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सोमवार, 12 जुलाई 2010

श्री कुप्. सी. सुदर्शन द्वारा रामशंकर अगिन्होत्री को शोक श्रद्धांजलि


आषाढ़ कृष्ण 12 ईस्वी सं. कलियुग - 5112 09-07-2010
कल जब रायपुर से श्री राजेन्द्र दुबे ने समाचार दिया कि मेरे अति आत्मीय, परम मित्र परामर्शदाता व मार्गदर्शक श्री रामशंकर जी अग्निहोत्री परमात्मचरणों में लीन हो गये तो ऐसा लगा कि अभिन्नता में आधा भाग अलग हो गया है। सन् 1942 से 1946 तक, जब मैं मध्यप्रदेश के नर्मदा तटवर्ती जिला केन्द्र मण्डला में 6वीं से 10वीं तक की पढ़ाई कर रहा था, तब रामशंकर जी प्रचारक होकर मण्डल आए थे। तब हम दोनों की उम्र में केवल एक वर्ष का ही अन्तर होने के कारण हम दोनों सही अर्थो में अभिन्न शरीर और संघ मन बन गये थे। उस समय मा. श्री एकनाथ जी रानडे महाकौशल प्रान्त के प्रचारक थे। संघ के अखिल भारतीय अधिकारियों में सर्वप्रथम हम लोगों का परिचय मा. बाबा साहेब आप्टे से हुआ। संघ केवल लाठी-काठी सिखाने वाला अखाड़ा नहीं अपितु हिन्दु समाज को संगठित करने का लक्ष्य लेकर चलने वाला कार्य है। यह बात सर्वप्रथम उन्हीं से सुनी थी। सन् 1947 में महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए जब जबलपुर आया और तत्कालीन राबर्टसन कॉलेज में भर्ती हुआ तो माननीय रामशंकर जी भी वहां पढ़ने आये थे। तभी 30 जनवरी को प्रातः स्मरणीय महात्मा गांधी की हत्या हो गयी और राजनैतिक विद्वेषवश संघ को भी इसमें सम्मिलित मानकर प्रतिबंधित कर दिया गया। प.पू. श्री गुरूजी के आदेश से उसको हटवाने के लिए सत्याग्रह किया गया तो मैं भी तीन माह जैल में रहा और रामशंकर जी भुमिगत रह कर कार्य करते रहे। सन् 54 में मेरे प्रचारक निकलने के पश्चात् रामशंकर जी मेरे प्रांत प्रचारक बने और उनके नेतृत्व में मैं रायगढ़ जिला प्रचारक, सागरनगर प्रचारक तथा विन्ध्य विभाग प्रचारक का दायित्व सम्हालते हुए उनसे सब प्रकार का मार्गदर्शन करता रहा। श्री रामशंकर जी बाद में युग धर्म, राष्ट्र धर्म, आदि दैनिक व मासिक में भी काम करते रहे व हिन्दुस्तान समाचार और विश्व संवाद केन्द्र का भी काम अत्यन्त कुशलता से सम्हाला।
रामजन्म भूमि आन्दोलन के समय तो अयोध्या का विश्व संवाद केन्द्र ही उस अभूतपूर्व आन्दोलन के अद्यतन समाचार जानने का केन्द्र बिन्दु बना रहा यही नहीं विश्व संवाद केन्द्र समाचार सेवा का वही उद्गम भी था। गत वर्ष ही जब रायपुर गया था तब उनसे भेंट हुई थी और खूब देर तक हम अपने भूत काल में विचार करते रहे। रायपुर में वे अमरकंटक के बाबा नागराज द्वारा आविष्कृत जीवन विद्या का प्रचार करने के लिए रायपुर आ गये थे और दीनदयाल मानव अध्ययन केन्द्र का अध्यक्ष पद सम्हाल रहे थे।
ऐसे मेरे प्रायः संपूर्ण जीवन के साथी मा. रामशंकर जी तो इहलोक का अपना कर्तव्य निभा कर चले गये। मुझको भी देर सवेर उसी पथ का राही बनना है अतः उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत भोपाल में
सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम में शामिल हुए
भोपाल 26 फरवरी। अपने तीन दिवसीय प्रवास पर 26 फरवरी को सांय 7ः25 बजे मुंबई से भोपाल पधार रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत शनिवार, 27 फरवरी को सुबह 10ः00 बजे सामाजिक सद्भावना बैठक में भाग लेंगे। सद्भावना बैठक को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी संबोधित करेंगे। बैठक का आयोजन शहीद भवन, विधायक विश्राम गृह के पास, मालवीय नगर, में किया गया है। बैठक में 100 से अधिक विभिन्न जाति, धर्म, संप्र्रदाय के भोपाल जिले के पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे। हिन्दू समागम आयोजन समिति के महासचिव श्री दीपक शर्मा ने बताया कि सरसंघचालक श्री मोहनजी भागवत रविवार, 28 फरवरी को सांय 4 बजे लाल परेड मैदान में होने जा रहे हिन्दू समागम को संबोधित करेंगे। इस दौरान उनके साथ अखिल भारतीय सह शारीरिक प्रमुख श्री अनिल ओक, अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख श्री हस्तीमलजी, क्षेत्र संघचालक श्रीकृष्ण माहेश्वरी सहित समिति व संघ के पदाधिकारी भी उपस्थित रहेंगे।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक कांतिलाल चतर ने बताया कि हिन्दू समागम के लिये भोपाल महानगर के 40 हजार परिवारों से सीधा संपर्क किया जा चुका है। विभिन्न समूह बनाकर सामाजिक व धासद्भावना समाज और राष्ट्र को विकसित और सुरक्षित करने का आधार है ः परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत
भोपाल 27 फरवरी। समाज में सुधार, विकास, सेवा का कार्य करते हुए अपने कार्य में अन्य समाज के लोगों को बुलाने से समाज में सामाजिक सद्भाव उत्पन्न किया जा सकता है। समाज को विकसित और सुरक्षित रखने के लिये एक रहना आवश्यक है। सद्भावना समाज और राष्ट्र को विकसित और सुरक्षित करने का आधार है। मनुष्य को आपस में भेदभाव नहीं करनी चाहिये। उक्त बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी ने आज यहां सामाजिक सद्भावना बैठक में प्रस्ताविक उद्बोधन देते हुए कही। यह उनकी 24वीं बैठक थी इसके पूर्व 23 प्रांतों के प्रांतीय मुख्यालयों इसी तरह की बैठकों को सम्बोधित कर चुके हैं। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र संचालक श्री श्रीकृष्ण माहेश्वरी, क्षेत्रीय प्रचारक विनोद कुमार, मध्य भारत प्रांत के संघचालक श्री शशिभाई सेठ, विभाग संघचालक श्री कांतिलाल चतर, हिन्दू समागम आयोजन समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आर.डी. शुक्ला, महासचिव दीपक शर्मा सहित हिन्दू समाज के संत, धर्माचार्य तथा 100 से अधिक सामाजिक संगठनों के सैकड़ों पदाधिकारी व प्रतिनिधि उपस्थित थे।
प.पू. सरसंघचालक श्री भागवतजी ने सामाजिक समरसता के लिये दलितों, पिछड़ों, उपेक्षितों, अनुसूचित जाति@जनजाति की उपेक्षा नहीं करने, उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने तथा उनके दुःख में शामिल होते हुए उन्हें समाज में यथोचित सम्मान और सत्कार दिये जाने की अपील की।
डॉ. भागवतजी ने कहा कि भारत आक्रमणग्रस्त है। यदि हिन्दू समाज एकजुट होकर खड़ा हो जाता है तो भविष्य में भारत किसी भी आक्रमण को सहन कर सकता है। इनसे भली-भांति परिचित विदेशी ताकतें अपने स्वार्थ और एकाधिकार के चलते हिन्दू समाज को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं जो कदापि नहीं होने दिया जायेगा। इसके लिए उन्होंने हिन्दू समाज को एकजुट होने का आव्हान किया।
श्री भागवतजी ने प्रांत स्तर पर वर्ष में दो बार सामाजिक सद्भावना बैठक करने और उसे विकासखण्ड स्तर से नीचे गांवों तक ले जाने की बात पर जोर दिया।
कार्यक्रम में समाज के विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों ने सामाजिक कार्यों के बारे में जानकारी दी और समाज को एकजुट रखने के लिये सुझाव भी दिये।
प्रारंभ में आमंत्रित संतों, धर्माचार्यों को श्री कांतिलालजी चतर द्वारा तिलक लगाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का समापन वंदेमातरम् गीत से किया गया जिसे बालिका पूर्वी सप्रे ने प्रस्तुत किया। संचालन सोमकांत उमालकर ने किया।
र्मिक संगठनों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, सीए, शिक्षकों, प्रोफेसरों, पत्रकारों, लेखकों, रंगकर्मियों, विद्यार्थियों आदि से सम्पर्क किया जा चुका है। हिन्दू समागम में नारी शक्ति की विशेष सहभागिता दिखाई दें इसके लिये सभी क्षेत्रों में कार्यरत् बहिनों से सम्पर्क हेतु अब तक महिलाओं की 50 बैठकें की जा चुकी हैं।

सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम में शामिल हुए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत भोपाल में
सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम में शामिल हुए
भोपाल 26 फरवरी। अपने तीन दिवसीय प्रवास पर 26 फरवरी को सांय 7ः25 बजे मुंबई से भोपाल पधार रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत शनिवार, 27 फरवरी को सुबह 10ः00 बजे सामाजिक सद्भावना बैठक में भाग लेंगे। सद्भावना बैठक को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी संबोधित करेंगे। बैठक का आयोजन शहीद भवन, विधायक विश्राम गृह के पास, मालवीय नगर, में किया गया है। बैठक में 100 से अधिक विभिन्न जाति, धर्म, संप्र्रदाय के भोपाल जिले के पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे। हिन्दू समागम आयोजन समिति के महासचिव श्री दीपक शर्मा ने बताया कि सरसंघचालक श्री मोहनजी भागवत रविवार, 28 फरवरी को सांय 4 बजे लाल परेड मैदान में होने जा रहे हिन्दू समागम को संबोधित करेंगे। इस दौरान उनके साथ अखिल भारतीय सह शारीरिक प्रमुख श्री अनिल ओक, अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख श्री हस्तीमलजी, क्षेत्र संघचालक श्रीकृष्ण माहेश्वरी सहित समिति व संघ के पदाधिकारी भी उपस्थित रहेंगे।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक कांतिलाल चतर ने बताया कि हिन्दू समागम के लिये भोपाल महानगर के 40 हजार परिवारों से सीधा संपर्क किया जा चुका है। विभिन्न समूह बनाकर सामाजिक व धार्मिक संगठनों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, सीए, शिक्षकों, प्रोफेसरों, पत्रकारों, लेखकों, रंगकर्मियों, विद्यार्थियों आदि से सम्पर्क किया जा चुका है। हिन्दू समागम में नारी शक्ति की विशेष सहभागिता दिखाई दें इसके लिये सभी क्षेत्रों में कार्यरत् बहिनों से सम्पर्क हेतु अब तक महिलाओं की 50 बैठकें की जा चुकी हैं।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल, युगाब्द 5111
दिनांक: 9,10,11 अक्टूबर, 2009
राजगृह, नालन्दा (बिहार)

प्रस्ताव क्र॰: 1
सीमा सुरक्षा सुदृढ़ करें

अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल भारत - तिब्बत (चीन अधिकृत) सीमा पर हुए हाल के घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त करता है। विस्तारवादी चीन द्वारा हमारे भू-भाग पर कब्जा जमाने के निरंतर प्रयासों को कई समाचार माध्यमों ने उजागर किया है और अपने सुरक्षा विभाग के जिम्मेवार अधिकारियों ने भी इसकी पुष्टि की है।
अकेले गत वर्ष में ही इन रपटों ने चीन की ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ द्वारा नियंत्रण रेखा के
270 उल्लंघन और ‘आक्रामक सीमा चैकसी’ की 2285 घटनाएँ होने की पुष्टि की है। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था पर दुःखद टिप्पणी है कि हमारे भू-भाग के बारे में विरोधियों की कुटिल योजनाओं के प्रति देश की जनता को सचेत करने के स्थान पर कानूनी कार्यवाही द्वारा मीडिया के स्वरों को दबाने का प्रयास हुआ है और आसन्न खतरे को निर्लज्जतापूर्वक कम दिखाने का भी प्रयास हुआ है। चीन की आक्रामक गतिविधियों के विरोध में अपनी तैयारी के विषय में हमारे नेताओं द्वारा दिये जा रहे पराभूत मनोवृत्ति वाले वक्तव्य अत्यन्त निराशाजनक एवं मनोबल गिराने वाले हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे आस-पास के देशों के आक्रामक व्यवहार के प्रति हमारी प्रतिक्रिया सदैव ढीली-ढाली रहती है। परम श्रद्धेय दलाई लामा को शरण देने के ऐतिहासिक निर्णय को छोड़ दें तो, तिब्बत के प्रश्न पर हमने निरंतर गलतियाँ की हैं और अंततः सार्वभौम व स्वतंत्र तिब्बत पर चीनी कब्जे को मान्यता ही दे दी है। चीन ने 50 के दशक में लद्दाख के अक्साई चिन पर कब्जा जमा लिया। हमारे अन्य भी भू-भाग हड़पने के चीन के षड्यंत्र के परिणामस्वरूप 1987 में सुंदोरांग चू घाटी के विषय में हमें अपमानजनक समझौता करना पड़ा। हमारी कमजोरी का लाभ उठाकर अब तो चीन ने पूरे अरुणाचल प्रदेश पर ही अपना दावा करना प्रारम्भ कर दिया है।
अ.भा.का.मं. का मानना है कि इस प्रकार के आक्रमणकारी रवैये पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया सर्वथा अपर्याप्त रही है। कार्यकारी मंडल सरकार से आवाहन करता है कि भारत-तिब्बत सीमा को और साथ ही साथ समुद्री सीमा, भारत-पाक एवं भारत-बांग्लादेश सीमा को भी सुदृढ़ करने के लिए तुरन्त कदम उठाए। चीन द्वारा सीमा के उस पार भारी सैन्य बल का एकत्रीकरण और ढाँचागत व्यवस्थाओं के निर्माण को देखते हुए हमें भारत-तिब्बत सीमा पर अपने सैन्य बल की प्रत्युत्तर क्षमता को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है।
कूटनीतिक संवाद, घेरना और हमारे शत्रुओं को प्रोत्साहन देना - इन तीन बातों का भारत को परेशान करने के लिए चीन व्यूहात्मक शस्त्र के रूप में प्रयोग करता है। दक्षिण म्यांमा के
कोको द्वीप में स्थित उनकी गश्ती चैकी को उन्होंने पूर्णरूपेण सेना चैकी के रूप में विकसित कर लिया है। श्रीलंका में चीन एक वाणिज्य बंदरगाह का निर्माण कर रहा है जबकि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में उसके द्वारा बनाया गया ग्वादर सैनिक बंदरगाह कामकाज के लिये तैयार हो चुका है। एक ओर वह भारत-तिब्बत सीमा को सैनिकी उŸोजना के लिये उपयोग में ला रहा है तो दूसरी ओर पूर्वोŸार भारत में स्थित आतंकवादी और राष्ट्रविरोधी तत्वों की मदद करने के लिए भारत-म्यांमा सीमा का दुरुपयोग कर रहा है। वह भारत को तोड़ने की बात तक करने लगा है।
कार्यकारी मंडल को खेद के साथ कहना पड़ता है कि सरकार के इस ढुलमुल रवैये
की कीमत भारत को न केवल सीमा पर अपितु कूटनीतिक मोर्चे पर भी चुकानी पड़ रही है।
‘ एशियन डेवलपमेंट बैंक ’ में अरुणाचल प्रदेश का मुद्दा उठाकर उस राज्य के विकास के लिए ऋण प्राप्त करने के भारत के प्रयासों को बाधित करने में चीन सफल हुआ है। चीन ने परमाणु आपूर्ति समूह के देशों को भारत के विरुद्ध लगे प्रतिबंधों को हटाने से रोकने का असफल प्रयास भी किया है।
अ.भा.का.मं. सरकार को स्मरण दिलाना चाहता है कि उसे संसद द्वारा 14 नवम्बर, 1962 को पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव की भावना के प्रकाश में कदम उठाना चाहिए, जिसमें चीन द्वारा हड़पी गई सारी भूमि वापस प्राप्त करने की बात स्पष्ट रूप से कही गई थी। भारत सरकार को चीन से स्पष्ट रूप से कह देना चाहिए कि वह पश्चिमी क्षेत्र में हड़पे गये भू-भाग को वापस करे और अन्य क्षेत्रों के संदर्भ में कोई दावा पेश न करे। चीन से कहा जाए कि वह मैकमोहन रेखा को भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में उसी तरह मान्यता दे जिस तरह उसने चीन-म्यांमा सीमा पर उसे दी है।
यह बात चिन्ताजनक है कि अरुणाचल प्रदेश व कश्मीर के नागरिकों को चीन ‘पेपर वीसा’ दे रहा है। इस उकसाने वाली कारवाई से चीन दिखाना चाहता है कि अरुणाचल प्रदेश व कश्मीर को वह भारत के अविभाज्य अंग के रूप में स्वीकार नहीं करता। कार्यकारी मंडल माँग करता है कि सरकार आव्रजन अधिकारियों को आदेश दे कि, लोगों को देश से बाहर जाने के लिये इस प्रकार के ‘पेपर वीसा’ के प्रयोग पर तत्काल प्रतिबंध लगाये। आक्रामक दौत्य नीति के साथ इस प्रकार के दृढ़ कदम ही चीन के संबंध में अनुकूल परिणाम दे सकते हैं।
भारत-पाक मोर्चे पर भी इसी तरह की चिंताओं को कार्यकारी मंडल रेखांकित करना चाहता है। विशेषकर 9 जुलाई 2009 का भारत और पाक के प्रधानमंत्रियों का शर्म-अल-शेख का
संयुक्त वक्तव्य देश को स्तब्ध कर देने वाला है। अनेक विशेषज्ञ और विभिन्न राजनीतिक दलो के नेताओं ने इस वक्तव्य की दौत्य संबंधी भारी भूलों को उजागर किया है, जैसे - बलूचिस्तान मुद्दे को उसमें लाना और पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को जारी रखने पर भी उससे वात्र्ता पुनः प्रारम्भ करने की सहमति व्यक्त करना।
अ.भा.का.मं. माँग करता है कि पाकिस्तान के संबंध में भी संसद के 22 फरवरी 1994 के सर्वसम्मत प्रस्ताव की भावना का सरकार पालन करे, जिसमें कहा गया है कि पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में वापस लाना ही एक मात्र मुद्दा है।
कार्यकारी मंडल हमारी सीमाओं की रक्षा में लगे बहादुर जवानों एवं अधिकारियों के शौर्यपूर्ण कृत्यों का अभिनंदन करता है और देशवासियों से आवाहन करता है कि वे सदैव सतर्क रह कर सरकार को अपनी भौगोलिक अखंडता एवं स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए बाध्य करें ।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

ऊँ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
’’समिधा‘‘ संघ कार्यालय, ई-2/187, महावीर नगर, भोपाल-462016
दूरभाष-07ःः7241004, फैक्स-07ःः-2421055, अणुडाक-ोेनकंतेींद2009/तमकपििउंपसण्बवउ

कुप्. सी. सुदर्षन

तिथि: कार्तिक कृष्ण 2 ईसवी दिनांक 06.10.2009
कलियुग-5111 पटना, बिहार

आज पटना पहुंचते ही यह अति दुःखद समाचार मिला कि हमारे वरिष्ठ प्रचारक श्री प्यारेलाल जी खण्डेलवाल हम सबको छोड़कर परमधाम सिधार गये। सन् 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगे प्रथम प्रतिबंध के समय संघ कार्य पर आए संकट को दूर करने और आगे उसकी अभिवृद्धि के लिए जिन प्रचारकों ने अपना जीवन लगाने का संकल्प किया उनमें श्री प्यारेलाल जी भी एक थे। इंदौर नगर के प्रचारक के रुप में कार्यारम्भ कर उन्होंने जिला, विभाग ऐसे अनेक दायित्व सम्हाले और सन् 1964 में जनसंघ की मध्यप्रदेष इकाई में उनकी योग्यता हुई। तब से कुछ वर्षों पूर्व तक उन्होंने राजनैतिक क्षेत्र में अपनी सेवाएं समर्पित की।
पहल जनसंघ और बाद में आपातकाल के पश्चात् भारतीय जनता पार्टी में न एक कर्मठ, निरलस, अकुतोभय एवं कुषल संगठन के रुप में विख्यात रहे। आज की मूल्यविहीन राजनीति में जिन कुछ लोगों ने आचरण का आदर्ष प्रस्तुत किया उनमें श्री प्यारेलाल जी भी एक रहे। मूल्यों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। सन् 1989 मे लोकसभा सदस्य के रुप में निर्वाचित होकर ढ़ाई वर्ष तक लोकसभा में तथा सन् 1998 से लेकर जब तक राज्यसभा में उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया।
गत तीन वर्षों से वे बीमार चल रहे थे। बीच में अ.भा.आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती रहे तथा हम लोगों में से अनेक उनसे मिलने भी गये थे। अपनी प्रवास इच्छा-षक्ति के बल पर वे रोगों से जूझते रहे। शारीरिक दुर्बलता के बाद भी उन्हें कार्य की सतत चिन्ता रहा करती थी, यहां तक कि अस्वस्थ होते हुये भी 29 जुलाई 2009 केा दिल्ली में स्वयंसेवक सांसदों के श्री गुरुदक्षिणा उत्सव के कार्यक्रम में वे सम्मिलित हुये। इतने वर्षों के उनके सार्वजनिक जीवन में समाज का जो बहुत बड़ा वर्ग जो उनके सम्पर्क में आया था उन सबका शोक संतप्त होना स्वाभाविक है। पर नियति के आगे किसी का बस नहीं चलता और वे हम सबको छोड़ गये।
दिनांक 07 अक्टूबर से राजगीर में प्रारंभ हो रही अ.भा.कार्यकारी मंडल की बैठक के पूर्व संघ के केन्द्रीय पदाधिकारियों की यह बैठक श्री प्यारेलालजी के बड़े भाई श्री गुलाबचन्द खण्डेलवाल, उनके परिवारजनों तथा स्नेहीजनों एवं सहयोगियों के शोक में सहभागी होतु हुये स्व. श्री प्यारेलालजी को अश्रुपूर्ण श्रद्धाजंलि अर्पित करती हैं।
ऊँ पूर्णमदःपूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावषिष्यते।
ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः
अपठित हस्ताक्षर सहित केन्द्रीय पदाधिकारियों की सूची -
सरसंघचालक - पू. श्री मोहनराव भागवत
सरकार्यवाह - मा. श्री भैयाजी जोषी
सह सरकार्यवाह - मा. सुरेषजी सोनी
सह सरकार्यवाह - मा. दत्तात्रय होसबाले
अ.भा. बौद्धिक प्रमुख - मा. भागय्या जी
अ.भा. शारीरिक प्रमुख - मा. कण्णन जी
अ.भा. प्रचार प्रमुख - मा. मनमोहनजी
अ.भा. सह सेवा प्रमुख - मा. सुहास हिरेमठ
अ.भा. प्रचारक प्रमुख - मा. मदनदासजी
अ.भा. सह प्रचारक प्रमुख - मा. श्रीकृष्णजी मोतलग
अ.भा. कार्यकारिणी सदस्य - मा. इंदे्रषजी
निवृत्त सरसंघचालक - मा. सुदर्षनजी
अ.भा. कार्यकारिणी सदस्य - मा. मधुभाई कुलकर्णी

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009













झिरी गांव - अब आदर्श ग्राम का सपना दूर नहीं
संघ की शाखा का प्रभाव, आदर्श बने झिरी गांव
संघ के स्वयंसेवकों के लिए यह गर्व का विषय है, अपने स्वप्न को साकार हुआ देखना गौरवान्वित करता है। मीडिया के लिए यह कौतुहल का मुद्दा है। आखिर पूरा गांव संस्कृतमय कैसे है! बच्चा-बच्चा संस्कृत कैसे बोलता-समझता है। शोधार्थियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण विषय है। एक समूचा गांव स्वावलंबी और समर्थ कैसे बना, संपूर्ण समाज समरस कैसे है, गांव को सम्पन्न और समृद्ध बनाने वाले प्रेरक तत्व कौन-कौन हैं, गांव में स्व विकास का दौर कब और कैसे शुरू हुआ- ये और ऐसे कई सवाल हैं जो झिरी गांव को गर्व, कौतुहल और शोध का विषय बनाते है। झिरी गांव का प्रयोग संघ विरोधियों को विरोध का नहीं बल्कि विचार का विषय दे रहा है। संघ सिर्फ लाठी और चड्डी (निकर) वालों का ही संगठन नहीं है। संघ जीवन के सभी क्षेत्रों में व्याप्त हुआ है - ग्राम विकास के क्षेत्र में भी। यह ग्राम विकास पश्चिमी विकास माॅडल को नकारता और भारतीय पारंपरिक विकास प्रतिरूपों का दर्शन कराता है। झिरी गांव राजगढ़ जिले में है। प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 200 किमी की दूरी पर। एक गांव के कारण मध्यप्रदेश ही नहीं पूरे देश में राजगढ़ की चर्चा है। संभव है यह चर्चा राष्ट्र की सीमाओं को लांघ जाए। आखिर इस गांव के बारे में इतनी बातें क्यों हो रही है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक कुप्हल्ली सीतारमैया सुदर्शन 9 फरवरी को झिरी गांव गए। इसके पहले वे शाजापुर में संघ कार्यकर्ताओं के दो दिवसीय प्रांतीय शिविर में थे। झिरी ग्राम पंहुचकर संघ प्रमुख घर-घर गए। एक-एक घर विकास, स्वावलंबन और समरसता का संदेश दे रहा था। जगह-जगह संस्कृत में लिखे वाक्य और पारंपरिक तौर पर स्वागत से संघ प्रमुख अभिभूत थे। उनकी खुशी का कारण भी था- वे संघ का सपना साकार होते देख रहे थे। स्वयंसेवकों का प्रयास और शाखा का प्रभाव संघ प्रमुख की आंखों के सामने था। 110 परिवार और लगभग 800 की आबादी वाला यह गांव स्वावलंबन और समरसता का परिचय दे रहा है। पानी, अन्न, शिक्षा और रोजगार के मामले में गांव स्वावलंबी है। विवाद और न्यायालयीन मामले ढूंढने पड़ते हैं। कुछ र्है भी तो स्थानीय समाधान पाकर खत्म होने की कगार पर। पूरा गांव संस्कृतमय। बच्चे-बूढ़े और जवान, स्त्री-पुरूष, गरीब-अमीर सभी संस्कृत में बातें करते हैं। अब गांव स्वयं को देववाणी में अभिव्यक्त कर रहा है। यह सब आश्चर्यजनक तो है, लेकिन हकीकत है। संघ के पुराने स्वयंसेवक बताते हैं। इस गांव में सन् 1978 में पहली बार शाखा लगी। पहले शाखा शुरू हुई और व्यवस्थित हुई। धीरे-धीरे यह शाखा प्रभावी होने लगी। प्रभावी शाखा का मतलब है - आस-पास के परिवेश और वातावरण को प्रभावित करने वाली शाखा। देशभर में शाखाओं को प्रभावी बनाने की संघ की पुरानी चाहत रही है। झिरी गांव की शाखा एक नमूना है। देशभर में ऐसी और भी कई शाखाएं हैं, लेकिन झिरी की यह शाखा, प्रभाव का नायाब नमूना है। शाखा के प्रभाववश झिरी गांव व्यवस्थित होने लगा हैं। शुरूआत गांव के जीर्ण-शीर्ण विद्यालय के जीर्णोद्धार से हुई। बाद में परंपरागत जल संरचनाओं का नवीनीकरण और नई संरचनाओं का निर्माण हुआ। खेती को रासायनिक प्रयोगों से मुक्त करने की कवायद की गई। अब गांव में जैविक खेती होती है। पानी और अन्न की उपलब्धता पूरे साल रहती है। लोगों की शिक्षा और साक्षरता के लिए वैयक्तिक और संागठनिक तौर पर कोशिश की जा रही है। गांव में भिन्न-भिन्न जाति वर्ग के लोग तो हैं, लेकिन वैमनस्य का नामोनिशान नहीं। समरसता की झलक चारों ओर दिखती है। गांव से पलायन नहीं है। हां, लोगबाग रोजगार की तलाश जरूर करते हैं। लेकिन वे रोजगार पाने में सक्षम हुए हैं। वे अब अवसरों का बेहतर लाभ ले सकते हैं। उदय सिंह चैहान इसी गांव के निवासी हैं। संघ के स्वयंसेवक और कार्यकर्ता हैं और संस्कृत भारती संगठन के जिला प्रमुख भी । श्री चैहान गांव में संस्कृत विकास के बाबत बताते हैं- वर्ष 2002-03 से झिरी गांव में संस्कृत का प्रचार-प्रसार श्ुारू हुआ। संस्कृत भारती की दो महिला पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं ने यहां काम शुरू किया। गौरतलब है कि इसमें से एक कार्यकर्ता मतान्तरित इसाई है। विमला पन्ना और बालाप्रसाद तिवारी ने गांव के लोगों को संस्कृत सिखाना शुरू किया। आज गांव के समस्त बाल, युवा और वृद्ध संस्कृत बोलते है। झिरी आज संस्कृत ग्राम बन चुका है। अब तो आस-पास के गांव भी संस्कृत अपनाने लगे हैं। झिरी गांव की प्रभावी शाखा ने गांव को ही प्रभावी बना दिया है। अब खरबूजे (झिरी) को देख आस-पास के खरबूजे (मंडला और सुसाहेड़ी) भी रंग बदलने लगे हैं। संघ के सरसंघलाचक श्री कुप्.सी. सुदर्शनजी ने गांव के लोगों के बीच बोलते हुए कहा कि चाहे ग्राम विकास हो या संगठन का विकास, कुछ लोगों को विशेष प्रयास करना होता है। अगर संकल्प के साथ काम करें तो हमें कोई रोक नहीं सकता। प्रगति के लिए समूचे समाज को हाथ मिलाकर रास्ते खोजने होंगे। गांव के पिछडेपन, गरीबी और दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियों, खासकर नेहरू की पश्चिमी परस्त नीतियों को जिम्मेवार बताते हुए उन्होंने कहा कि श्री नेहरू के प्रधानमंत्री बनने से शहरों का विकास हुआ, गांवों का नहीं। वे शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के पोषक थे, ग्रामीण विकास के नहीं। नेहरू ने यह सब पश्चिमी प्रभाव के कारण किया। अंग्रेजों के समय से ही शहरों के विकास पर विशेष बल दिया गया, लेकिन गांव की उपेक्षा की गई। नेहरू ने भी इसी नीति को आगे बढ़ाया। जबकि सच्चाई यही है कि गांवों के विकास से ही देश का विकास संभव है। गांव के लोग समृद्ध होंगे तभी देश समृद्ध होगा। हमें गांव के सर्वांगीण विकास पर जोर देना है। संघ प्रमुख ने अपना उद्बोधन संस्कृत में न दे पाने के कारण गांव के लोगों से क्षमा मांगी। उन्होंने कहा कि झिरी अब ‘प्रभात ग्राम’ की श्रेणी में आ गया है। संघ ने ग्राम विकास की दृष्टि गांवों की तीन श्रेणियां बना रखी है। संघ के मुताबिक गांव पहले किरण, फिर प्रभात और अंत में उदय ग्राम का दर्जा पायेंगे। सभी के लिए अलग-अलग मानक भी तय किए गए हैं। गौरतलब है कि प्रभात ग्राम के मानकों पर खरे उतरने के बाद ही झिरी को प्रभात ग्राम का दर्जा मिला है। झिरी को अब उदय ग्राम बनना है। तभी वह संपूर्ण आदर्श ग्राम बन पायेगा। श्री सुदर्शन जी ने कहा कि गांव को ‘प्राकृतिक खेती’ का केन्द्र बनाया जाए। यह गांव पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकता है। मध्यप्रदेश सरकार के मुखिया श्री शिवराज सिंह चैहान ने ‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’ का नारा दिया है। लेकिन नारा सरकारी प्रयासों से पूरा नहीं हो सकता। झिरी ग्राम, सामुदायिक प्रयास और जन भागीदारी का भी सटीक उदाहरण है। यहां का प्रयास, सरकारी महकमे के लिए भी उदाहरण बन सकता है। अनिल सौमित्र