबकि सत्य तो यह है कि न्यायालय ने पुरातत्व के प्रमाणों को ही अपने निर्णय का मुख्य आधार बनाया है।
इस निर्णय से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और तोजो इंटरनेशनल के प्रति दुनिया भर में विश्वास जगा है। भारत में हजारों ऐसी मस्जिद, मजार और दरगाह हैं, जो पहले हिन्दू मंदिर या भवन थे। भारतीय इतिहास ग्रन्थों में इनका स्पष्ट उल्लेख है। लोकगीतों में भी ये प्रसंग तथा इनकी रक्षा के लिए बलिदान हुए हिन्दू वीरों की कथाएं जीवित हैं। यद्यपि अपने स्वभाव के अनुसार वामपंथी इसे नहीं मानते।
क्या ही अच्छा हो यदि ऐसे कुछ भवनों की जांच इन दोनों संस्थाओं से करा ली जाए। काशी विश्वनाथ और श्रीकृष्ण जन्मभूमि, मथुरा की मस्जिदें तो अंधों को भी दिखाई देती हैं। फिर भी उनके नीचे के चित्र लिये जा सकते हैं। दिल्ली की कुतुब मीनार, आगरा का ताजमहल, फतेहपुर सीकरी, भोजशाला (धार, म0प्र0), नुंद ऋषि की समाधि (चरारे शरीफ, कश्मीर), टीले वाली मस्जिद, (लक्ष्मण टीला, लखनऊ), ढाई दिन का झोपड़ा (जयपुर) आदि की जांच से सत्य एक बार फिर सामने आ जाएगा।
मुसलमानों के सर्वोच्च तीर्थ मक्का के बारे में कहते हैं कि वह मक्केश्वर महादेव का मंदिर था। वहां काले पत्थर का विशाल शिवलिंग था, जो खंडित अवस्था में अब भी वहां है। हज के समय संगे अस्वद (संग अर्थात पत्थर, अस्वद अर्थात अश्वेत अर्थात काला) कहकर मुसलमान उसे ही पूजते और चूमते हैं। इसके बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार स्व0 पी.एन.ओक ने अपनी पुस्तक ‘वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास’ में बहुत विस्तार से लिखा है।
अरब देशों में इस्लाम से पहले शैव मत ही प्रचलित था। इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उम्र बिन हश्शाम द्वारा रचित शिव स्तुतियां श्री लक्ष्मीनारायण (बिड़ला) मंदिर, दिल्ली की ‘गीता वाटिका’ में दीवारों पर उत्कीर्ण हैं। क्या ही अच्छा हो कि मक्का के वर्तमान भवन के चित्र भी तोजो इंटरनेशनल द्वारा खिंचवा लिये जाएं। राडार एवं उपग्रह सर्वेक्षण से सत्य प्रकट हो जाएगा।
क्या स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा बुद्धिवादी मानने वाले वामपंथी तथा प्रयाग उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद छाती पीट रहे मजहबी नेता इस बात का समर्थन करेंगे ?
विजय कुमार -
संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्@6, नई दिल्ली - 22)
1992 में बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद 1993 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा ने सर्वोच्च न्यायालय से यह पूछा था कि क्या तथाकथित बाबरी मस्जिद किसी खाली जगह पर बनायी गयी थी या उससे पूर्व वहां पर कोई अन्य भवन था ? इस प्रश्न पर ही यह सारा मुकदमा केन्द्रित था।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रश्न से बचते हुए अपनी बला प्रयाग उच्च न्यायालय के सिर डाल दी। उच्च न्यायालय ने इसके लिए तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ बनाकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का सहयोग मांगा। पुरातत्व विभाग ने कनाडा के विशेषज्ञों के नेतृत्व में तोजो इंटरनेशनल कंपनी की सहायता ली। उसने राडार सर्वे से भूमि के सौ मीटर नीचे तक के चित्र खींचे। इनसे स्पष्ट हो गया कि वहां पर अनेक फर्श, खम्भे तथा मूर्तियां आदि विद्यमान हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इसके बाद वहां कुछ स्थानों पर खुदाई करायी। इससे भी वहां कई परतों में स्थित मंदिर के अवशेषों की पुष्टि हो गयी। इस रिपोर्ट के आधार पर तीनों माननीय न्यायाधीशों ने एकमत से यह कहा कि वहां पहले से कोई हिन्दू भवन अवश्य था। अर्थात राष्ट्रपति जी के प्रश्न का स्पष्ट और निर्विवाद उत्तर प्राप्त हो गया।
इसके साथ मुकदमे में जो सौ से अधिक प्रश्न और उभरे, अधिकांश विद्वानों का मानना है कि उन पर तीनों न्यायाधीशों ने अपनी वैचारिक, राजनीतिक तथा मजहबी पृष्ठभूमि के आधार पर निर्णय दिया है।
इसके बाद भी रूस, चीन तथा अरब देशों के हाथों बिके हुए विचारशून्य वामपंथी लेखक फिर उन्हीं गड़े मुर्दों को उखाड़ रहे हैं कि वहां पशुओं की हड्डियां मिली हैं और चूना-सुर्खी का प्रयोग हुआ है, जो इस्लामी काल के निर्माण को दर्शाता है; पर वे उन मूर्तियों तथा शिलालेखों को प्रमाण नहीं मानते, जो छह दिसम्बर, 92 की कारसेवा में प्राप्त हुए थे। उनका कहना है कि उन्हें कारसेवकों ने कहीं बाहर से लाकर वहां रखा है।
इन अक्ल के दुश्मनों से कोई पूछे कि बाबरी ढांचा इस्लामी नहीं तो क्या हिन्दू निर्माण था ? सभी विद्वान, इतिहास तथा पुरातत्व की रिपोर्ट पहले से ही इसे कह रहे थे और अब तो तीनों न्यायाधीशों ने भी इसे मान लिया है; पर जो बुद्धिमानों की बात मान ले, वह वामपंथी कैसा ? चूना-सुर्खी का प्रयोग भारत के लाखोंं भवनों में हुआ है। सीमेंट तथा सरिये से पहले निर्माण में चूना-सुर्खी का व्यापक प्रयोग होता था। इस आधार पर तो पांच-सात सौ वर्ष पुराने हर भवन को इस्लामी भवन मान लिया जाए ?
जहां तक छह दिसम्बर की बात है, तो उस दिन दुनिया भर का मीडिया वहां उपस्थित था। क्या किसी चित्रकार के पास ऐसा कोई चित्र है, जिसमें कारसेवक बाहर से लाकर मूर्तियां या शिलालेख वहां रखते दिखाई दे रहे हों ? इसके विपरीत प्रायः हर चित्रकार के पास ऐसे चलचित्र (वीडियो) हैं, जिसमें वे शिलालेख और मूर्तियां ढांचे से प्राप्त होते तथा कारसेवक उन्हें एक स्थान पर रखते दिखाई दे रहे हैं। हजारों चित्रकारों के कैमरों में उपलब्ध चित्रों से बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है ?
न्यायालय के मोर्चे पर पिटने के बाद अब वामपंथी इस बात को सिर उठाये घूम रहे हैं कि प्रमाणों के ऊपर आस्था को महत्व दिया गया है, जो ठीक नहीं है और इससे भविष्य में कई समस्याएं खड़ी हो जाएंगी, जबकि सत्य तो यह है कि न्यायालय ने पुरातत्व के प्रमाणों को ही अपने निर्णय का मुख्य आधार बनाया है।
इस निर्णय से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और तोजो इंटरनेशनल के प्रति दुनिया भर में विश्वास जगा है। भारत में हजारों ऐसी मस्जिद, मजार और दरगाह हैं, जो पहले हिन्दू मंदिर या भवन थे। भारतीय इतिहास ग्रन्थों में इनका स्पष्ट उल्लेख है। लोकगीतों में भी ये प्रसंग तथा इनकी रक्षा के लिए बलिदान हुए हिन्दू वीरों की कथाएं जीवित हैं। यद्यपि अपने स्वभाव के अनुसार वामपंथी इसे नहीं मानते।
क्या ही अच्छा हो यदि ऐसे कुछ भवनों की जांच इन दोनों संस्थाओं से करा ली जाए। काशी विश्वनाथ और श्रीकृष्ण जन्मभूमि, मथुरा की मस्जिदें तो अंधों को भी दिखाई देती हैं। फिर भी उनके नीचे के चित्र लिये जा सकते हैं। दिल्ली की कुतुब मीनार, आगरा का ताजमहल, फतेहपुर सीकरी, भोजशाला (धार, म0प्र0), नुंद ऋषि की समाधि (चरारे शरीफ, कश्मीर), टीले वाली मस्जिद, (लक्ष्मण टीला, लखनऊ), ढाई दिन का झोपड़ा (जयपुर) आदि की जांच से सत्य एक बार फिर सामने आ जाएगा।
मुसलमानों के सर्वोच्च तीर्थ मक्का के बारे में कहते हैं कि वह मक्केश्वर महादेव का मंदिर था। वहां काले पत्थर का विशाल शिवलिंग था, जो खंडित अवस्था में अब भी वहां है। हज के समय संगे अस्वद (संग अर्थात पत्थर, अस्वद अर्थात अश्वेत अर्थात काला) कहकर मुसलमान उसे ही पूजते और चूमते हैं। इसके बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार स्व0 पी.एन.ओक ने अपनी पुस्तक ‘वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास’ में बहुत विस्तार से लिखा है।
अरब देशों में इस्लाम से पहले शैव मत ही प्रचलित था। इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उम्र बिन हश्शाम द्वारा रचित शिव स्तुतियां श्री लक्ष्मीनारायण (बिड़ला) मंदिर, दिल्ली की ‘गीता वाटिका’ में दीवारों पर उत्कीर्ण हैं। क्या ही अच्छा हो कि मक्का के वर्तमान भवन के चित्र भी तोजो इंटरनेशनल द्वारा खिंचवा लिये जाएं। राडार एवं उपग्रह सर्वेक्षण से सत्य प्रकट हो जाएगा।
क्या स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा बुद्धिवादी मानने वाले वामपंथी तथा प्रयाग उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद छाती पीट रहे मजहबी नेता इस बात का समर्थन करेंगे ?
विजय कुमार -
संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्@6, नई दिल्ली - 22)
अयोध्या पर सेक्युलर समूह का छल
अयोध्या पर हाई कोर्ट के निर्णय के बाद विभिन्न कोनों से आई
प्रतिक्रियाएं विचारणीय हैं। जहां मुकदमे के पक्षकारों ने संयम और सद्भाव
दिखाया वहीं कुछ जाने-माने वामपंथी बुद्धिजीवियों ने निर्णय का विरोध
किया है। रोमिला थापर, डीएन झा, केएन पणिक्कर जैसे कई लोगों ने संयुक्त
हस्ताक्षर करके कहा है कि यह निर्णय देश के सेक्युलर चरित्र पर आघात है
और इससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा गिरी है। उन्होंने यह भी कहा है कि
विवादित स्थल पर पहले राममंदिर होने की बात एक धोखाधड़ी है। एक बार फिर यह
एक उचित अवसर है कि देश में साप्रदायिक विभेद और तनाव बढ़ाने वालों को
ठीक से पहचाना जाए। सच तो यह है कि मुसलमानों की तरफ से तरह-तरह की
शिकायत, मांग और विरोध आदि को मुस्लिम नेताओं ने उतना नहीं उठाया जितना
ऐसे लिबरल-सेक्युलर कहलाने वाले हिंदू बुद्धिजीवियों ने। ऐसा करते इनमें
न कोई न्याय-बोध रहता है, न साविधानिक या निष्पक्ष आधार। ऐसे लोगों ने
मुस्लिमों के स्वयंभू हितचिंतक बनकर देश के साप्रदायिक वातावरण को जितना
बिगाड़ा है उतना किसी अन्य चीज ने नहीं। इन सेक्युलर बौद्धिकों का
वास्तविक चरित्र घोर पक्षपाती रहा। उनकी हर सक्रियता ने दोनों समुदायों
की मानसिकता पर हानिकारक प्रभाव डाला है। अयोध्या प्रसंग में भी यह बात
बार-बार दिखाई पड़ी। थापर, झा, पणिक्कर आदि ये वही लोग हैं जिन्होंने 1989
में 'पॉलिटिकल एब्यूज ऑफ हिस्ट्री' नामक एक उग्र पुस्तिका लिखकर अयोध्या
विवाद को एक नया आयाम दिया था। उसमें श्रीराम के अस्तित्व को ही नकारा
गया था और हिंदू पक्ष को सीधे-सीधे राजनीति-प्रेरित कहकर हटाने, हराने की
मांग रखी गई थी। इसने विवाद को बुरी तरह बदल दिया। इसके पहले तक विवादित
स्थल पर मात्र कानूनी लड़ाई चल रही थी।
कभी भी मुस्लम पक्ष ने श्रीराम के अस्तित्व आदि पर प्रश्न नहीं उठाया था।
वे तो मात्र वर्तमान नागरिक कानून आदि के आधार पर विवादित ढांचे को अपने
हाथ में रखने की जिद कर रहे थे। इतिहास पर उन्होंने प्रश्न नहीं उठाया
था। यह तो ऐसे सेक्युलर ठग थे, जिन्होंने राम के जन्म का 'ऐतिहासिक
प्रमाण' मांगकर मामला बिगाड़ा। ऐसे बौद्धिकों के हस्तक्षेप में किसी
समाधान की चाह नहीं थी। वे तो बस अपनी हिंदू-विरोधी विचारधारा सब पर
थोपना चाहते थे। बाद में, प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा बनाई गई सरकारी
समिति ने भी इनके बारे में यही पाया। पहले तो उन्हीं इतिहासकारों ने
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के आधिकारिक पैरोकार बनकर मुस्लिम पक्ष को आपसी
समाधान करने से रोका। उन्हें भरोसा दिलाया कि राम या रामजन्मभूमि का कोई
प्रमाण नहीं है और इसी से विवादित स्थल पर उनका एकमात्र हक है, लेकिन जब
प्रधानमंत्री चंद्रशेखर द्वारा दोनों पक्षों को बिठाकर प्रमाणों की
जांच-पड़ताल होने लगी तो मुस्लिम पक्ष के यही पैरोकार बहाना बनाकर बीच
रास्ते भाग खड़े हुए। इन सेक्युलर-वामपंथी बौद्धिकों की नीयत कितनी खराब
थी, यह तब पुन: प्रमाणित हुआ जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2003 में
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को अयोध्या में विवादित स्थल की खुदाई का आदेश
दिया ताकि वहां पहले से राममंदिर होने या न होने का प्रमाण पाया जा सके।
इस पर सबसे आक्रामक प्रतिक्रिया इन्हीं इतिहासकारों की आई जो अब तक
रामजन्मभूमि या मंदिर का प्रमाण मांगते रहे थे! खुदाई का आदेश देने के
लिए इन्होंने न्यायाधीशों पर पक्षपात का आरोप लगाने में भी देर नहीं
लगाई। पुरातत्व सर्वेक्षण पर भी लाछन जड़ा कि वे बेईमानी करेंगे।
अयोध्या मसले के समाधान में इन कथित सेक्युलर लोगों ने हमेशा अड़ंगा लगाया
है। ऐसे लोगों ने 1989-90 में यही किया, फिर वही बाद में और आज भी वे यही
कर रहे हैं। अत: आवश्यक है कि ऐसे कथित सेक्युलर लिबरल बुद्धिजीवियों की
घातक राजनीतिक भूमिका ठीक से परखी जाए। अभी जिस तरह हिंदू-मुस्लिम
समुदायों तथा उनके नेताओं ने न्यायालय के निर्णय पर संयम दिखाया, वह
प्रसन्नता और संतोष की बात होनी चाहिए थी। उनके लिए तो विशेषकर जो स्वयं
को धर्म-मजहब से ऊपर रहकर उन्नति, विकास आदि के लिए फिक्रमंद बताते हैं,
किंतु ठीक इन्हीं लोगों ने एक समुदाय विशेष को भड़काने के लिए फिर
अनावश्यक बयानबाजी आरंभ कर दी है। इस लिबरल-सेक्युलर बौद्धिक गिरोह की
कुटिलता तब और स्पष्ट दिखती है जब याद करें कि यही लोग निर्णय आने से
पहले न्यायालय का 'जो भी निर्णय हो' वह मानने की भरपूर वकालत कर रहे थे।
संविधान की सर्वोच्चता और सामुदायिक सद्भाव को सर्वोपरि रखने की सीख दे
रहे थे। ये सब तर्क उन्होंने निर्णय आते ही तिरोहित कर दिया। क्यों?
कयोंकि उनके सभी तकरें के पीछे सदैव एक घातक राजनीति छिपी होती है।
30 सितंबर से पहले के उनके सभी तर्क एक अनुमान पर आधारित थे कि निर्णय
कुछ और आएगा। अर्थात एक विशेष प्रकार का निर्णय करना, करवाना और मनवाना
ही उनका लक्ष्य था और है। इसीलिए यह निर्णय आने के बाद सामुदायिक शाति
बने रहने पर ठीक यही लोग बुरी तरह असंतुष्ट हैं। वे तरह-तरह से अपनी
अप्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं। एक वामपंथी इतिहासकार कह रहे हैं कि
न्यायालय ने कानून का ध्यान छोड़कर मानो पंचायत का फैसला सुना दिया है।
दूसरी प्रखर सेक्युलरवादी बौद्धिका कह रही हैं कि अब मुसलमानों का भारतीय
राजसत्ता से विश्वास उठ गया है। तीसरा इसे न्यायिक नहीं, राजनीतिक निर्णय
बता रहा है।
[एस. शंकर: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]
प्रतिक्रियाएं विचारणीय हैं। जहां मुकदमे के पक्षकारों ने संयम और सद्भाव
दिखाया वहीं कुछ जाने-माने वामपंथी बुद्धिजीवियों ने निर्णय का विरोध
किया है। रोमिला थापर, डीएन झा, केएन पणिक्कर जैसे कई लोगों ने संयुक्त
हस्ताक्षर करके कहा है कि यह निर्णय देश के सेक्युलर चरित्र पर आघात है
और इससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा गिरी है। उन्होंने यह भी कहा है कि
विवादित स्थल पर पहले राममंदिर होने की बात एक धोखाधड़ी है। एक बार फिर यह
एक उचित अवसर है कि देश में साप्रदायिक विभेद और तनाव बढ़ाने वालों को
ठीक से पहचाना जाए। सच तो यह है कि मुसलमानों की तरफ से तरह-तरह की
शिकायत, मांग और विरोध आदि को मुस्लिम नेताओं ने उतना नहीं उठाया जितना
ऐसे लिबरल-सेक्युलर कहलाने वाले हिंदू बुद्धिजीवियों ने। ऐसा करते इनमें
न कोई न्याय-बोध रहता है, न साविधानिक या निष्पक्ष आधार। ऐसे लोगों ने
मुस्लिमों के स्वयंभू हितचिंतक बनकर देश के साप्रदायिक वातावरण को जितना
बिगाड़ा है उतना किसी अन्य चीज ने नहीं। इन सेक्युलर बौद्धिकों का
वास्तविक चरित्र घोर पक्षपाती रहा। उनकी हर सक्रियता ने दोनों समुदायों
की मानसिकता पर हानिकारक प्रभाव डाला है। अयोध्या प्रसंग में भी यह बात
बार-बार दिखाई पड़ी। थापर, झा, पणिक्कर आदि ये वही लोग हैं जिन्होंने 1989
में 'पॉलिटिकल एब्यूज ऑफ हिस्ट्री' नामक एक उग्र पुस्तिका लिखकर अयोध्या
विवाद को एक नया आयाम दिया था। उसमें श्रीराम के अस्तित्व को ही नकारा
गया था और हिंदू पक्ष को सीधे-सीधे राजनीति-प्रेरित कहकर हटाने, हराने की
मांग रखी गई थी। इसने विवाद को बुरी तरह बदल दिया। इसके पहले तक विवादित
स्थल पर मात्र कानूनी लड़ाई चल रही थी।
कभी भी मुस्लम पक्ष ने श्रीराम के अस्तित्व आदि पर प्रश्न नहीं उठाया था।
वे तो मात्र वर्तमान नागरिक कानून आदि के आधार पर विवादित ढांचे को अपने
हाथ में रखने की जिद कर रहे थे। इतिहास पर उन्होंने प्रश्न नहीं उठाया
था। यह तो ऐसे सेक्युलर ठग थे, जिन्होंने राम के जन्म का 'ऐतिहासिक
प्रमाण' मांगकर मामला बिगाड़ा। ऐसे बौद्धिकों के हस्तक्षेप में किसी
समाधान की चाह नहीं थी। वे तो बस अपनी हिंदू-विरोधी विचारधारा सब पर
थोपना चाहते थे। बाद में, प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा बनाई गई सरकारी
समिति ने भी इनके बारे में यही पाया। पहले तो उन्हीं इतिहासकारों ने
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के आधिकारिक पैरोकार बनकर मुस्लिम पक्ष को आपसी
समाधान करने से रोका। उन्हें भरोसा दिलाया कि राम या रामजन्मभूमि का कोई
प्रमाण नहीं है और इसी से विवादित स्थल पर उनका एकमात्र हक है, लेकिन जब
प्रधानमंत्री चंद्रशेखर द्वारा दोनों पक्षों को बिठाकर प्रमाणों की
जांच-पड़ताल होने लगी तो मुस्लिम पक्ष के यही पैरोकार बहाना बनाकर बीच
रास्ते भाग खड़े हुए। इन सेक्युलर-वामपंथी बौद्धिकों की नीयत कितनी खराब
थी, यह तब पुन: प्रमाणित हुआ जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2003 में
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को अयोध्या में विवादित स्थल की खुदाई का आदेश
दिया ताकि वहां पहले से राममंदिर होने या न होने का प्रमाण पाया जा सके।
इस पर सबसे आक्रामक प्रतिक्रिया इन्हीं इतिहासकारों की आई जो अब तक
रामजन्मभूमि या मंदिर का प्रमाण मांगते रहे थे! खुदाई का आदेश देने के
लिए इन्होंने न्यायाधीशों पर पक्षपात का आरोप लगाने में भी देर नहीं
लगाई। पुरातत्व सर्वेक्षण पर भी लाछन जड़ा कि वे बेईमानी करेंगे।
अयोध्या मसले के समाधान में इन कथित सेक्युलर लोगों ने हमेशा अड़ंगा लगाया
है। ऐसे लोगों ने 1989-90 में यही किया, फिर वही बाद में और आज भी वे यही
कर रहे हैं। अत: आवश्यक है कि ऐसे कथित सेक्युलर लिबरल बुद्धिजीवियों की
घातक राजनीतिक भूमिका ठीक से परखी जाए। अभी जिस तरह हिंदू-मुस्लिम
समुदायों तथा उनके नेताओं ने न्यायालय के निर्णय पर संयम दिखाया, वह
प्रसन्नता और संतोष की बात होनी चाहिए थी। उनके लिए तो विशेषकर जो स्वयं
को धर्म-मजहब से ऊपर रहकर उन्नति, विकास आदि के लिए फिक्रमंद बताते हैं,
किंतु ठीक इन्हीं लोगों ने एक समुदाय विशेष को भड़काने के लिए फिर
अनावश्यक बयानबाजी आरंभ कर दी है। इस लिबरल-सेक्युलर बौद्धिक गिरोह की
कुटिलता तब और स्पष्ट दिखती है जब याद करें कि यही लोग निर्णय आने से
पहले न्यायालय का 'जो भी निर्णय हो' वह मानने की भरपूर वकालत कर रहे थे।
संविधान की सर्वोच्चता और सामुदायिक सद्भाव को सर्वोपरि रखने की सीख दे
रहे थे। ये सब तर्क उन्होंने निर्णय आते ही तिरोहित कर दिया। क्यों?
कयोंकि उनके सभी तकरें के पीछे सदैव एक घातक राजनीति छिपी होती है।
30 सितंबर से पहले के उनके सभी तर्क एक अनुमान पर आधारित थे कि निर्णय
कुछ और आएगा। अर्थात एक विशेष प्रकार का निर्णय करना, करवाना और मनवाना
ही उनका लक्ष्य था और है। इसीलिए यह निर्णय आने के बाद सामुदायिक शाति
बने रहने पर ठीक यही लोग बुरी तरह असंतुष्ट हैं। वे तरह-तरह से अपनी
अप्रसन्नता प्रकट कर रहे हैं। एक वामपंथी इतिहासकार कह रहे हैं कि
न्यायालय ने कानून का ध्यान छोड़कर मानो पंचायत का फैसला सुना दिया है।
दूसरी प्रखर सेक्युलरवादी बौद्धिका कह रही हैं कि अब मुसलमानों का भारतीय
राजसत्ता से विश्वास उठ गया है। तीसरा इसे न्यायिक नहीं, राजनीतिक निर्णय
बता रहा है।
[एस. शंकर: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]
मंगलवार, 21 सितंबर 2010
स्वाभिमानी राष्ट्र गुलामी के कलंकों को बर्दाश्त नहीं करते : आर्नोल्ड टॉयन्बी
आर्नोल्ड टॉयन्बी आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ इतिहासकार माने जाते हैं। सन 1960 में श्री टॉयन्बी ‘एक व्याख्यानमाला’ में बोलने के लिए दिल्ली आये। ‘भारत और एक विश्व’ विषय पर उनके तीन भाषण हुए। ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ ने ये तीनों भाषण एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किये हैं। श्री टॉयन्बी ने अपने भाषण में पोलैंड का एक उदाहरण दिया कि किस प्रकार पोलैंड ने स्वतंत्र होते ही रूसियों द्वारा बनवाया गया चर्च ध्वस्त कर दिया। श्री टॉयन्बी के शब्दों में,
”सन् 1914-15 में रूसियों ने पोलैंड की राजधानी वार्सा को जीत लिया तो उन्होंने शहर के मुख्य चौक में एक चर्च बनवाया। रूसियों ने यह पोलैंडवासियों को निरन्तर याद करवाने के लिए बनवाया कि पोलैंड में रूस का शासन है। जब पोलैंड 1918 में आजाद हुआ तो पोलैंडवासियों ने पहला काम उस चर्च को ध्वस्त करने का किया, हालांकि नष्ट करने वाले सभी लोग ईसाई मत को मानने वाले ही थे। मैं जब पोलैंड पहुंचा तो चर्च ध्वस्त करने का काम समाप्त हुआ ही था। मैं एक चर्च को ध्वस्त करने के लिए पोलैंड को दोषी नहीं मानता क्योंकि रूस ने वह चर्च राजनीतिक कारणों से बनवाया था। उनका मन्तव्य पोल लोगों का अपमान करना था।‘’
उसी भाषण में श्री टॉयन्बी ने आगे कहा कि, ‘इसी सिलसिले में मैं काशी और मथुरा की मस्जिदों का जिक्र करना चाहूंगा। औरंगजेब ने अपने दुश्मनों को अपमानित करने के लिए जान-बूझकर इन मंदिरों को मस्जिदों में बदल डाला, उसी दुर्भावना के कारण जिसके कारण कि रूसियों ने वार्सा में चर्च बनाया था। इन मस्जिदों का उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि हिन्दुओं के पवित्रतम स्थानों पर भी मुसलमानों की हुकूमत चलती है।”
श्री टॉयन्बी के अनुसार पोलिश लोगों ने समझदारी का काम किया क्योंकि चर्च ध्वस्त करने से रूस और पोलैंड के बीच की शत्रुता की भावना समाप्त हो गई। वह चर्च पोल लोगों को रूस के आक्रमण की याद दिलाता रहता था। आर्नोल्ड टॉयन्बी ने इस बात पर खेद प्रकट किया कि हिन्दुस्थान के लोग हिन्दू और मुस्लिमों में तनाव की जड़ इन मस्जिदों को हटा नहीं रहे हैं। उन्होंने यह कह कर अपनी बात समाप्त की कि, ‘’भारत की इस सहिष्णुता से मैं स्तभ्भित हूं साथ इससे मुझे अपार पीड़ा भी हुई है।‘’
नास्तिक रूसियों ने मूर्तियां स्थापित कीं
यह उन दिनों की घटना है जब रूस में साम्यवाद अपने उफान पर था। सन 1968 में भारत के सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी के नेतृत्व में रूस गया। रूसी दौरे के समय सांसदों को लेनिनग्राद शहर का एक महल दिखाने भी ले जाया गया। वह रूस के ‘जार’ (राजा) का सर्दियों में रहने के लिए बनवाया गया महल था। महल को देखते समय संसद सदस्यों के ध्यान में आया कि पूरा महल तो पुराना लगता था किन्तु कुछ मूर्तियां नई दिखाई देती थीं। पूछताछ करने पर पता लगा कि वे मूर्तियां ग्रीक देवी-देवताओं की हैं। सांसदों में प्रसिद्ध विचारक तथा भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी भी थे। उन्होंने सवाल किया कि, ‘आप तो धर्म और भगवान के खिलाफ हैं, फिर आपकी सरकार ने देवी-देवताओं की मूर्तियों को फिर से बनाकर यहां क्यों रखा है?’ इस पर साथ चल रहे रूसी अधिकारी ने उत्तर दिया, ‘इसमें कोई शक नहीं कि हम घोर नास्तिक हैं किन्तु महायुद्ध के दौरान जब हिटलर की सेनाएं लेनिनग्राद पर पहुंच गई तो वहां हम लोगों ने उनसे जमकर संघार्ष किया। इस कारण जर्मन लोग चिढ़ गये और हमारा अपमान करने के लिए उन्होंने यहां की देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां तोड़ दी। इसके पीछे यही भाव था कि रूस का राष्ट्रीय अपमान किया जाये। हमारी दृष्टि में हमें ही नीचा दिखाया जाये। इस कारण हमने भी प्रणा किया कि महायुद्ध में हमारी विजय होने के पश्चात् राष्ट्रीय सम्मान की पुनर्स्थापना करने के लिए हम इन देवताओं की मूर्तियां फिर से स्थापित करेंगे।
रूसी अधिकारी ने आगे कहा कि, ‘हम तो नास्तिक हैं ही किन्तु मूर्ति भंजन का काम हमारा अपमान करने के लिए किया गया था और इसलिए इस राष्ट्रीय अपमान को धो डालने के लिए हमने इन मूर्तियों का पुनर्निर्माण किया।‘
ये मूर्तियां आज भी जार के ‘विन्टर पैलेस’ में रखी हैं और सैलानियों के मन में कौतुहल जगाती हैं।
दक्षिण कोरिया की कैपिटल बिल्डिंग
दक्षिण कोरिया अनेक वर्षों तक जापान के कब्जे में रहा है। जापानी सत्ताधारियों ने अपनी शासन सुविधा के लिए राजधानी सिओल के बीचों-बीच एक भव्य इमारत बनाई और उसका नाम ‘कैपिटल बिल्डिंग’ रखा। इस समय इस भवन में कोरिया का राष्ट्रीय संग्रहालय है। इस संग्रहालय में अनेक प्राचीन वस्तुओं के साथ जापानियों के अत्याचारों के भी चित्रा हैं।
वर्ष 1995 में दक्षिण कोरिया को आजाद हुए पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं। अत: वहां की सरकार आजादी का स्वर्ण जयंती वर्ष’ धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रही है। इस स्वतंत्राता प्राप्ति की स्वर्णा जयंती महोत्सव का एक प्रमुख कार्यक्रम होगा ‘कैपिटल बिल्डिंग’ को ध्वस्त करना। दक्षिण कोरिया की सरकार ने इस विशाल भवन को गिराने का निर्णय ले लिया है। इसमें स्थित संग्रहालय को नये बन रहे दूसरे भवन में ले जाया जायेगा। इस पूरी कार्रवाई में 1200 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
यह समाचार 2 मार्च 1995 को बी.बी.सी. पर प्रसारित हुआ था। कार्यक्रम में ‘कैपिटल बिल्डिंग’ को भी दिखाया गया। इस भवन में स्थित ‘राष्ट्रीय वस्तु संग्रहालय’ के संचालक से बीबीसी संवाददाता की बातचीत भी दिखाई गई। जब उनसे इस इमारत को नष्ट करने का कारण पूछा गया तो संचालक महोदय ने बताया कि, ‘इस इमारत को देखते ही हमें जापान द्वारा हम पर लादी गई गुलामी की याद आ जाती है। इसको गिराने से जापान और दक्षिण कोरिया के बीच सम्बंधों का नया दौर शुरु हो सकेगा। इसके पीछे बना हमारे राजा का महल लोगों की नजरों से ओझल रहे यही इसको बनाने का उद्देश्य था और इसी कारण हम इसको गिराने जा रहे हैं।‘
दक्षिण कोरिया की जनता ने भी सरकार के इस निर्णय का उत्साहपूर्वक स्वागत किया। (यह भवन उसी वर्ष ध्वस्त कर दिया गया।)
पांच सौ साल पुराने गुलामी के निशान मिटाये कुछ वर्ष पहले तक युगोस्लाविया एक राज्य था जिसके अन्तर्गत कई राष्ट्र थे। साम्यवाद के समाप्त होते ही ये सभी राष्ट्र स्वतंत्र हो गये तथा सर्बिया, क्रोशिया, मान्टेनेग्रो, बोस्निया हर्जेगोविना आदि अलग-अलग नाम से देश बन गये। बोस्निया में अभी भी काफी संख्या में सर्ब लोग हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहां सर्ब काफी संख्या में हैं, इस समय (सन् 1995) सर्बियाई तथा बोस्निया की सेना में युद्ध चल रहा है। इस साल के शुरु में सर्ब सैनिकों ने बोस्निया के कब्जे वाला एक नगर ‘इर्वोनिक’ अपने अधिकार में ले लिया।
इर्वोनिक की एक लाख की आबादी में आधे सर्ब हैं और शेष मुसलमान। सर्ब फौजों के कब्जे के बाद मुसलमान इस शहर से भाग गये तथा बोस्निया के ईसाई यहां आ गये। ब्रंकों ग्रूजिक नाम के एक सर्ब नागरिक को शहर का महापौर भी बना दिया गया। महापौर ने सबसे पहले यह काम किया कि नगर के बाहर बहने वाली ड्रिना नदी के किनारे बनी एक टेकड़ी पर एक ‘क्रास’ लगा दिया। महापौर ने बताया कि, ‘इस स्थान पर हमारा चर्च था जिसे तुर्की के लोगों ने सन् 1463 में ध्वस्त कर डाला था। अब हम उस चर्च को इसी स्थान पर पुन: नये सिरे से खड़ा करेंगे।‘ श्री ग्रूजिक ने यह भी कहा कि तुर्कों की चार सौ साल की सत्ता में उनके द्वारा खड़े किये गये सारे प्रतीक मिटाये जाएंगे। उसी टेकड़ी पर पुराने तुर्क साम्राज्य के रूप में एक मीनार खड़ी थी उसे सर्बों ने ध्वस्त कर दिया। टेकड़ी के नीचे ‘रिजे कॅन्स्का’ नाम की एक मस्जिद को भी बुलडोजर चलाकर मटियामेट कर दिया गया।
यह विस्तृत समाचार अमरीकी समाचार पत्र हेरल्ड ट्रिब्युन में 8 मार्च 1995 को छपा। समाचार लाने वाला संवाददाता लिखता है कि उस टेकड़ी पर पांच सौ साल पहले नष्ट किये गये चर्च की एक घंटी पड़ी हुई थी। महापौर ने अस्थायी क्रॉस पर घंटी टांककर उसको बजाया। घंटी गुंजायमान होने के बाद महापौर ने कहा कि, ‘मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह क्लिंटन (अमरीकी राष्ट्रपति) को थोड़ी अक्ल दे ताकि वह मुसलमानों का साथ छोड़कर उसके सच्चे मित्र ईसाइयों का साथ दे।
सोमनाथ का कलंक मिटाया गया
भारत में जब तक सत्ता की भूख नेताओं के सर पर सवार नहीं हुई थी, गुलामी के प्रतीकों को मिटाने का प्रयत्न किया गया। नागपुर के विधानसभा भवन के सामने लगी रानी विक्टोरिया की संगमरमर की मूर्ति आजादी के बाद हटा दी गई। मुम्बई के काला घोड़ा स्थान पर घोड़े पर सवार इंग्लैंड के राजा की प्रतिमा हटाई गई। विक्टोरिया, एंडवर्ड और जार्ज पंचम से जुड़े अस्पताल, भवन, सड़कों आदि तक के नाम बदले गये। लेकिन जब सत्ता का स्वार्थ और चाहे जैसे हो सत्ता में बने रहने की अंधी लालसा जगी तो दिल्ली की सड़कों के नाम अकबर, जहांगीर, शाहजहां तथा औरंगजेब रोड तक रख दिये गये।
भारत के आजाद होते ही सरदार पटेल ने सोमनाथ का जीर्णोद्धार कराया। उस स्थान पर बनी मस्जिदों व मजारों को ध्वस्त कर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के समारोह में सेकुलरवादी पं. नेहरु के विरोध के बावजूद तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सम्मिलित हुए। उस समय किसी ने मुस्लिम भावनाओं की या मस्जिदें नष्ट न करने की बात नहीं उठाई। इसलिए कि उस समय सरदार पटेल जैसे राष्ट्रवादी नेता थे और देश की जनता में भी आजाद के आंदोलन का कुछ जोश बाकी था। (पाथेय कण)
”सन् 1914-15 में रूसियों ने पोलैंड की राजधानी वार्सा को जीत लिया तो उन्होंने शहर के मुख्य चौक में एक चर्च बनवाया। रूसियों ने यह पोलैंडवासियों को निरन्तर याद करवाने के लिए बनवाया कि पोलैंड में रूस का शासन है। जब पोलैंड 1918 में आजाद हुआ तो पोलैंडवासियों ने पहला काम उस चर्च को ध्वस्त करने का किया, हालांकि नष्ट करने वाले सभी लोग ईसाई मत को मानने वाले ही थे। मैं जब पोलैंड पहुंचा तो चर्च ध्वस्त करने का काम समाप्त हुआ ही था। मैं एक चर्च को ध्वस्त करने के लिए पोलैंड को दोषी नहीं मानता क्योंकि रूस ने वह चर्च राजनीतिक कारणों से बनवाया था। उनका मन्तव्य पोल लोगों का अपमान करना था।‘’
उसी भाषण में श्री टॉयन्बी ने आगे कहा कि, ‘इसी सिलसिले में मैं काशी और मथुरा की मस्जिदों का जिक्र करना चाहूंगा। औरंगजेब ने अपने दुश्मनों को अपमानित करने के लिए जान-बूझकर इन मंदिरों को मस्जिदों में बदल डाला, उसी दुर्भावना के कारण जिसके कारण कि रूसियों ने वार्सा में चर्च बनाया था। इन मस्जिदों का उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि हिन्दुओं के पवित्रतम स्थानों पर भी मुसलमानों की हुकूमत चलती है।”
श्री टॉयन्बी के अनुसार पोलिश लोगों ने समझदारी का काम किया क्योंकि चर्च ध्वस्त करने से रूस और पोलैंड के बीच की शत्रुता की भावना समाप्त हो गई। वह चर्च पोल लोगों को रूस के आक्रमण की याद दिलाता रहता था। आर्नोल्ड टॉयन्बी ने इस बात पर खेद प्रकट किया कि हिन्दुस्थान के लोग हिन्दू और मुस्लिमों में तनाव की जड़ इन मस्जिदों को हटा नहीं रहे हैं। उन्होंने यह कह कर अपनी बात समाप्त की कि, ‘’भारत की इस सहिष्णुता से मैं स्तभ्भित हूं साथ इससे मुझे अपार पीड़ा भी हुई है।‘’
नास्तिक रूसियों ने मूर्तियां स्थापित कीं
यह उन दिनों की घटना है जब रूस में साम्यवाद अपने उफान पर था। सन 1968 में भारत के सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी के नेतृत्व में रूस गया। रूसी दौरे के समय सांसदों को लेनिनग्राद शहर का एक महल दिखाने भी ले जाया गया। वह रूस के ‘जार’ (राजा) का सर्दियों में रहने के लिए बनवाया गया महल था। महल को देखते समय संसद सदस्यों के ध्यान में आया कि पूरा महल तो पुराना लगता था किन्तु कुछ मूर्तियां नई दिखाई देती थीं। पूछताछ करने पर पता लगा कि वे मूर्तियां ग्रीक देवी-देवताओं की हैं। सांसदों में प्रसिद्ध विचारक तथा भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी भी थे। उन्होंने सवाल किया कि, ‘आप तो धर्म और भगवान के खिलाफ हैं, फिर आपकी सरकार ने देवी-देवताओं की मूर्तियों को फिर से बनाकर यहां क्यों रखा है?’ इस पर साथ चल रहे रूसी अधिकारी ने उत्तर दिया, ‘इसमें कोई शक नहीं कि हम घोर नास्तिक हैं किन्तु महायुद्ध के दौरान जब हिटलर की सेनाएं लेनिनग्राद पर पहुंच गई तो वहां हम लोगों ने उनसे जमकर संघार्ष किया। इस कारण जर्मन लोग चिढ़ गये और हमारा अपमान करने के लिए उन्होंने यहां की देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां तोड़ दी। इसके पीछे यही भाव था कि रूस का राष्ट्रीय अपमान किया जाये। हमारी दृष्टि में हमें ही नीचा दिखाया जाये। इस कारण हमने भी प्रणा किया कि महायुद्ध में हमारी विजय होने के पश्चात् राष्ट्रीय सम्मान की पुनर्स्थापना करने के लिए हम इन देवताओं की मूर्तियां फिर से स्थापित करेंगे।
रूसी अधिकारी ने आगे कहा कि, ‘हम तो नास्तिक हैं ही किन्तु मूर्ति भंजन का काम हमारा अपमान करने के लिए किया गया था और इसलिए इस राष्ट्रीय अपमान को धो डालने के लिए हमने इन मूर्तियों का पुनर्निर्माण किया।‘
ये मूर्तियां आज भी जार के ‘विन्टर पैलेस’ में रखी हैं और सैलानियों के मन में कौतुहल जगाती हैं।
दक्षिण कोरिया की कैपिटल बिल्डिंग
दक्षिण कोरिया अनेक वर्षों तक जापान के कब्जे में रहा है। जापानी सत्ताधारियों ने अपनी शासन सुविधा के लिए राजधानी सिओल के बीचों-बीच एक भव्य इमारत बनाई और उसका नाम ‘कैपिटल बिल्डिंग’ रखा। इस समय इस भवन में कोरिया का राष्ट्रीय संग्रहालय है। इस संग्रहालय में अनेक प्राचीन वस्तुओं के साथ जापानियों के अत्याचारों के भी चित्रा हैं।
वर्ष 1995 में दक्षिण कोरिया को आजाद हुए पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं। अत: वहां की सरकार आजादी का स्वर्ण जयंती वर्ष’ धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रही है। इस स्वतंत्राता प्राप्ति की स्वर्णा जयंती महोत्सव का एक प्रमुख कार्यक्रम होगा ‘कैपिटल बिल्डिंग’ को ध्वस्त करना। दक्षिण कोरिया की सरकार ने इस विशाल भवन को गिराने का निर्णय ले लिया है। इसमें स्थित संग्रहालय को नये बन रहे दूसरे भवन में ले जाया जायेगा। इस पूरी कार्रवाई में 1200 करोड़ रुपये खर्च होंगे।
यह समाचार 2 मार्च 1995 को बी.बी.सी. पर प्रसारित हुआ था। कार्यक्रम में ‘कैपिटल बिल्डिंग’ को भी दिखाया गया। इस भवन में स्थित ‘राष्ट्रीय वस्तु संग्रहालय’ के संचालक से बीबीसी संवाददाता की बातचीत भी दिखाई गई। जब उनसे इस इमारत को नष्ट करने का कारण पूछा गया तो संचालक महोदय ने बताया कि, ‘इस इमारत को देखते ही हमें जापान द्वारा हम पर लादी गई गुलामी की याद आ जाती है। इसको गिराने से जापान और दक्षिण कोरिया के बीच सम्बंधों का नया दौर शुरु हो सकेगा। इसके पीछे बना हमारे राजा का महल लोगों की नजरों से ओझल रहे यही इसको बनाने का उद्देश्य था और इसी कारण हम इसको गिराने जा रहे हैं।‘
दक्षिण कोरिया की जनता ने भी सरकार के इस निर्णय का उत्साहपूर्वक स्वागत किया। (यह भवन उसी वर्ष ध्वस्त कर दिया गया।)
पांच सौ साल पुराने गुलामी के निशान मिटाये कुछ वर्ष पहले तक युगोस्लाविया एक राज्य था जिसके अन्तर्गत कई राष्ट्र थे। साम्यवाद के समाप्त होते ही ये सभी राष्ट्र स्वतंत्र हो गये तथा सर्बिया, क्रोशिया, मान्टेनेग्रो, बोस्निया हर्जेगोविना आदि अलग-अलग नाम से देश बन गये। बोस्निया में अभी भी काफी संख्या में सर्ब लोग हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहां सर्ब काफी संख्या में हैं, इस समय (सन् 1995) सर्बियाई तथा बोस्निया की सेना में युद्ध चल रहा है। इस साल के शुरु में सर्ब सैनिकों ने बोस्निया के कब्जे वाला एक नगर ‘इर्वोनिक’ अपने अधिकार में ले लिया।
इर्वोनिक की एक लाख की आबादी में आधे सर्ब हैं और शेष मुसलमान। सर्ब फौजों के कब्जे के बाद मुसलमान इस शहर से भाग गये तथा बोस्निया के ईसाई यहां आ गये। ब्रंकों ग्रूजिक नाम के एक सर्ब नागरिक को शहर का महापौर भी बना दिया गया। महापौर ने सबसे पहले यह काम किया कि नगर के बाहर बहने वाली ड्रिना नदी के किनारे बनी एक टेकड़ी पर एक ‘क्रास’ लगा दिया। महापौर ने बताया कि, ‘इस स्थान पर हमारा चर्च था जिसे तुर्की के लोगों ने सन् 1463 में ध्वस्त कर डाला था। अब हम उस चर्च को इसी स्थान पर पुन: नये सिरे से खड़ा करेंगे।‘ श्री ग्रूजिक ने यह भी कहा कि तुर्कों की चार सौ साल की सत्ता में उनके द्वारा खड़े किये गये सारे प्रतीक मिटाये जाएंगे। उसी टेकड़ी पर पुराने तुर्क साम्राज्य के रूप में एक मीनार खड़ी थी उसे सर्बों ने ध्वस्त कर दिया। टेकड़ी के नीचे ‘रिजे कॅन्स्का’ नाम की एक मस्जिद को भी बुलडोजर चलाकर मटियामेट कर दिया गया।
यह विस्तृत समाचार अमरीकी समाचार पत्र हेरल्ड ट्रिब्युन में 8 मार्च 1995 को छपा। समाचार लाने वाला संवाददाता लिखता है कि उस टेकड़ी पर पांच सौ साल पहले नष्ट किये गये चर्च की एक घंटी पड़ी हुई थी। महापौर ने अस्थायी क्रॉस पर घंटी टांककर उसको बजाया। घंटी गुंजायमान होने के बाद महापौर ने कहा कि, ‘मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह क्लिंटन (अमरीकी राष्ट्रपति) को थोड़ी अक्ल दे ताकि वह मुसलमानों का साथ छोड़कर उसके सच्चे मित्र ईसाइयों का साथ दे।
सोमनाथ का कलंक मिटाया गया
भारत में जब तक सत्ता की भूख नेताओं के सर पर सवार नहीं हुई थी, गुलामी के प्रतीकों को मिटाने का प्रयत्न किया गया। नागपुर के विधानसभा भवन के सामने लगी रानी विक्टोरिया की संगमरमर की मूर्ति आजादी के बाद हटा दी गई। मुम्बई के काला घोड़ा स्थान पर घोड़े पर सवार इंग्लैंड के राजा की प्रतिमा हटाई गई। विक्टोरिया, एंडवर्ड और जार्ज पंचम से जुड़े अस्पताल, भवन, सड़कों आदि तक के नाम बदले गये। लेकिन जब सत्ता का स्वार्थ और चाहे जैसे हो सत्ता में बने रहने की अंधी लालसा जगी तो दिल्ली की सड़कों के नाम अकबर, जहांगीर, शाहजहां तथा औरंगजेब रोड तक रख दिये गये।
भारत के आजाद होते ही सरदार पटेल ने सोमनाथ का जीर्णोद्धार कराया। उस स्थान पर बनी मस्जिदों व मजारों को ध्वस्त कर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के समारोह में सेकुलरवादी पं. नेहरु के विरोध के बावजूद तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सम्मिलित हुए। उस समय किसी ने मुस्लिम भावनाओं की या मस्जिदें नष्ट न करने की बात नहीं उठाई। इसलिए कि उस समय सरदार पटेल जैसे राष्ट्रवादी नेता थे और देश की जनता में भी आजाद के आंदोलन का कुछ जोश बाकी था। (पाथेय कण)
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