बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

हिन्दू समागम को सफल बनाने में महिलाएं प्राणपण से जुटेंगी

राष्ट््रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के भोपाल आगमन पर 28 फरवरी को भोपाल में आयोजित किये जा रहे हिन्दू समागम की तैयारियंा जोर शोर से जारी हैं। कार्यक्रम की सफलता के लिए स्थान स्थान पर बैठकों के दौर शुरू हो गए हैं। इसी तारतम्य में विभिन्न समाजों की महिला पदाधिकारियों की एक बैठक आयोजित की गई जिसमें आयोजन समिति की सदस्य महापौर श्रीमती कृष्णा गौर ने कहा कि हिन्दू समागम भोपाल के इतिहास में एक यादगार कार्यक्रम होगा। श्रीमती गौर ने कहा कि महिलाएं परिवार की धुरी हैं और परिवार हिन्दू समाज का आधार है। इसीलिए इस आयोजन की सफलता में महिलाओं को बहुत महती भूमिका निभानी है। इस अवसर पर श्रीमती कृष्णा गौर ने कहा कि देश तीन चीजों से चलता है शक्ति बुद्धि और समृद्धि । और भारतीय चिंतन में इन तीनों शक्तियों की प्रतीक लक्ष्मी सरस्वती और दुर्गा ही हैं। उन्होंने कहा कि 28 फरवरी का हिन्दू समागम एक ऐसा अवसर है जब हिन्दू मातृशक्ति बडी संख्या में लाल परेड मैदान में एकत्रित हो कर अपने सामाजिक दायित्व को पूरा करने की दिशा में आगे बढ सकती है।
उन्होंने कहा कि जैसे महिलाओं का परिवार के प्रति दायित्व है वैसे ही उनका देश व समाज के प्रति भी एक दायित्व है और हिन्दू समागम इस दायित्व को निभाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। श्रीमती गौर ने महिलाओं से आव्हान किया कि 28 फरवरी को वे मातृशक्ति का भव्य स्वरूप उपस्थित करने मेे प्राणपण से जुट जाएं।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

न्यायमूर्ति आर डी शुक्ला हिन्दू समागम आयोजन समिति के नए अध्यक्ष होंगे

राष्ट््रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के भोपाल आगमन पर हिन्दू समागम आयोजित करने हेतु एक आयोजन समिति का गठन किया गया है जिसके अध्यक्ष पद पर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री एच एम जोशी का निर्वाचन किया गया था । श्री जोशी द्वारा निजी कारणों से अध्यक्ष के रूप में कार्य करने में असमर्थता व्यक्त किये जाने के उपरंात आयोजन समिति की कार्यकारिणी की बैठक में प्रदेश के पूर्व विधि सचिव एवं मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्री आर. डी शुक्ला का निर्वाचन किया गया है । श्री पी एल चतुर्वेदी ने श्री शुक्ल का नाम प्रस्तावित किया एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीपति खिरवडकर ने इसका समर्थन किया । इस मौके पर नवनियुक्त अध्यक्ष श्री शुक्ला ने सहर्ष यह दायित्व स्वीकार करते हुए हिन्दू समाज को जातिभेद से मुक्त और समरसता से युक्त बनाने की आवश्यकता प्रतिपादित की और यह विश्वास व्यक्त किया कि सभी के सहयोग से यह हिन्दू समागम एक सफल आयोजन सिद्ध होगा।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

संघ की ओर समाज की नज़र

यह पुराना आलेख है। यह आलेख तब लिखा गया था जब श्री मोहनराव भागवत संघ के सरसंघचालक बने थे।
अनिल सौमित्र
नागपुर में संघ की बहुप्रतीक्षित प्रतिनिधि सभा की बैठक चल रही है। औपचारिक तौर पर यह बैठक 21 से 23 तक होगी। संघ की परंपरा और संविधान के मुताबिक प्रतिनिधि सभा की बैठक प्रतिवर्ष होती है। लेकिन इस साल की बैठक का विशेष महत्व इसलिए है कि यह वर्ष संघ का चुनावी वर्ष है। प्रत्येक तीन साल पर संघ में सरकार्यवाह का चुनाव होता है। पहले प्रांत और उसके नीचे की इकाइयों में संघचालक का चुनाव होता है, तत्पश्चात् विभिन्न इकाइयों के प्रतिनिधि अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में सरकार्यवाह का चुनाव करते हैं। इस वर्ष यह बैठक इसलिए भी विशेष चर्चा में है कि काफी समय पहले से ही सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन के पदमुक्त होने का अनुमान लगाया जा रहा था।
मीडिया और समाज का अनुमान सच सिद्ध हुआ। प्रतिनिधि सभा बैठक के दूसरे दिन 21 मार्च को श्री सुदर्शन जी ने अपने दायित्व से मुक्त होने का निर्णय करते हुए वर्तमान सरकार्यवाह श्री मोहनराव भागवत को सरसंघचालक नियुक्त करने की घोषणा कर दी। यह घोषणा देश-दुनिया के लिए बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय है। ऐसा होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के प्रमुख का मनोनयन और दूसरे सबसे बड़े पद का निर्वाचन हुआ है। लेकिन यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ही संभव है कि इतने विशाल संगठन के मुखिया और अन्य पदाधिकारियों का मनोनयन ओर निर्वाचन इतने सरल और सहज तरीके से हो पाता है।
श्री मोहनराव भागवत, संघ के छठे सरसंघचालक होंगे। संघ के पहले सरसंघचालक, संघ के संस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार हुए। इसके पश्चात् श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर (श्रीगुरूजी), श्री बालासाहब देवरस, प्रो. श्री राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) और श्री कृप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन सरसंघचालक बने। उल्लेखनीय है कि 1939 डाॅ. हेडगेवार के जीवन काल में सिंदी संघ के शिविर में ही कार्यकर्ता जान चुके थे कि श्रीगुरूजी ही सरसंघचालक होंगे। वैसे ही, बल्कि उससे कहीं अधिक कल्पना देश के संघ कार्यकर्ताओं को श्री गुरूजी के बाद बालासाहब देवरस के सरसंघचालक बनने की हो गई थी। श्री गुरू जी 33 वर्षों तक सरसंघचालक रहे जबकि बालासाहब देवरस 21 वर्षों तक। श्री रज्जू भैया वर्ष 1994 से 2000 तक सरसंघचालक रहे। जबकि श्री सुदर्शन जी वर्ष 2000 से 2009 तक।
कार्य की दृष्टि से सरसंघचालकों के कार्यकाल का विश्लेषण काफी कठिन है। संघ का मूल कार्य तो शाखा कार्य विस्तार है। इस दृष्टि से शाखा कार्य का विस्तार तो सतत होता गया है। लेकिन विभिन्न सरसंघचालकों के कार्यकाल को देशकाल-परिस्थिति और तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संदर्भों में देखने पर समीचीन विश्लेषण संभव होगा।
संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक रहे मोरेश्वर गणेश तपस्वी ने अपनी पुस्तक ‘ राष्ट्राय नमः’ में लिखा है - संघकार्य के वास्तविक शुरूआत के कुछ महीनों बाद एक दिन डाॅ. हेडगेवार जब संघ के शाखा स्थान पर पहंुचे तो स्वयंसेवकों ने उन्हें अकल्पित रूप से ‘सरसंघचालक प्रणाम’ कहा। तभी से डाॅक्टर जी सरसंघचालक बन गए। पन्द्रह वर्षों तक उन्होंने अपना खून-पसीना एक कर संघ का विस्तार किया, उसे देश के सुदूर क्षेत्रों तक विस्तार दिया। एक तरफ साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष और दूसरी तरफ समाज को असन्न संकटों से जूझने के लिए समर्थ और सशक्त बनाने का दोहरा दायित्व डाॅ. हेडगेवार के जिम्मे था। श्रीगुरूजी के 33 वर्षों के कार्यकाल में संघ को देश के प्रत्येक जिले में विस्तार मिला, वहीं राजनीति सहित समाज जीवन से जुड़ी लगभग बीस से अधिक संगठनों की शुरूआत भी हुई। आज जिस ‘संघ परिवार’ शब्दावली की चर्चा होती है उसकी शुरूआत इसी समय हुई। श्रीगुरूजी के समय ही संघ को सर्वाधिक विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। गांधी-हत्या का ठीकरा संघ पर फोड़ा गया। तत्कालीन कांग्रेस की सरकार ने कलुषित राजनीति का परिचय देते हुए संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। एक विजयी योद्धा की तरह श्रीगुरूजी ने संघ को सामाजिक-राजनीतिक झंझावातों से बाहर निकाला।
श्री बाला साहब देवरस ने इक्कीस वर्षो। तक संघ को नेतृत्व दिया। इस दौरान संघ, समाजव्यापी बना। संघ परिवार अब समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचने लगा। देवरस जी के समय ही संघ को आपातकाल के दौरान दूसरे प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। निष्ठुर शासक वर्ग के खिलाफ जनांदोलन का शंखनाद संघ के अदृश्य नेतृत्व में ही हुआ। अस्वास्थ्य के कारण उन्होंने संघ प्रवाह का कार्य 1994 में श्री रज्जू भैया को सौंप दिया। श्री रज्जू भैया लगभग छह वर्षों तक सरसंघचालक के रूप में अपनी सेवाएं दे पाए। इस दौरान संघ कार्य का विस्तार दुनिया के अन्य देशों में काफी फैला। संघ के बारे में यह धारणा भी निर्मूल हुई कि संघ मराठी और उसमें भी एक विशेष ब्राह्मण समाज का संगठन है। जाति, भाषा और क्षेत्र आधारित धारणाएं इस दौरान मिथक सिद्ध हुई। संघ के वास्तविक रूप के बारे में समाज के सभी वर्गोंं में सकारात्मक संदेश गया। मीडिया भी संघ के बारे में सकारात्मक हुआ। संघ विचारों से प्रेरित राजनीतिक कार्यकर्ता भी उंचे शिखरों तक पहंचे। निवर्तमान सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी ने अपने कार्यकाल में ग्रामीण विकास, सामाजिक समरसता और संस्कृत व हिन्दी के विकास पर विशेष बल दिया। संघ विचारों से प्रेरित भारतीय जनता पार्टी का राजनैतिक उत्कर्ष भी उल्लेखनीय है।
नए सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के बारे में विभिन्न प्रकार के कयास लगाए जा रहे हैं। संघ और संघ के माध्यम से राष्ट्रीय फलक पर राजनैतिक-सामाजिक स्थितियों में बड़े युगान्तकारी परिवर्तन की अपेक्षा की जा रही है। श्री भागवत, संगठन और जमीनी काम को अन्य सभी कार्यों की शक्ति मानते हैं। इसलिए यह स्वाभावित है कि उनका ध्यान संघ के मूल कार्य, शाखा विस्तार की ओर होगा। संघ में शाखा कार्य और स्वयंसेवकों की गुणवत्ता को लेकर काफी चर्चा होती रही है। स्वयंसेवकों और शाखाकार्य में गुणात्मक विस्तार है देश के समक्ष आसन्न संकटों का समाधान दे सकेगा। श्री भागवत सरल और सहज व्यक्तित्व के धनी हैं। वे मीतभाषी और मृदुभाषी हैं। न दिखना और काम करते जाना उनके स्वाभाव में है। कार्यकर्ताओं के साथ वे छाया की तरह होते हैं, लेकिन मीडिया को ढूंढने पर भी नहीं मिलते। वे जानते हैं कार्य का विस्तार होगा तो उसका प्रचार भी होगा, प्रचार से कार्य का विस्तार नहीं। शायद इसीलिए वे अपने व्यक्तित्व को छुपाकर, गलाकर, मिटाकर संघ का व्यक्तिव गढ़ रहे हैं। वे सरकार्यवाह के रूप में संघ के कार्यकारी प्रमुख थे, अब सरसंघचालक के रूप में संवैधनिक प्रमुख के नाते संघ के दर्शन और नीतियों अभिव्यक्त करेंगे। संघ, संघ परिवार और संघ विचार को वही परंपरागत वैचारिक प्रतिबद्धता, अनुशासन और राष्ट्रधर्म का पुनस्र्मरण होगा। श्री भागवत के नेतृत्व मे संघ को न सिर्फ चतुर्दिक विस्तार मिलेगा, बल्कि देश को सभी क्षेत्रों में नई दिशा भी मिलेगी। देश और समाज को संघ से यही अपेक्षा है। संघ के नूतन सरसंघचालक का हार्दिक अभिनंदन!
विराट हिन्दू समागम के लिये आयोजन समिति गठित

भोपाल,विश्व संवाद केन्द्र. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भोपाल में हिन्दू समागम का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन के लिये एक आयोजन समिति का गठन किया गया है। 28 फरवरी को आयोजित होने वाले इस विराट हिन्दू समागम के सफल आयोजन हेतु इस समिति में भोपाल के विभिन्न वर्गों के नागरिकों का सहयोग संरक्षण, मार्गदर्शन एवं सहयोग लिया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्यभारत प्रांत के संघचालक श्री शशिभाई सेठ की उपस्थिति में आयोजन समिति की पहली बैठक आज सम्पन्न हुई है। इस बैठक में उपस्थित सभी विशिष्ठ नागरिकों की सहमति से तय हुआ कि आयोजन समिति में विभिन्न मत-पंथ एवं सम्प्रदायों के धर्माचार्य इस आयोजन समिति के संरक्षण होंगे। वरिष्ठ नागरिक एवं पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री एच.एम. जोशी की अध्यक्षता में गठित आयोजन समिति में एयर मार्शल विक्रम पेठिया, श्री हेमन्त सोनी, श्री विजय रामानी, डाॅ. मृणाली गोरे,, श्री श्रीपति खिरवडकर, श्री विशम्भर राजदेव, श्री कृष्णन, श्री संजीव अग्रवाल, श्री अजय गोयनका, श्री राजेश जैन और डाॅ. दीपक शाह उपाध्यक्ष होंगे। समिति के महासचिव श्री दीपक शर्मा एवं श्री राजूल अग्रवाल, श्री नैमेष सेठ, श्री विष्णु खत्री, श्री सुधीर दाते, श्रीमती सुप्रीत कौर एवं श्रीमती साधना जैन सचिव के रुप में कार्य करेंगे।
आयोजन समिति की बैठक में हिन्दू समागम के आयोजन एवं इसके महत्व के बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघचालक श्री शशिभाई सेठ ने बताया कि उन्होंने कहा कि यह संघ का नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज का कार्यक्रम होगा। कार्यक्रम को व्यापक एवं विराट स्वरुप देने के लिये इस समिति का गठन किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बड़ी संख्या में लोग प्रत्यक्ष जुड़े हैं, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में अभी भी ऐसे लोग है जो संघ को प्रसार माध्यमों या अन्य तरीकों से जानते हैं। श्री सेठ ने ऐसे सभी बन्धुओं से संघ के निकट आने व जानने समझने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि आज देश में देशभक्त और देशविरोधी लोगों का ध्रुवीकरण हो रहा है। देश में आज देवासुर संग्राम जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। संघ ने समाज के सज्जन और सात्विक शक्ति को संगठित करने का कार्य किया है । इस दिशा में अन्य अनेक संगठन भी कार्यरत् है।
हिन्दू समागम के अवसर पर भोपाल में सज्जन हिन्दू शक्ति के व्यापक प्रकटीकरण का प्रयास किया जायेगा। 28 फरवरी भोपाल के लिये ऐतिहासिक दिन बने हम सब इसका मिलकर प्रयास करें। इसके लिये अधिकाधिक लोगों तक सूचना, संदेश और सम्पर्क करने का आव्हान श्री सेठ ने किया। बैठक के अन्त में संघ के कार्यों से संबंधित छोटी सी फिल्म का प्रदर्शन भी हुआ।
बैठक में श्री सिद्धभाऊ जी, श्री बाबूलाल गौर,, डाॅ. अजय नारंग, डाॅ. शंकरलालजी पाटीदार,, श्री संतोष अग्रवाल, श्री महेन्द्र शुक्ला आदि विशेष रुप से उपस्थित थे।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

राजा कृष्णदेव राय के राज्याभिषेक का ५०० वां वर्ष

हिंदुस्तान की महान विरासत का उत्सव
विजयनगर साम्राज्य एवं राजा कृष्णदेव राय के 500 वें राज्याभिषेक का आज शुभदिन है । कर्नाटक में इस त्रिदिविसीय समारोह के रूप में मनाया जा रहा है।
सर्वश्रेष्ठ राजा, महान शासक और एक न्याय-पुरुष।’ यह लिखा था सोलहवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आए एक पुर्तगाली यात्री डॉमिंगोज पेस ने। राजा थे कृष्णदेव राय, जो १५क्९ में विजयनगर की गद्दी पर बैठे थे और चालीस की उम्र में किसी अज्ञात बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई थी। उनके गद्दी पर बैठने के लगभग आधी सहस्राब्दी के बाद उनके राज्याभिषेक का उत्सव मनाया जा रहा है।वे महान योद्धा थे, लेकिन एक योग्य प्रशासक, सहिष्णु राजनीतिज्ञ और कलाओं के महान संरक्षक भी थे। 20 साल की अवधि में कृष्णदेव राय ने विजयनगर को एक विशालकाय साम्राज्य में तब्दील कर दिया था। उनके राज्य की राजधानी और अब विश्व की विरासतों में से एक हम्पी में कृष्णदेव राय की महानता घुली-मिली है। वस्तुत: लगातार हम्पी की तुलना अब रोम से की जाती है।उनके समय में दक्षिण भारत की कला और स्थापत्य अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया था। वास्तव में यहां के मिले-जुले स्थापत्य में हिंदू और इस्लामिक, दोनों ही कलाओं के तत्व मिलते हैं। हम्पी के लोटस महल में इस कला के दर्शन किए जा सकते हैं। भले ही कर्नाटक ने उनके राज्याभिषेक के ५०० वें varsh का समारोह मनाने की पहल की हो, लेकिन उनकी कभी न खत्म होने वाली महानता के दर्शन आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में भी किए जा सकते हैं। सम्पूर्ण राष्ट्र इसे समारोह पूर्वक मनाये ।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

यह के लिए शुभ भी है और लाभकारी भी

कांग्रेस के महासचिव और राजीव-सोनिया पुत्र राहुल गांधी के मध्यपदेश आगमन और यहां के कुछेक विश्वविद्यालय परिसरों में उनके कार्यक्रमों से बवाल मचा है। यह विवाद भाजपा या अन्य के लिए अनपेक्षित हो सकता है, लेकिन राहुल गांधी के योजनाकारों के लिए यह अपेक्षित और उनकी योजना का परिणाम ही है। भाजपा के नेताओं और भाजपा सरकार के प्रतिनिधियों ने राहुल गांधी की यात्रा के बाद जो बयान, कायवाई या पहल की उसका सीधा या प्रकारान्तर से प्रचारात्मक लाभ राहुल गांधी को ही मिला।
यह पहली बार नहीं हुआ है कोई राजनीतिक व्यक्ति शैक्षणिक परिसर में गया हो। राहुल गांधी के पहले भी मंत्री, विधायक, सांसद, जनप्रतिनिधि और आकादमिक व्यक्ति का रूप धारण कर राजनैतिक लोग शिक्षा परिसरों में जाते रहे हैं। जाना भी चाहिए। अगर 18 साल से अधिक उम्र के युवाओं को मतदान का संवैधानिक अधिकार दिया गया है, काॅलेज और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ के चुनाव हो रहे हैं, वहां विभिन्न स्तरों पद राजनीति शास्त्र का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है तो कोई कारण नहीं कि शैक्षणिक परिसरों को राजनेताओं से अछूत रखा जाए। काॅलेज-विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं का राजनीतिक प्रशिक्षण हो यह देश की राजनीति के लिए शुभ भी है और लाभकारी भी। राजनेताओं का विश्वविद्यालय परिसरों में जाना और विद्याथियों से संवाद करना उपयुक्त भी है और आवश्यक भी। हां! इस दृष्टि से इतना अवश्य होना चाहिए कि इस संवाद हेतु कोइ नीति और पद्धति भी विकसित हो। भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को भी योजनापूर्वक यह प्रयास करना चाहिए कि वे भी छात्र-छात्राओं के बीच अपना विचार, संगठन और नीति लेकर जाएं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने छात्र राजनीति के मामले में एक नजीर पेश की है। वहां से राजनीतिक प्रशिक्षण प्राप्त छात्रों ने देश की राजनीति में काफी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।
राहुल गांधी के प्रकरण में भाजपा ने प्रतिक्रिया की है। इस प्रतिक्रिया से कांग्रेस और उनके नेताओं का प्रचार ही होगा। इस दिशा में भाजपा नेता, उनके युवा नेतृत्व अगर पिछलग्गू और प्रतिक्रिया व्यक्त करने की बजाए छात्र और युवा राजनीति के लिए योजनाबद्ध नेतृत्व प्रदान करें तो यह देश और प्रदेश की राजनीति के हित में ही होगा।
मध्यप्रदेश की आंतरिक सुरक्षा के बारे मे आपके पास कुछ जानकारी, कोइ विचार, कोइ आलेख या आंकडे हो तो मुझे भी बताइये. मेरी मदद होगी..
प्रति,


महोदय,
आप विश्व संवाद केन्द्र से परिचित ही हैं। आपको विदित ही है कि केन्द्र मीडिया के क्षेत्र में शोध, जागरुकता, जनसंपर्क और संचार संबंधी कार्यो में गत कई वर्षों से कार्यरत है। विश्व संवाद केन्द्र विभिन्न विषयों पर विशेषांक, स्मारिका, पुस्तिकाएं और पुस्तकों का प्रकाशन भी करता रहा है। आपको स्मरण कराते हुए प्रसन्नता होती है कि विश्व संवाद केन्द्र ने गत 10 वर्षों में संवाद मंथन, साप्ताहिक लेख सेवा के अतिरिक्त - स्वतंत्रता के इक्शवन वर्ष: क्या खोया, क्या पाया, कश्मीर: कबिलाई आक्रमण से करगिल तक, जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन, भाई परमानन्द व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व, उत्सव मेरे प्राण जैसे विशेषांक और पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया है। अभी हाल में ही ‘‘तुष्टीकरण’’ विषय पद विशेषांक का प्रकाशन किया गया है। इसके लेख और अन्य सामग्रियों पर काफी चर्चा हुई।
विश्व संवाद केन्द्र द्वारा पूर्व की ही भांति अपने नए विशेषांक/स्मारिका के प्रकाशन की योजना बनी है। इस बार ‘‘मध्यप्रदेश में आंतरिक सुरक्षा’’ विषय पद विशेषांक का प्रकाशन किया जा रहा है। हमारा प्रयास आपके सहयोग के बिना तो पूरा हो सकता है और न ही प्रभावी। कृपया हमारे इस प्रयास में आप भी मदद करने का कष्ट करें। निम्न विषयों से संबंधित आलेख, जानकारी के साथ आंकड़े और दस्तावेज/अभिलेख आपके पास उपलब्ध हों तो कृपया हमें उपलब्ध कराने का कष्ट करें-
1. आंतरिक सुरक्षा के मायने
2. मध्यप्रदेश में आंतरिक सुरक्षा से संबंधित प्रमुख विषय/मुदृदे
3. प्रदेश के नागरिकों में आंतरिक सुरक्षा बोध
4. आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में व्यक्ति, समाज और सरकार की भूमिका
5. आंतरिक सुरक्षा के लिए प्रदेश सरकार की पहल
6. प्रदेश के लिए आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से प्रमुख खतरे
7. आंतरिक सुरक्षा: मध्यप्रदेश की चुनौतियां
8. मध्यप्रदेश में आंतरिक सुरक्षा
9. घुसपैठ, आतंकवाद, नक्सलवाद, मतान्मरण और आंतरिक सुरक्षा
10. मध्य्रपेदश का सांस्कृतिक ताना-बाना और आंतरिक सुरक्षा
11. अल्पसंख्यक दृष्टि से मध्यप्रदेश की आंतरिक सुरक्षा
12. चर्च, मदरसे, मिशनरियों और पादरियों की सक्रियता और आंतरिक सुरक्षा
13. आंतरिक सुरक्षा: केन्द्र और प्रदेश
14. आंतरिक सुरक्षा: रीति-नीति, कानून और क्रियान्वयन
15. आंतरिक सुरक्षा में नागरिक संगठनों की भूमिका
16. मध्यप्रदेश में विभिन्न आंदोलन और आंतरिक सुरक्षा
17. देश की सुरक्षा और मध्यप्रदेश की आंतरिक सुरक्षा
18. आंतरिक सुरक्षा: क्या करें, क्या न करें
19. संबंधित पुस्तकें
20. दुनिया में आंतरिक सुरक्षा
21. देश में आंतरिक सुरक्षा
22. मध्यपदेश में आंतरिक सुरक्षा
अन्य विषय जो आपको समीचीन, संदर्भित और उपयोगी लगते हों। विश्व संवाद केन्द्र इस सहयोग के लिए आपके प्रति ऋणी होगा। आपके सहयोग और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में।
सादर,
भवदीय

अनिल सौमित्र
संपादक

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

प्रो. बी.के. कुठियाला बने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति




bk प्रो. बी.के. कुठियाला बने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपतिभोपाल। प्रो. बी. के. कुठियाला माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नए कुलपति बने हैं। वे विश्वविद्यालय के सातवें कुलपति हैं। इसके पूर्व श्री अच्युतानन्द मिश्र और संस्थापक कुलपति डॉ. राधेश्याम शर्मा ऐसे कुलपति रहे जो अकादमिक पृष्ठभूमि के हैं। उल्लेखनीय है कि डॉ. शर्मा के बाद और श्री मिश्र के पूर्व जिन चार लोगों ने कुलपति का दायित्व निर्वहन किया वे प्रशासनिक पृष्ठभूमि के थे। इनमें डॉ. भागीरथ प्रसाद, श्री शरदचन्द्र बेहार और श्री सुमित बोस तो भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे, जबकि श्री अरविन्द चतुर्वेदी राज्य प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे। श्री चतुर्वेदी जनसंपर्क विभाग में अपर संचालक के पद पर थे।

प्रो. ब्रजकिशोर कुठियाला कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष रहे हैं। वे भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली के निदेशक भी रह चुके हैं। विश्वविद्याल अनुदान आयोग से संबध्द रहे श्री कुठियाला मीडिया, जनसंचार, शोध और शिक्षण कार्यों से जुड़े रहे हैं। मानवशास्त्र और समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त प्रो. कुठियाला अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं। वे श्री अच्युतानन्द मिश्र के उतराधिकारी के रूप में विश्वविद्यालय की अकादमिक परंपरा का निर्वहन करेंगे। कार्यभार ग्रहण करते हुए प्रो. कुठियाला ने कहा कि वे विश्वविद्यालय की अकादमिक परंपरा का निर्वहन करते हुए कोशिश करेंगे कि वर्तमान संदर्भ में मीडिया की आवश्यकताओं के अनुरूप जनसंचार के क्षेत्र में कार्य करने वाले मूल्यनिष्ठ और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण हो।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

आने वाले दिनों में कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रम आप भी प्रतिभागी हो सकते हैं, हिस्सेदारी कर सकते हैं

1. 14 जनवरी, 2010 9ः30 बजे से पानी, पर्यावरण और पत्रकारिता पद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एक दिवसीय कार्यशाला । यह कार्यक्रम हिन्दी वाटर पोर्टल के संयुक्त प्रयासों से हो रहा है।
2. 15, 16 और 17 जनवरी, 2010 को गढ़ी, टिमरनी में भाउ साहब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन। इस आयोजन में 15 जनवरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विश्व विभाग के सह-संयोजक श्री रवि कुमार अय्यर, ‘‘भारत महाशक्ति एवं विश्वगुरु बनने की ओर’’ विषय पद व्याख्यान देंगे। 16 और 17 जनवरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवर्तमान सरसंघचालक श्री कृप्.सी. सुदर्शन का व्याख्यान होगा। श्री सुदर्शन ‘‘पाश्चात्य चिन्तन और विकास पथ’’ और ‘‘हिन्दू चिन्तन और विकास पथ’’ विषय पद व्याख्यान देंगे।
3. 28 फरवरी, 2010 को भोपाल में विशाल हिन्दू संगम का आयोजन किया गया है। इस हिन्दू संगम को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डाॅ. मोहनराव भागवत संबोधित करेंगे। संघ के कार्यकर्ताओं ने एक लाख परिवारों को पंजीयन कर उन्हें इस संगम में भागीदार बनाने का लक्ष्य रखा है।
4. 9 और 10 मार्च, 2010 को हरिद्वार में ‘‘राष्ट्र रक्षा सम्मेलन’’ का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन में देशभर के सुरक्षा विशेषज्ञों, सुरक्षा विषय पद शोध, अन्वेषण, दस्तावेजीकरण और लेखन करने वालों का आमंत्रित किया जा रहा है। सेना, अर्द्धसेनिक बल, और पुलिस के सेवानिवृत्त अधिकारी भी इसमें बड़ी संख्या में भाग लेने वाले हैं।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा अपने अंतिम चरण में गोविन्दाचार्य ने हरदा, खंडवा और बुरहानपुर में यात्रा को संबोधित किया


यात्रा से अनिल सौमित्र
भोपाल। विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा अब अब अंतिक चरण में है। पिछले साल विजयादशमी के दिन कुरूक्षेत्र से शुरू हुई यह यात्रा 17 जनवरी, 2010 को नागपुर में पूरी होगी। इस दौरान यह यात्रा 20 हजार किमी की देरी तय करेगी। 108 दिनों की इस यात्रा में 400 से अधिक धर्मसभाएं आयोजित होंगी। गौ को राष्ट्रीय प्राणी घोषित कराने के लिए करोड़ों हस्ताक्षर कराए जायेंगे। पूरे देशभर में जिला, तहसील और विकास खंडों में 15000 उप-यात्राएं के माध्यम से 10 लाख किमी की दूरी तय की जायेगी। इस बीच करोड़ों लोगों से संपर्क किया जायेगा।
उल्लेखनीय है कि यात्रा अपने प्रथम चरण में 14 अक्टूबर को मध्यप्रदेश के ग्वालियर से होकर निकली। इसी दिन मध्यभारत प्रांत में यात्रा का शुभारंभ भी हुआ। अब जबकि यात्रा अपने अंतिम दौर में है पुनः 02 जनवरी, 2010 को रतलाम में आई। 09 जनवरी को यह यात्रा जबलपुर से होकर छत्तीसगढ़ की सीमा में पहुचेगी। 10 जनवरी को कवर्धा में यात्रा का स्वागत होगा।
भोपाल में यह यात्रा 6 जनवरी को आई। इसके पूर्व 5 जनवरी को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के उप-नगर बैरसिया और बैरागढ़ में भी यात्रा का भव्य स्वागत हुआ। भोपाल की सभा को गोकर्णपीठ श्रीरामचन्द्रपुर मठ के शंकराचार्य पूज्य श्री राघवेश्वर भारती महास्वामी जी और प्रख्यात चिन्तक श्री गोविन्दाचार्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सेवा प्रमुख सीताराम जी के अलावा अनेक संतों और बुद्धिजीवियों ने संबोधित किया।
भोपाल की सभा को संबोधित करते हुए पूज्य शंकराचार्य जी ने कहा कि गो-माता विश्व पावनी, जननी और पोषिणी हैं। लेकिन यह दुःख का विषय है कि गो-माता की रक्षा के लिए यात्रा निकालने की नौबत आ गई है। आज का समय ऐसा आ गया है कि हम गोपाल बनने में सम्मान नहीं बल्कि अपमान महसूस करते हैं। उन्होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि इस यात्रा के कारण लोगों में जागरुका आ रही है। गो रक्षा और इसके संवर्द्धन के लिए संगठन भी खड़ा हो रहा है। शंकराचार्य जी विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा के उद्देश्यों पद प्रकाश डालते हुए कहा कि यह यात्रा व्यक्ति और समाज में परिवर्तन के लिए है। इसके माध्यम से कुछ ऐसा करना है ताकि देश की आने वाली पीढ़ियां खुशहाल रह सकें। हम इसके माध्यम से सरकार और समाज का ध्यान आकृष्ट कराना चाहते हैं। आज गौ माता की ऐसी दुर्दशा है इसीलिए यह यात्रा निकाली जा रही है। उन्होंने बताया कि गाय की उपेक्षा का एक बढ़ा कारण यह है कि हमें गाय का महत्व और उसका उपयोग ठीक से मालूम नहीं है। हमें गाय के बारे में आर्थिक और भावनात्मक दोनों पक्षों का उजागर करना है। गौ पालन के लिए भाव और इच्छा जागरण के साथ ही वातावरण निर्माण का कार्य भी करना आवश्यक है। इसके लिए हम सभी की सेवा चाहिए। श्री शंकराचार्य जी ने बताया कि यात्रा के बाद गौ-संरक्षण व संवर्द्धन के लिए विस्तृ त कार्य-योजना तैयार की जायेगी। स्थान-स्थान पद प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित करने की भी आवश्यकता है।
प्रख्यात चिंतक गोविन्दाचार्य ने स्वदेशी अर्थचिंतक श्री गोविंदाचार्य ने भी सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि गौ माता जगत जननी है, प्रत्येक भारतीय को इसकी रक्षा का संकल्प करना चाहिए। गाय की सेवा अर्थात 35 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा करना। अपनी पूरी जिंदगी और मरने के बाद भी गो-माता मनुष्य और प्रकृति के लिए उपयोगी है। भारत की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि भारत दुनिया का अनमोल देश है। अपने वैशिष्ट के कारण ही इसे देवभूमि और पुण्यभूमि का विशेषण मिला। चीन में एक कहावत सर्वत्र प्रचलित है कि इस जन्म में अच्छा काम करोगे तो अगला जन्म भारत में मिलेगा। भारत में 29 हजार किस्म की वनस्पति और 85 हजार से अधिक पशु-पक्षियों की नस्लें हैं। भारत में सूर्य देवता का प्रताप भी अद्वितीय है। दुनिया के अन्य देशों में भारत की तरह सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता है। इसका हमारे जीवन पद काफी प्रभाव है। सूर्य के इसी प्रभाव के कारण यहां की गायों को भी विशेष गुण प्राप्त हुआ है। भारतीय गायों के दुध और घी में जो पीलापन है वह सूर्यतत्व है। यह सूर्य तत्व अन्य किसी प्रणी के दूध या किसी अन्य देश की गाय को प्राप्त नहीं है। क्योंकि भारतीय नस्ल की गायों में ही सूर्य तत्व को ग्रहण करने की क्षमता है।
श्री गोविंदाचार्य ने अंगेजी हुकूमत और स्वतंत्रता के बाद काले अंग्रेजों की हुकूमत पर गोवंश की कमी का ठीकरा फोड़ा। उन्होंने कहा कि सन 1800 में एक भारतीय पद 6 मवेशी होते थे, जबकि आजादी के वक्त दो भारतीय पर एक मवेशी ही बच पाया। आज हालात यह है कि 100 करोड़ की जनसंख्या पद मात्र 25 करोड़ गौवंश ही बचा है। यह इसलिए हुआ कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी उन्हीं की नीतियों को जारी रखा गया। चूंकि अंग्रेजों का मुख्य भोजन गो-मांस था इसलिए उन्होंने ऐसी नीतियां बनाई कि अधिकाधिक गो-वंश का उनके भोजन के लिए मारा जा सके। जबकि भारत में गा-वंश का उपयोग हमेशा से गो-दुग्ध, अन्य गो-उत्पाद और खेती तथा परिवहन आदि कार्यों के लिए होता था। उल्लेखनीय है कि 1857 से 1947 के बीच लगभग 40 करोड़ गो-वंश का वध किया गया। यह आज भी जारी है। देश के लाखों बूचड़खाने इसकी मिसाल हैं। भारत से गो-मांस का निर्यात आज भी निर्बाध गति से जारी है।
श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि गाय का गोबर, मूत्र, और दुग्ध गुणकारी है। हम इसके बारे में जानते हुए भी लाभ नहीं ले पा रहे हैं। कृषि में मशीनीकरण के कारण गो-वंश का उपयोग निरंतर कम होता जा रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि हमें गो विरोधी स्थितियां, भावना और नीतियों को दूर करना है। भारतीय नौकरशाही और काले अंग्रेजों ने पिछले 50 वर्षों में गाय के लिए घातक नीतियां बनाई। उन्होंने कहा कि गोशाला और वृद्धाश्रम स्वस्थ्य समाज की निशानी नहीं है। वृद्धों का स्थान घरों में और गो-माता का स्थान किसान के खूंटे पर ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पद जोर दिया कि प्रत्येक विकासखंड पर नंदीशाला और पशु चिकित्सालय होना चाहिए। बेहतर चारे के लिए प्रत्येक जिले में गो-अनुसंधान केन्द्र विकसित होना चाहिए। सरकार को कृषि, सिंचाई, परिवहन और उर्जा नीति गाय के अनुकूल बनाना चाहिए। परिवहन के लिए भी मानव श्रम, पशु परिवहन और बस और रेल का अनुपात तय किया जाना चाहिए।
श्री गोविंदाचार्य ने जोर देकर कहा कि जैसी दृष्टि होगी वैसी ही सृष्टि होगी। हमारा नजरिया बदलेगा तभी नजारा बदलेगा। गौ और गंगा माता की रक्षा करने से ही राष्ट्रीय पुनर्निर्माण होगा। गौ माता का मुद्दा सांप्रदायिक नहीं राष्ट्रीय है। उन्होंने दावा किया कि जिस दिन गौ-वंश की संख्या इंसान से अधिक हो जायेगी उस दिन भारत पुनः विश्वगुरु बन जायेगा। इसके पूर्व श्री गोविन्दाचार्य ने हरदा, खंडवा और बुरहानपुर में भी यात्रा-सभा को संबोधित किया।
मध्यभात में आयोजित अनेक उप-यात्राओं का इसी सप्ताह समापन हुआ। 22 से 29 नवम्बर, 09 तक लाखों हस्ताक्षर कराए गए। ग्राम स्तर पद 5 से 15 दिसंबर तक और 15 से 25 दिसंबर तक उप यात्राओं का आयोजन हुआ था। उप यात्राओं के समापन पर गौ-भक्तों और विद्वानों ने सभा को संबोधित किया। भोपाल सहित सभी सभाओं में हजारों की संख्या में उपस्थित ग्रामीणों और नागरिकों को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने गाय की महिमा, गोवंश को खत्म करने के देशी-विदेशी षड्यंत्रों, सरकारी उपेक्षा, नागरिक लापरवाही और सज्जन शक्ति की उदासीनता पर प्रकाश डाला।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

Launcing of Website of HSS and Sri Gurudakshina
Celebrated at Triolet, Mehashwarnath Mandir, Mauritius
( Dated : 27-Dec-2009)

Website was Launched by Swami Poornanand Ji, Organized by HSS Mauritius. The function was presided over by Sri Raghunath Deealji, Sanghchalak Mauritius and the chief speaker was Sri Prabhu Narain Srivastava(Prabhuji), Sah Prant Sangh Chalak, Avadh Prant, U.P., Rtd Chief Engineer and All Inda Organizing Secretary of Mahamana Malaviya Mission, India.

The website was launched in the presence of nearly hundred citizens of Mauritius. On this occasion Prabhuji highlighted the three Global problems .i.e. Global Terrorism, Global Recession and Global Warming. The entire world is engaged in resolving these subtle challenges mankind is ever facing. Hindu Dharam, since time immemorial has advocated life vision which addresses these problems in its entirety. It is because of this that the Hinduism has survived since thousands of centuries. The inclusiveness of Hinduism has the remedy of all these global problems. The mother earth should be milked not bled to satisfy the unending material desires of the mankind, which has resulted into global warming and global recession. The global terrorism is also the outcome of the life vision of exclusivist, who propagates their religion through violence. Shreemad Bhagwad Geeta and other Hindu Scriptures have been awakening the ill effects of Global Terrorism, Recession and Warming since beginning. It is a matter of satisfaction that mankind has at least started to recognize the efficacy of Hindu philosophy to bring about world piece and sustainable eco-friendly development, the testimony to which is the recitation of Vedic Richas in the Parliament of USA. It is a matter of pride that Mauritius has shown the path of cultural expansion for peace and brotherhood by Harmonizing French, English, Hindi, Bhojpuri and Creol languages. Besides this the foundation of Trayodash Maurisheshwar Nath Jyotirling, Gangal Talao( Grand Bassin) Mauritius is a step forward to expand its cultural identity across the world. Prabhuji requested all the Hindu saints of India to give the recognition to this Trayodash Maurisheshwar Nath Jyotirling.

After the speech of Prabhuji Swami Poornanand Blessed the HSS for expanding its work in Mauritius. The sanghchalak of Mauritius Sri Raghunath Deealji elaborated the importance of Gurupooja and Bhagwa Dhwaj. All the swayamsevaks offered their oblations and the program was concluded by prarthana.

By- Pragya Srivastava

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

http://www.panchjanya.com/dynamic/modules.php?name=Content&pa=showpage&pid=358&page=17

समाचार विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा

29 दिसंबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह सुरेश सोनी भोपाल में विवेकानन्द केन्द्र के कार्यकर्ता सम्मेलन में देश भर से आए कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करेंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक, भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव और वरिष्ठ चिंतक-विचारक के.एन.गोविन्दाचार्य मध्यप्रदेश के भोपाल, होशंगाबाद, हरदा, खंडवा और बुरहानपुर के दौरे पद हैं। 29 से 30 दिसंबर के बीच वे भोपाल में पत्रकार और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों से मुलाकात करेंगे, वहीं वे हरदा, खंडवा और बुरहानपुर में विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा को संबोधित करेंगे। 31 दिसंबर को वे राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की बैठक में भाग लेंगे।

अखिल भारतीय स्तर पद आयोजित विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा 5 जनवरी, 2010 को भोपाल पहुंचेगी।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

राम मंदिर आंदोलन का शंखनाद अप्रैल में

विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रवीणभाई तोगडिय़ा ने साफ कहा कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने का ब्लू प्रिंट 6 अप्रैल से शुरू हो रहे हरिद्वार के कुंभ मेले में साधु-संतों की अगुआई में तैयार होगा। वे कारसेवा या जो भी फैसला लेंगे, उसी आधार पर आंदोलन चलेगा। इसका नेतृत्व संत करेंगे। किसी नेता को मंच पर भी नहीं चढऩे देंगे। तोगडिय़ा ने कहा कुंभ में 6 अप्रैल को 20 हजार से ज्यादा साधु-संत मौजूद होंगे। विहिप संतों से आग्रह करेगी कि मंदिर आंदोलन का मार्ग प्रशस्त करें। उनकी मंशानुसार ही राममंदिर का संकल्प पूरा किया जाएगा। तोगडिय़ा ने कहा अलगाववाद, जेहाद, घुसपैठिए बांग्लादेशी और सच्चर कमेटी का समाधान इसी रास्ते से गुजरेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन चुनाव या वोटों के लिए नहीं होगा। इसका नेतृत्व साधु-संत ही करेंगे।

मंदिर निर्माण से मिटेगा जेहादी आतंकवादविहिप के हितरक्षक सम्मेलन में गरजे तोगडिय़ाइंदौर, सिटी रिपोर्टर। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रवीण भाई तोगडिय़ा ने ऐलान किया कि एक बार फिर राम मंदिर आंदोलन उठेगा। जेहादी आतंकवाद को मिटाने का रास्ता मंदिर निर्माण से ही गुजरेगा। यह लड़ाई कोई पीएम और सीएम बनाने की नहीं, बल्कि अखंड ब्रह्मांड के भगवान राम के मंदिर की है। वे विहिप के हित रक्षक सम्मेलन में गरज रहे थे। उन्होंने कहा कि अगर मो. कासिम से लेकर मो. जिन्ना तक की मंदिर तोडऩे वाली मानसिकता खत्म नहीं की तो देश बंट जाएगा। भारत में अवैध बसे तीन लाख बांग्लादेशियों की विदाई का रास्ता भी मंदिर बनने से ही होगा।वंदे मातरम् का फतवा राष्ट्रद्रोह
डॉ. तोगडिय़ा ने कहा कि एक लाख मौलवियों के सम्मेलन में वंदे मातरम् का फतवा जारी किया गया। यह राष्ट्रद्रोह है। रंगनाथ मिश्र आधुनिक जिन्ना है, जिसने संसद में मुस्लिमों को आरक्षण देने की रपट पेश की है।हर तहसील में जिन्ना की औलादें
उन्होंने कहा अब तो भारत की हर तहसील में जिन्ना की औलादें पैदा हो गई हैं। इंदौर और उज्जैन में सिमी के नाम पर इनकी कोई कमी नहीं है। सम्मेलन में विहिप संयुक्त मंत्री स्वामी विद्यानंदजी ने भी विचार रखे। इस मौके पर अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष एस. वेदांतम, संगठन महामंत्री दिनेशचंद्र, संयुक्त महामंत्री स्वामी विद्यानंद, वरिष्ठ सलाहकार मंडल गिरिराज किशोर, मालवा प्रांत अध्यक्ष जड़ावचंद्र जैन, प्रांत मंत्री नारायणजी और प्रशासनिक व्यवस्था व प्रचार-प्रसार प्रमुख मुकेश जैन भी मौजूद थे। स्वास्थ्य खराब होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल सम्मेलन में नहीं आ पाए। हिंदुत्व के लिए काम करें गडकरी
इंदौर। विहिप के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रवीण भाई तोगडिय़ा ने पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा में कहा कि भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को हिंदुत्व के लिए काम करना चाहिए। अगर वे ऐसा करते हैं तो करोड़ों हिंदुओं का भरोसा जीत पाएंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करेगा राष्ट्रीय सुरक्षा पर चिंतन


9-10 मार्च, 2010 में हरिद्वार में होगा अखिल भारतीय राष्ट्र-रक्षा कुंभ

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में सीमाई सुरक्षा के साथ देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर भी चिंतित है। संघ की चिंता समय-समय पर प्रस्तावों, वक्तव्यों और कार्यक्रमों के माध्यम से व्यक्त होती रही है। देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा केन्द्र और राज्यों की सरकारों के साथ ही आमलोगों की चिंता का विषय बने इस दिशा में कई प्रयास किए जा रहे हैं। संघ की प्रेरणा और पहल से देश के अनेक सुरक्षा विशेषज्ञों, सेना और पुलिस के सेवानिवृत्त अधिकारियों तथा अन्य तकनीकी और विशिष्ट क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने ‘फोरम फाॅर इंटीग्रेटेड नेशनल सिक्योरिटी’ (फिन्स) का गठन किया है। अखिल भारतीय स्तर पर गठित इस फोरम को सभी राज्यों में विस्तार दिया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि फिन्स को विस्तार देने और इसे प्रभावी बनाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य श्री इन्द्रेश कुमार देशभर में प्रवास कर रहे हैं। इसी सिलसिले में वे 21 दिसंबर को भोपाल आए थे। श्री इन्द्रेश कुमार ने 9-10 मार्च, 2010 में प्रस्तावित राष्ट्र रक्षा सम्मेलन के सिलसिले में भोपाल के विशिष्ट लोगों से चर्चा। यह सम्मेलन हरिद्वारा में होना प्रस्तावित है। इस सम्मेलन में देशभर से लगभग सात सौ प्रतिनिधि शामिल होंगे। ये सभी प्रतिनिधि सुरक्षा संबंधी मामलों से जुडे विशेषज्ञ होंगे। इन्द्रेश कुमार भोपाल के सेवानिवृत्त पुलिस, प्रशासन और सेना के लोगों से मिले और घंटो चर्चा की। उन्होंने बताया कि हरिद्वारा में आयोजित इस राष्ट्र रक्षा सम्मेलन में देश की आंतरिक, सीमाई और बाह्य सुरक्षा के विषयों पर विविध आयामों से विस्तृत चर्चा की जायेगी। विभिन्न तकनीकी सत्रों में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में सुरक्षा संबंधी समस्याओं और सरकार तथा सुरक्षा संबंधी एजेंसियों के साथ ही नागरिकों स्तर पर हाने वाली पहल के बारे में सुझाव, योजना और रणनीति संबंधी चर्चा भी होगी।
श्री इन्द्रश कुमार ने चर्चा उपस्थित सभी वरिष्ठ प्रतिभागियों से हरिद्वार में प्रस्तावित राष्ट्ररक्षा सम्मेलन में उपस्थित होने और इस सम्मेलन में अधिकाधिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति के लिए सभी से प्रयास करने का आग्रह भी किया। भोपाल की चर्चा में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस आर डी शुक्ला, सेवानिवृत्त डीजीपी एन. नटराजन,एचएम जोशी, सुभाषचन्द्र त्रिपाठी, वीपी साहनी, कैप्टन वीपी सिंह, सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी डीएस गिल और जयकृष्ण गौड़ आदि उपस्थित थे। अन्य राज्य की तरह ही मध्यप्रदेश से भी प्रतिनिधियों की सूची तैयार की जायेगी। मध्यप्रदेश के सुरक्षा और रक्षा विशेषज्ञों का भी अच्छी संख्या में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जायेगा।

सोमवार, 16 नवंबर 2009

‘हरित तकनीक द्वारा अक्षम विकास‘ पर केद्रित होगा
द्वितीय भारतीय विज्ञान सम्मेलन
3 दिसम्बर, 2009 से इंदौर में


भोपाल (म.प्र) विभिन्न भारतीय भाषाओं के माध्यम से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रकीर्णन हेतु आयोजित भारतीय विज्ञान सम्मेलन का द्वितीय आयोजन इंदौर में 3 दिसम्बर से होने जा रहा है। जो हरित तकनीक द्वारा अक्षम विकास पर केंद्रित होगा ।
सम्मेलन का आयोजन आमजन के बीच लाभार्थ विज्ञान आंदोलन ‘‘विज्ञान भारती‘‘ म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय भोपाल द्वारा किया जा रहा है। प्रथम भारतीय विज्ञान सम्मेलन का आयोजन भोपाल में किया गया था जिसमें प्रख्यात वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी भाग लिया था ।
ग्लोबल वार्मिग की विश्व व्यापी समस्या की भारतीय दृष्टि से समाधान प्रस्तुत करने के लिए द्वितीय भारतीय विज्ञान सम्मेलन का विषय हरित तकनीक द्वारा अक्षम विकास है ।
ज्ञात है कि भारतीय विज्ञान सम्मेलन एक ऐसा प्रयास है जिसमें समस्त भारतीय भाषाओं में शोध पत्रों को प्रस्तुत किया जा सकता है। इस सम्मेलन की मूल अवधारणा है कि भारतीय भाषाओं के उपयोग से ही विज्ञान को भारतीय समाज के लिए कल्याणकारी बनाया जा सकता है।
सम्मेलन के सफल आयोजन हेतु मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान द्वारा तैयारियों की समीक्षा की गई । श्री चैहान ने विज्ञान सम्मेलन को गरिमा तथा उद्देश्य परकता के साथ आयोजित करने पर बल दिया ।
इस वर्ष सम्मेलन के अध्यक्ष देश के परम कम्प्युटर के जनक डा. विजय भाटकर होंगे ं साथ ही पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. कलाम इसरो के चैयरमैन प्रो. जी माधवन नायर, सीएसआईआर के पूर्व महानिदेशक श्री मशालकर जी, स्वामीनायन, परमाणु उर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोड़कर भी सम्मिलित होंगे ।
इस अवसर पर 27 नवम्बर से देवी अहिल्या परिसर में एक अखिल भारतीय प्रदर्शनी का भी आयोजन किया जाएगा । जिसमें म0प्र0 शासन सहित भारत सरकार के प्रतिष्ठित विज्ञान संस्थानों की उपलब्धियों का चित्रण होगा ।
द्वितीय भारतीय विज्ञान सम्मेलन,2009 प्रो. (डा.) जे.सी.बोस की एक सौ पचासवी जन्म शताब्दी को समर्पित है। भारतीय विज्ञान उन वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है जो जीवन के प्रत्येक मार्ग पर वातावरण को बिना किसी क्षति के आगे बढ़ने का समाधान प्रस्तुत करता है। वर्तमान में पाश्चात्य जगत में आ रही नवीन उर्जा सम्बन्धी धारणाएं हमारे पुरातन ज्ञान की सार्थकता को प्रमाणित कर रही है ।
हरित तकनीकी द्वारा राष्ट्र और उनके समाजों की सामाजिक, आर्थिक विभिन्नताओं, शहरीकरण, ग्रामीण निर्धनता पर्यावरणीय क्षय और विषय विकास की समस्याओं को हल किया जा सकता है।
प्रज्ञा प्रवाह द्वारा वंदेमातरम् पर विमर्श
मुस्लिम देशो के राष्ट्रगीत में मातृवंदना, फिर वंदेमातरम् गैर इस्लामी कैसे!

भोपाल। जब विश्व के अधिकांश मुस्लिम देशों के राष्ट्रगीतों में मातृभूमि प्रतीकों का चित्रण है फिर राष्ट्रगान वंदेमातरम् को गैर इस्लामी कैसे कहा जा सकता है। मुसलमानों द्वारा वंदेमातरम् गायन का विरोध अज्ञानता का परिचायक है। यह विचार मनोज श्रीवास्तव, आयुक्त जनसम्पर्क मध्यप्रदेश शासन ने ‘प्रज्ञा प्रवाह‘ संस्थान द्वारा वंदेमातरम् पर आयोजित परिचर्चा में व्यक्त किया।
वन्दे मातरम् - गीत के साहित्येतिहासिक महत्व का अध्ययन करने और इसी विषय पर पुस्तिका लिखने वाले श्री श्रीवास्तव ने विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वंदेमातरम् का विरोध करने वाले सबसे पहले इसका अध्ययन करें। उन्होंने इसे नापसंद करने वाले राजेन्द्र यादव, ए.जी.नूरानी, शम्सुल इस्लाम, अम्बरीश आदि के वक्तव्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राष्ट्रगान सांप्रदायिकता कट्टरपन से परे मातृभूमि के प्रति समर्पित भावना का प्रतीक है और इस संवैधानिक मान्यता मिली है।
वरिष्ठ समाजसेवी लज्जाशंकर हरदेनिया ने भी वंदेमातरम् की ऐतिहासिक और संवैधानिक भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब भी संवैधानिक और पारंपरिक मान्यताओं के बीच टकराव हो तो हमें संवैधानिक दायित्वों को पालन करना चाहिए। इसी से आपसी भाईचारा और राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत हो सकेगी। उन्होंने जमाएते उलेमा हिंद द्वारा देवबंद में जारी वंदेमातरम् के फतवे के साथ ही उलेमाओं के कट्टरपंथी अन्य प्रस्तावों की भी आलोचना की । म.प्र. अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष मो. अनवर खान ने उलेमाओं द्वारा वंदेमातरम् के खिलाफ जारी फतवे को ‘सियासी चाल‘ बताते हुए कहा कि जब उल्लमा इकबाल ने वंदेमातरम् का विरोध नहीं किया फिर आजकल के फिरकापरस्ती ताकतों द्वारा इसका विरोध गैर वाजिब है। वैसे भी इस फतवे की कोई शरियत हैसियत नहीं है और न ही यह कोई खुदा का हुक्म है जिसे माना जाए। उन्होंने मुस्लिम समाज को देश ओर इसकी संस्कृति के प्रति दायित्वपूर्ण रवैया अपनाने का आहवान किया। देवबंद से तालीम प्राप्त भोपाल के मौलाना अख्तर हाशमी ने भी इस तरह के फतवों को कोई अहमियत न दिए जाने की पुरजोर वकालत की । उन्होंने कहा कि मुझे और मेरे जैसे लाखों मुसलमानों को इस बात पर फक्र है कि वो पूरी आजादी और मजहबी उसूलों के साथ इस देश में रह रहे हैं। श्री हाशमी ने कहा कि उलेमा कौम को प्रगति के रास्ते पर ले जाने वाले कदम उठाएं न कि गैर जरूरी मुद्दों पर विवाद और फसाद वाले कदम।
प्रख्यात चिंतक और धर्मपाल शोधपीठ के निदेशक प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज‘ ने देवबंद में वंदेमातरम के खिलाफ जारी फतवे को गहरी सांस्कृतिक कशमकश से उपजी सोच बताते हुए कहा कि ऐसे मुद्दो पर फतवे जारी करने की बजाय मुस्लिम संवाद का रास्ता अपनाए जिससे सही रास्ता निकल सके। विमर्श का आयोजन स्वराज संस्थान के सभाकक्ष में ‘प्रज्ञा प्रवाह‘ द्वारा किया गया था। प्रज्ञा प्रवाह के प्रांत संयोज बालकृष्ण दवे ने उपस्थिति सुधीजन के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रज्ञा प्रवाह के सह-संयोजक दीपक शर्मा ने किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डाॅ. देवेन्द्र दीपक, अधिवक्ता परिषद् के ब्रजकिशोर सांघी, मध्यप्रदेश राष्ट्रीय एकता परिषद् के रमेश शर्मा, संस्कार भारती के कामतानाथ वैशम्पायन, राष्ट्र सेविका समिति की सुखप्रीत कौर सहित काफी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल, युगाब्द 5111
दिनांक: 9,10,11 अक्टूबर, 2009
राजगृह, नालन्दा (बिहार)

प्रस्ताव क्र॰: 1
सीमा सुरक्षा सुदृढ़ करें

अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल भारत - तिब्बत (चीन अधिकृत) सीमा पर हुए हाल के घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त करता है। विस्तारवादी चीन द्वारा हमारे भू-भाग पर कब्जा जमाने के निरंतर प्रयासों को कई समाचार माध्यमों ने उजागर किया है और अपने सुरक्षा विभाग के जिम्मेवार अधिकारियों ने भी इसकी पुष्टि की है।
अकेले गत वर्ष में ही इन रपटों ने चीन की ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ द्वारा नियंत्रण रेखा के
270 उल्लंघन और ‘आक्रामक सीमा चैकसी’ की 2285 घटनाएँ होने की पुष्टि की है। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था पर दुःखद टिप्पणी है कि हमारे भू-भाग के बारे में विरोधियों की कुटिल योजनाओं के प्रति देश की जनता को सचेत करने के स्थान पर कानूनी कार्यवाही द्वारा मीडिया के स्वरों को दबाने का प्रयास हुआ है और आसन्न खतरे को निर्लज्जतापूर्वक कम दिखाने का भी प्रयास हुआ है। चीन की आक्रामक गतिविधियों के विरोध में अपनी तैयारी के विषय में हमारे नेताओं द्वारा दिये जा रहे पराभूत मनोवृत्ति वाले वक्तव्य अत्यन्त निराशाजनक एवं मनोबल गिराने वाले हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे आस-पास के देशों के आक्रामक व्यवहार के प्रति हमारी प्रतिक्रिया सदैव ढीली-ढाली रहती है। परम श्रद्धेय दलाई लामा को शरण देने के ऐतिहासिक निर्णय को छोड़ दें तो, तिब्बत के प्रश्न पर हमने निरंतर गलतियाँ की हैं और अंततः सार्वभौम व स्वतंत्र तिब्बत पर चीनी कब्जे को मान्यता ही दे दी है। चीन ने 50 के दशक में लद्दाख के अक्साई चिन पर कब्जा जमा लिया। हमारे अन्य भी भू-भाग हड़पने के चीन के षड्यंत्र के परिणामस्वरूप 1987 में सुंदोरांग चू घाटी के विषय में हमें अपमानजनक समझौता करना पड़ा। हमारी कमजोरी का लाभ उठाकर अब तो चीन ने पूरे अरुणाचल प्रदेश पर ही अपना दावा करना प्रारम्भ कर दिया है।
अ.भा.का.मं. का मानना है कि इस प्रकार के आक्रमणकारी रवैये पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया सर्वथा अपर्याप्त रही है। कार्यकारी मंडल सरकार से आवाहन करता है कि भारत-तिब्बत सीमा को और साथ ही साथ समुद्री सीमा, भारत-पाक एवं भारत-बांग्लादेश सीमा को भी सुदृढ़ करने के लिए तुरन्त कदम उठाए। चीन द्वारा सीमा के उस पार भारी सैन्य बल का एकत्रीकरण और ढाँचागत व्यवस्थाओं के निर्माण को देखते हुए हमें भारत-तिब्बत सीमा पर अपने सैन्य बल की प्रत्युत्तर क्षमता को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है।
कूटनीतिक संवाद, घेरना और हमारे शत्रुओं को प्रोत्साहन देना - इन तीन बातों का भारत को परेशान करने के लिए चीन व्यूहात्मक शस्त्र के रूप में प्रयोग करता है। दक्षिण म्यांमा के
कोको द्वीप में स्थित उनकी गश्ती चैकी को उन्होंने पूर्णरूपेण सेना चैकी के रूप में विकसित कर लिया है। श्रीलंका में चीन एक वाणिज्य बंदरगाह का निर्माण कर रहा है जबकि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में उसके द्वारा बनाया गया ग्वादर सैनिक बंदरगाह कामकाज के लिये तैयार हो चुका है। एक ओर वह भारत-तिब्बत सीमा को सैनिकी उŸोजना के लिये उपयोग में ला रहा है तो दूसरी ओर पूर्वोŸार भारत में स्थित आतंकवादी और राष्ट्रविरोधी तत्वों की मदद करने के लिए भारत-म्यांमा सीमा का दुरुपयोग कर रहा है। वह भारत को तोड़ने की बात तक करने लगा है।
कार्यकारी मंडल को खेद के साथ कहना पड़ता है कि सरकार के इस ढुलमुल रवैये
की कीमत भारत को न केवल सीमा पर अपितु कूटनीतिक मोर्चे पर भी चुकानी पड़ रही है।
‘ एशियन डेवलपमेंट बैंक ’ में अरुणाचल प्रदेश का मुद्दा उठाकर उस राज्य के विकास के लिए ऋण प्राप्त करने के भारत के प्रयासों को बाधित करने में चीन सफल हुआ है। चीन ने परमाणु आपूर्ति समूह के देशों को भारत के विरुद्ध लगे प्रतिबंधों को हटाने से रोकने का असफल प्रयास भी किया है।
अ.भा.का.मं. सरकार को स्मरण दिलाना चाहता है कि उसे संसद द्वारा 14 नवम्बर, 1962 को पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव की भावना के प्रकाश में कदम उठाना चाहिए, जिसमें चीन द्वारा हड़पी गई सारी भूमि वापस प्राप्त करने की बात स्पष्ट रूप से कही गई थी। भारत सरकार को चीन से स्पष्ट रूप से कह देना चाहिए कि वह पश्चिमी क्षेत्र में हड़पे गये भू-भाग को वापस करे और अन्य क्षेत्रों के संदर्भ में कोई दावा पेश न करे। चीन से कहा जाए कि वह मैकमोहन रेखा को भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में उसी तरह मान्यता दे जिस तरह उसने चीन-म्यांमा सीमा पर उसे दी है।
यह बात चिन्ताजनक है कि अरुणाचल प्रदेश व कश्मीर के नागरिकों को चीन ‘पेपर वीसा’ दे रहा है। इस उकसाने वाली कारवाई से चीन दिखाना चाहता है कि अरुणाचल प्रदेश व कश्मीर को वह भारत के अविभाज्य अंग के रूप में स्वीकार नहीं करता। कार्यकारी मंडल माँग करता है कि सरकार आव्रजन अधिकारियों को आदेश दे कि, लोगों को देश से बाहर जाने के लिये इस प्रकार के ‘पेपर वीसा’ के प्रयोग पर तत्काल प्रतिबंध लगाये। आक्रामक दौत्य नीति के साथ इस प्रकार के दृढ़ कदम ही चीन के संबंध में अनुकूल परिणाम दे सकते हैं।
भारत-पाक मोर्चे पर भी इसी तरह की चिंताओं को कार्यकारी मंडल रेखांकित करना चाहता है। विशेषकर 9 जुलाई 2009 का भारत और पाक के प्रधानमंत्रियों का शर्म-अल-शेख का
संयुक्त वक्तव्य देश को स्तब्ध कर देने वाला है। अनेक विशेषज्ञ और विभिन्न राजनीतिक दलो के नेताओं ने इस वक्तव्य की दौत्य संबंधी भारी भूलों को उजागर किया है, जैसे - बलूचिस्तान मुद्दे को उसमें लाना और पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को जारी रखने पर भी उससे वात्र्ता पुनः प्रारम्भ करने की सहमति व्यक्त करना।
अ.भा.का.मं. माँग करता है कि पाकिस्तान के संबंध में भी संसद के 22 फरवरी 1994 के सर्वसम्मत प्रस्ताव की भावना का सरकार पालन करे, जिसमें कहा गया है कि पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में वापस लाना ही एक मात्र मुद्दा है।
कार्यकारी मंडल हमारी सीमाओं की रक्षा में लगे बहादुर जवानों एवं अधिकारियों के शौर्यपूर्ण कृत्यों का अभिनंदन करता है और देशवासियों से आवाहन करता है कि वे सदैव सतर्क रह कर सरकार को अपनी भौगोलिक अखंडता एवं स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए बाध्य करें ।

मध्यप्रदेश में एनजीओ पंचायत के मायने

अनिल सौमित्र
12 अक्टूबर को प्रदेश की राजधानी भोपाल में एनजीओ पंचायत आहूत की गई है। पहले यह पंचायत 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन किया जाना था। सरकार ने गांधीजी से संबंधित दिवस पर एनजीओ पंचायत कर कुछ विशेष संदेश देने की सोची होगी। लेकिन किन्ही कारणों से यह पंचायत अब 12 अक्टूबर को की जा रही है। दिवस चाहे कोई भी हो, इस पंचायत का पूर्व नियोजित कोई उद्देश्य अवश्य होगा। प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चैहान ने ‘‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’’ का नारा दिया है। सरकार ने 2013 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा है। उल्लेखनीय है कि सिर्फ भाजपा सरकार ही नहीं, संपूर्ण भाजपा और कहें तो संपूर्ण राष्ट्रवादी शक्तियों की यही अभीप्सा है - परम् वैभवम् नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्’ अर्थात् अपने देश को परम वैभव के शिखर तक ले जाना है। राष्ट्र के परम वैभव का सपना तभी सकार होगा जब एक-एक प्रदेश परम् वैभव की ओर अग्रसर होगा।
स्वप्न का संबंध स्वप्नद्रष्ट्रा से भी है। स्वप्न तो कोई भी देख सकता है, लेकिन उसे साकार वहीं कर सकता है जो कुशल योजनाकार और रणनीतिकार हो। स्वप्न को नीति, योजना और रणनीति दिए बिना साकार करना संभव नहीं है। आजादी के बाद अनेक पार्टियों और सरकारों ने सुखद स्वप्न देखे। लेकिन ये स्वप्न नारों में तब्दिल होकर रह गए। क्या भाजपा सरकार के मुखिया शिवराज का स्वप्न भी नारे में तब्दील होकर रह जायेगा! अन्य पार्टियों और सरकारों की तुलना में भाजपा और भाजपा सरकारों में थोड़ा ही सही, लेकिन फर्क तो जरूर है। यही फर्क उसे स्वप्न को साकार करने का जज्बा, उर्जा और कौशल देता है। भाजपा के पास आज भी प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज है। सैकड़ों समविचारी संगठनों का सहयोग और उर्जा है। अगर शिवराज सरकार ने पार्टी के कार्यकर्ताओं और समविचारी संगठनों की उर्जा और कौशल का उपयोग किया तो स्वर्णिम मध्यप्रदेश का स्वप्न साकार होने में देर नहीं लगेगी।
शिवराज सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में भी विभिन्न पंचायतों के माध्यम से जनमत का आगाज किया था। इस कार्यकाल में भी प्रदेश के मुखिया ने पंचों को मंच देने का सिलसिला जारी रखा है। वे जानते हैं पंच ही परमेश्वर है। भाजपा सरकार हकदारों को सुनना चाहती है, जिनका हक है उनसे दो बातें करना चाहती है। मुख्यमंत्री की चैपाल में पंचायत का आयोजन सबको सुनने का एक उपक्रम है। लेकिन सुने हुए को गुना जाए और गुने हुए को वापस सब तक पहुचाया जाए, यह जनता-जनार्दन की अपेक्षा है। महिला पंचायत, किसान पंचायत, जनजाति (आदिवासी) पंचायत, वन पंचायत, अनुसूचित जाति पंचायत, कोटवार पंचायत, खेल पंचायत, लघु उद्योग पंचायत तथा कारीगर-शिल्पी पंचायत, किसान महापंचायत, निःशक्तजन पंचायत, मछुआ पंचायत, स्व-सहायता समूह पंचायत, हम्माल-तुलावट पंचायत और रिक्शा-ठेला चालक पंचायत के बाद इस एनजीओ पंचायत के अपने मायने हैं। इसके बाद कामकाजी महिलाओं की पंचायत भी की जा रही है।
यह पंचायत पूर्व में आयोजित पंचायतों से कई मायनों में भिन्न है। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मध्यप्रदेश ही नहीं, देश और दुनियाभर में सार्वजनिक और निजी (सेक्टर) क्षेत्र की तरह एनजीओ सेक्टर का भी विस्तार हुआ है। पूर्व में आयोजित विभिन्न पंचायतों के बरक्स, राजनीति और वैचारिक क्षेत्र में एनजीओ सेक्टर का उन सबसे अधिक दखल और प्रभाव है। प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एनजीओ की अलग किस्म की राजनीति है। एनजीओ के अनेक समूहों का न सिर्फ सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में दखल है, बल्कि वे देश और दुनिया की राजनीति को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं। आज कुकुरमुत्ते की तरह पनप रहे पनप रहे एनजीओ की चर्चा छोड़ दे ंतो मध्यप्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में स्थापित एनजीओ अपनी-अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि के साथ अपने उद्देश्यों को अंजाम देने में लगे हैं। अमेरिका जैसे पूंजीवादी देशों से लेकर सोवियत रूस तक एनजीओ के माध्यम से अपने नियोजित उद्देश्यों को पूरा करते रहे हैं। अनेक सरकारों की खुफिया एजेंसियां भी अपनी विदेश नीति को क्रियान्वित करने में एनजीओ को माध्यम की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। लगभग सभी बड़ी रानीतिक पार्टियों ने एनजीओ प्रकोष्ठ की स्थापना कर रखी है। लेकिन अभी इस क्षेत्र में वाम राजनीति का एकछत्र कब्जा है। शिक्षा, शोध, मानवाधिकार, गरीबी, सूचना और ऐसे लगभग सभी क्षेत्रों में वाम राजनीति ने एनजीओ के माध्यम से अपना दखल और रूतबा बनाए रखा है। आज तक देशभर में माक्र्सवाद, लेनिनवाद, माओवाद और कुल मिलाकर वाम (कम्युनिस्ट) राजनीति को स्थापित करने, उसे विस्तार देने में एनजीओ को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। भारत में एनजीओ सेक्टर अपेक्षाकृत नया और कच्चा है। इस लिए अभी से इस दिशा में जागरुक, सचेत और सावधानी पूर्वक पहल व प्रयोग की दरकार है।
मध्यप्रदेश में जन अभियान परिषद् के रूप में एक अभिनव प्रयोग हुआ है। स्वैच्छिक संस्थाओं को संस्कार और प्रशिक्षण के माध्यम से सशक्त करने का प्रयास भले ही दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में शुरु हुआ, लकिन तब तक यह सुप्तावस्था में ही था। भाजपा सरकार ने पहली बार इस दिशा में एक सार्थक और सकारात्मक पहल की। भारत सरकार का योजना विभाग, योजना आयोग के माध्यम से इस दिशा में सक्रिय प्रयोग कर रहा है। इस प्रयोग के परिणाम भी आने लगे हैं। मध्यप्रदेश सरकार की पहल को और अधिक सक्रियता की दरकार है। जन अभियान परिषद् को कार्य करते हुए दशक बीत गए, लेकिन अभी तक कोई उल्लेखनीय परिणाम नहीं दिखा। अच्छे बजट और भारी-भरकम अमले के बावजूद जन अभियान परिषद् का कार्य-निष्पादन संतोषजनक नहीं है। स्वैच्छिक संस्थाओं और सरकार के बीच नीति, योजना और क्रियान्वयन के स्तर पर अभी बहुत कुछ किया जाना है। संभव है 12 अक्टूबर को आयोजित इस एनजीओ पंचायत में किसी एनजीओ नीति के प्रारूप की घोषणा हो। मुख्यमंत्री चाहें तो जन अभियान परिषद् के बैनर तले एक नीति-निर्माण समिति का गठन भी कर सकते हैं। ग्राम पंचायत से लेकर प्रदेश स्तर तक न सिर्फ विकास योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में, बल्कि आम जनता तक सुशासन सुनिश्चित करने में भी एनजीओ की भूमिका तय की जा सकती है।
जब कभी विकास की बात होती है तो उसके साथ विभिन्न ‘‘सिद्धांतों-वादों’’ की चर्चा भी होती है। विकास का चाहे पूंजीवादी, समाजवादी या माक्र्सवादी सिद्धांत हो या हिन्दुत्ववादी सिद्धांत, सबका लक्ष्य व्यक्ति को सुखी और सम्पन्न बनाना है। हिन्दुत्ववादी चिन्तन विशेष रूप से सभी प्रकार के संघर्षों का निषेध करते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता देता है। यह विविधताओं और श्रेष्ठताओं को सहज स्वीकार करता है। गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय का विकास चिन्तन इसी हिन्दुत्व से प्रेरित और पोषित है। भारतीय समाज ने इसे सहज स्वीकार किया है। लेकिन माक्र्सवादी, माओवादी और लेनिनवादी अपने विकास सिद्धांतों को जबरन थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जो न माने उसे हथियारों का भय दिखाने और भयभीत न होने वालों को खत्म कर देने का खूनी खेल हैं। भाजपा और भाजपा सरकार के मुखिया गाहे-बगाहे हिन्दुत्व, एकात्ममानववाद, अन्त्योदय और सर्वोदय की चर्चा करते ही रहे हैं। सर्वे भवन्तु सुखिनः की कल्पना साकार करने में प्रदेश के हजारों स्वैच्छिक संगठन समाज के प्रतिनिधि के तौर पर सरकार की मदद के लिए आगे आ सकते हैं। बशर्ते वे प्रशिक्षित और संस्कारित किए जाएं। प्रदेश के स्थापित एनजीओ स्वयं के प्रशिक्षण और संस्कार का विरोध भी कर सकते हैं। उन्हें अपने प्रशिक्षण और संस्कार का गुमान भी है। सरकार का राजधर्म तो यही है कि नये-पुराने, छोटे-बड़े सभी को साथ लेकर चले। वैचारिक अंतरद्र्वन्दों के बीच आपसी समन्वय स्थापित हो। प्रदेश की स्वैच्छिक संस्थाएं अपने शासकीय मुखिया के साथ कदम मिलाने, साथ चलने की चेष्टा करें तो ही बीमारू मध्यप्रदेश, स्वस्थ होकर स्वर्णिम प्रदेश बन सकेगा। यही स्वर्णिम प्रदेश, परम वैभवशाली राष्ट्र के लिए देश का नेतृत्व कर सकेगा। स्वर्णिम मध्यप्रदेश की चाह, कांग्रेस के गरीबी हटाओ और अनुशासन लाओ के नारे की तरह न हो जाए, इसलिए प्रदेश के विकास के प्रति अटूट प्रतिबद्धता विकसित करने की जरूरत है। इस दृष्टि से निश्चित ही इस एनजीओ पंचायत के मायने हैं। यह पंचायत इस आर्षवाणी की साक्षी बनेगी -
समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहिचित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमिभिमन्त्रये वः
समानने दो हविषा जुहोमि।।
अर्थात् मिलकर कार्य करने वालों का मन्त्र समान होता है, ये परस्पर मंत्रणा करके एक निर्णय पर पहंुचते हैं, चित्तसहित इनका मन समान होता है। मैं तुम्हे मिलकर समान निष्कर्ष पर पहंुचने की प्रेरणा देता हूं। यह एनजीओ पंचायत स्वर्णिम मध्यप्रदेश के लिए प्रदेश के मुखिया द्वारा समन्वय और उर्जा संचय का एक आह्वान भी है।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)
ई-31, 45 बंगले, भोपाल

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

ऊँ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
’’समिधा‘‘ संघ कार्यालय, ई-2/187, महावीर नगर, भोपाल-462016
दूरभाष-07ःः7241004, फैक्स-07ःः-2421055, अणुडाक-ोेनकंतेींद2009/तमकपििउंपसण्बवउ

कुप्. सी. सुदर्षन

तिथि: कार्तिक कृष्ण 2 ईसवी दिनांक 06.10.2009
कलियुग-5111 पटना, बिहार

आज पटना पहुंचते ही यह अति दुःखद समाचार मिला कि हमारे वरिष्ठ प्रचारक श्री प्यारेलाल जी खण्डेलवाल हम सबको छोड़कर परमधाम सिधार गये। सन् 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगे प्रथम प्रतिबंध के समय संघ कार्य पर आए संकट को दूर करने और आगे उसकी अभिवृद्धि के लिए जिन प्रचारकों ने अपना जीवन लगाने का संकल्प किया उनमें श्री प्यारेलाल जी भी एक थे। इंदौर नगर के प्रचारक के रुप में कार्यारम्भ कर उन्होंने जिला, विभाग ऐसे अनेक दायित्व सम्हाले और सन् 1964 में जनसंघ की मध्यप्रदेष इकाई में उनकी योग्यता हुई। तब से कुछ वर्षों पूर्व तक उन्होंने राजनैतिक क्षेत्र में अपनी सेवाएं समर्पित की।
पहल जनसंघ और बाद में आपातकाल के पश्चात् भारतीय जनता पार्टी में न एक कर्मठ, निरलस, अकुतोभय एवं कुषल संगठन के रुप में विख्यात रहे। आज की मूल्यविहीन राजनीति में जिन कुछ लोगों ने आचरण का आदर्ष प्रस्तुत किया उनमें श्री प्यारेलाल जी भी एक रहे। मूल्यों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। सन् 1989 मे लोकसभा सदस्य के रुप में निर्वाचित होकर ढ़ाई वर्ष तक लोकसभा में तथा सन् 1998 से लेकर जब तक राज्यसभा में उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया।
गत तीन वर्षों से वे बीमार चल रहे थे। बीच में अ.भा.आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती रहे तथा हम लोगों में से अनेक उनसे मिलने भी गये थे। अपनी प्रवास इच्छा-षक्ति के बल पर वे रोगों से जूझते रहे। शारीरिक दुर्बलता के बाद भी उन्हें कार्य की सतत चिन्ता रहा करती थी, यहां तक कि अस्वस्थ होते हुये भी 29 जुलाई 2009 केा दिल्ली में स्वयंसेवक सांसदों के श्री गुरुदक्षिणा उत्सव के कार्यक्रम में वे सम्मिलित हुये। इतने वर्षों के उनके सार्वजनिक जीवन में समाज का जो बहुत बड़ा वर्ग जो उनके सम्पर्क में आया था उन सबका शोक संतप्त होना स्वाभाविक है। पर नियति के आगे किसी का बस नहीं चलता और वे हम सबको छोड़ गये।
दिनांक 07 अक्टूबर से राजगीर में प्रारंभ हो रही अ.भा.कार्यकारी मंडल की बैठक के पूर्व संघ के केन्द्रीय पदाधिकारियों की यह बैठक श्री प्यारेलालजी के बड़े भाई श्री गुलाबचन्द खण्डेलवाल, उनके परिवारजनों तथा स्नेहीजनों एवं सहयोगियों के शोक में सहभागी होतु हुये स्व. श्री प्यारेलालजी को अश्रुपूर्ण श्रद्धाजंलि अर्पित करती हैं।
ऊँ पूर्णमदःपूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावषिष्यते।
ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः
अपठित हस्ताक्षर सहित केन्द्रीय पदाधिकारियों की सूची -
सरसंघचालक - पू. श्री मोहनराव भागवत
सरकार्यवाह - मा. श्री भैयाजी जोषी
सह सरकार्यवाह - मा. सुरेषजी सोनी
सह सरकार्यवाह - मा. दत्तात्रय होसबाले
अ.भा. बौद्धिक प्रमुख - मा. भागय्या जी
अ.भा. शारीरिक प्रमुख - मा. कण्णन जी
अ.भा. प्रचार प्रमुख - मा. मनमोहनजी
अ.भा. सह सेवा प्रमुख - मा. सुहास हिरेमठ
अ.भा. प्रचारक प्रमुख - मा. मदनदासजी
अ.भा. सह प्रचारक प्रमुख - मा. श्रीकृष्णजी मोतलग
अ.भा. कार्यकारिणी सदस्य - मा. इंदे्रषजी
निवृत्त सरसंघचालक - मा. सुदर्षनजी
अ.भा. कार्यकारिणी सदस्य - मा. मधुभाई कुलकर्णी

गोवंश के बिना विश्व मंगल की कामना नहीं

गोवंश के बिना विश्व मंगल की कामना नहीं
नादौन 8 october : विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के नादौन स्थित श्रीराम लीला मैदान में वीरवार सुबह नौ बजे पहुंचते ही पंडाल वंदे गो मातरम् के जयघोष से गूंज उठा।समारोह में भारत माता मंदिर हरिद्वार से यात्रा के साथ आए अखिलेश्वरानंद महाराज ने जनसमूह को संबोधित करते कहा कि जो देश आदिकाल से ही गोमाता का पुजारी था। वहां आज गोवंश की निर्मम हत्या की जा रही है जिसके लिए देश के कर्णधार शासकों की नीतियां जिम्मेवार हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे शासकों को न तो गोमाता की महिमा का पता है और न ही परलोक का ज्ञान है। उन्होंने कहा कि जब हमारे बुजुर्ग बूढ़े हो जाते हैं तो क्या हम उनके प्रति श्रद्धा का भाव नहीं रखते हैं। उन्होंने कहा कि संपूर्ण गोवंश देश के विकास में काम आता है और इसके बिना भारत तो क्या विश्व के मंगल की कामना करना भी मुश्किल है।

उन्होंने गाय माता के प्रति वचनबद्धता के संकल्प से लोगों को प्रतिज्ञा भी दिलवाई। सभी लोगों से गाय को माता मानकर उसे सम्मान देने का आह्वान किया गया। समारोह यात्रा के प्रदेशाध्यक्ष महंत सूर्यनाथ ने कहा कि माता नाम ही ऐसा है जिसमें करुणा बसी है। सूर्यनाथ ने कहा कि जब-जब भी गोवंश का सम्मान हुआ भारत सोने की चिड़िया कहलाया।

इस अवसर पर दंगड़ी मठ के संत श्रीमद भक्ति प्रसाद विष्णु महाराज भी उपस्थित थे। समारोह में गोशाला भड़ाली भगोर के संस्थापक सुखदेव शास्त्री तथा भदरूं गोशाला के संयोजक पाधा मंशा राम को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर श्रीनिवास मूर्ति, कैलाश, वेद प्रकाश, विवेक, सोहन सिंह, विजय अग्निहोत्री, राजकुमार शर्मा, किशोर शर्मा, सुभाष, अजय सौंधी, जसवीर सिंह, दिनेश, प्रमोद कपिल, त्रिभुवन सिंह आदि उपस्थित थे।


गाय में समाहित हैं सभी शास्त्र – स्वामी अखिलेश्वरानंद
पठाणकोट, अक्तूबर ७ – गाय भारतीय समाज – जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श और प्रभावित करती है । गाय में अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, चिकित्साशास्त्र का समावेश है । यह कहना है स्वामी अखिलेश्वरानंद का । स्वामी जी विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के स्वागत के लिए पठाणकोट में आयोजित एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे ।

स्वामी जी ने कहा कि गाय अपने आप में एक संपूर्ण विज्ञान है । गोमूत्र सभी रोगों की रामबाण औषधि है । यह संपूर्ण शरीर का शोधन करके रोगों का नाश करता है । उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रों में गोविज्ञान की बात कही गयी है । गाय का दूध, मूत्र, गोबर आर्थिक विकास में उपयोगी है और वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरे उतरे हैं । उन्होंने कहा कि गाय को अपने जीवन से दूर करन के कारण ही पंजाब की समृद्धि में कमी आयी है ।

इससे पहले कठुआ में आयोजित स्वागत सभा में बोलते हुए गो विज्ञान अनुसंधान केन्द्र के सुरेश धवन ने गाय की उपयोगिता और पंचगव्य को लेकर हुए आधुनिक शोधों के बारे में जानकारी दी । उन्होंने कहा कि बाजार में उपलब्ध घी बनाने की प्रक्रिया दोषपूर्ण है । बाजारु घी स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है । जबकि ठीक प्रकार से बनाया गया गाय का घी हृदयरोगियों के लिए भि लाभदायक है ।

यात्रा को जम्मू से हिमाचल प्रदेश में प्रवेश करने पर नूरपुर में यात्रा का भव्य स्वागत किया गया । कांगडा में आयोजित स्वागत सभा में बोलते हुए ज्वाला देवी मंदिर के स्वामी सूर्यनाथ ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद पं. जवाहर लाल नेहरु और उनके समर्थकों के कारण गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला प्रस्ताव संसद में पारित नही हो सका । उन्होंने गोशालाओं में सुधार करने की भी बात कही ।

गोकर्णा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने आंकडो का हवाला देते हुए कहा कि १९४७ में एक हजार भारतीयों पर ४३० गोवंश उपलब्ध थे । २००१ में यह आंकडा घटकर ११० हो गयी । और २०११ में यह आंकडा घटकर २० गोवंश प्रति एक हजार व्यक्ति हो जाने का अनुमान है ।

उन्होंने कहा कि गोमाता की रक्षा करके ही भारतमाता और प्रकृति माता की रक्षा की जा सकती है ।

फिल्म अभिनेता सुरेश ओबेराय ने अपना व्यक्तिगत अनुभव बताते हुए कहा कि गोदुग्ध के सेवन से उनके पूरे परिवार में प्यार का माहौल बन गया है । उन्होंने कहा कि गोवंश के महत्व को तार्किक रूप से समझने की आवश्यकता है ।

विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा अब मैदानी हिस्से छोडकर पहाडी क्षेत्रों में प्रवेश कर चुकी है । लेकिन यात्रा के स्वागत कार्यक्रमों और जनसमुदाय की भागीदारी में कोई कमी नहीं आयी है

वंदेमातरम कहने से सहमत नहीं

सहारनपुर। दारुल उलूम देवबंद को लेकर जमीयत उलेमा द्वारा आयोजित जलसे में वक्ताओं ने कहा कि इस देश का मुसलमान राष्ट्रगान का सम्मान करता है। खुदा के अलावा किसी और को सजदा इस्लाम में जायज न होने के कारण धार्मिक तौर पर वंदेमातरम कहने से सहमत नहीं हैं। इसलिए देश के लिए तो जान दे सकते हैं परंतु वंदेमातरम नहीं कह सकते।

इस्लामिया इंटर कालेज की मस्जिद में आयोजित जलसे में वक्ताओं ने कहा कि दारुल उलूम देवबंद का मकसद कुरान व इस्लाम की तालीम देना रहा है। देश की आजादी में इस संस्था का योगदान रहा है। जमीयतुल उलेमा के अध्यक्ष मौलवी जहूर अहमद ने कहा कि जिन लोगों ने दारुल उलूम का पुतला जलाया उनके कार्य से राजद्रोह की बू आ रही है। उनका यह कार्य न केवल असंवैधानिक बल्कि अपराध की श्रेणी में आता है। उन्होंने वंदेमातरम का सहारा लेकर समाज को बांटने और सांप्रदायिकता फैलाने का काम किया है। वतन से मोहब्बत नबी का फरमान है इसलिए वे देश से प्यार करते हैं और राष्ट्रगान का सम्मान करते हैं। जलसे के बाद में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सीओ को ज्ञापन दिया।

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

सैकड़ों स्वयंसेवकों की उपस्थिति में स्व. श्री नरेश मोटवानी को अंतिम विदाई

विश्व संवाद केन्द्र
100/45, शिवाजी नगर, भोपाल
0755-2763768, 0-9425008648

दिनांक 29.09.2009


भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवर्तमान सरसंघचालक श्री कुप्. सी. सुदर्शन की उपस्थिति में सैंकड़ों स्वयंसेवकों और समाज के बन्धुओं ने स्व. श्री नेरश मोटवानी को अंतिम विदाई दी। इस अवसर पर श्री सुदर्शन जी, भोपाल विभाग के संघचालक श्री कांतिलाल चतर, प्रांत सेवा प्रमुख श्री प्रदीप खांडेकर, प्रांत शारीरिक प्रमुख श्री विलास गोळे सहित सैकड़ों कार्यकर्ता और स्वयंसेवक उपस्थित थे। सेंट्रल सिंधी पंचायत के अध्यक्ष बंसीलाल इसराणी और महासचिव श्री गिरधारी लाल भीखानी, सचिव श्री किशन लाल आशुदानी, लालघाटी सिंधी पंचायत के अध्यक्ष लालचंद ममतानी आदि उपस्थित थे। सभी ने स्व. श्री नरेश मोटवानी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देते हुए भगवान से प्रार्थना की कि श्री मोटवानी की आत्मा को सदगति दें और उनके परिवार को दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।
इस अवसर पर पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक के प्रांत शारीरिक प्रमुख श्री विलास गोळे ने बताया कि संघ के कार्यकर्ता और स्वयंसेवक पूरी तरह मोटवानी परिवार के साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि संघ के कार्यकर्ताओं ने तत्काल उपचार के लिए उन्हें अस्पताल पहुचा कर अपने स्वयंसेवक को बचाने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन हमारा दुर्भाग्य कि हम श्री मोटवानी को बचा नहीं पाए। श्री विलास गोळे ने पुनः दुहराया कि पुलिस-प्रशासन द्वारा की जा रही जांच में हम पूर्ण सहयोग करेंगे और संघ के स्वयंसेवक मोटवानी परिवार की हर संभव सहायता करेंगे।
अंतिम संस्कार में भोपाल के विधायक श्री उमाशंकर गुप्ता, प्रदेष भाजपा उपाध्यक्ष एवं सांसद श्री अनिल दवे, भोपाल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री सुरेन्द्रनाथ सिंह, उपाध्यक्ष श्री विष्णु खत्री, नगर निगम के अध्यक्ष श्री रामदयाल प्रजापति, श्री भगवानदास सबनानी, विश्व हिन्दू परिषद् के श्री बी.एल. तिवारी, श्री देवेन्द्र रावत, राष्ट्रीय सिख संगत के श्री बिहारीलाल,, लघु उद्योग भारतीय के अ.भा. मंत्री श्री जितेन्द्र गुप्ता, प्रज्ञा प्रवाह के श्री दीपक ष्षर्मा, अधिवक्ता परिषद के श्री बी के संाघी साहित्य अकादमी के निदेषक डाॅ देवेन्द्र दीपक,, निराला सृजन पीठ के श्री रामेष्वर मिश्र पंकज सहित अनेक संगठनों के कार्यकर्ता और समाज के वरिष्ठ लोग उपस्थित थे।

सोमवार, 28 सितंबर 2009

संघ के कार्यकर्ता श्री नरेश मोटवानी की दुर्घटनावश हुई दुःखद मृत्यु

विश्व संवाद केन्द्र
100/45, शिवाजी नगर, भोपाल
0755-2763768, 0-9425008648

भोपाल । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक श्री कांतिलाल चतर ने आंबेडकर नगर के विजयादशमी कार्यक्रम के पश्चात संघ के कार्यकर्ता श्री नरेश मोटवानी की दुर्घटनावश हुई दुःखद मृत्यु पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने इसे संघ और समाज के लिए एक बड़ी क्षति बताया है। श्री चतर ने कहा कि दुःख कि इस घड़ी में समूचा संघ मोटवानी परिवार के साथ खड़ा है। उन्होंने कहा कि इस दुर्घटनाजन्य मृत्यु से स्व. श्री नेरश मोटवानी के पारिवारिक सदस्य और रिश्तेदारों के साथ ही संघ के कार्यकर्ता भी स्तब्ध और शोकाकुल हैं। इस विषम परिस्थिति में संघ के कार्यकर्ता श्री मोटवानी परिवार की मदद के लिए तत्पर हैं। उन्होंने पुलिस और प्रशासन को जांच में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।

भवदीय

सुरेन्द्र ठाकरे
कार्यालय प्रभारी

सोमवार, 7 सितंबर 2009

विष्व सभ्यताओं के अंतस्संबंध, आतंकवाद, मीडिया और भारत के बौद्धिकों पर दो दिवसीय संगोष्ठी


बहुकला केन्द्र भारत भवन में राष्ट्रवादी बद्धिजीवियों का दो दिवसीय समागम
अरसे बाद मध्यप्रदेश की राजधानी भेापाल में बुद्धिजीवियों का जमावड़ा हुआ। इस बौद्धिक जमघट में अधिकांश राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी शामिल हुए। संगोष्ठी में देशभर के पत्रकारों, लेखकों और साहित्यकारों ने भी भागीदारी की। स्व. माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मान समारोह के मौके पर मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग ने दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में कुल चार चर्चा सत्रों का आयोजन किया गया। प्रथम सत्र में विश्व सभ्यताओं के अंतस्संबंध, दूसरे सत्र में वैश्विक आतंकवाद की चुनौतियां और भारत की भूमिका, तीसरे सत्र में स्वाधीन भारत राष्ट्र के बौद्धिक - अतीत और भविष्य तथा चैथे सत्र में भविष्य का भारत और मीडिया की भूमिका जैसे विषयों पर गंभीर बौद्धिक विमर्श हुआ।
‘‘विश्व सभ्यताओं के अंतस्संबंध’’
विश्व सभ्यताओं में संघर्ष नहीं, सतत संवाद की जरूरत
संगोष्ठी की शुरूआत ‘‘विश्व सभ्यताओं के अंतस्संबंध’’ पर विमश्आ। प्रो. कुसुमलता केडिया ने इस विषय पर अपना बीज वक्तव्य दिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री राममाधव ने इस विषय पर विचार रखते हुए विषय को और अधिक विस्तार दिया। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के सह संगठन मंत्री श्री श्रीधर पराड़कर कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। मध्यप्रदेश के शासन के जनसंपर्क और संस्कृति मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
संगोष्ठी में वक्ताओं ने विश्व सभ्यताओं के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य और आपसी संबंधों पर गहन विमर्श किया। विद्वान वक्ताओं ने असभ्यताओं के संघर्ष का उल्लेख करते हुए श्रेष्ठ दुनिया के लिए संभ्यताओं के बीच अंतस्संबंध की हिमायत की। सभ्यताओं के बीच संघर्ष की बजाए संवाद पर जोर देते हुए अपनी-अपनी सभ्यतामूलक श्रेष्ठताओं के आदान-प्रदान की जरूरत बताई गई। सुपर सिविलाइजेशन के आदर्श के नाम पर हमारे उपर विचार और आदर्श लादने की कोशिश की जा रही है, यह जायज नहीं है। इससे संवाद का मार्ग नहीं निकलेगा, बल्कि विरोध के स्वर ही मुखरित होंगे। पूर्वाग्रह रहित होकर दूसरों की पहचान और उनके विचारों को जानने-समझने और स्वीकार करने से ही बेहतर विश्व की कल्पना की जा सकी है।
गांधी विद्या संस्थान, वाराणसी की प्रो. कुसुमलता केडिया ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि धरती पर प्राचीन समय से ही उन्नत सभ्यताओं को अस्तित्व रहा है। इन सभ्यताओं का अपना-अपना वैशिष्ठ भी रहा है। सभ्यताओं के बारे में हमारा ज्ञान बहुत ही अल्प है। यह ज्ञान न तो सभ्यताओं की व्यापकता को और न ही उसकी प्राचीनता को समेट पाता है। आज विश्व सभ्यताओं के बारे में लाखों-करोड़ों वर्षों के तथ्य सामने आ रहे हैं। प्रो. केडिया ने युवा पीढ़ी को नइ तथ्यों और विश्व सभ्यता के इतिहास का अध्ययन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अध्ययन से ही भविष्य में ज्ञान के इस आलोक से परिचित भारत विश्व का नेतृत्व करने में समर्थ होगा।
इस विमर्श में मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री राममाधव ने बोलते हुए कहा कि सिर्फ अपनी ही सभ्यता को श्रेष्ठ मानने के सोच से उपर उठना होगा। कोई धर्म या संस्कृति संस्कृति युद्ध नहीं करती, बल्कि व्यक्ति युद्ध करता है, यह बात कहने में आदर्श में लग सकती है। लेकिन यह सच नही हो सकता है। धर्म और संस्कृति इतिहास में अनेक युद्धों के कारक रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी सभ्यता और संस्कृति को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जा सकता। इसलिए किसी को भी अपनी सभ्यता और संस्कृति को आक्रामक तरीके से स्थापित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। आज आपसी संवाद की बजाए ग्लोबलाइजेशन, साइंस एन्ड टेक्नाॅलोजी, ह्यूमन राइट्स और हथियारों के बल पर सुपर सिविलाइजेशन को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। उदारता के साथ सभ्यताओं का परस्पर संवाद ही एकमात्र रास्ता है।
उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि श्री श्रीधर पराड़कर ने कहा कि हमारे उपर विचार और परिभाषाएं लाद दी गई हैं। इससे संवाद और संबंध का मार्ग प्रशस्त नहीं, अवरूद्ध होता है। लेकिन संवाद के लिए हमें अपनी पहचान न तो भूलना चाहिए और न ही उसे नकारना चाहिए। अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए दुनियाभर में चल रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए श्री पराड़कर ने कहा कि लाशों पर सभ्यताएं नहीं बनती हैं। उन्होंने कहा कि निहित स्वार्थ नहीं बल्कि मनुष्यत्व के भाव से ही सभ्यताएं बनती और पनपती हैं। दूसरों के अस्तित्व और विचारों को जानना, समझना, मानना और उसे सम्मान देना होगा, इसी से विश्व संभ्यताओं के बीच अंतस्संबंध विकसित होंगे।
मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति और जनसंपर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने उद्घाटन के अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि प्रदेश सरकार ने युवा पीढ़ी को अध्ययन की ओर प्रवृत करने के लिए प्रत्येक जिले में अध्ययन केन्द्र स्थापित करने का प्रयास करेगी। जनसंपर्क और संस्कृति सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। चर्चा की प्रस्तावना रखते हुए श्री श्रीवास्तव ने वैश्विक धरातल पर उपस्थित सांस्कृकि संकट को रेखांकित किया। सभ्यतागत संघर्षों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारतीय संस्कृति में संवाद और समन्वय की लंबी परंपरा को भी उद्धृत किया।
‘‘वैश्विक आतंकवाद की चुनौतियां और भारत की भूमिका’’
आतंकवाद से निपटने में सरकार से अधिक समाज की भूमिका
संगोष्ठी के दूसरे सत्र में वक्ताओं ने ‘‘वैश्विक आतंकवाद की चुनौतियां और भारत की भूमिका’’ पर अपने विचार प्रस्तुत किए। पांचजन्य के पूर्व संपादक और विचारक श्री देवेन्द्र स्वरूप ने इस चर्चा सत्र की अध्यक्षता की। भारतीय पुलिस सेवा की वरिष्ठ अधिकारी श्रीमती अनुराधा शंकर ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। लेखक और चिंतक प्रो. शंकर शरण तथा डाॅ. पवन सिन्हा ने आतंकवाद की चुनौतियों पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत किया।
विश्व आतंकवाद से निजात पाने के लिए समाज को आगे आकर रणनीति तैयार कर अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी। वैश्विक आतंकवाद रूपी ताकत से निपटने के लिए वैचारिक स्पष्टता, द्ढ़ता एवं शक्ति का होना अत्यन्त आवश्यक है। सिर्फ राजनैतिक इच्छा शक्ति के आधार पर आतंकवाद पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। आतंकवाद की विचारधारा से अनभिज्ञ रहकर हम आतंकवाद से लड़ाई नहीं लड़ सकते।
उपरोक्त चर्चा सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और विचारक श्री देवेन्द्र स्वरूप ने कहा कि आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध में भारत आध्यात्म के बल पर ही अपनी लड़ाई लड़ सकता है। लेकिन राजनैतिक नेतृत्व को भी आगे आकर अपना आत्मबल प्रकट करना होगा। उन्होंने इस अवसर पर महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधीजी का स्वाधीनता आंदोलन आध्यात्मिक शक्ति पर ही आधारित था। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से निपटने में सरकार से अधिक समाज की भूमिका होती है। श्री स्वरूप ने कहा कि आतंकवाद के विरूद्ध संघर्ष एक कठिन चुनौती है। आतंकवाद का संचालन करने वाला अदृश्य होता है, उसका स्थान और तरीका पूर्व नियोजित होता है। आतंकवाद के शिकार हमेशा दृश्य होते हैं। उन्होंने कहा कि आतंकियों का उद्देश्य केवल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया को भयभीत करना, शत्रु के मनोबल और आत्मविश्वास को खंडित करना और शत्रु के शिविर में अविश्वास पैदा करना होता है।
श्री स्वरूप ने कहा कि आतंकियों की लड़ाई सरकार से न होकर समाज से होती है। हमें युवाओं को में आतंकवाद से संघर्ष के लिए आत्मबल विकसित करना होगा। हमें आतंकियों की उस विधा को भी समझने की कोशिश करनी हं स्पोगी जिसके द्वारा वे नवयुवकों को जिहाद और आत्म बलिदान के लिए प्रेरित करते हैं। पुलिस और सैन्यबल के लिए आतंकवाद से संघर्ष करना कठिन है। इसके लिए हमें समाज और खासकर युवाओं को तैयार और तैनात करना होगा। आतंकवाद के विरूद्ध संषर्घ और सोच को हमें स्पष्ट करना होगा। आतंकवाद की चुनौती से निपटने के लिए एक तरफ तो हमें अपनी बौद्धिक तैयारी करनी पडे़गी वहीं राजनैतिक इच्छा शक्ति भी उत्पन्न करनी होगी।
वैश्विक आतंकवाद की चुनौतियों पर अपना उद्बोधन देते हुए राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक और स्तंभकार प्रो. शंकर शरण ने कहा कि आतंकवाद या नक्सलवाद के प्रति मीडिया को अपना दोहरापन खत्म करना होगा। उन्होंने कहा कि आतंकवादियों और नक्सलियों से बरामद दस्तावेजों की जांच-पड़ताल कर उनके मूल विचारों एवं कारणों तक पहुचना होगा। दुनिया में जितने भी कुख्यात आतंकवादी संगठन हैं उनमें मज़हबी शब्दावली का इस्तेमाल हो रहा है, इस पर विचार और इसका विरोध होना चाहिए। आतंकवादी संगठनों द्वारा भेजे जाने वाले ई-मेल की चर्चा बाहर भी होनी चाहिए, ताकि समाज भी उसकी विचारधारा से अवगत हो सके। उन्होंने कहा कि झूठ और हिंसा का आपसी संबंध होता है। यह आतंकवाद और नक्सलवाद के संदर्भ में भी लागू होता है। प्रो. शंकर शरण ने कहा कि आतंकवाद के परिपेक्ष्य में अब तक सिर्फ भौतिक लड़ाई पर ध्यान दियश गया है, वैचारिक लड़ाई पर ध्यान न देना अब तक की सबसे बड़ी भूल रही है। आतंकवाद से निपटने के लिए वैचारिक लड़ाई भी आवश्यक है। उन्होंने बौद्धिक वर्ग का आह्वान किया िकवे अपनी तर्क शक्ति से आतंकवाद जैसे खतरनाक और ज्वलंत विषय पर समाज को प्रेरित करें।
अपने बीज वक्तव्य में भारतीय पुलिस सेवा की वरिष्ठ अधिकारी श्रीमती अनुराधा शंकर ने कहा कि हमारे देश में 1980 तक पारंपरिक आतंकवाद 1990 के दशक में विभीषिकाजनक आतंकवाद में परिवर्तित हो गया। इसके लिए सोवियत संघ का पतन एक प्रमुख कारक रहा है। आधुनिक आतंकवादी संगठनों के पास आधुनिक ज्ञान और हथियार आ गए। आतंकवादी संगठनों ने ज्यादा से ज्यादा जनहानि पहुंचाने की रणनीति पर काम करना शुरू किया। श्रीमती शंकर ने कहा कि आतंकवाद के मूल स्वरूप को आज भी बहुत कम करके आंका जा रहा है। भारत में हुई मुम्बई की घटना के बाद वैश्विक आतंकवाद के पीड़ितों में भारत की प्रविष्टि हो सकी। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस वैश्विक आतंकवाद में नक्सलवाद भी शामिल है। भोपाल में पकड़ी गई नक्सलियों के हथियारों की फैक्ट्री का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इसमें यूरोपीय देशों के हथियार भी मिले। भारत को वैश्विक आतंकवाद के संदर्भ में गंभीरतापूर्वक विचार और चिंतन करना होगा।
दिल्ली विश्वविद्याल में राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक डाॅ. पवन सिन्हा ने कहा कि वैश्विक आतंकवाद में अर्थव्यवस्था और विचारधारा महत्वपूर्ण कारक सिद्ध हुए हैं। वैश्विक आतंकवाद का ध्येय आर्थिक आधार अथवा अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करना रहा है। डाॅ. सिन्हा ने आथर््िक मंदी और आतंकवाद के अंतस्संबंध का भी उल्लेख किया। चर्चा के प्रारंभ में मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति और जनसंपर्क सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि आतंकवाद को हमें मनोवैज्ञानिक धरातल पर समझना होगा।
‘‘स्वाधीन भारत राष्ट्र के बौद्धिक - अतीत और भविष्य’’
भारत में विचारों, विद्वानों और बौद्धिकों के स्वागत और समन्वय की परंपरा
संगोष्ठी के दूसरे दिन वक्ताओं ने ‘स्वाधीन भारत राष्ट्र के बौद्धिक - अतीत और भविष्य’’ विषय पर अपने विचार रखे। प्रख्यात चिंतक और राज्यसभा के पूर्व सदस्य डाॅ. महेश्शचन्द्र शर्मा ने इस चर्चा की अध्यक्षता की। डाॅ. मधुकरश्याम चतुर्वेदी ने बीज वक्तव्य दिया। प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज ने इस विषय पर शोधपरक उद्बोधन प्रस्तुत किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में दीनदयाल शोध संस्थान के पूर्व सचिव और सांसद डाॅ. महेशचन्द्र शर्मा ने कहा कि प्रत्येक भारतीय को अपने राष्ट्र को सही समझने और जानने की आवश्यकता है। कुछ वर्षों की अंग्रेजों की गुलामी ने भारतीय परंपरा और ज्ञान को बदलकर रख दिया है। भारत के हजारों वर्षों के इतिहास को सीमित कर दिया गया है। भारत जैसे महान देश को बनाने में वाणिज्य, कला, विज्ञान एवं दर्शन क्षेत्र की महान हस्तियों ने योगदान दिया है। उनकी पहचान दुनियाभर में है। डाॅ. शर्मा ने कहा कि युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृति व परंपरा के बारे में गहन शोध करने की आवश्यकता है। इन शोधों के जरिये सही भारत की पहचान दुनियाभर में हो सकेगी। उन्होंने भारतीय परंपराओं और हिन्दू दर्शन को वर्तमान पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने की वकालत की। भारत में स्वागत और समन्वय की परंपरा का उल्लेख करते हुए डाॅ. शर्मा ने कहा कि किसी भी विषय पर खुले मंच पर पक्ष एवं विपक्ष पर चर्चा होना चाहिए। इन खुली चर्चाओं के बाद ही सार्थक तत्व का बोध हो सकेगा।
संगोष्ठी में अपना वक्तव्य देते हुए निराला सृजनपीठ के निदेशक और भारत भवन के पूर्व सचिव प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा कि अंग्रेजों के समय से शिक्षा व्यवस्था एवं विश्वविद्यालयों में वायसराय का दखल रहता था। इसका प्रभाव अब तक देखने का मिल रहा है। उन्होंने कहा कि महामना मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, लेकिन आजादी के बाद यह विश्वविद्यालय भी पश्चिमी प्रभाव से अछूता नहीं रहा। प्रो. ंपकज ने देश के अनेक प्राचीन विश्वविद्यालयों के अस्तित्व समाप्ति की ओर ध्यान आकृष्ट किया। हिन्दुओं के संरक्षण के लिए राष्ट्रपति से विशेष प्रावधान करने का आग्रह भी किया।
चर्चा सत्र की शुरूआत राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रो. मधुकर श्याम चतुर्वेदी के बीज वक्तव्य से हुई। प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि स्वतंत्र भारत में जब शिक्षा व्यवस्था की नींव डाली जा रही थी, तब हमारे राजनेताओं ने भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था की अनदेखी की थी। इसके दुष्परिणाम अब तक देखने को मिल रहे हैं। लंबे समय तक भारत के संविधान में राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा और संस्कृति का उल्लेख तक नहीं था। ‘‘सेक्यूलर’’ शब्द की आड़ में बहुसंख्यक भारतीयों की भावनाओं की अनदेखी की गई। देश की स्वाधीनता आंदोलन का इतिहास कांग्रेस का पर्याय बनकर रह गया। अरविन्द एवं तिलक जैसे जननायकों के विचारों को पूरी तरह से मान्यता नहीं मिल सकी। इनज न नायकों का चिन्तन पश्चिमी चिन्तन से मेल नहीं खाता था। आज भारत में आत्म हनन को भारतीय संस्कृति की पहचान दी जा रही है। धर्म पर चर्चा निषेध हो गया है। इन सबके बावजूद भारतीय चिन्तन और परंपरा ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारता है।
चर्चा के प्रारंभ में संस्कृति सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने भारत में हजारों वर्ष पुरानी समृद्ध बौद्धिक परंपरा का हवाला देते हुए स्वाधीन भारत के बौद्धिकों का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि इतिहास और वर्तमान की बौद्धिक बुनियाद पर भारत का स्वर्णिम बौद्धिक भविष्य गढ़ा जायेगा।
‘‘भविष्य का भारत और मीडिया की भूमिका’’
वर्तमान समय में सिद्धांतों की पत्रकारिता आसान नहीं
संगोष्ठी का अंतिम चर्चा सत्र मीडिया पर आधारित था। ‘‘भविष्य का भारत और मीडिया की भूमिका’’ विषय केन्द्रित इस चर्चा सत्र में वरिष्ठ पत्रकार श्री महेश श्रीवास्तव ने अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। टीवी कलाकार श्रीमती स्मृति ईरानी ने इस विषय पर अपना बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। राज्यसभा सांसद श्री प्रभात झा, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र, भाषाविद् श्री प्रभु जोशी और वरिष्ठ पत्रकार श्री श्रवण गर्ग ने इस विषय पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत किया।
भविष्य का भारत और मीडिया की भूमिका को लेकर आयोजित चर्चा में पत्रकारिता, साहित्य और अभिनय क्षेत्रों की ख्यातिनाम हस्तियों ने अपने-अपने तर्कों और विचारों के माध्यम से मीडिया की भूमिका को अधिक सकारात्मक और विश्वसनीय बनाए जाने पर जोर दिया। विद्वान वक्ताओं के मुताबिक मीडिया के सामाजिक सरोकारों में पूंजी के रोडे को दूर करने की जरूरत है। विज्ञापनों का लगातार बढ़ता दायरा और हस्तक्ष्ेाप चिन्ता बढ़ाने वाला है। स्व. माणिकचन्द्र वाजपेयी और रामशंकर अग्निहोत्री की पत्रकारिता का उल्लेख करते हुए विद्वान वक्ताओं ने भविष्य के भारत निर्माण में मीडिया की भूमिका का खुलासा किया। पत्रकारिता विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में मौजूदा वक्त की जरूरतों के मुताबिक विषयों का समावेश करने पर भी जोर दिया गया।
मुख्यअतिथि के रूप में प्रख्यात टीवी कलाकार श्रीमती स्मृति ईरानी ने कहा कि भारत के भविष्य में मीडिया की भूमिका को लेकर आज तेजी से विज्ञापनदाताओं का दखल ज्यादा चिंता की बात है। ऐसी स्थिति में सिद्धांतों की पत्रकारिता अब आसान नहीं रही। श्रीमती ईरानी ने कहा कि मौजूदा पत्रकारिता की शक्ल पर सवाल खड़े करने के पहले हमें यह देखना होगा कि पत्रकार नौकरी किसकी कर रहे हैं। ऐसे में उनके फर्ज मालिक के आदेश और इसके मुताबिक काम करते हुए स्वयं के लाभ एवं हितों में फर्ज सिमट गए हैं। मीडिया में अपने अनुभवों और वर्तमान स्थितियों के मद्देनजर श्रीमती ईरानी ने नई पीढ़ी का आह्वान किया कि अब उसे देश के हित में फर्ज निभाने के लिए अपने विवके पर अच्छे और बुरे का निर्णय कर आगे का रास्ता तैयार करना होगा। अगर वे खुद से पहले राष्ट्र के बारे में सोचेंगे तो यह राह आसान हो जायेगी।
इस अवसर पर सांसद और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभात झा ने कहा कि मीडिया का अतीत गौरवशाली रहा है और इसका भविष्य भी गौरवशाली है। उन्होंने कहा कि भारत पूरे विश्व की समस्याओं का उत्तर है। श्री झा ने कहा कि आज देश में लोगों के भीतर नागरिक बोध से अधिक मतदाता बोध जागृत हो गया है। मीडिया को इसे समझना और दूर करना होगा। बदलते समय और भविष्य के भारत के संदर्भ में मीडिया की भूमिका अपेक्षाकृत अधिक बढ़ गई है। मीडिया को रोटी से अधिक राष्ट को महत्व देने की जरूर है।
वरिष्ठ पत्रकार श्री महेश श्रीवास्तव ने इस चर्चा सत्र में अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्याल के कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार श्री श्रवण गर्ग और श्री प्रभु जोशी ने अपने विचार रखे। जनसंपर्क और संस्कृति सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने अतिथियों का स्वागत किया और प्रस्ताविक भाषण प्रस्तुत किया।
अनिल सौमित्र

रामषंकर अग्निहोत्री को माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मान



दो दिवसीय संगोष्ठी में विष्व सभ्यता, आतंकवाद, मीडिया और भारत के बौद्धिकों पर महत्वपूर्ण चर्चा
मातृभाषा को मिले सम्मान और प्रोत्साहन: श्री सुदर्शन
मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्व. माणिकचन्द्र वाजपेयी की स्मृति में पत्रकारिता सम्मान की स्थापना की गई है। राष्ट्रीय स्तर का यह सम्मान प्रति वर्ष वरिष्ठ पत्रकार को दिया जाता है। वर्ष 2008 का सम्मान वरिष्ठ पत्रकार श्री रामशंकर अग्निहोत्री को दिया गया है। गत वर्ष श्री ओमप्रकाश कुन्द्रा को सम्मानित किया गया था। 23 अगस्त को आयोजित इस सम्मान समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवर्तमान सरसंघचालक श्री कृप्प.सी. सुदर्शन, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान, अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के सह-संयोजक श्री श्रीधर पराड़कर और मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति एवं जनसंपर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा विशेष रूप से उपस्थित थे।
इस अवसर पर मुख्यअतिथि के रूप में उपस्थित श्री सुदर्शन जी ने कहा कि देश में अंग्रेजी को अनावश्यक महत्व दिये जाने के कारण इसे न जानने वाले लोगों में हीन भावना का विकास होता है। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाएं आगे नहीं बढ़ पाती। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी के साथ अन्य विदेशी भाषाओं का अध्ययन भी किया जाना चाहिए। लेकिन मातृ भाषा में अध्यापन होने से देश की प्रतिभाएं आगे नहीं बढ़ सकेंगी। उन्होंने हिन्दी भाषी राज्यों में एक विश्वविद्यालय हिन्दी माध्यम से विकसित करने का सुझाव दिया। श्री सुदर्शन जी ने कहा कि देश के कई गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों में अपनी मातभाषा के प्रति लगाव अभी भी कायम है परंतु हिन्दी क्षेत्रों में अंग्रेजी को अधिक प्रधानता दी जाती है। उन्होंने हिन्दी समाचार-पत्रों में अंग्रेजी भाषा के उपयोग अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि हिन्दी के पत्रों में हिन्दी शब्दों का ही उपयोग करना चाहिएं। उन्होंने कहा कि भाषाा की शुद्धता का भी अपना महत्व है। अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओं को सीखने में कोई आपत्ति नही है, परन्तु हमें अपनी-अपनी मातृ-भाषा से लगाव होना चाहिएं यह हमारे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत बनाने और विश्व में देश को अग्रणी बनाने के लिए आवश्यक है।
संघ के निवर्तमान सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी ने कहा कि भाषा के विषय पर दिल्ली, हरियाणा, मध्यप्रदेश सहित अनेक राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मुलाकात कर वे अपना सुझाव दे चुके हैं और इस संबंध में कम से कम एक विश्वविद्यालय हिन्दी माध्यम से शुरू करने का आग्रह भी वे कर चुके हैं। पत्रकारित सम्मान के अवसर पर श्री सुदर्शन जी ने स्व. श्री माणिकचन्द्र वाजपेयी ‘‘मामाजी’’ और श्री रामशंकर अग्निहोत्री से अपने सुदीर्घ संबंधें का उल्लेख किया। दोनों महान विभूतियों के पत्रकारिता में योगदान की भी उन्होंने चर्चा की।
सम्मान समारोह की अध्यक्षता करते हुए मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान ने कहा कि देश की पत्रकारिता आजादी की लड़ाई, स्वतंत्रता के बाद विकास और नव-निर्माण, राष्ट्रीय अपेक्षाओं के पूरा न होने पर निराशा, जयप्रकाश जी के नवनिर्माण आंदोलन तथा आपातकाल के दौरान आजादी की तीसरी लडाई और अब आधुनिक-वैश्विक व्यवसाय जैसे विभिन्न दौर से गुजरी है। लेकिन समाज में जिस प्रकार से मूल्यों का ह्यस हो रहा है अब जरूरी लगता है कि राजनेता, मंत्री और पत्रकार भी अपनी-अपनी आचार संहिताओं के दायरे में काम करें।
श्री चैहान ने आगे कहा कि शासन व्यवस्था में मीडिया की स्वस्थ आलोचना से गड़बड़ियों के सुधार में सहायता मिलती है, लेकिन यह भी आवश्यक प्रतीत होता है कि पत्रकारिता में आलोचना तथा रचनात्मकता में संतुलन हो। श्री चैहान ने मामाजी का स्मरण करते हुए सम्मानित पत्रकार श्री रामशंकर अग्निहोत्री के पत्रकारिता योगदान का भी उल्लेख किया।
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री रामशंकर अग्निहोत्री ने कहा कि पत्रकारिता हमेशा मिशन रही है और रहेगी। पत्रकारों को अपने भीतर मिशन की भावना जागृत रखने की आवश्यकता है। विचार तथा मिशन ही पत्रकारिता के लिए स्थाई आदर्श हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में लोकमत के परिष्कार का भी प्रावधान है।
कार्यक्रम में विशेष अतिथि के तौर पर उपस्थित मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क और संस्कृति मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने इस अवसर पर सभी अतिथियों का शाल-श्रीफल एवं पुष्पमाला से स्वागत किया और उन्हें स्मृति चिन्ह भेंट की। अपने वक्तव्य में श्री शर्मा ने कहा कि राज्य शासन ने पत्रकारों के हित में कई कदम उठाए हैं तथा भविष्य में भी इस दिशा में प्रयास जारी रहेंगे। उन्होंने समारोह के दौरान आयोजित दो दिवसीय विचार गोष्ठी पर केन्द्रित पुस्तिका प्रकाशित करने और सीडी जारी करने की घोषणा भी की।
जनसंपर्क विभाग के सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव ने सम्मानित पत्रकार श्री रामशंकर अग्निहोत्री का प्रशस्ति वाचन किया। श्री श्रीवास्तव ने इस अवसर पर स्व. श्री माणिकचन्द्र वाजपेयी के पत्रकारिता योगदान पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने भारत भवन में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।
इस समारोह में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पत्रकार, साहित्यकार और प्रबुद्ध नागरिकों ने हिस्सा लिया। पूर्व मुख्यमंत्री श्री कैलाश जोशी, श्री सुंदरलाल पटवा, राज्यसभा सांसद श्री कप्तान सिंह सोलंकी, श्री प्रभात झा, डाॅ. महेशचन्द्र शर्मा, कलाकार श्रीमती स्मृति ईरानी, लेखक श्री शंकर शरण, डाॅ. मधुकर श्याम चतुर्वेदी, श्रीमती कुसुमलता केडिया, प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज, श्री अच्युतानंद मिश्र, प्रा. पी. के. वर्मा आदि की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इसके पूर्व जनसंपर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने सभी अतिथियों का शाल-श्रीफल एवं पुष्पमाला से सम्मान किया तथा उन्हें स्मृति चिन्ह भेंट किया। श्री सुदर्शन जी ने श्री रामशंकर अग्निहोत्री को शाल-श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया। जनसंपर्क विभाग के अपर संचालक श्री ए.के. कबीर ने सभी प्रतिभागियों और अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

गुरुवार, 25 जून 2009

BJP themselves are not sure of what Hindutva is!



Janmenjay
BJP themselves are not sure of what Hindutva is!
The political party BJP has been making headlines these days, and for all the wrong reasons. As a voter of this party (or just as a citizen of India if you like) I felt a need to study BJP’s present condition from a bird’s eye. I had researched upon BJP’s history earlier and understood one primary thing – absence of a dynasty in the top order. I also noticed that BJP’s top leaders were from ground level. What I did not understand about the 2004 (and 2009) elections was why BJP has been unable to connect to the masses. When I say ‘the masses’ I speak of the farmers, the labourers, the clerks, the shopkeepers and such businessmen, the women of the villages and unnamed multitudes who seem to appear during the election campaigning to watch their candidates (since the candidates appear once in 5 years), vote and disappear.
The one thing I used to admire about BJP was the clarity in its approach. Their agendas were always clear and never leader-centric (as they were in 2009 elections). Their plans were strongly in favour of nationalism and focused on farmer class, defence, foreign policies, on the ‘common man’, so to speak. I also admired the BJP’s leadership under Atal Bihari Vajpayee. His policies and decisions struck me as being very rock-solid.
Enough praise. Now, the issue that I have difficulty in understanding is why a party with so many people emerged from the ground level, has a policy which strikes me as being very elite and unconnected to the base – so to speak. I don’t say that BJP does not care for the farmers. All I say is that they do not manage to get that across. Also I have seen people who dislike Congress also dislike BJP because it’s communal. BJP is communal because it preaches Hindutva. Another failure of the BJP is to give a clear and concise definition of the word Hindutva. Does Hindutva mean that you slice of Muslim beards (or the heads the beards are attached to)? Or does it mean you burn down the mosques and churches? Or does Hindutva just stand for nationalism? What is the concept of a Hindu Rashtra? I sometimes feel that the workers of the BJP themselves are not sure of what Hindutva is. So how do you expect the common man to appreciate it?
2009. The election in which BJP got thrashed. I will not mince my words. This election was a failure for the party as well as the nation. It was a failure for the nation because the voting in the entire country hovered around 40-50 percent, a mere nothing. Many failures awaited BJP. I will outline some that I perceive. First was the defeat. Second was the reason behind it (same thing perhaps but I will still take them separately). Thirdly, there was absence of a next-gen party leader as should have been groomed by Advani Ji. Four, there is absence of a young party leader in the upcoming generation. Fifth place goes to a lack of ideological clarity. Sixth is naturally the in-fighting over the leader to take up Advani Ji’s mantle (this looks extremely ugly over the press). For last position we have lack of introspection. Actually, a problem that I felt was that BJP put too much of Advani Ji’s leadership in their campaigning. It has never been a leader-centric party and should not attempt to be so.

Finally, I will approach my suggestions for a solution. The obvious advice is (in a wise old man’s scratchy voice) – sort his mess out. Join hands and get out of this problem. Introspect and get a solution. But such advice is available by the dozen and is rather useless unless a method is attached to it. I feel that within the party the leadership of a person like Narendra Modi (like him means someone firm and of the ground level) who should be egalitarian (treating all equally and bringing further transparency to the party) and portrayal of BJP as a strong party of the people should be done (of the people, for the people, by the people I’d say!). The internal disputes of BJP should be internal and not broadcast like the day’s prime soaps. The only announcement that should emerge should be of BJP’s internal leader and its ideologies being decided in finality. The BJP itself should not forget the smell of the earth after the rains and of the soft winds that flow through the green and brown fields. In simpler terms, BJP should perceive and be part of the ground level. The next five years are adequate for it to re-establish a base in the hearts of the people of this country. And finally, BJP should make clear to the people what it really is. I.e. its ideology and policies should be clear to the people (in concise form and in detail).

सोमवार, 25 मई 2009

श्री विष्णु कुमार जी के बारे
बहुत दुःख हुआ . वे एक live-wire थे . उनसे मिलकर आपको लगता था की बस उठें और लग जाएँ वंचितों के कल्याण में . यद्यपि उनकी ऊर्जा का परिमाण इतना विशाल था कि उनके साथ चलना दुष्कर. उनका पदार्पण जब भी मेरे घर में हुआ, आशीर्वाद के साथ उनकी जिज्ञासा और हिदायतों ने हमेशा प्रेरित किया. बच्चों जैसा कौतुक और बुजुर्गों जैसी समझ.
उन जैसे साधू को क्या श्रद्धांजलि दी जाये? उन्मुक्त, अपने दरिद्र-नारायण की अनन्य भक्ति में लीन, उन्हें किसी प्रशंसा से जब जीवन में मतलब न रहा तो ऐसे निरहंकार प्राणी को देहांत के बाद क्या व्यापेगा?
एक रिक्तता हो गयी। अपूरणीय.
अनुराधा शंकर्
संघ के वरिष्ठ प्रचारक विष्णु कुमार का निधन

भोपाल। संघ के वरिष्ठ प्रचारक और सेवा भारती के संरक्षक श्री विष्णु कुमार का कल सुबह निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार थे और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा था। 66 वर्षीय श्री विष्णु कुमार का जन्म सन् 1933 में कर्नाटक के कोलार जिले के गौरीबिदनूरू ग्राम में हुआ था। घर में छह भाई और एक बहन हैं। श्री विष्णु कुमार हाई स्कूल में संघ के स्वयंसेवक बन गए थे। उन्होंने मेकैनिकल विषय में इंजीनियरिंग की उपाधि प्राप्त की। उनके एक भाई रामकृष्ण आश्रम के संन्यासी हैं और एक अन्य भाई संघ के प्रचारक रहे। श्री विष्णु कुमार 1958 में संघ के प्रचारक निकल गए। उनका प्रचारक जीवन उत्तरप्रदेश से शुरू हुआ।
संघ के सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस की प्रेरणा से श्री विष्णु कुमार ने दिल्ली की सेवा बस्तियों में सेवा काम शुरु किया। शुरुआती दिनों में 600 बस्तियों में यह काम शुरु हुआ। बाद के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में सेवा भारती के नाम से काम का विस्तार हुआ। इन्ही के प्रयासों से दिल्ली में सेवाधाम के नाम से एक छात्रावास की शुरुआत हुई। इस छात्रावास और विद्यालय में पिछड़े समाज के बच्चों को सब प्रकार की सुविधा दी जाती है। भोपाल में विष्णु जी के ही प्रयासों से आनंदधाम परिसर का निर्माण हुआ। इस परिसर में वृद्धजनों को सब प्रकार की सुविधाएं मुहैया करायी जाती है।
सन् 1994 में श्री विष्णु कुमार मध्यक्षेत्र में सेवा कार्यों के विस्तार के लिए आए। अत्यन्त अल्प काल में ही मध्यक्षेत्र के विभिन्न प्रांतों में सेवा कार्यों का जाल फैल गया। वनवासी क्षेत्रों में एकल विद्यालय के साथ ही भोपाल में अनाथ बच्चों के लिए मात्छाया, वनवासी बच्चों के लिए वनवासी विद्यालय आदि का निर्माण और विस्तार किया। मध्यक्षेत्र में आज हजारों की संख्या में वनवासी विद्यालयों का संचालन किया जा रहा है।
श्री विष्णु कुमार के सरल और सह्दय व्यक्तित्व को सभी ने पसंद किया और सराहा। आज सायं 5ः30 बजे दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ। मध्यक्षेत्र के संघचालक श्री श्रीकृष्ण माहेश्वरी, मध्यभारत प्रांत के संघचालक श्री शशीभाई सेठ और विभाग संघचालक श्री कांतिलाल चतर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सेवा प्रमुख श्री प्रदीप खांडेकर, सेवा भारती के प्रांत संगठनमंत्री श्री संजय शर्मा ने श्री विष्णु कुमार के निधन पर अपनी शोक संवेदना व्यक्त की है। सेवा भारती भोपाल ईकाई के सचिव श्री सोमकांत उमालकर ने बताया कि श्री विष्णु कुमार की अन्त्येष्टि में विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल, महामंत्री श्री ओंकार भावे, पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री सत्यनारायण जटिया, राज्यसभा सांसद श्री गोपाल व्यास, दिल्ली भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डाॅ. हर्षवर्धन, मध्यप्रदेश भाजपा के संगठन महामंत्री माखन सिंह चैहान, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिल्ली प्रांत के कार्यवाह श्री विजय कुमार, प्रांत प्रचारक श्री प्रेम कुमार और राष्ट्रीय सेवा भारती के कार्यालय मंत्री श्री सुरेश अग्रवाल उपस्थित थे।

शनिवार, 23 मई 2009

15 वीं लोकसभा का एक संदेश यह भी -
राजनीति के दलाल, भगोड़े और ब्लैकमेलर सबक सीखें
अनिल सौमित्र
15 वीं लोकसभा का गठन हो चुका। लेकिन विश्लेषणों का दौर थमा नहीं है। राजनीति के जानकार और मीडिया के लोग अपने-अपने हिसाब से विश्लेषण कर रहे हैं, अपने-अपने तर्काें और विचारों की जमावट और सजावट कर लोगों तक परोस रहे हैं। इन्हीं विश्लेषणों में एक विश्लेषण यह भी है कि 15 वीं लोकसभा के लिए मतदाताओं ने खास किस्म के नेताओं के लिए कुछ संदेश और कुछ सबक दिए हैं। इन संदेशों और सबक पर भी गौर किया जाना चाहिए। हालांकि अभी यूपीए की सफलता के जयकारे में कोई भी दूसरी आवाज सुनाई दे यह मुश्किल है। लेकिन सुनाई न देने के डर से आवाज देना तो नहीं छोड़ा जा सकता। यूपीए, राहुल, सोनिया, मनमोहन की जय हो! लेकिन मतदाताओं ने ममता, नवीन, नीतीश और रमन की भी जय की है। छत्तीसगढ़ की 11 में से भाजपा को 10 सीटें देकर मतदाताओं ने राहुल, सेनिया और मनमोहन फैक्टर को नकारा और रमन फैक्टर को स्वीकारा है। यही हाल बिहार में, बंगाल में और उडी़सा में भी हुआ है। यद्यपि 15 वीं लोकसभा के लिए अखिल भारतीय स्तर पर किसी एक राजनैतिक दिशा का संकेत नहीं मिल रहा है, लेकिन मोटै तौर पर इस चुनाव ने कुछ इशारा तो दिया ही है, मसलन - युवा मतदाताओं का उत्साह और युवा नेतृत्व का उभार, सादगी और ताजगी को जनता का स्वीकार, सुशासन की ललक और स्वच्छ छवि वाले नेताओं के प्रति झुकाव आदि नए संकेत हैं।
लालू यादव, मुलायम सिंह, रामविलास पासवान, मायावती और अजीत सिंह जैसे नेताओं ने चुनाव के पूर्व और चुनाव के बाद जिस तरह की राजनीतिक हरकतें की है उससे आम जनता के बीच जो संदेश गया है वह बहुत ही निराशाजनक है। इनकी हरकतों से राजनीति में अब नए जुमलों का चलन हो जायेगा। ऐसा लगने लगा है कि राजनीति के दलालों, भगोड़ों और ब्लैकमेलरों को जनता ने सबक सिखाने की कोशिश तो की है, लेकिन शायद ये नेता अब भी सीखने को तैयार नहीं हैं। बिना किसी तर्क और आधार के जिस तरह से बिन बुलाए मेहमान की तरह बसपा, सपा, राजद और राष्ट्रीय लोकदल ने पाला बदलते हुए बिना मांगे ही समर्थन की घोषणा कर दी है। यह तो सरासर जनमत का अनादर और अपमान है। लालू और पासवान में तो इतना भी राजनैतिक शर्म नहीं बचा की वे जनादेश को स्वीकार कर विपक्ष में बैठकर रचनात्मक राजनीति करें। शायद उन्हें सत्ता की राजनीति की आदत हो गई है। वे सोनिया गांधी की तरफ मुंहबाए खड़े हैं कि किसी भी तरह उन्हें यूपीए में शामिल कर लिया जाए। सत्ता सुख न सही, कोई उनसे सम्मानजनक बात ही कर ले। कांग्रेस के बार-बार मना करने के बावजूद राजद, सपा और बसपा ने यूपीए को एकतरफा समर्थन की घोषणा कर दी है। ये दल और इनके नेताओं को अपने पापों का अनुमान है। वे भीतर-ही-भीतर डरे हुए हैं। नाजायज तरीके से जमा धनबल और बाहुबल का खतरा अब सताने लगा है। चुनाव प्रचार के दरम्यान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने बसपा प्रमुख मायावती को सीबीआई का डंडा दिखाया ही था। कांग्रेस के पास अब तो सत्ता का डंडा है। इस डंडे का डर अब राजनीतिक दलालों, भगोड़ों और ब्लैकमेलरों को भयभीत करने लगा है। इसलिए भारतीय राजनीति में शायद पहली बार ऐसा हो रहा कि बिना मांगे ही समर्थन की बाढ़ आ गई है। वाम दलों ने तो जनता का संदेश समझते हुए विपक्ष में बैठने की घोषणा कर दी है, लेकिन तथाकथित तीसरे और चैथे मोर्चे के घटक दल तो जनता को फिर से धोखा देने पर आमादा हैं।
इसबार जनता ने भाजपा को भी कुछ सबक और संदेश देने की कोशिश की है। समझना-न समझना, मानना-न मानना पार्टी के नेताओं के उपर है। जनता का यह संदेश भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरे के बारे में ही है। नरेन्द्र मोदी भले ही भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा जवान बताते रहे, लेकिन भाजपा के थके-मांदे, बूढ़े और जर्जर चेहरे, पार्टी की चाल और चरित्र बयान कर रहे थे। जनता और मतदाता भाजपा के इन चेहरों को नानाजी देशमुख का संकल्प और आदर्श याद दिला रही है। क्या भाजपा के ये दीर्घजीवी नेता तब तक राजनीति का रास्ता और पार्टी का दामन नहीं छोडेंगे जब तक उनके वारिश इसे थाम न लें! भाजपा के ऐसे अनेक नेताओं को अपना प्रतिनिधित्व देने से जनता ने साफ मना कर दिया। अनेक क्षेत्रों में अपराधी और धनपशुओं को भी जनता ने करारा झटका दिया है। वरूण व मेनका गांधी, मुरलीमनोहर जोशी और योगी आदित्यनाथ की विजय सांप्रदायिक और जातीय राजनीति पर हिन्दुत्व की विजय पताका है। भाजपा को अपने स्थायी मुद्दे पर लौटने और दृढ़ता प्रदर्शन का संकेत है। भाजपा के कमराबंद चुनाव प्रबंधकों के लिए भी एक सबक - बंद कमरे में राजनीतिक प्रबंधन से बाज आएं, जनता की नब्ज टटोलें और जमीनी प्रबंधन करें। आयातित और भगोड़े नेता-कार्यकर्ता को जुटाने की बजाए नेता और कार्यकर्ता का निर्माण करें। जनता का मत है- भाजपा दूसरों की डालियों पर बैठने की बजाए अपनी जड़े मजबूत करे। भाजपा को फिर अपने कैडर, विचारधारा, मुद्दों और संगठन की ओर लौटना होगा।
15 वीं लोकसभा में जनता और मतदाता ने जाने-अंजाने एक साफ और स्पष्ट संकेत स्थायी सरकार का दिया है। जातीय, क्षेत्रीय, पारिवारिक और व्यक्तिवादी आधार पर चलने वाले दलों का किनारे लगाने की कोशिश मतदाताओं की है, हालांकि यह काम पूरा-पूरा नहीं पाया। देश की राजनीति दो दलीय और दो ध्रुवीय हो ये जनता की चाहत और राष्ट्रीय राजनीति की जरूरत है। लेकिन इसके लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों को मशक्कत करनी होगी। कांग्रेस को सरकार और यूपीए गठबंधन की मर्यादा हो सकती है, लेकिन इस दिशा में शिद्दत से आगे बढ़ना भाजपा की जरूरत भी है और उसके लिए पांच साल का अवसर भी। संभव है बिहार का अगला चुनाव नीतीश कुमार बिना भाजपा के लड़े, जैसे उड़ीसा में नवीन पटनायक ने किया। नीतिश कुमार के सहयोग से बिहार में भाजपा आगे नहीं बढ़ रही, बल्कि पिछड़ रही है या यथास्थिति में है।
यूपीए, कांग्रेस, सोनिया, राहुल और मनमोहन सिंह के बारे में अभी कोई भी विश्लेषण निरर्थक होगा। क्योंकि अभी कांग्रेस को सबसे अधिक सांसद मिले हैं। अभी सरकार बनाने की खुशी है। सभी तर्क, विश्लेषण और विचार कांग्रेस के पक्ष में ही किए जायेंगे। ये सब वातानुकूलित हैं। लेकिन उन सवालों को झुठलाया नहीं जा सकता जो राष्ट्रीय क्षितिज पर मंडरा रहे हैं। आंतरिक और बाह्य सुरक्षा, आतंकवाद, आर्थिक मंदी, बढ़ती बेराजगारी, मंहगाई, दीर्घकालीन तुष्टीकरण से पैदा हुई समस्याओं को न तो यूपीए सरकार और न ही विपक्ष नकार सकता है। यह तो देश का काॅमन मिनिमम प्रोग्राम है। देश की जनता चाहती है समस्याओं का निदान, विकास के अवसर और सुरक्षित माहौल। उसने वादाखिलाफी, परिवारवाद, अहंकार, बेरूखी और दागदार छवि को नकार दिया है। नेताओं, पार्टियों और दलों के रहनुमाओं सावधान! भारतीय लोकतंत्र अब वयस्क हो रहा है। मतदाता सतर्क और सावधान है, इनके संकेत और सबक को पहचानों, उसपर अमल करो।