भोपाल 11 सितंबर 2010
पहले जो पत्रकारिता भारतीय मूल्यों को लेकर की जाती थी आज उसके स्वरूप मे व्यापारिक मूल्य अधिक हावी होते जा रहे है इसे देखते हुए मीडिया की कार्यप्रणाली में सुधार की जरुरत है और मीडिया को स्वयं ही इसकी शुरुआत करनी होगी। यह विचार जनसंपर्क,ं संस्कृति, एवं उच्च शिक्षा मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने इंडियन मीडिया सेंटर की गवर्निंग बोर्ड की दो दिवसीय राष्ट्ीय बैठक के उदृघटन सत्र में मुख्य अतिथि के रुप में व्यक्त किए।
बैठक की अध्यक्षता इंडियन मीडिया सेंटर के अध्यक्ष, वरिष्ठ पत्रकार एवं सांसद डॉ.चंदन मित्रा ने की। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं इंडियन मीडिया सेंटर के निदेशक श्याम खोसला एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता वि.वि.के कुलपति प्रो. ब्रजकिशोर कुठियाला, पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक श्री पी.सी. डोगरा विशिष्ट अतिथि के रुप में उपस्थित थे। बैठक का आयोजन इंडियन मीडिया सेंटर के मध्यप्रदेश चैप्टर द्वारा किया गया था। बैठक का समापन रविवार को मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान करेंगे।
श्री शर्मा ने कहा कि आज मीडिया में नकारात्मक बातों को विशेष रूप से प्रभावी बनाया जा रहा है। सरकार व प्रशासन में जो गलत हो रहा है उसे मीडिया को जरुर छापना व दिखाना चाहिये। पर जब अच्छा काम हो तो वह भी सामने लाया जाना चाहिये। उन्होंने युवा पत्रकारों का आहवान करते हुये कहा कि भारतीय मूल्यों की स्थापना के लिये अच्छे साहित्य का अध्ययन करना चाहिये।
कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. चंदन मित्रा ने कहा कि पत्रकारिता में हो रहे अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें समाज का नैतिक अवमूल्यन रोकना होगा। इस लिहाज से हमें मीडिया की कमजोरियों पर व्यापक दृष्टिकोण से विचार करना चाहिये। मीडिया की विकृतियों पर अंकुश लगाने के लिये मीडिया को स्वयं रास्ता तलाशना होगा। पेड न्यूज की बढती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा कि पिछले चुनावों में मीडिया की इस प्रवृत्ति के सामने राजनैतिक दल झुक गये यदि वे ऐसा नहीं करते तो इस पर अंकुश लग सकता था। उन्होंने कहा कि अकेले पत्रकार यह लडाई नहीं लड़ पायेंगे। इसके लिये समाज और राजनीतिक दलों को जागरुक करना होगा।
वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम खोसला ने कहा कि पत्रकारिता नाजुक और चुनौती से भरे दौर से गुजर रही है और यह खतरे बाहर के नहीं मीडिया के भीतर से ही पैदा हुये हैं। मीडिया को अपने इन संकटों और कमजोरियों को पहचानना होगा। और आत्म निरीक्षण करना होगा। श्री खोसला ने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता घटी है। पत्रकारों में सच्चाई ढूंढने की प्रवृत्ति कम हुई है। आज पत्रकारों को सच को सामने रखना होगा। पेड न्यूज की चर्चा करते हुये श्री खोसला ने कहा कि प्रेस कौंसिल के वर्तमान स्वरुप में बदलाव करते हुए एक नई मीडिया कौंसिल बनाये जाने की जरुरत पर जोर दिया। एक शक्तिशाली और प्रभावी कौंसिल ही मीडिया को नियंत्रित करने में कारगर हो सकती है।। उन्होंनेे कहा कि इंडियन मीडिया संंेटर समर्पित व्यक्तियों के माध्यम से मीडिया को बदलने का एक प्रयास है।
इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार वि.वि. के कुलपति प्रो. ब्रजकिशोर कुठियाला ने कहा कि जिस तरह का बदलाव हो रहा है उसे देखते हुए भविष्य में समाज की रचना मीडिया संवाद पर ही निर्भर करेगी। इसलिए यदि समाज को सुनियोजित करना है तो मीडिया को सुनियोजित करना होगा। इसके लिए मीडिया और समाज दोनों को मिलकर भी कार्य करना होगा। कार्यक्रम में स्वागत उद्बोधन वरिष्ठ पत्रकार एवं उपाध्यक्ष राष्ट्रीय एकता समिति श्री रमेश शर्मा जी ने दिया। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार श्री राघवेन्द्र सिंह ने किया और आभार प्रदर्शन मीडिया कार्यकर्ता श्री अनिल सौमित्र ने किया।
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रविवार, 12 सितंबर 2010
भारतीय मूल्य ही मीडिया को दिशा देने में सक्षम : मुख्यमंत्री श्री चौहान
भोपाल 12 सितंबर 2010
भौतिकता से दग्ध मानवता को शांति और दिशा देने का काम भारतीय मूल्य और दर्शन करेंगे। भारतीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावना को संरक्षित करने और प्रसारित करने की जिम्मेदारी मीडिया को निभानी होगी। उक्त विचार प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान ने इंडियन मीडिया सेंटर की गवर्निंग बोर्ड की मीटिंग में मीडिया में भारतीय मूल्यों के समावेश विषय पर व्यक्त किए। इस दो दिवसीय बैठक का आयोजन इंडियन मीडिया सेंटर के भोपाल चैप्टर ने किया। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार डॉ. चंदन मित्रा ने की।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री चैहान ने कहा कि आज भारतीय मूल्यों और परंपराओं को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। मीडिया भी इसमें शामिल है। मीडिया को मर्यादित होना होगा। श्री चैहान ने आजादी के पूर्व और बाद के मीडिया की सकारात्मक और संर्घषशील भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि आज मीडिया व्यावसायिक हो रहा है जिसके कारण वह संकट के दौर से गुजर रहा है। श्री चैहान ने पेड न्यूज की चर्चा करते हुए इसे समाज के लिए जहर के समान बताया। उन्होंने कहा कि देश तब मजबूत होगा जब नागरिक राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होंगे। मीडिया को समाज में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने का कार्य करना चाहिए।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार डॉ चंदन मित्रा ने कहा कि भारतीय मूल्यों की रचना में गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण योगदान रहा है पर आज उस इतिहास की उपेक्षा हो रही है जिसके परिणामस्वरूप भारतीय मूल्यों में गिरावट आ रही है। नई पीढ़ी इतिहास और परम्पराओं से अनभिज्ञ है। मीडिया भी भारतीय मूल्यों पर हमला कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पत्रकारिता में राष्ट्रीय भावना को हीन करने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने मीडिया से शाश्वत भारतीय मूल्यों को सामने लाने का आहवान किया। .श्री मित्रा ने नई पीढ़ी को भारतीय इतिहास और मूल्यों से परिचित करवाने हेतु इसे पाठ्यक्रमों में शामिल करने की बात कही।
इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी. के. कुठियाला ने कहा कि आज देश में जो पत्रकारिता की जा रही है वह भारत के लिए तो है लेकिन भारतीयों के लिए नहीं है। इस प्रवृत्ति का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया की उत्पत्ति, सिद्धांत और आधार पश्चिमी रहे हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का आधार सत्य है पर आज की पत्रकारिता अप्रिय और अधूरे सत्य को अभिव्यक्त कर रही है। श्री कुठियाला ने कहा कि पत्रकारिता का व्यापारीकरण उचित नहीं है समाज उसे बल देकर सामाजिक उददेश्यों की प्राप्ति का साधन बना सकता है।
इंडियन मीडिया सेंटर के संयोजक और मध्यप्रदेश राष्ट्रीय एकता समिति के उपाध्यक्ष श्री रमेश शर्मा ने कहा कि आज देश का मीडिया भारत की प्राथमिकताओं के साथ नहीं है वह विदेशी ताकतोंे के साथ दिखता है। मीडिया राष्ट्र और राष्ट्रवाद को अनदेखा कर रहा है जो कि हमारी मानसिक दासता का द्योतक है।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में पेड न्यूज पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री के. जी सुरेश ने कहा कि आज विज्ञापनों और पेड न्यूज को बतौर समाचार दिखाया जा रहा है। आज पत्रकारों को आत्ममंथन की आवश्यकता है क्योंकि उनकी इस कमजोरी के कारण राजनेता उनको कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। इस विषय पर पत्रकारों को सोचना होगा कि यदि उन्होंेने अपनी इस कमजोरी को खत्म नहीं किया तो हमारी विश्वनीयता समाप्त हो जाएगी।
कार्यक्रम में उपस्थित भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रो.प्रदीप माथुर ने कहा कि मीडिया में आ रही गिरावट के लिए सिर्फ पत्रकार जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि समाज को भी इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी और घटिया सामग्री वाले मीडिया को नकारना होगा। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज के लिए पैसे देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है जितना कि लेने वाला। इसलिए मीडिया और पत्रकारों के साथ ही समाज को भी जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा।
कार्यक्रम में आए प्रतिभागियों का धन्यवाद श्री रमेश शर्मा ने किया। प्रथम सत्र में श्री संजय द्विवेदी तथा दूसरे सत्र में कार्यक्रम का संचालन श्री अनिल सौमित्र ने किया।
भौतिकता से दग्ध मानवता को शांति और दिशा देने का काम भारतीय मूल्य और दर्शन करेंगे। भारतीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावना को संरक्षित करने और प्रसारित करने की जिम्मेदारी मीडिया को निभानी होगी। उक्त विचार प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान ने इंडियन मीडिया सेंटर की गवर्निंग बोर्ड की मीटिंग में मीडिया में भारतीय मूल्यों के समावेश विषय पर व्यक्त किए। इस दो दिवसीय बैठक का आयोजन इंडियन मीडिया सेंटर के भोपाल चैप्टर ने किया। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार डॉ. चंदन मित्रा ने की।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री चैहान ने कहा कि आज भारतीय मूल्यों और परंपराओं को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। मीडिया भी इसमें शामिल है। मीडिया को मर्यादित होना होगा। श्री चैहान ने आजादी के पूर्व और बाद के मीडिया की सकारात्मक और संर्घषशील भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि आज मीडिया व्यावसायिक हो रहा है जिसके कारण वह संकट के दौर से गुजर रहा है। श्री चैहान ने पेड न्यूज की चर्चा करते हुए इसे समाज के लिए जहर के समान बताया। उन्होंने कहा कि देश तब मजबूत होगा जब नागरिक राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होंगे। मीडिया को समाज में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने का कार्य करना चाहिए।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार डॉ चंदन मित्रा ने कहा कि भारतीय मूल्यों की रचना में गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण योगदान रहा है पर आज उस इतिहास की उपेक्षा हो रही है जिसके परिणामस्वरूप भारतीय मूल्यों में गिरावट आ रही है। नई पीढ़ी इतिहास और परम्पराओं से अनभिज्ञ है। मीडिया भी भारतीय मूल्यों पर हमला कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पत्रकारिता में राष्ट्रीय भावना को हीन करने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने मीडिया से शाश्वत भारतीय मूल्यों को सामने लाने का आहवान किया। .श्री मित्रा ने नई पीढ़ी को भारतीय इतिहास और मूल्यों से परिचित करवाने हेतु इसे पाठ्यक्रमों में शामिल करने की बात कही।
इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी. के. कुठियाला ने कहा कि आज देश में जो पत्रकारिता की जा रही है वह भारत के लिए तो है लेकिन भारतीयों के लिए नहीं है। इस प्रवृत्ति का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया की उत्पत्ति, सिद्धांत और आधार पश्चिमी रहे हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का आधार सत्य है पर आज की पत्रकारिता अप्रिय और अधूरे सत्य को अभिव्यक्त कर रही है। श्री कुठियाला ने कहा कि पत्रकारिता का व्यापारीकरण उचित नहीं है समाज उसे बल देकर सामाजिक उददेश्यों की प्राप्ति का साधन बना सकता है।
इंडियन मीडिया सेंटर के संयोजक और मध्यप्रदेश राष्ट्रीय एकता समिति के उपाध्यक्ष श्री रमेश शर्मा ने कहा कि आज देश का मीडिया भारत की प्राथमिकताओं के साथ नहीं है वह विदेशी ताकतोंे के साथ दिखता है। मीडिया राष्ट्र और राष्ट्रवाद को अनदेखा कर रहा है जो कि हमारी मानसिक दासता का द्योतक है।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में पेड न्यूज पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री के. जी सुरेश ने कहा कि आज विज्ञापनों और पेड न्यूज को बतौर समाचार दिखाया जा रहा है। आज पत्रकारों को आत्ममंथन की आवश्यकता है क्योंकि उनकी इस कमजोरी के कारण राजनेता उनको कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। इस विषय पर पत्रकारों को सोचना होगा कि यदि उन्होंेने अपनी इस कमजोरी को खत्म नहीं किया तो हमारी विश्वनीयता समाप्त हो जाएगी।
कार्यक्रम में उपस्थित भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रो.प्रदीप माथुर ने कहा कि मीडिया में आ रही गिरावट के लिए सिर्फ पत्रकार जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि समाज को भी इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी और घटिया सामग्री वाले मीडिया को नकारना होगा। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज के लिए पैसे देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है जितना कि लेने वाला। इसलिए मीडिया और पत्रकारों के साथ ही समाज को भी जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा।
कार्यक्रम में आए प्रतिभागियों का धन्यवाद श्री रमेश शर्मा ने किया। प्रथम सत्र में श्री संजय द्विवेदी तथा दूसरे सत्र में कार्यक्रम का संचालन श्री अनिल सौमित्र ने किया।
मंगलवार, 19 मई 2009
देवर्षि नारद: मीडिया के पथप्रदर्शक
अनिल सौमित्र
आज नारद जयंती है। ईस्वी सन् के अनुसार वर्ष 2009 और 11 मई है। किन्तु यह संयोग है। सामान्यतः नारद को भारतीय संदर्भों में जानना समझना ही उपयुक्त और समीचीन होगा। इसलिए नारद की जयन्ती भारतीय कालगणना के अनुसार ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष द्वितीया को है। आंग्ल कालगणना के अनुसार तारीख और मास भले ही बदल जाये लेकिन भारतीय अथवा हिन्दू गणना के अनुसार प्रत्येक वर्ष की ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष द्वितीया को ही उनकी जयंती होती है।
आज यह सवाल सर्वथा समीचीन है कि नारद को हम क्यों स्मरण कर रहे हैं। क्या इस लिए लिए वे भारत की ऋषि, महर्षि और देवर्षि की परंपरा के वाहक थे। या इसलिए कि उन्होंने अपने कर्तृत्व के द्वारा लोक कल्याण को धारण किया। महर्षि नारद के बारे में आम धारणा यह है कि वे देवलोक और भू-लोक के बीच संवादवाहक के रूप में काम करते थे। देवलोक में भी वे देवताओं के बीच संदेशों का प्रसारण करते रहे। लेकिन नारद मुनि के बारे में भू-लोक वासियों के मन में अच्छी छवि नहीं दिखती है। यही कारण है कि जो लोग अपनी संतान को एक अच्छा पत्रकार बनाना चाहते हैं भी उसका नाम नारद रखने से बचते हैं। कई लोग नारद मुनि के व्यक्तित्व की व्याख्या समाज में आज के चुगली करने वाले की तरह करते हैं। जिस पत्रकार के बारे में नकारात्मक टिप्पणी करनी होती है तो उसे आमतौर पर ‘नारद’ के नाम से ही संबोधित कर देते हैं।
लेकिन अब धीरे-धीरे नारद मुनि के बारे में सकारात्मक दृष्टि से चर्चा शुरू हो गई है। नारद के बहाने भारत में ऋषि-मुनि, महर्षि और देवर्षि जैसे विशेषणों के बारे में खोज-खबर शुरु हो गई है। नारद मुनि के बारे जितनी जानकारी उपलब्ध है उसके मुताबिक उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू एक कुशल संचारक, संप्रेषक और संवादवाहक का है। आज के मीडिया प्रतीकों के संदर्भ में विचार करें तो स्पष्टतः नारद और महाभारत काल के संजय की भूमिका मीडिया मैन की दिखती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक प्रातःस्मरण में जिन महापुरूषों को बार-बार स्मरण करते हैं उनमें देवर्षि नारद का नाम प्रमुख है। संघ, नारद को भारतीय ज्ञान और संचार परंपरा का वाहक मानता है। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को सही अर्थों में समझने और समझाने का गुरुतर दायित्व भी संघ ने अपने उपर लिया है। संघ अपने स्थापना काल से ही प्रचार से दूर रहा। लेकिन समय की आवश्यकताओं के मदद्ेनज़र संघ ने भी प्रचार को अंगीकार किया और इस दिशा में पहल की। प्रचार विभाग, संघ के संरचनागत ढांचे में शामिल है। प्रचार विभाग की ईकाइयां जिला स्तर पर कार्यरत हैं। संघ ने प्रचार को स्वीकार तो किया है, लेकिन इस क्षेत्र में कार्य करते हुए वह पूरी तरह सतर्क और सावधान है। जाहिर है, संघ के लिए प्रचार का एक सीमित उद्देश्य है। संघ को पता है कि अनियंत्रित और असंयमित प्रचार से संघ कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव हो सकता है। शायद इसी सावधानी और सतर्कता के कारण संघ सीधे तौर पर मीडिया की दैनंदिनी गतिविधि में शामिल नहीं है। आवश्यकतानुसार निर्धारित व्यक्तियों के द्वारा मीडिया से चर्चा की जाती है। मीडिया क्षेत्र में दीर्घकालिक और योजनाबद्ध कार्य करने के लिए संघ की प्रेरणा से सभी प्रांतों में विश्व संवाद केन्द्र कार्यरत है। संवाद केन्द्रों की कार्य योजना में शोध, सूचना-प्रसार और प्रकाशन महत्वपूर्ण अंग है।
नारद मुनि की चर्चा जितना संघ के लिए प्रसंागिक है उतना ही मीडिया क्षेत्र और समाज के लिए भी। प्रचार या मीडिया का महत्व संघ के लिए आंशिक है। क्योंकि संघ समाज तक सीधे और प्रत्यक्ष पहंुचना चाहता है। लेकिन मीडिया का तो कार्य ही सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का है। इसलिए नारद मीडिया के प्रतिमान भी हैं और पथप्रदर्शक भी। दिन-ब-दिन मीडिया का महत्व समाज जीवन में बढ़ता ही जा रहा है। व्यक्ति के निजी और सार्वजनिक जीवन में मीडिया का दखल और प्रभाव दोनों बढ़ता जा रहा है। मीडिया का हस्तक्षेप भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर बढ़ रहा है। लोकतंत्र में मीडिया विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिक के साथ चैथे स्तंभ के रूप में कार्यरत है। मीडिया के अलावा अन्य तीनों स्तंभों पर किसी न किसी का नियंत्रण और नियमन है, लेकिन मीडिया रूपी यह चैथा स्तंभ किसी तंत्र के नियंत्रण या नियमन से परे है। अपेक्षा यह की जाती है कि मीडिया स्वयं ही अपना नियमन और नियंत्रण करे। यहीं पर देवषि नारद का व्यक्तित्व और कर्तृत्व मीडिया के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। नारद का संपूर्ण जीवन और व्यक्तित्व एक व्यापक अध्ययन की मांग करता है। उनके कर्तृत्व का अनेक पहलू ऐसा है जो अनछुआ और अनसुलझा है। भारतीय ग्रंथों और साहित्यों में उन्हें तलाशने की आवश्यकता है।
आज जिन बातों की अपेक्षा सभ्य समाज मीडिया से करता है नारद का चरित्र और कर्तृत्व पूर्णतः उसके माकूल है। देवर्षि नारद ने सूचनाओं का आदान-प्रदान लोकहित का ध्यान में रखकर किया। कई बार उनकी सूचनाओं या संप्रेषण शैली से देवताओं को तनाव या व्यवधान उत्पन्न होता प्रतीत होता था, लेकिन लोक या जन की दृष्टि से विचार करने पर उनके अन्तर्निहित भाव का बोध सहज ही हो जाता है। आज मीडिया जब पूंजी, राज्य और बाजार के नियंत्रण में दिखता है, मीडिया का लोकोन्मुखी चरित्र विलुप्त-सा है। पाठक, श्रोता और दर्शक मीडिया अधिष्ठान के द्वारा ग्राहक बनाए जा रहे हैं। मीडिया अब उत्पाद बन गया है। सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का घाल-मेल हो गया है। वर्तमान मीडिया, पश्चिमी और यूरोपीय प्रभाव से वशीभूत है। भारतीय मीडिया के प्राचीन नायक नारद को खलनायक की तरह देखने-समझने की बजाए सही अर्थों में जानने-समझने की चेष्टा होनी चाहिए। इसके पहले कि मीडिया से लोक का भरोसा उठ जाए, मीडिया के भारतीय प्रतिमानों, प्रतिरूपों और नायकों को ढूंढने की कोशिश होनी चाहिए। सही मायने में नारद, मीडिया के लिए पथप्रदर्शक हो सकते हैं।
हर वर्ष नारत की जयंती आती और चलर जाती है। भारत में महापुरूषों से सीखने, उनका अनुगमन करने और मार्गदर्शन प्राप्त करने की विधायक परंपरा पही है। ग्राम विकास और अन्त्योदय की बात हो तो गांधी, सर्वोदय की बात हो तो विनोबा, एकात्ममानववाद की बात हो दीनदयाल उपाध्याय हमें सहज ही याद आते हैं, ऐसे ही मीडिया की चर्चा हो तो नारद स्मरण स्वाभाविक ही है। नारद को अब प्रथम पत्रकार या संवाददाता के रूप में याद किया जाने लगा है। अगर चालू भाषा में कहें तो नारद फस्ट मीडिया मैन थे। लेकिन वे तत्व ज्ञान के जानकार, अध्येता और ऋषि परंपरा के वाहक भी थे। उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलु अनजाने हैं, लेकिन एक संचारक, संवादवाहक और संप्रेरक के रूप में आमजन उन्हें जानता है, उनके इस रूप को और अधिक जानने की आवश्यकता है। भारतीय मीडिया जगत के लोग भी उन्हें इन्हीं अर्थों में जाने-समझे और स्वीकारे यह समय की मांग है।
(लेखक संघ के मीडिया केन्द्र से संबद्ध हैं।)
अनिल सौमित्र
आज नारद जयंती है। ईस्वी सन् के अनुसार वर्ष 2009 और 11 मई है। किन्तु यह संयोग है। सामान्यतः नारद को भारतीय संदर्भों में जानना समझना ही उपयुक्त और समीचीन होगा। इसलिए नारद की जयन्ती भारतीय कालगणना के अनुसार ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष द्वितीया को है। आंग्ल कालगणना के अनुसार तारीख और मास भले ही बदल जाये लेकिन भारतीय अथवा हिन्दू गणना के अनुसार प्रत्येक वर्ष की ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष द्वितीया को ही उनकी जयंती होती है।
आज यह सवाल सर्वथा समीचीन है कि नारद को हम क्यों स्मरण कर रहे हैं। क्या इस लिए लिए वे भारत की ऋषि, महर्षि और देवर्षि की परंपरा के वाहक थे। या इसलिए कि उन्होंने अपने कर्तृत्व के द्वारा लोक कल्याण को धारण किया। महर्षि नारद के बारे में आम धारणा यह है कि वे देवलोक और भू-लोक के बीच संवादवाहक के रूप में काम करते थे। देवलोक में भी वे देवताओं के बीच संदेशों का प्रसारण करते रहे। लेकिन नारद मुनि के बारे में भू-लोक वासियों के मन में अच्छी छवि नहीं दिखती है। यही कारण है कि जो लोग अपनी संतान को एक अच्छा पत्रकार बनाना चाहते हैं भी उसका नाम नारद रखने से बचते हैं। कई लोग नारद मुनि के व्यक्तित्व की व्याख्या समाज में आज के चुगली करने वाले की तरह करते हैं। जिस पत्रकार के बारे में नकारात्मक टिप्पणी करनी होती है तो उसे आमतौर पर ‘नारद’ के नाम से ही संबोधित कर देते हैं।
लेकिन अब धीरे-धीरे नारद मुनि के बारे में सकारात्मक दृष्टि से चर्चा शुरू हो गई है। नारद के बहाने भारत में ऋषि-मुनि, महर्षि और देवर्षि जैसे विशेषणों के बारे में खोज-खबर शुरु हो गई है। नारद मुनि के बारे जितनी जानकारी उपलब्ध है उसके मुताबिक उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू एक कुशल संचारक, संप्रेषक और संवादवाहक का है। आज के मीडिया प्रतीकों के संदर्भ में विचार करें तो स्पष्टतः नारद और महाभारत काल के संजय की भूमिका मीडिया मैन की दिखती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक प्रातःस्मरण में जिन महापुरूषों को बार-बार स्मरण करते हैं उनमें देवर्षि नारद का नाम प्रमुख है। संघ, नारद को भारतीय ज्ञान और संचार परंपरा का वाहक मानता है। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को सही अर्थों में समझने और समझाने का गुरुतर दायित्व भी संघ ने अपने उपर लिया है। संघ अपने स्थापना काल से ही प्रचार से दूर रहा। लेकिन समय की आवश्यकताओं के मदद्ेनज़र संघ ने भी प्रचार को अंगीकार किया और इस दिशा में पहल की। प्रचार विभाग, संघ के संरचनागत ढांचे में शामिल है। प्रचार विभाग की ईकाइयां जिला स्तर पर कार्यरत हैं। संघ ने प्रचार को स्वीकार तो किया है, लेकिन इस क्षेत्र में कार्य करते हुए वह पूरी तरह सतर्क और सावधान है। जाहिर है, संघ के लिए प्रचार का एक सीमित उद्देश्य है। संघ को पता है कि अनियंत्रित और असंयमित प्रचार से संघ कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव हो सकता है। शायद इसी सावधानी और सतर्कता के कारण संघ सीधे तौर पर मीडिया की दैनंदिनी गतिविधि में शामिल नहीं है। आवश्यकतानुसार निर्धारित व्यक्तियों के द्वारा मीडिया से चर्चा की जाती है। मीडिया क्षेत्र में दीर्घकालिक और योजनाबद्ध कार्य करने के लिए संघ की प्रेरणा से सभी प्रांतों में विश्व संवाद केन्द्र कार्यरत है। संवाद केन्द्रों की कार्य योजना में शोध, सूचना-प्रसार और प्रकाशन महत्वपूर्ण अंग है।
नारद मुनि की चर्चा जितना संघ के लिए प्रसंागिक है उतना ही मीडिया क्षेत्र और समाज के लिए भी। प्रचार या मीडिया का महत्व संघ के लिए आंशिक है। क्योंकि संघ समाज तक सीधे और प्रत्यक्ष पहंुचना चाहता है। लेकिन मीडिया का तो कार्य ही सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का है। इसलिए नारद मीडिया के प्रतिमान भी हैं और पथप्रदर्शक भी। दिन-ब-दिन मीडिया का महत्व समाज जीवन में बढ़ता ही जा रहा है। व्यक्ति के निजी और सार्वजनिक जीवन में मीडिया का दखल और प्रभाव दोनों बढ़ता जा रहा है। मीडिया का हस्तक्षेप भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर बढ़ रहा है। लोकतंत्र में मीडिया विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिक के साथ चैथे स्तंभ के रूप में कार्यरत है। मीडिया के अलावा अन्य तीनों स्तंभों पर किसी न किसी का नियंत्रण और नियमन है, लेकिन मीडिया रूपी यह चैथा स्तंभ किसी तंत्र के नियंत्रण या नियमन से परे है। अपेक्षा यह की जाती है कि मीडिया स्वयं ही अपना नियमन और नियंत्रण करे। यहीं पर देवषि नारद का व्यक्तित्व और कर्तृत्व मीडिया के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। नारद का संपूर्ण जीवन और व्यक्तित्व एक व्यापक अध्ययन की मांग करता है। उनके कर्तृत्व का अनेक पहलू ऐसा है जो अनछुआ और अनसुलझा है। भारतीय ग्रंथों और साहित्यों में उन्हें तलाशने की आवश्यकता है।
आज जिन बातों की अपेक्षा सभ्य समाज मीडिया से करता है नारद का चरित्र और कर्तृत्व पूर्णतः उसके माकूल है। देवर्षि नारद ने सूचनाओं का आदान-प्रदान लोकहित का ध्यान में रखकर किया। कई बार उनकी सूचनाओं या संप्रेषण शैली से देवताओं को तनाव या व्यवधान उत्पन्न होता प्रतीत होता था, लेकिन लोक या जन की दृष्टि से विचार करने पर उनके अन्तर्निहित भाव का बोध सहज ही हो जाता है। आज मीडिया जब पूंजी, राज्य और बाजार के नियंत्रण में दिखता है, मीडिया का लोकोन्मुखी चरित्र विलुप्त-सा है। पाठक, श्रोता और दर्शक मीडिया अधिष्ठान के द्वारा ग्राहक बनाए जा रहे हैं। मीडिया अब उत्पाद बन गया है। सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का घाल-मेल हो गया है। वर्तमान मीडिया, पश्चिमी और यूरोपीय प्रभाव से वशीभूत है। भारतीय मीडिया के प्राचीन नायक नारद को खलनायक की तरह देखने-समझने की बजाए सही अर्थों में जानने-समझने की चेष्टा होनी चाहिए। इसके पहले कि मीडिया से लोक का भरोसा उठ जाए, मीडिया के भारतीय प्रतिमानों, प्रतिरूपों और नायकों को ढूंढने की कोशिश होनी चाहिए। सही मायने में नारद, मीडिया के लिए पथप्रदर्शक हो सकते हैं।
हर वर्ष नारत की जयंती आती और चलर जाती है। भारत में महापुरूषों से सीखने, उनका अनुगमन करने और मार्गदर्शन प्राप्त करने की विधायक परंपरा पही है। ग्राम विकास और अन्त्योदय की बात हो तो गांधी, सर्वोदय की बात हो तो विनोबा, एकात्ममानववाद की बात हो दीनदयाल उपाध्याय हमें सहज ही याद आते हैं, ऐसे ही मीडिया की चर्चा हो तो नारद स्मरण स्वाभाविक ही है। नारद को अब प्रथम पत्रकार या संवाददाता के रूप में याद किया जाने लगा है। अगर चालू भाषा में कहें तो नारद फस्ट मीडिया मैन थे। लेकिन वे तत्व ज्ञान के जानकार, अध्येता और ऋषि परंपरा के वाहक भी थे। उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलु अनजाने हैं, लेकिन एक संचारक, संवादवाहक और संप्रेरक के रूप में आमजन उन्हें जानता है, उनके इस रूप को और अधिक जानने की आवश्यकता है। भारतीय मीडिया जगत के लोग भी उन्हें इन्हीं अर्थों में जाने-समझे और स्वीकारे यह समय की मांग है।
(लेखक संघ के मीडिया केन्द्र से संबद्ध हैं।)
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