मंगलवार, 25 नवंबर 2008
मैं साध्वी प्रज्ञा
जब से सन्यासिन हुई हूं मैं अपने जबलपुर वाले आश्रम से निवास कर रही हूं. आश्रम में मेरा अधिकांश समय ध्यान-साधना, योग, प्राणायम और आध्यात्मिक अध्ययन में ही बीतता था. आश्रम में टीवी इत्यादि देखने की मेरी कोई आदत नहीं है, यहां तक कि आश्रम में अखबार की कोई समुचित व्यवस्था भी नहीं है. आश्रम में रहने के दिनों को छोड़ दें तो बाकी समय मैं उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सों में धार्मिक प्रवचन और अन्य धार्मिक कार्यों को संपन्न कराने के लिए उत्तर भारत में यात्राएं करती हूं. 23-9-2008 से 4-10-2008 के दौरान मैं इंदौर में थी और यहां मैं अपने एक शिष्य अण्णाजी के घर रूकी थी. 4 अक्टूबर की शाम को मैं अपने आश्रम जबलपुर वापस आ गयी.
7-10-2008 को जब मैं अपने जबलपुर के आश्रम में थी तो शाम को महाराष्ट्र से एटीएस के एक पुलिस अधिकारी का फोन मेरे पास आया जिन्होंने अपना नाम सावंत बताया. वे मेरी एलएमएल फ्रीडम बाईक के बारे में जानना चाहते थे. मैंने उनसे कहा कि वह बाईक तो मैंने बहुत पहले बेच दी है. अब मेरा उस बाईक से कोई नाता नहीं है. फिर भी उन्होंने मुझे कहा कि अगर मैं सूरत आ जाऊं तो वे मुझसे कुछ पूछताछ करना चाहते हैं. मेरे लिए तुरंत आश्रम छोड़कर सूरत जाना संभव नहीं था इसलिए मैंने उन्हें कहा कि हो सके तो आप ही जबलपुर आश्रम आ जाईये, आपको जो कुछ पूछताछ करनी है कर लीजिए. लेकिन उन्होंने जबलपुर आने से मना कर दिया और कहा कि जितनी जल्दी हो आप सूरत आ जाईये. फिर मैंने ही सूरत जाने का निश्चय किया और ट्रेन से उज्जैन के रास्ते 10-10-2008 को सुबह सूरत पहुंच गयी. रेलवे स्टेशन पर भीमाभाई पसरीचा मुझे लेने आये थे. उनके साथ मैं उनके निवासस्थान एटाप नगर चली गयी.
यहीं पर सुबह के कोई 10 बजे मेरी सावंत से मुलाकात हुई जो एलएमएल बाईक की खोज करते हुए पहले से ही सूरत में थे. सावंत से मैंने पूछा कि मेरी बाईक के साथ क्या हुआ और उस बाईक के बारे में आप पडताल क्यों कर रहे हैं? श्रीमान सावंत ने मुझे बताया कि पिछले सप्ताह सितंबर में मालेगांव में जो विस्फोट हुआ है उसमें वही बाईक इस्तेमाल की गयी है. यह मेरे लिए भी बिल्कुल नयी जानकारी थी कि मेरी बाईक का इस्तेमाल मालेगांव धमाकों में किया गया है. यह सुनकर मैं सन्न रह गयी. मैंने सावंत को कहा कि आप जिस एलएमएल फ्रीडम बाईक की बात कर रहे हैं उसका रंग और नंबर वही है जिसे मैंने कुछ साल पहले बेच दिया था.
सूरत में सावंत से बातचीत में ही मैंने उन्हें बता दिया था कि वह एलएमएल फ्रीडम बाईक मैंने अक्टूबर 2004 में ही मध्यप्रदेश के श्रीमान जोशी को 24 हजार में बेच दी थी. उसी महीने में मैंने आरटीओ के तहत जरूरी कागजात (टीटी फार्म) पर हस्ताक्षर करके बाईक की लेन-देन पूरी कर दी थी. मैंने साफ तौर पर सावंत को कह दिया था कि अक्टूबर 2004 के बाद से मेरा उस बाईक पर कोई अधिकार नहीं रह गया था. उसका कौन इस्तेमाल कर रहा है इससे भी मेरा कोई मतलब नहीं था. लेकिन सावंत ने कहा कि वे मेरी बात पर विश्वास नहीं कर सकते. इसलिए मुझे उनके साथ मुंबई जाना पड़ेगा ताकि वे और एटीएस के उनके अन्य साथी इस बारे में और पूछताछ कर सकें. पूछताछ के बाद मैं आश्रम आने के लिए आजाद हूं.
यहां यह ध्यान देने की बात है कि सीधे तौर पर मुझे 10-10-2008 को गिरफ्तार नहीं किया गया. मुंबई में पूछताछ के लिए ले जाने की बाबत मुझे कोई सम्मन भी नहीं दिया गया. जबकि मैं चाहती तो मैं सावंत को अपने आश्रम ही आकर पूछताछ करने के लिए मजबूर कर सकती थी क्योंकि एक नागरिक के नाते यह मेरा अधिकार है. लेकिन मैंने सावंत पर विश्वास किया और उनके साथ बातचीत के दौरान मैंने कुछ नहीं छिपाया. मैं सावंत के साथ मुंबई जाने के लिए तैयार हो गयी. सावंत ने कहा कि मैं अपने पिता से भी कहूं कि वे मेरे साथ मुंबई चलें. मैंने सावंत से कहा कि उनकी बढ़ती उम्र को देखते हुए उनको साथ लेकर चलना ठीक नहीं होगा. इसकी बजाय मैंने भीमाभाई को साथ लेकर चलने के लिए कहा जिनके घर में एटीएस मुझसे पूछताछ कर रही थी.
शाम को 5.15 मिनट पर मैं, सावंत और भीमाभाई सूरत से मुंबई के लिए चल पड़े. 10 अक्टूबर को ही देर रात हम लोग मुंबई पहुंच गये. मुझे सीधे कालाचौकी स्थित एटीएस के आफिस ले जाया गया था. इसके बाद अगले दो दिनों तक एटीएस की टीम मुझसे पूछताछ करती रही. उनके सारे सवाल 29-9-2008 को मालेगांव में हुए विस्फोट के इर्द-गिर्द ही घूम रहे थे. मैं उनके हर सवाल का सही और सीधा जवाब दे रही थी.
अक्टूबर को एटीएस ने अपनी पूछताछ का रास्ता बदल दिया. अब उसने उग्र होकर पूछताछ करना शुरू किया. पहले उन्होंने मेरे शिष्य भीमाभाई पसरीचा (जिन्हें मैं सूरत से अपने साथ लाई थी) से कहा कि वह मुझे बेल्ट और डंडे से मेरी हथेलियों, माथे और तलुओं पर प्रहार करे. जब पसरीचा ने ऐसा करने से मना किया तो एटीएस ने पहले उसको मारा-पीटा. आखिरकार वह एटीएस के कहने पर मेरे ऊपर प्रहार करने लगा. कुछ भी हो, वह मेरा शिष्य है और कोई शिष्य अपने गुरू को चोट नहीं पहुंचा सकता. इसलिए प्रहार करते वक्त भी वह इस बात का ध्यान रख रहा था कि मुझे कोई चोट न लग जाए. इसके बाद खानविलकर ने उसको किनारे धकेल दिया और बेल्ट से खुद मेरे हाथों, हथेलियों, पैरों, तलुओं पर प्रहार करने लगा. मेरे शरीर के हिस्सों में अभी भी सूजन मौजूद है.
13 तारीख तक मेरे साथ सुबह, दोपहर और रात में भी मारपीट की गयी. दो बार ऐसा हुआ कि भोर में चार बजे मुझे जगाकर मालेगांव विस्फोट के बारे में मुझसे पूछताछ की गयी. भोर में पूछताछ के दौरान एक मूछवाले आदमी ने मेरे साथ मारपीट की जिसे मैं अभी भी पहचान सकती हूं. इस दौरान एटीएस के लोगों ने मेरे साथ बातचीत में बहुत भद्दी भाषा का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. मेरे गुरू का अपमान किया गया और मेरी पवित्रता पर सवाल किये गये. मुझे इतना परेशान किया गया कि मुझे लगा कि मेरे सामने आत्महत्या करने के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचा है.
14 अक्टूबर को सुबह मुझे कुछ जांच के लिए एटीएस कार्यालय से काफी दूर ले जाया गया जहां से दोपहर में मेरी वापसी हुई. उस दिन मेरी पसरीचा से कोई मुलाकात नहीं हुई. मुझे यह भी पता नहीं था कि वे (पसरीचा) कहां है. 15 अक्टूबर को दोपहर बाद मुझे और पसरीचा को एटीएस के वाहनों में नागपाड़ा स्थित राजदूत होटल ले जाया गया जहां कमरा नंबर 315 और 314 में हमे क्रमशः बंद कर दिया गया. यहां होटल में हमने कोई पैसा जमा नहीं कराया और न ही यहां ठहरने के लिए कोई खानापूर्ति की. सारा काम एटीएस के लोगों ने ही किया.
मुझे होटल में रखने के बाद एटीएस के लोगों ने मुझे एक मोबाईल फोन दिया. एटीएस ने मुझे इसी फोन से अपने कुछ रिश्तेदारों और शिष्यों (जिसमें मेरी एक महिला शिष्य भी शामिल थी) को फोन करने के लिए कहा और कहा कि मैं फोन करके लोगों को बताऊं कि मैं एक होटल में रूकी हूं और सकुशल हूं. मैंने उनसे पहली बार यह पूछा कि आप मुझसे यह सब क्यों कहलाना चाह रहे हैं. समय आनेपर मैं उस महिला शिष्य का नाम भी सार्वजनिक कर दूंगी.
एटीएस की इस प्रताड़ना के बाद मेरे पेट और किडनी में दर्द शुरू हो गया. मुझे भूख लगनी बंद हो गयी. मेरी हालत बिगड़ रही थी. होटल राजदूत में लाने के कुछ ही घण्टे बाद मुझे एक अस्पताल में भर्ती करा दिया गया जिसका नाम सुश्रुसा हास्पिटल था. मुझे आईसीयू में रखा गया. इसके आधे घण्टे के अंदर ही भीमाभाई पसरीचा भी अस्पताल में लाये गये और मेरे लिए जो कुछ जरूरी कागजी कार्यवाही थी वह एटीएस ने भीमाभाई से पूरी करवाई. जैसा कि भीमाभाई ने मुझे बताया कि श्रीमान खानविलकर ने हास्पिटल में पैसे जमा करवाये. इसके बाद पसरीचा को एटीएस वहां से लेकर चली गयी जिसके बाद से मेरा उनसे किसी प्रकार का कोई संपर्क नहीं हो पाया है.
इस अस्पताल में कोई 3-4 दिन मेरा इलाज किया गया. यहां मेरी स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा था तो मुझे यहां से एक अन्य अस्पताल में ले जाया गया जिसका नाम मुझे याद नहीं है. यह एक ऊंची ईमारत वाला अस्पताल था जहां दो-तीन दिन मेरा ईलाज किया गया. इस दौरान मेरे साथ कोई महिला पुलिसकर्मी नहीं रखी गयी. न ही होटल राजदूत में और न ही इन दोनो अस्पतालों में. होटल राजदूत और दोनों अस्पताल में मुझे स्ट्रेचर पर लाया गया, इस दौरान मेरे चेहरे को एक काले कपड़े से ढंककर रखा गया. दूसरे अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मुझे फिर एटीएस के आफिस कालाचौकी लाया गया.
इसके बाद 23-10-2008 को मुझे गिरफ्तार किया गया. गिरफ्तारी के अगले दिन 24-10-2008 को मुझे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, नासिक की कोर्ट में प्रस्तुत किया गया जहां मुझे 3-11-2008 तक पुलिस कस्टडी में रखने का आदेश हुआ. 24 तारीख तक मुझे वकील तो छोड़िये अपने परिवारवालों से भी मिलने की इजाजत नहीं दी गयी. मुझे बिना कानूनी रूप से गिरफ्तार किये ही 23-10-2008 के पहले ही पालीग्रैफिक टेस्ट किया गया. इसके बाद 1-11-2008 को दूसरा पालिग्राफिक टेस्ट किया गया. इसी के साथ मेरा नार्को टेस्ट भी किया गया.
मैं कहना चाहती हूं कि मेरा लाई डिटेक्टर टेस्ट और नार्को एनेल्सिस टेस्ट बिना मेरी अनुमति के किये गये. सभी परीक्षणों के बाद भी मालेगांव विस्फोट में मेरे शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिल रहा था. आखिरकार 2 नवंबर को मुझे मेरी बहन प्रतिभा भगवान झा से मिलने की इजाजत दी गयी. मेरी बहन अपने साथ वकालतनामा लेकर आयी थी जो उसने और उसके पति ने वकील गणेश सोवानी से तैयार करवाया था. हम लोग कोई निजी बातचीत नहीं कर पाये क्योंकि एटीएस को लोग मेरी बातचीत सुन रहे थे. आखिरकार 3 नवंबर को ही सम्माननीय अदालत के कोर्ट रूम में मैं चार-पांच मिनट के लिए अपने वकील गणेश सोवानी से मिल पायी.
10 अक्टूबर के बाद से लगातार मेरे साथ जो कुछ किया गया उसे अपने वकील को मैं चार-पांच मिनट में ही कैसे बता पाती? इसलिए हाथ से लिखकर माननीय अदालत को मेरा जो बयान दिया था उसमें विस्तार से पूरी बात नहीं आ सकी. इसके बाद 11 नवंबर को भायखला जेल में एक महिला कांस्टेबल की मौजूदगी में मुझे अपने वकील गणेश सोवानी से एक बार फिर 4-5 मिनट के लिए मिलने का मौका दिया गया. इसके अगले दिन 13 नवंबर को मुझे फिर से 8-10 मिनट के लिए वकील से मिलने की इजाजत दी गयी. इसके बाद शुक्रवार 14 नवंबर को शाम 4.30 मिनट पर मुझे मेरे वकील से बात करने के लिए 20 मिनट का वक्त दिया गया जिसमें मैंने अपने साथ हुई सारी घटनाएं सिलसिलेवार उन्हें बताई, जिसे यहां प्रस्तुत किया गया है.
(मालेगांव बमकांड के संदेह में गिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर द्वारा नासिक कोर्ट में दिये गये शपथपत्र पर आधारित.)
बुधवार, 19 नवंबर 2008
बुधवार, 29 अक्टूबर 2008
आतंकवाद को सेक्यूलरी जामा पहनाने की कवायद
अनिल सौमित्र
पिछले दिनों आतंकवाद को लेकर एक संप्रदाय विशेष पर उंगलियां उठनी शुरू हो गई थीं। सिमी जैसे संगठनों ने संगठित आतंक के कारण न सिर्फ पुलिस व्यवस्था, बल्कि मुस्लिम समुदाय के नाक में दम कर रखा था। घुसपैठ, आतंकवाद, नक्सलवाद और सांप्रदायिकता से जुड़े कई पहलुओं पर यूपीए सरकार और खास तौर पर कांग्रेस आरोपों के घेरे में थी। भाजपा ने राजनीतिक तौर पर और अन्य संगठनों ने सामाजिक तौर पर कांग्रेस और यूपीए सरकार की घेरेबंदी शुरू कर दी थी। रामसेतु, अमरनाथ भूमि विवाद और अफ़ज़ल को फांसी देने का का मुद्दा केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार के लिए गले की हड्डी बन गया। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस को मुद्दों के साथ-साथ मुस्लिम वोटों को अपने पाले में लाने के लिए मौकों की तलाश है। उसके सामने दूसरी चुनौती थी भाजपा और दूसरे भगवा संगठनों के आरोपों का सामना करने और उसकी धार को कुंद करने की।
मालेगांव विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा के आरोपी बनने से कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इसमें अपनी सारी मुश्किलों का हल ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। न्यूज़ चैनलों पर कुछ टीवी एंकर और कांग्रेस प्रवक्ताओं की बाजीगरी गौर से देखिए, बस थोड़ा सोचिए सब समझ में आ जाएगा। मालेगांव विस्फोट और आतंकवाद पर चर्चा और छानबीन के बजाए पूरा जोर इस पर है कि संघ परिवार और भाजपा को कैसे लपेटे में लिया जाए। कैसे सिद्ध किया जाए कि अब भाजपा भी आतंकवादी संगठन हो गया है। महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते और मध्य प्रदेश व गुजरात पुलिस पर जांच को प्रभावित करने का दबाव बनाया जा रहा है। न्यूज चैनलों की पूर्वाग्रह से ग्रस्त रिपोर्टिंग और विश्लेषण किसी सुनियोजित षड्यंत्र का संकेत देते हैं।
इस मामले को रातोंरात इतना बड़ा बना दिया गया कि उसके कारण आतंकवाद, सीरियल ब्लास्ट, सिमी, मतांतरण, कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या, केरल में संघ के स्वयंसेवकों की हत्या, असम में घुसपैठ विरोधी जनांदोलन, अफ़ज़ल की फांसी और न जाने कितने मुद्दे गौण हो गए। सितंबर, 2006 में मालेगांव में ही हुए उस विस्फोट कैसे भुला दिया गया जिसमें 38 लोग मारे गए थे और अनेक लोग घायल हुए थे। कहना न होगा कि साध्वी प्रज्ञा, अभिनव भारत संगठन और श्रीराम सेना को आरोपी बनाना और संघ परिवार, भाजपा व समूचे हिंदू समाज को कठघरे में खड़ा करना किसी बड़ी सुनियोजित साज़िश का हिस्सा है। फिलहाल तो ऐसा ही लग रहा है कि साज़िश रचने वाले और इसे अमल करने वाले अपने इरादे में सफल हो गए हैं और आतंकवाद के मुद्दे पर आक्रामक संघ परिवार व भाजपा को बैकफुट पर धकेल दिया है।
समूचा संघ परिवार, साधु-संतों के संगठनों और अपने को हिंदुओं का पैरोकार बताने वाले राजनैतिक दलों भाजपा और शिवसेना का साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी मामले में एक अजीब-सी चुप्पी समूचे हिंदू समाज के लिए खतरनाक है। इन संगठनों को सोचना होगा कि सवाल से बचा जाए, चुप्पी साध ली जाए या फ्रंटफुट पर आकर सवाल पूछा जाए और पलटवार किया जाए। यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि हिन्दू समाज अपने ऊपर हो रहे अन्याय कब तक सहता रहेगा। संतों को समाज जागरण के लिए आक्रामक तेवर अपनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? हिन्दू समाज अपने ही देश में न्याय और सम्मान की खातिर क्रुद्ध और हताश क्यों है? सालों से वह पिटता ही क्यों आ रहा है? कांग्रेस के इतने वर्षों के राज में हिन्दू समाज दमन, अपमान और अन्याय का भागीदार ही क्यों बना? आखिर कौन पूछेगा ये सवाल, कौन देगा इन सवालों का जवाब? जब सवाल पूछने वाले ही असमंजस में हों, अंजाने अपराधबोध से ग्रस्त हो जाएं, तो समाज तो अवसादग्रस्त हो ही जाएगा।
पुलिस के एक आला अधिकारी ने व्यक्तिगत चर्चा में इस बात का खुलासा किया कि डंडे के बल पर किसी को भी आरोपी बनाया जा सकता है। किसी से भी कुछ भी कबूल कराया जा सकता है। यह तब और भी आसान हो जाता है जब पुलिस और अन्य सरकारी एजेंसियों का उच्चस्तरीय राजनीतिक दुरुपयोग होने लगे। यह कौन दावा करेगा कि साध्वी प्रज्ञा को पुलिस ने प्रताड़ित नहीं किया। सिर्फ आरोपी से अपराधी और आतंकी जैसा सलूक नहीं किया? अब सिर्फ राज्य पुलिस और विभिन्न आयोगों का ही नहीं, बल्कि सीबीआई, आईबी और विशेष पुलिस दस्ते का भी राजनैतिक उपयोग होने लगा है। जब षड्यंत्र और उसे अमल में लाने की रणनीति सत्ता के शीर्ष स्रोत से हो, तो सामान्य लोगों के लिए इसे समझना मुश्किल हो जाता है। वे तो कही-सुनी गई बातें, टीवी चैनलों की व्याख्या और अखबारों के आंशिक सच को ही संपूर्ण सत्य मान लेते हैं। लेकिन जागरूक पाठक और दर्शक तो आंशिक सच को शक के नजरिये से देखेगा, विवेकपूर्ण विचार करेगा और तब कोई समझ बनाएगा। साध्वी प्रज्ञा के टेलिफोन और मोबाइल में से जांच एजेंसियों के कुछ लक्षित और उद्देश्यप्रेरित नंबरों की ही जांच क्यों की जाए, उन सभी नंबरों से पर्दा उठाया जाए जो उसके पास उबलब्ध है। उनके साथ सिर्फ भाजपा नेताओं के फोटो न दिखाए जांए, बल्कि आज तक के उनके सभी संपर्कों की छानबीन की जाए। सच तब उजागर होगा। तब कई सरकारी एजेंसियों और लोगों व राजनीतिक दलों के बारे में राज खुलेंगे। जांच व्यापक और निष्पक्ष होनी चाहिए, किसी निर्दिष्ट उद्देश्य और लक्ष्य से प्रेरित नहीं।
गांधी की हत्या में भी संघ को फंसाया गया था। इस मामले में न्यायालय द्वारा संघ को निर्दोष करार देने के बाद भी कांग्रेसी और संघ विरोधी आज भी गांधी हत्या के मामले में संघ का नाम लेने से बाज नहीं आते। न्यायालय की इस अवमानना के बारे में कोई कुछ बोलता भी नहीं। तब से लेकर आज तक संघ ही नहीं सभी छोटे-बड़े हिन्दू संगठनों को बदनाम, अपमानित और अस्तित्वहीन कर देने का षड्यंत्र लगातार जारी है। तमिलनाडु में पू. शंकराचार्य जी पर आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार किया गया, उन्हें अपमानित किया गया। अब उस मामले का क्या हुआ, किसी को नहीं मालूम। संभव है साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी भी किसी बड़े राजनीतिक हेतु के लिए किया गया हो। योजनाकार की मंशा पूरी होते ही इसे भी दफन कर दिया जाएगा।
हिन्दू समाज और संगठन आज चारों ओर से विरोधों और आक्रमणों से घिर गया है। दुनियाभर की ईसाई और इस्लामिक ताकतें सुरसा की तरह मुंह बाए भारत को क्षत-विक्षत करने को आतुर हैं। वे भारत को खंडित कर देने का हर संभव प्रयास कर रही हैं। यहां आतंकवाद, नक्सलवाद, मतांतरण और घुसपैठ को देशहित के नज़रिए से देखने के बजाए तुष्टिकरण के चश्में से देखा जा रहा है। देश में काम कर रहे सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों को प्रतिबंध की धमकी दी जा रही है। इन संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया जा रहा है। शेष समाज को इन संगठनों से न जुड़ने की अप्रत्यक्ष चेतावनी दी जा रही है। दुस्साहस का भयावह परिणाम दिखाया जा रहा है। अब आतंकवाद पर वैसी बात नहीं की जाएगी। इसमें सेक्युलरिज़्म का तड़का लगाया जा रहा है। अब मुस्लिम और ईसाई आतंकवाद के साथ थोड़ी चर्चा हिन्दू आतंकवाद की भी होगी।
यह चुप रहने का समय नहीं है। चुप्पी के भयावह और खतरनाक प्रभाव होंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व के पैरोकार सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दलों को आगे आना ही होगा। कोई बोले न बोले, इन्हें बोलना ही पड़ेगा। इन संगठनों को चुनौतियों से मुंह चुराने के बजाए तर्क और त्वरा शक्ति, आक्रामक शैली और संगठन कौशल के साथ आतंकवाद के खिलाफ और साध्वी प्रज्ञा के पक्ष में खड़े होना होगा। यह विचार, संगठन और कार्यकर्ताओं की परीक्षा की घड़ी है। साध्वी प्रज्ञा के गुरु स्वामी अवधेशानंद जी को आगे आकर हिन्दू शक्तियों का उत्साहवर्द्धन करना चाहिए। वह अपने शिष्या के पक्ष में जिरह करें, यह परिस्थितियों की मांग है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सज़ा सुनाने के बाद भी आतंकियों के पक्ष में कितने वकील, समाजसेवी और लेखक-बुद्धिजीवी सामने आ गए थे। आतंकियों के एन्काउंटर में एक पुलिस अधिकारी की शहादत के बाद भी उस मामले की जांच की मांग राजनैतिक दलों द्वारा की गई। उन्हें इसका ज़रा-सा भी मलाल नहीं। आज साध्वी के पक्ष में कोई क्यों नहीं आ रहा? कोई वकील नहीं, कोई पैसे वाला नहीं, कोई लेखक-बुद्धिजीवी नहीं, कोई समाजसेवी नहीं, कोई साधु-संत नहीं, कोई नेता-राजनेता नहीं। क्या सिर्फ इसलिए कि हिन्दू दुनिया में अल्पसंख्यक है, अपने ही देश में जलालत और अपमान की ज़िंदगी जीने को अभिशप्त है! देश के सामने अनेक ज्वलंत समस्याएं और चुनौतियां हैं। ये समस्याएं और चुनौतियां राजनीति और चुनाव के मुद्दे बन गए हैं। भाजपा और उनके सहयोगी दलों ने भरसक कोशिश करके विधानसभा और आने वाले लोकसभा चुनावों में इन्हें मुद्दा बनाने की योजना बखूबी बना ली थी, लेकिन बहुत ही कुशलता से उन मुद्दों से ध्यान बांटने और हटाने की एक चतुर चाल चली गई है। तोप का मुंह चलाने वाले की तरफ ही कर दिया गया है। सभी राष्ट्रवादी शक्तियों को इस चाल से खुद को भी बचाना है और देश व समाज को भी।
आतंकवाद नहीं, सिर्फ मुद्दे से निजात की कोशिश
साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी पर कई सवाल। क्या सचमुच हिंदुओं के सब्र का प्याला भर चुका। क्या रिटायर्ड फौजी भी आतंकवाद के तुष्टिकरण की नीति से खफा। पर इन दो सवालों से पहले एक मूल सवाल। सवाल पुलिस एफआईआर की विश्वसनीयता का। अदालत में आधे केस ठहरते ही नहीं। इमरजेंसी में इसी पुलिस ने कितने मनघढ़ंत केस बनाए। संघ के अधिकारियों पर भैंस चोरी तक के केस बने। बर्तन चोरी तक के केस बनाए गए। अपने पास ऐसे एक-आध नहीं। दर्जनों केसों के सबूत मौजूद। पुलिस आकाओं के इशारे पर काम करने में माहिर। सो पहला अंदेशा राजनीतिक दखल का। आखिर राजनीतिक दखल से ही अफजल की फांसी अब तक नहीं हुई। अगर यह केस राजनीतिक दखल से नहीं बना। तब भी एक तकनीकी सवाल बाकी। क्या मोटर साईकिल का चेसी नंबर ही प्रज्ञा को आतंकी साबित कर देगा? अगर ऐसा संभव। तो दिल्ली के जामा मस्जिद के पीछे जितनी चाहे चेसियां खरीद लो। मोटर साईकिलों की या कारों की भी। अपन को नहीं लगता। कोर्ट में इतना सबूत ही काफी होगा। दिल्ली के करोलबाग में सेकिंडहैंड मोटर साईकिलों का बाजार। हर रोज दर्जनों मोटर साईकिलों की खरीद-फरोख्त। आधे सिर्फ स्टांप पेपर पर बिक जाते हैं। रजिस्ट्री तक नहीं होती। रजिस्ट्री के मामले में कानून में ही सुराख। बेचने वाले की कोई जिम्मेदारी नहीं। रजिस्ट्री करवाना खरीदने वाले की जिम्मेदारी। अपन दो कारें बेच चुके। किसी की रजिस्ट्री करवाने नहीं गए। पर इससे गंभीर किस्सा स्कूटर का। अपन जब चंडीगढ़ में हुआ करते थे। तो अपन ने बजाज का चेतक स्कूटर खरीदा। दिल्ली में जब अपन ने कार ले ली। तो स्कूटर कई महीने गैराज में धूल फांकता रहा। इनकम टेक्स में अपने एक मित्र हुआ करते थे बीबी सिंह। उनने अपने दामाद को देने के लिए अपन से स्कूटर मांगा। तो अपन ने फौरन हां कर दी। खरीद-फरोख्त की बात ही नहीं थी। पर कुछ महीने बाद उनने लिफाफे में रखकर कुछ पैसे थमा दिए। पैसे स्कूटर की कीमत से ज्यादा थे। सो बातचीत की गुंजाइश नहीं बची। बीबी सिंह अब इस दुनिया में नहीं। उनके दामाद का अपन को अता-पता नहीं। कबाड़ में बिका हुआ स्कूटर किसी दिन अपन को आतंकी न बना दे। दुनियादारी में ऐसे सेकड़ों-हजारों किस्से मिलेंगे। कानूनदानों की नजर में प्रज्ञा का मोटर साईकिल सबूत नहीं। तो क्या पुलिस के पास कुछ और भी सबूत। अपन ने आईबी के एक अफसर से पूछा। तो वह बोला- ‘फिलहाल नहीं।’ अब सवाल पुलिस की एफआईआर का। कहीं आतंकवाद का मुद्दा खत्म करने की रणनीति तो नहीं? आतंकवाद की गंभीरता कम करने की साजिश तो नहीं? आखिर बीजेपी वाले कहने लगे थे- ‘हर मुसलमान आतंकी नहीं। पर पकड़ा गया हर आतंकी मुसलमान।’ इस आरोप की हवा निकालने की साजिश तो नहीं? कांग्रेस और यूपीए आतंकवाद का तुष्टिकरण करते पकड़े जा चुके। आतंकवाद के तुष्टिकरण से निजात पाने की कोशिश तो नहीं? सरकार जरा इस पर गंभीरता से सोच ले। हिंदुओं और मुसलमानों में खाई बढ़ा देगी यह साजिश। पर अगर यह सब नहीं। तो क्या सचमुच हिंदुओं के सब्र का प्याला भर चुका। क्या आतंकवादियों के हाथों जान गंवाने वाले फौजियों का शासन से भरोसा उठ चुका? अगर सचमुच प्रज्ञा ने बदला लेने की ठानी? अगर सचमुच रिटायर्ड फौजियों ने प्रज्ञा का साथ दिया? जैसा कि पुलिस की थ्योरी ने कहा। तो सचमुच देश की जनता का हुकमरानों से मोह भंग हो चुका। मोह भंग हो चुका- कि मौजूदा शासक आतंकवाद से निजात दिला सकते हैं। दीपावली पर सरकार को भी रोशनी मिले। तो मुद्दे से नहीं, आतंकवाद से निपटने की कोशिश शुरू हो।
Categories: आतंकवाद, इंडिया गेट से संजय उवाच