अनिल सौमित्र
राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर पत्रकारों के अनेक संगठन हैं। एनयूजे यानी नेशनल यूनियन आॅफ जर्नलिस्ट इसे नेशनलिस्ट यूनियन आॅफ जर्नलिस्ट भी कहा जा सकता है। यह संगठन पत्रकार संगठनों को फेडेरेशन है। अर्थात् पत्रकारों के अनेक संगठन इस यूनियन से संबंद्ध हैं। अनेक संगठनों में से एक - जर्नलिस्ट यूनियन आॅफ मध्यप्रदेश यानी जम्प भी इस फेडेरेशन का सदस्य है। वैसे तो मध्यप्रदेश और देश में दोनों संगठन पिता-पुत्र या बड़े-छोटे भाई की तरह अनेक वर्षों से कार्यरत हैं। कार्य करते हुए कभी आपसी मनमुटाव नहीं हुआ। होता भी कैसे अगर समविचारी लोग भले ही वे पत्रकार क्यों न हों अगर एक भले काम में लगे हैं, लोगों का संगठन कर रहे हैं। इसमें मनमुटाव की कोई गुंजाइश होना भी नहीं चाहिए। लेकिन काम करते हुए व्यक्ति ही नहीं संगठन का भी विस्तार और दबदबा बढ़ता है। संगठन अगर पत्रकारों का हो तो रूतबा और ज्यादा भी हो सकता है। यही सब कुछ हुआ पिछले वर्षों में एनयूजे और जम्प में।
रूतबा, दबदबा और ताकत के विस्तार का ही परिणाम था कि जम्प में विभिन्न पदों को लेकर चुनाव की नौबत आ गई। लोकतांत्रिक देश में किसी संगठन संस्था के लिए यह शुभ और अच्छा संकेत है कि वहां पदो ंके लिए चुनाव हो और चुने हुए लोग विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करें। वैसे तो यह अच्छा होता कि अध्यक्ष, महामंत्री या सचिव सहित विभिन्न पदों और कार्यकारिणी के साथ राष्ट्रीय परिषद् के लिए भी सर्व-सम्मति से मनोनयन हो जाता। लेकिन चुनाव होना और भी अच्छी बात है, बशर्ते कि चुनाव के बाद कोई राग-द्वेष उत्पन्न न हो। चुनाव के पूर्व असहमति और विवाद के कारण कुछ मतभेद और मन-भेद पैदा हुए जिसके कारण चुनाव की नौबत आई। अब चुनाव हो चुके। चुनाव के बाद दमदार प्रत्याशी जीते यह तो मानना ही पड़ेगा। इसलिए अब जम्प भी दमदार हो गया है। पहले से अधिक रूतबे और दबदबे वाला। महिला दिवस की पूर्व संध्या पर जम्प और एनयूजे के लिए महिला पदाधिकारियों और सदस्यों का भी चुनाव हुआ। तो स्त्री शक्ति ने भी अपने रूतबे और दबदबे का इजहार कर दिया है। महिला पत्रकारों ने पुरूष वर्चस्व और एकाधिकार को तोड़ कर अपनी उपस्थिति दजे करायी है। वाकई यह मुस्लिम नेताओं के मुंह पर भी तमाचा है जो महिलाओं को सिर्फ नेता या पत्रकार पैदा करने की नसीहत दे रहे हैं। अब चुप हो जाओ मुल्ला-मौलवियों महिलाएं अब पत्रकार और नेता भी बनेंगी और पत्रकार और नेता पैदा भी करेंगी। आखिर देश को सबल, शक्तिशाली और तेजस्वी बनाने की जिम्मेदारी उनकी भी है।
लेकिन सब कुछ शुभ और नेक होने के वावजूद जम्प के चुनाव में कुछ बातें ऐसी हुई जो लोकतंत्र को धक्का और चोट पहुंचाने वाली थी। चुनाव के दिन सुबह से ही प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पत्रकार आने लगे थे। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के प्रतिष्ठित होटल पलाश रेसिडेंसी में 7 मार्च को पत्रकारों का जमावड़ा था। चूंकि महौल चुनाव का था इसलिए सभी दावेदार प्रत्याशी अपना-अपना परिचय ले-दे रहे थे। पत्रकारों का आना-जाना भी जारी था। इतने में एक इंडिका गाड़ी आई। सबने अनुमान तो यही लगाया कि इस गाड़ी में भी कुछ पत्रकार ही होंगे। अनुमान के मुताबिक उस गाड़ी से पत्रकार ही उतरे, लेकिन वे बन्दूकधारी पत्रकार थे। इन बन्दूकधारी पत्रकारों को देखकर अकबर इलाहाबादी का वो शेर याद आया - ‘‘खींचों ना कमानो को, ना तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।’’ मुझे लगा इलाहाबादी तो तोप ओर तलवारों के सामने अखबार निकालने की बात करते थे। ये कैसे पत्रकार हैं, बन्दूक से अखबार कैसे निकालेंगे! लेकिन फिर ध्यान आया इलाहाबादी ने जब अखबार निकालने की वकालत की थी तब जमाना अंग्रेजों का था। तब देश गुलाम था। गुलामी से लड़ने के लिए तोप और तलवार से अधिक ताकतवर हथियार उन्होंने अखबार को माना था। लेकिन आज तो आजाद मुल्क में हैं। कोई अंग्रेज वगैरह हमारी छाती पर बैठे नही, ंतो फिर अखबार की क्या जरूरत है। एक सवाल भी दिमाग में उठा - लोकतंत्र में अखबार बंदूक से भी ंिनकल सकते हैं। संभव है कुछ पत्रकार यह कहें कि हमारी मर्जी हम कलम की बजाए बंदूक से ही पत्रकारिता करेंगे, कोई अंग्रेजों का राज है क्या? फिर मुझे आज के अकबर इलाहाबादी याद आये - ‘‘खीचों ना कलम को, ना पैड निकालो, जब अखबार मुकाबिल हो तो बंदूक निकालो।’’
अब जबकि मध्यप्रदेश में जम्प और एनयूजे के लिए चुनाव हो चुके हैं। प्रदेश कार्यकारिणी का गठन भी हो चुका है। पत्रकार और पत्रकार संगठनों के प्रतिनिधि लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता और उसके भविष्य के बारे में अनवरत विचार करते रहेंगे ताकि लोकतंत्र और लोकतंत्र का चैथा पाया मीडिया भी मजबूत हो सके।
रविवार, 14 मार्च 2010
गुरुवार, 11 मार्च 2010
दफन हो जाये ऐसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

मकबूल फिदा हुैसन को लेकर फिर चर्चा है। कतर की नागरिकता लेने के बाद उनके पक्ष में तकरीरें की जा रही है। प्रगतिशील और भारतीय आस्थाओं के विरोधी एक बार फिर लामबंद, सक्रिय और आक्रमक हैं। हुसैन की करतूतों के कारण भारत में उनका काफी विरोध हुआ। भारत में कानून की हालत यह है कि यहां सद्विचार और गाली में कोई भेद नहीं होता। लचर कानून और व्यवस्था के कारण मनमाफिक न्यायालय, प्रदेश और देश चुनने की सुविधा है। इसमें भी कुछ परेशानी हो तो देश छोड़कर ही चले जाओ। कानून के नाम पर भागने वाले को भगोड़ा कहा गया है। लेकिन इस देश के कई विद्वान, लेखक, साहित्कार और कलाकार एक भगोड़े के प्रति गुस्सा और क्षोभ व्यक्त करने की बजाए आंसू बहा रहे हैं। नाम भारत का, लोकतंत्र और कानून का ले रहे हैं, लेकिन अपने ही मुह पर हुसैन का जूता और तमाचा मार रहे हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम लेकर कुछ हुसैन समर्थक अश्लीलता, भारतीय अस्मिता, देवी-देवताओं के प्रति आस्था, भारत के रूप में करोड़ों की माता का अपमान करने वाले हुसैन और उसकी करतूतों पर पर्दा डालने और उसका बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं। हुसैन की करतूत या निम्न स्तरीय व घटिया कला निजी नहीं, बल्कि सार्वजनिक हुई है। अभिव्यक्ति जब सार्वजनिक होती है उसका प्रभाव व्यापक होता है। हुसैन की अभिव्यक्ति से करोड़ों लोग आहत होते रहे हैं। अपने-अपने अनुसार लोगों ने प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति भी की है। कुछ ने उनकी नाजायज कलाकृतियों को तोड़कर अपनी प्रतिक्रिया अभिव्यक्त की, इसमें अनुचित क्या है? जो सांप्रदायिक होगा वह सांप्रदायिक स्तर पर विरोध करेगा, जो कलाकार होगा वह कला के स्तर पर विरोध करेगा। जैसे शब्दवान शब्दों से प्रक्रिया करेगा, वैसे ही बलवान अपने बल से। अभिव्यक्ति का अपना-अपना माध्यम हो सकता है। होना भी चाहिए। ये तो अच्छा है कि भारत के हिन्दुओं या बजरंगियों ने अभिव्यक्ति का नक्सलवादी, माओवादी, माक्र्सवादी या इस्लामी तरीका अख्तियार नहीं किया। अगर किया होता तो कानून भी बेबस होता और हुसैन भी। अगर इस्लामी अभिव्यक्ति के तहत हुसैन का सिर कलम हो जाता तो वे कतर में न होते। नक्सली, माओवादी और इस्लामी प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति के बरक्श बजरंगी अभिव्यक्ति को सलाम!
वो तो हिन्दुओं ने अपने उपर शराफत का मुल्लमा चढ़ा रखा है। नही ंतो अपनी मां और बहन-बेटी की इज्जत-आबरू को सार्वजनिक करने को पाप माना जाता है, ऐसा करने वाले को पापी। हिन्दू शास्त्रों में पापी को क्या सजा मिलती है? भला हो इस देश की न्याय व्यवस्था और कानून का जो हुसैन जैसे पापियों को भी कला और अभिव्यक्ति के नाम पर बक्श देती है। हुसैन ने जो किया है वह इस्लाम विरोधी तो है ही, लेकिन इस्लामी सोच वाले उनके कृत्य पर सजा नहीं पुरस्कार देंगे, क्योंकि उनका यह कृत्य हिन्दू विरोधी और भारत विरोधी है। अपनी श्रद्धा, आस्था और पूज्य मानकों के प्रति गलत विचार रखने के लिए हिन्दुओं में भी सजा का प्रवाधान है। लेकिन भारत में चूंकि अ-धर्म का बोल-बाला है। यहां धर्म से निरपेक्षता सबसे बड़ी बात है। इसलिए यहां विधर्मी, अधर्मी, धर्म विरोधी सब कानून से उपर हैं।
भारत के बुद्धिजीवी प्रगतिशीलता के नाम पर हुसैन के पाप को भी कला का दर्जा दे रहे हैं। हुसैन को भारत, भारतीयता, भारतीय संस्कृति हिन्दू और यहां की देवी-देवताओं से नफरत हैं। अपनी पेटिंग्स के माध्यम से वे इन सब को गालियां देते हैं। जाहिर है वे ही गालियां असरकारी होती हैं जो अपने प्रिय या आत्मीय के बारे में अधिकतम बुरा व्यक्त करती हैं। हिन्दुओं को ये गालियां लग गई हैं। लगना इसलिए स्वाभाविक है कि वे भारत को माता मानते हैं। अगर अपनी मां को नंगा होते देख उसका विरोध करना सांप्रदायिक है तो ये सांप्रदायिक विरोध भी जायज है। हुसैन के शुभचिंतकों से एक गुजारिश है। वे सब जो हुसैन की कला के मुरीद हैं, भारतमाता की ही तरह अपनी बहन-बेटियों और माताओं की एक-एक नंगी, खुली, संभोगरत तस्वीर या पेंटिंग बनवा लें। इनके प्रदर्शन के लिए कोई आर्ट गैलरी की जरूरत नहीं होगी। पूरा देश ही आर्ट गैलरी बन जायेगा। शायद कला की कम समझ रखने वाले भी कला प्रेमी हो जायें। कोणार्क और खजुराहो का नाम लेकर हुसैन के पाप को जायज ठहराने वाले तब अपने ही घर की कलाकृतियों का बेहतर उदाहरण दे सकेंगे। हुसैन की तरह पोर्नोग्राफी, यौन-विकृति और हिन्दू विरोध से ग्रस्त उनके प्रशंसकों को हुसैन की इस कला अभिव्यक्ति में रियलाइजेशन भी होगा। अगर ऐसा हो सका तो निश्चित ही हुसैन का विरोध कम हो जायेगा। ‘इरोटिक कला’ के प्रेमी, हुसैन प्रशंसकों और समर्थकों की बहु-बेटियों की उत्तेजक पेटिंग अपने डाइंग हॉल में लगा अपने कला प्रेम का इजहार भी कर सकेंगे और हुसैन की प्रशंसा भी। तब न हुसैन का इतना विरोध होगा और न ही उन्हें भारत से भगोड़ा होने की जरूरत रहेगी। देश में ‘इरोटिक कला’ प्रमियों का एक नया वर्ग तैयार होगा। हुसैन और उनके समर्थकों को काफी सुकून भी मिलेगा।
अगर ऐसा न हो सके तो हुसैन कतर और अन्य इस्लामी देश में ही अपनी रचनाधर्मी कला को अभिव्यक्त करें। वहां भी बहुत-सी बहन-बेटियां, बहुएं इस ‘पाप-कला’ के लिए मिल जायेंगी। अगर कम पड़े या कोई कठिनाई हो तो हुसैन अपने घर की ‘‘चीजों’’ का उपयोग कर सकते हैं। भारत की धरती उनके लिए ना-पाक है, ना-पाक ही बनी रहेगी। एक ऐसे इस्लामी कट्टर और यौन विकृति के शिकार कलाकार को भारत में न तो बौद्धिक और न ही भौतिक स्थान देने की जरूरत है जो करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत करता है। भारत में सब बुराइयों के बावजूद यहां स्त्रियों का बहुत आदर और सम्मान है। कम-से-कम इस्लाम और इसाई देशों से अधिक तो है ही।
हुसैन ने कतर की नागरिकता स्वीकार कर प्रगतिशील लेखकों और सेक्यूलर सोच वालों के मुह और सिर पर जूता जरूर मारा है, लेकिन हिन्दुओं, धर्मनिष्ठ नागरिकों और भारतमाता के पुत्रों में एक नए उत्साह और साहस का संचार किया है। अब कोई भी कला-पापी अपने को अभिव्यक्त करने से पहले कुछ तो सोचेगा ही। राष्ट्रवादी और आस्थावादी अभिव्यक्ति को नकार और सिर्फ हुसैनी और प्रगतिशील अभिव्यक्ति को स्वीकार मिलना हो तो दफन हो जाए ऐसी अभिव्यक्ति और ऐसी स्वतंत्रता!
शनिवार, 6 मार्च 2010
Smriti's interview on spirituality

Respected Mr Mishra
A truly good book teaches me better than to read it. I must soon lay it down, and commence living on its hint. What I began by reading, I must finish by acting thus from what I have read and what I believe in let me share some thoughts;
One of the great contributions of spiritual knowledge is that it realigns your sense of self to something you may not have even ever imagined was within you. Spirituality says that even if you think or others think that you're limited and small, it simply isn't so. You're greater and more powerful than you and others have ever imagined. A great and divine light exists only inside of you. This same light is also in everyone you know including your good self and in everyone you will ever know in the future. You may think you're limited to just your physical body and state of affairs — including your gender, race, family, job, and status in life — but spirituality comes in and says "there is more than this."
Perceive that spirit sounds similar to words like inspire and expire. This is especially apposite because when you're filled with spiritual energy, you experience great inspiration, and when the spiritual life energy leaves your body, your time on this soil terminates. These are two of the main themes of the spiritual journey Mr.Mishra:
· Allowing yourself to be filled with motivation, which also translates into love, joy, wisdom, peacefulness, and service.
· Remembering that an inevitable expiration waits to take you away from the very circumstances you may think are so very important right now.
The study of spirituality goes profoundly into the heart of every theme and extends far beyond the physical world of matter. Spirituality connects you with the profoundly powerful and divine force that's present in this universe. Whether you're looking for worldly success, inner peace, or supreme enlightenment, no knowledge can thrust you to accomplish your goals and provide as effective a plan for living as does spiritual knowledge.
Perhaps the best way to think about a spiritual approach to the world is to contrast it with a more common materialistic approach.
· The materialistic approach: The materialistic approach relies primarily on empirical verification provided by the five senses — what can literally be seen, heard, tasted, touched, or smelled. This approach depends on the outer appearances of things to decide how and what to think and feel about them. A materialistic person fixes whatever may be wrong or out of place in his or her world by moving things around and effecting outer changes.
· The spiritual approach: In contrast, the spiritual way is to see beyond mere outer appearances and the five senses to an intuitive perception of the causes behind outer conditions. Someone with a spiritual approach may change and uplift their world by first transforming and improving his or her own vision.
One of the main philosophies of spirituality is to look within and find what you seek within yourself. The external world is ephemeral, momentary, and ever changing; in fact, your body will die one day, sweeping all those worldly accoutrements away like a mere pile of dust. Your inner realm, on the other hand, is timeless, eternal, and deeply profound.
Although religion and spirituality are sometimes used interchangeably, they really designate two different aspects of the human experience. You might say that spirituality is the numinous face of religion.
· Spirituality is the wellspring of divinity that pulsates, dances, and flows as the source and essence of every soul. Spirituality relates more to your personal search, to finding greater meaning and purpose in your existence. Some elements of spirituality include the following:
· Looking beyond outer appearances to the deeper significance and soul of everything
· Love and respect for God
· Love and respect for yourself
· Love and respect for everybody
· Religion is most often used to describe an organized group or culture that has generally been sparked by the fire of a spiritual or divine soul. Religions usually act with a mission and intention of presenting specific teachings and doctrines while nurturing and propagating a particular way of life.
Different religions can look quite unlike one another. Some participants bow to colourful statues of deities, others listen to inspired sermons while dressed in their Sunday finery, and yet others set out their prayer rugs five times a day to bow their heads to the ground. Regardless of these different outer manifestations of worship, the kernel of religion is spirituality, and the essence of spirituality is God or the Supreme Being.
Spirituality is:
· Beyond all religions yet containing all religions
· Beyond all science yet containing all science
· Beyond all philosophy yet containing all philosophy
As one becomes more spiritual, animalistic aggressions of fighting and trying to control the beliefs of other people can be cast off like an old set of clothes that no longer fits. In fact, many seekers begin to feel that every image of divinity is just one more face of their own, eternally ever-present God.
Loving and respecting all religions and images of God doesn't mean that you have to agree with all their doctrines. In fact, you don't even have to believe and agree with every element and doctrine of your own religion! This goes for any teachings you may encounter along your path. Everybody thinks that what they are doing is right. That's what's so fun about the world. Everybody is doing something different, and each one believes deep in his soul that what he believes is right — some with more contemplation and conviction than others.
And to sum it all up so that the debate does not continue any further let me sum it up in Mother Teresa’s words “We need to find God, and he cannot be found in noise and restlessness. God is the friend of silence. See how nature - trees, flowers, grass- grows in silence; see the stars, the moon and the sun, how they move in silence... We need silence to be able to touch souls.” So in the future on this topic lets maintain silence.
As for my speaking on right-wing economic, social and political agenda, and whether I have it in me to fit in? Or is am I another famous face spouting spirituality to fill up for intellectual vacuum (by the way I think you sir have got the spelling of vacuum wrong) is something which you will have to wait and watch.
सोमवार, 1 मार्च 2010
Rituals are a means of communicating with God : SMRITI IRANI

I AM
SMRITI IRANI TV actor,politician
Spirituality means to converse with God.Most of us remember Him only during difficult times.Many of us are angry with Him for not doing enough for us,but i believe whatever happens,happens for the good.I dont bother Him with hows and whys.I feel the ability to communicate with God through all of the lifes ups and downs is what makes us truly spiritual.
I believe in rituals.God is my friend but Hes also like a father figure to me.Rituals are a means of communicating with God and conducting myself in front of Him as i would behave in the presence of my biological father.I have a temple at home where a pujari comes everyday to perform some rituals.Every year,me and my husband make it a point to visit temples at Mahakaleshwar,Somnath,Dwarka and Sreenathji.However,I dont wear any lucky charms as my faith in God is a protection in itself.I strongly believe in destiny.As they say,you cant achieve more than you are destined to or before you are destined to.
I was brought up by my grandfather a Bengali Brahmin who taught me all the rituals and ensured that i begin each day with a puja and end it with prayer.He also told me that God is within me.This is one of the primary reasons why even in my darkest moments,i never utter anything unkind to anyone.I believe that some things,when spoken from the heart,have a tendency to come true.
At a very early age,my family instilled in me not a fear of God,but a belief that if you stay on the path of truth,God will always be by your side.I was told that at the end of the day,only those who are truthful embrace the knowledge of Gita and will attain moksha (salvation).
My entire life has been a work of God.Else,how is it possible for a girl from such a humble background to attain so much in so little time.There are so many people who leave home and hearth to pursue their dreams,yet how many are successful Moreover,i was always made to believe in the axiom that nobody gets a perfect world.But i not only soared to professional heights,but also blessed with a wonderful life partner and children.
All this has been possible because a supreme power up there has been smiling down on me.Its not as though i havent had my share of challenges.I have been through many rough patches but have survived solely due to my faith.
(As told to Arun Sharma)
http://www.google.co.in/url?sa=t&source=web&oi=news_result&ct=res&cd=4&ved=0CBMQqQIwAw&url=http%3A%2F%2Fnavbharattimes.indiatimes.com%2Farticleshow%2F
http://www.in.com/news/current-affairs/rss-chief-mohan-bhagwat-favours-small-states-12897807-542c6330d42572caf0425d0b7698faeee0a97fc5-rhp.html
http://www.hindustantimes.com/rssfeed/bhopal/Not-Hindu-you-are-not-Indian-RSS-chief/Article1-514100.aspx
http://www.in.com/news/current-affairs/if-one-is-not-hindu-he-could-not-be-indian-12990653-148800-rhp.html
http://www.hindustantimes.com/rssfeed/bhopal/RSS-chief-calls-Nanaji-a-rare-politician/Article1-514023.aspx
http://www.in.com/news/current-affairs/pak-is-a-headache-rss-chief-12990431-fa7aec7effbf0dacae31830d6ad996c4ee6d65bc-rhp.html
http://www.hindustantimes.com/rssfeed/bhopal/Not-Hindu-you-are-not-Indian-RSS-chief/Article1-514100.aspx
http://www.in.com/news/current-affairs/if-one-is-not-hindu-he-could-not-be-indian-12990653-148800-rhp.html
http://www.hindustantimes.com/rssfeed/bhopal/RSS-chief-calls-Nanaji-a-rare-politician/Article1-514023.aspx
http://www.in.com/news/current-affairs/pak-is-a-headache-rss-chief-12990431-fa7aec7effbf0dacae31830d6ad996c4ee6d65bc-rhp.html
HT Correspondent, Hindustan Times
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Bhopal, March 01, 2010
First Published: 00:44 IST(1/3/2010)
Last Updated: 00:46 IST(1/3/2010)
Not Hindu? you are not Indian: RSS chief
Dismissing India’s tradition of religious and cultural pluralism, Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) chief Mohan Bhagwat on Sunday said, “He who is an Indian is a Hindu and he who is not a Hindu is not an Indian.”
“For us, the word Hindu does not mean any religion but a way of life,” he said at an annual function of the RSS and the Hindu samagam (congregation) here.
But he also said India’s ethos of unity in diversity is the answer to problems facing the world today. He said the problems emanate from some communities’ attempts to bring about uniformity in the world
Milind Ghatwai Tags : Mohan Bhagwat, Manmohan Singh Posted: Monday , Mar 01, 2010 at 0327 hrs Bhopal:
RSS Sarsanghchalak Mohan Bhagwat on Sunday criticised Prime Minister Manmohan Singh for favouring minorities over Hindus, and alleged that the majority community was not getting its due in the country, especially in the Valley where there was a separate yardstick of justice for them.“How can someone of the level of Prime Minister say, in violation of the Constitution, that they (minorities) have the first claim over resources?” asked Bhagwat while addressing a Hindu Samagam (conclave) here.The RSS chief’s attack on the Prime Minister came when he was making a case that Kashmiri Pandits were being ignored while separatists and terrorists, including those who were killing Muslims, were being pardoned and encouraged. He blamed vote bank politics for the sorry state of affairs of Hindus in the Valley.
Peace talks only helped extremists to regroup, he said, wondering, “I don’t know if it’s nasha (intoxication) or vote ki asha (hope for votes). Baki sab ke liye ek nyay aur Hinduon ke liye anyay (there’s injustice for Hindus but a separate yardstick of justice for the rest.)”
Sun, 28/02/2010 - 8:51pm If one is not Hindu he could not be Indian: Bhagwat
Bhopal, Feb 28 (PTI) RSS chief Mohan Bhagwat today said that those who were Indians were Hindus and if one was not a Hindu he could not be an Indian.
"For us the word Hindu did not mean any religion but a way of life," he said at an annual function of the RSS and the Hindu Samagam here.
The Union Finance Minister had in his budget speech quoted from Chanakaya but this was totally out of context, Bhagwat said, adding that what Chanakaya had said was valid for his times and not the present-day India.
The RSS chief hit out equally at America and China for trying to undermine India in a number of ways.
Bhagwat said that while America dumped rejected and cheap drugs in India, China was making attempts to make sure that it alone was the most powerful power in South Asia.
http://www.bhaskar.com/2010/02/27/100227051928_bhagwat_arrives_in_bhopal.html
भागवत आए, सद्भावना बैठक आज
Bhaskar News
भोपाल. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत शुक्रवार की रात मुंबई से भोपाल पहुंचे। वे यहां शनिवार और रविवार को दो कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। पहले दिन विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों के साथ उनकी सद्भावना बैठक होगी। दूसरे दिन लाल परेड मैदान पर हिंदू समागम का मुख्य समारोह होगा।
संघ की कमान संभालने के बाद डॉ. भागवत दूसरी बार भोपाल आ रहे हैं और भाजपा में हुए नेतृत्व परिवर्तन के बाद यह उनकी पहली यात्रा है। आयोजन समिति के महासचिव दीपक शर्मा व संघ के विभाग संघचालक कांतिलाल चतर ने बताया कि शनिवार सुबह 10 बजे शहीद भवन में होने जा रही सद्भावना बैठक में सौ से अधिक संगठनों के पदाधिकारियों को आमंत्रित किया गया है।
डॉ. भागवत सामाजिक एकजुटता पर इनसे चर्चा करेंगे। रविवार को लाल परेड मैदान पर हिंदू समागम में उनके अलावा संघ के अभा सह शारीरिक प्रमुख अनिल ओक, संपर्क प्रमुख हस्तीमल और क्षेत्र संघचालक श्रीकृष्ण माहेश्वरी समेत संघ के क्षेत्र एवं प्रांत के पदाधिकारी भी शामिल होंगे।
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Bhopal, March 01, 2010
First Published: 00:44 IST(1/3/2010)
Last Updated: 00:46 IST(1/3/2010)
Not Hindu? you are not Indian: RSS chief
Dismissing India’s tradition of religious and cultural pluralism, Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) chief Mohan Bhagwat on Sunday said, “He who is an Indian is a Hindu and he who is not a Hindu is not an Indian.”
“For us, the word Hindu does not mean any religion but a way of life,” he said at an annual function of the RSS and the Hindu samagam (congregation) here.
But he also said India’s ethos of unity in diversity is the answer to problems facing the world today. He said the problems emanate from some communities’ attempts to bring about uniformity in the world
Milind Ghatwai Tags : Mohan Bhagwat, Manmohan Singh Posted: Monday , Mar 01, 2010 at 0327 hrs Bhopal:
RSS Sarsanghchalak Mohan Bhagwat on Sunday criticised Prime Minister Manmohan Singh for favouring minorities over Hindus, and alleged that the majority community was not getting its due in the country, especially in the Valley where there was a separate yardstick of justice for them.“How can someone of the level of Prime Minister say, in violation of the Constitution, that they (minorities) have the first claim over resources?” asked Bhagwat while addressing a Hindu Samagam (conclave) here.The RSS chief’s attack on the Prime Minister came when he was making a case that Kashmiri Pandits were being ignored while separatists and terrorists, including those who were killing Muslims, were being pardoned and encouraged. He blamed vote bank politics for the sorry state of affairs of Hindus in the Valley.
Peace talks only helped extremists to regroup, he said, wondering, “I don’t know if it’s nasha (intoxication) or vote ki asha (hope for votes). Baki sab ke liye ek nyay aur Hinduon ke liye anyay (there’s injustice for Hindus but a separate yardstick of justice for the rest.)”
Sun, 28/02/2010 - 8:51pm If one is not Hindu he could not be Indian: Bhagwat
Bhopal, Feb 28 (PTI) RSS chief Mohan Bhagwat today said that those who were Indians were Hindus and if one was not a Hindu he could not be an Indian.
"For us the word Hindu did not mean any religion but a way of life," he said at an annual function of the RSS and the Hindu Samagam here.
The Union Finance Minister had in his budget speech quoted from Chanakaya but this was totally out of context, Bhagwat said, adding that what Chanakaya had said was valid for his times and not the present-day India.
The RSS chief hit out equally at America and China for trying to undermine India in a number of ways.
Bhagwat said that while America dumped rejected and cheap drugs in India, China was making attempts to make sure that it alone was the most powerful power in South Asia.
http://www.bhaskar.com/2010/02/27/100227051928_bhagwat_arrives_in_bhopal.html
भागवत आए, सद्भावना बैठक आज
Bhaskar News
भोपाल. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत शुक्रवार की रात मुंबई से भोपाल पहुंचे। वे यहां शनिवार और रविवार को दो कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। पहले दिन विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों के साथ उनकी सद्भावना बैठक होगी। दूसरे दिन लाल परेड मैदान पर हिंदू समागम का मुख्य समारोह होगा।
संघ की कमान संभालने के बाद डॉ. भागवत दूसरी बार भोपाल आ रहे हैं और भाजपा में हुए नेतृत्व परिवर्तन के बाद यह उनकी पहली यात्रा है। आयोजन समिति के महासचिव दीपक शर्मा व संघ के विभाग संघचालक कांतिलाल चतर ने बताया कि शनिवार सुबह 10 बजे शहीद भवन में होने जा रही सद्भावना बैठक में सौ से अधिक संगठनों के पदाधिकारियों को आमंत्रित किया गया है।
डॉ. भागवत सामाजिक एकजुटता पर इनसे चर्चा करेंगे। रविवार को लाल परेड मैदान पर हिंदू समागम में उनके अलावा संघ के अभा सह शारीरिक प्रमुख अनिल ओक, संपर्क प्रमुख हस्तीमल और क्षेत्र संघचालक श्रीकृष्ण माहेश्वरी समेत संघ के क्षेत्र एवं प्रांत के पदाधिकारी भी शामिल होंगे।
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
प्रसिद्ध समाजसेवी नानाजी देशमुख नहीं रहे
नयी दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता नानाजी देश मुख का शनिवार को निधन हो गया।
1975 में गठित गैरकांग्रेसी सरकार में मंत्री रहने के बाद नानाजी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। उसके बाद उन्होंने समाज सेवा शुरू कर दिया था। पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे नानाजी आजकल चित्रकूट में रह रहे थे।
मूलगामी दृष्टि - नानाजी देशमुख
नानाजी देशमुख
(ग्राम विकास के पुरोधा)
विभिन्न विवादा- स्पद विषयों पर भी गुरुजी सहज भाव से समाधान बता दिया करते थे। जब कभी कोई मार्ग नहीं सूझता था, गुरुजी का मार्गदर्शन काम आता था।
बात उस समय की है, जब पंजाब में भाषा विवाद खड़ा हुआ था। संयोग से दीनदयाल जी की और मेरी नागपुर में गुरुजी से भेंट हुई। कई स्थानीय कार्यकर्ता भी थे। गुरुजी बोले - 'अरे भाई क्या चल रहा है पंजाब में? तुम्हारे नेता लोग क्या कह रहे हैं पंजाबी भाषा के बारे में?'
स्पष्ट विचार
हममे से काई कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद गुरुजी स्वयं बोले - 'क्या राजनीति में काम करने वालों का दृष्टिकोण सीमित (दलगत) हो जाता है? वह (दृष्टिकोण) व्यापक नहीं रह पाता? हिन्दी राष्ट्रभाषा है, स्वाभाविक रूप से उसके प्रति मोह, उसके विकास के लिए प्रयत्न होना चाहिए। लेकिन पंजाबी भाषा क्या विदेशी भाषा है? क्या वह सांप्रदायिक भाषा है? पंजाबी भाषा एक क्षेत्रीय भाषा है और हमारी अपनी भाषा है। उसका अभिमान होना चाहिए न कि उसका उपहास। यह सिर्फ केशधारियों की भाषा नहीं है। यह कहना भी गलत है कि यह सिर्फ नानकपंथियों की भाषा है। 'गुरुग्रंथ साहब' आदि धार्मिक ग्रंथों में क्या केवल पंजाबी भाषा है? अनेक भाषाएँ मिलती हैं। उन्हें किसी भाषा से नफरत नहीं थी। किसी और को भी उनकी भाषा से नफरत नहीं होनी चाहिए।' कितना स्पष्ट विचार था!'
श्रीगुरुजी द्वारा किया जाने वाला समस्या का विश्लेषण और निदान सत्य की कसौटी पर भी खरा उतरता था। आंध्र विवाद जब शुरू हुआ तो हमारे लोगों ने वहाँ एक अध्ययन दल भेजा। गुरुजी उन दिनों इंदौर में विश्राम कर रहे थे। मैं भी संयोग से इंदौर में था। उनसे भेंट हुई तब वे बोले - 'तुम्हारा अध्ययन दल वहाँ क्या कर रह है? आंध्र और तेलंगाना के अलग होने से कोई कठिनाई नहीं आयेगी? इससे राष्ट्रीय एकता खंडित नहीं होगी? लोगों को सुविधा हो, आर्थिक विकास में पोषण हो और प्रशासनिक दृष्टि से सुविधाजनक हो तो आवश्यकतानुसार प्रान्तों की पुनर्रचना राष्ट्रीय एकात्मता के लिए भी आवश्यक रहती है। इसमें अध्ययन करने का क्या प्रश्न है? यह तो स्वयं स्पष्ट हैं। आंध्र-तेलंगाना के प्रश्न को विवादास्पद बनाकर लोगों में असंतोष व हिंसक वृत्ति को बल मिले, ऐसी हठवादिता का क्या अर्थ है?
गुरुजी के सान्निध्य में जो भी आता था, गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।
डा. सम्पूर्णानन्द का आकलन
बात शायद सन् 1946 या 1947 की है। काशी के डी.ए.वी. कालेज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शिक्षण शिविर लगा था। स्व. डा. सम्पूर्णानंद जी से मेरे बहुत पहले से संबंध थे। वे इस शिविर के समापन समारोह में पधारे थे। गुरुजी भी थे। उस समय उनसे (डा. संपूर्णानंद से) बातचीत नहीं हो सकी, पर बाद में उनसे मिलने का संयोग हुआ तो वे बोले - 'हम तुम्हारे संघ को देख आए हैं।'
मैंने कहा - 'मैं भी वहाँ था।'
वे बोले - 'हाँ, तुम उस दिन मिलिट्री कमाण्डर जैसे लग रहे थे।'
मैंने पूछा - 'क्या आपको हमारे कमांडर बनने में कुछ एतराज है?'
उन्होंने जवाब दिया - 'नहीं भाई, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो कह रहा था कि तुम्हारे यहाँ बड़ा गजब का अनुशासन है। इस संगठन के पीछे जो तुम्हारे गुरुजी हैं, उनका बड़ा विशिष्ट व्यक्तित्व है, बहुत ही गतिशील और प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व है। मतभेद की बात दिखने के बाद भी उनसे विवाद करने की इच्छा नहीं होती। उनसे मिलकर एक आश्चर्य की बात अनुभव हुई कि विवादास्पद विषय का पूर्ण अनुमान कर गुरुजी ऐसा मत प्रकट करते थे कि सामने बैठे व्यक्तियों को एक नये ढंग से सोचने के लिए प्रेरणा मिल जाती है।'
मैंने पूछा - 'बाबूजी, आपने यह सब कहा तो सही, पर बात क्या हुई?'
वे बोले - 'खैर छोड़ो, तुम्हारे गुरुजी के बारे में मेरी ऐसी धारणा बन गई है। सही या गलत मैं नहीं जानता, यह तुम जानो।'
श्री श्रीप्रकाश के विचार
गुरुजी के सान्निध्य में ही नहीं उनके विचारों और भाषणों से भी अनेक विद्वान और नेता अभिभूत हुए हैं। श्री श्रीप्रकाश जी का संस्मरण समीचीन रहेगा।
महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से निवृत्त होकर श्रीप्रकाश जी देहरादून में एक कुटिया बनाकर रह रहे थे। उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया। बाद में पता चला कि डा. सम्पूर्णानंद ने उन्हें लिखा था कि तुम नाना जी को मिलो। गुरुजी की 'बंच ऑफ थॉट्स' पुस्तक को अवश्य पढ़ो। डा. सम्पूर्णानंद जी ने ही मेरा परिचय श्रीप्रकाश जी से कराया था। उनकी इच्छा देख मैंने 'बंच ऑफ थॉट्स' उन्हें भी भेज दी।
जब मेरा श्री श्रीप्रकाश से साक्षात्कार हुआ तो वे बोले: 'मैं गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित अवश्य था, किन्तु उनका व्यक्तित्व इतना सर्वव्यापी है, इसकी मुझे कल्पना नहीं थी। हो सकता है, कुछ मामलों में मतभेद हो, पर उनका चिंतन बड़ा मौलिक और जड़ को छूने वाला है। इसका आप लोग व्यापक प्रचार क्यों नहीं करते? कई चीजें तो ऐसी हैं, जिनको व्यवहार में लाया जाये तो हिन्दुस्थान की सब समस्याएँ हल हो जाएँगी। मैं नहीं समझता था कि तुम्हारे गुरुजी धर्म परिवर्तन किए बिना मुसलमान और ईसाइयों को राष्ट्रजीवन का अंग मानने के लिए तैयार हो सकते हैं। गुरुजी के सारे विचार देखकर लगता है कि यदि मुसलमानों ने थोड़ा-सा भी दृष्टिकोण में परिवर्तन किया और हिन्दुस्थान की गौरवमयी राष्ट्रीय परम्परा का अभिमान रखा, तो तुम्हारे गुरुजी को उन्हें राष्ट्रीय एकात्मता के अंग मानने में कोई एतराज नहीं होगा। यह एक बहुत बड़ी बात मैं गुरुजी की समझ पाया हूँ। गुरुजी के उस विचार से मतभेद नहीं रखा जा सकता। मेरे मन में उनके प्रति आदर बढ़ गया है।'
दीनदयाल जी के प्रति स्नेह-विश्वास
दीनदयाल जी के प्रति गुरुजी के मन में बड़ा स्थान था, बड़ा स्नेह और अटूट विश्वास।
बात उस समय की है जब कालीकट के अधिवेशन के पूर्व दीनदयाल जी जनसंघ के अधयक्ष निर्वाचित हुए। कालीकट के अधिवेशन के बाद हम लोग कार से बंगलौर होते हुए डोंडबल्लापुर पहुँचे। वहाँ संघ कार्यकर्ताओं का एक वर्ग लग रहा था। गुरुजी संघ कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन दे रहे थे।
नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के परभानी जिले के कदोली नामक छोटे से कस्बे में सन् १९११ में हुआ था। नानाजी का बचपन अभावों में बीता। उनके पास शुल्क देने और पुस्तकें खरीदने के लिये पैसे नहीं थे किन्तु उनके अन्दर शिक्षा और ज्ञानप्राप्ति की उत्कट अभिलाषा थी। अत: इस कार्य के लिये उन्होने शब्जी बेचकर पैसे की व्यवस्था की। उनका निधन चित्रकूट में २७ फरवरी २०१० को हो गया।
कार में दीनदयाल जी, सुन्दरसिंह जी भण्डारी, जगन्नाथराव जी जोशी भी थे। हम लोगों को देखते ही गुरुजी बोले - 'तुम सब नेता लोग यहाँ कहाँ आ गए?'
भोजन, विश्राम के बाद गुरुजी के साथ चाय के लिए बैठे। गुरुजी का बौध्दिक होने वाला था। चाय के समय गुरुजी बोले - 'आज दीनदयाल बोलेगा।' हम सब आश्चर्यचकित रह गए। किसी ने कहा कि वर्ग में सभी लोग आपसे मार्गदर्शन पाने के लिए एकत्रित हुए हैं। सभी कार्यक्रम आप ही को लेने हैं।
गुरुजी बोले - 'नहीं भाई, दीनदयाल ही बोलेगा।' फिर किसी ने कहा, 'गुरुजी वे तो जनसंघ के अध्यक्ष हैं।' गुरुजी ने तत्काल उत्तर दिया - 'नहीं, दीनदयाल स्वयंसेवक है। स्वयंसेवक के नाते बोलेगा, जनसंघ अध्यक्ष के रूप में नहीं।' और वस्तुत: दीनदयाल जी का जब बौध्दिक हुआ, तो गुरुजी ने भी बहुत सराहा।
प्रसिद्ध समाजसेवी नानाजी देशमुख नहीं रहे
नई दिल्ली। प्रसिद्ध समाजसेवी और भारतीय जन संघ के पूर्व नेता नानाजी देशमुख का आज दिल का दौरा पड़ने के कारण निधन हो गया। नानाजी 94 वर्ष के थे। वे दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे तथा समाजसेवा, विशेषकर चित्रकूट क्षेत्र में रेन वाटर हार्वेस्टिंग के लिए काम करने के लिए उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया
नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के परभनी जिले में हुआ था। नानाजी देशमुख एक समाजसेवक होने के साथ-साथ भारतीय राजनीति में भी रहे तथा राज्यसभा सांसद के रूप में काम किया। जनसंघ की स्थापना और इसके बाद गठबंधन की राजनीति के सूत्रपात में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
मूलत: राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के प्रचारक रहे देशमुख ने चित्रकूट में खासा काम किया। पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी उनसे खासे प्रभावित रहे हैं। जब वाजपेयी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा था तो देशमुख ही उनके मार्गदर्शक की भूमिका में रहे। चित्रकूट में समाजसेवा के रूप में उनके किए कार्यों की पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी तारीफ की थी।
प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख का यहाँ लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 97 वर्ष के थे। उनके परिवार के सदस्यों के अनुसार उनका निधन शाम यहाँ एक अस्पताल में हुआ।
नानाजी देशमुख दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे तथा समाजसेवा विशेषकर चित्रकूट क्षेत्र में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के लिए काम करने के लिए उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया था। वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
नानाजी अटल बिहारी वाजपेयी समेत सभी भाजपा के बड़े नेताओं के पथप्रदर्शक रहे। उन्होंने चित्रकूट में जो कार्य किया, उसकी प्रशंसा पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम आजाद ने भी की थी। कलाम ने कहा था कि नानाजी ने कभी सत्ता की राजनीति नहीं की।
महाराष्ट्र में जन्में नानाजी देशमुख ने सादगी और ईमानदारी की मिसाल पेश की। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सबसे वृद्ध प्रचारक नानाजी की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कितनी आस्था दृढ़ थी, इसकी मिसाल 2000 में उस वक्त देखने को मिली जब वे व्हीलचेयर पर बैठकर मतदान करने पहुँचे।
नानाजी की भारतीय लोकतंत्र में गहरी आस्था थी और वे कहते थे कि देश के हर नागरिक को मतदान का उपयोग करके अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। यही कारण था कि चलने-फिरने में लाचार होने के बावजूद उन्होंने मतदान में हिस्सा लिया था। (वेबदुनिया/वार्ता)
1975 में गठित गैरकांग्रेसी सरकार में मंत्री रहने के बाद नानाजी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। उसके बाद उन्होंने समाज सेवा शुरू कर दिया था। पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे नानाजी आजकल चित्रकूट में रह रहे थे।
मूलगामी दृष्टि - नानाजी देशमुख
नानाजी देशमुख
(ग्राम विकास के पुरोधा)
विभिन्न विवादा- स्पद विषयों पर भी गुरुजी सहज भाव से समाधान बता दिया करते थे। जब कभी कोई मार्ग नहीं सूझता था, गुरुजी का मार्गदर्शन काम आता था।
बात उस समय की है, जब पंजाब में भाषा विवाद खड़ा हुआ था। संयोग से दीनदयाल जी की और मेरी नागपुर में गुरुजी से भेंट हुई। कई स्थानीय कार्यकर्ता भी थे। गुरुजी बोले - 'अरे भाई क्या चल रहा है पंजाब में? तुम्हारे नेता लोग क्या कह रहे हैं पंजाबी भाषा के बारे में?'
स्पष्ट विचार
हममे से काई कुछ नहीं बोला। कुछ देर बाद गुरुजी स्वयं बोले - 'क्या राजनीति में काम करने वालों का दृष्टिकोण सीमित (दलगत) हो जाता है? वह (दृष्टिकोण) व्यापक नहीं रह पाता? हिन्दी राष्ट्रभाषा है, स्वाभाविक रूप से उसके प्रति मोह, उसके विकास के लिए प्रयत्न होना चाहिए। लेकिन पंजाबी भाषा क्या विदेशी भाषा है? क्या वह सांप्रदायिक भाषा है? पंजाबी भाषा एक क्षेत्रीय भाषा है और हमारी अपनी भाषा है। उसका अभिमान होना चाहिए न कि उसका उपहास। यह सिर्फ केशधारियों की भाषा नहीं है। यह कहना भी गलत है कि यह सिर्फ नानकपंथियों की भाषा है। 'गुरुग्रंथ साहब' आदि धार्मिक ग्रंथों में क्या केवल पंजाबी भाषा है? अनेक भाषाएँ मिलती हैं। उन्हें किसी भाषा से नफरत नहीं थी। किसी और को भी उनकी भाषा से नफरत नहीं होनी चाहिए।' कितना स्पष्ट विचार था!'
श्रीगुरुजी द्वारा किया जाने वाला समस्या का विश्लेषण और निदान सत्य की कसौटी पर भी खरा उतरता था। आंध्र विवाद जब शुरू हुआ तो हमारे लोगों ने वहाँ एक अध्ययन दल भेजा। गुरुजी उन दिनों इंदौर में विश्राम कर रहे थे। मैं भी संयोग से इंदौर में था। उनसे भेंट हुई तब वे बोले - 'तुम्हारा अध्ययन दल वहाँ क्या कर रह है? आंध्र और तेलंगाना के अलग होने से कोई कठिनाई नहीं आयेगी? इससे राष्ट्रीय एकता खंडित नहीं होगी? लोगों को सुविधा हो, आर्थिक विकास में पोषण हो और प्रशासनिक दृष्टि से सुविधाजनक हो तो आवश्यकतानुसार प्रान्तों की पुनर्रचना राष्ट्रीय एकात्मता के लिए भी आवश्यक रहती है। इसमें अध्ययन करने का क्या प्रश्न है? यह तो स्वयं स्पष्ट हैं। आंध्र-तेलंगाना के प्रश्न को विवादास्पद बनाकर लोगों में असंतोष व हिंसक वृत्ति को बल मिले, ऐसी हठवादिता का क्या अर्थ है?
गुरुजी के सान्निध्य में जो भी आता था, गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।
डा. सम्पूर्णानन्द का आकलन
बात शायद सन् 1946 या 1947 की है। काशी के डी.ए.वी. कालेज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शिक्षण शिविर लगा था। स्व. डा. सम्पूर्णानंद जी से मेरे बहुत पहले से संबंध थे। वे इस शिविर के समापन समारोह में पधारे थे। गुरुजी भी थे। उस समय उनसे (डा. संपूर्णानंद से) बातचीत नहीं हो सकी, पर बाद में उनसे मिलने का संयोग हुआ तो वे बोले - 'हम तुम्हारे संघ को देख आए हैं।'
मैंने कहा - 'मैं भी वहाँ था।'
वे बोले - 'हाँ, तुम उस दिन मिलिट्री कमाण्डर जैसे लग रहे थे।'
मैंने पूछा - 'क्या आपको हमारे कमांडर बनने में कुछ एतराज है?'
उन्होंने जवाब दिया - 'नहीं भाई, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं तो कह रहा था कि तुम्हारे यहाँ बड़ा गजब का अनुशासन है। इस संगठन के पीछे जो तुम्हारे गुरुजी हैं, उनका बड़ा विशिष्ट व्यक्तित्व है, बहुत ही गतिशील और प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व है। मतभेद की बात दिखने के बाद भी उनसे विवाद करने की इच्छा नहीं होती। उनसे मिलकर एक आश्चर्य की बात अनुभव हुई कि विवादास्पद विषय का पूर्ण अनुमान कर गुरुजी ऐसा मत प्रकट करते थे कि सामने बैठे व्यक्तियों को एक नये ढंग से सोचने के लिए प्रेरणा मिल जाती है।'
मैंने पूछा - 'बाबूजी, आपने यह सब कहा तो सही, पर बात क्या हुई?'
वे बोले - 'खैर छोड़ो, तुम्हारे गुरुजी के बारे में मेरी ऐसी धारणा बन गई है। सही या गलत मैं नहीं जानता, यह तुम जानो।'
श्री श्रीप्रकाश के विचार
गुरुजी के सान्निध्य में ही नहीं उनके विचारों और भाषणों से भी अनेक विद्वान और नेता अभिभूत हुए हैं। श्री श्रीप्रकाश जी का संस्मरण समीचीन रहेगा।
महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से निवृत्त होकर श्रीप्रकाश जी देहरादून में एक कुटिया बनाकर रह रहे थे। उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया। बाद में पता चला कि डा. सम्पूर्णानंद ने उन्हें लिखा था कि तुम नाना जी को मिलो। गुरुजी की 'बंच ऑफ थॉट्स' पुस्तक को अवश्य पढ़ो। डा. सम्पूर्णानंद जी ने ही मेरा परिचय श्रीप्रकाश जी से कराया था। उनकी इच्छा देख मैंने 'बंच ऑफ थॉट्स' उन्हें भी भेज दी।
जब मेरा श्री श्रीप्रकाश से साक्षात्कार हुआ तो वे बोले: 'मैं गुरुजी के व्यक्तित्व से प्रभावित अवश्य था, किन्तु उनका व्यक्तित्व इतना सर्वव्यापी है, इसकी मुझे कल्पना नहीं थी। हो सकता है, कुछ मामलों में मतभेद हो, पर उनका चिंतन बड़ा मौलिक और जड़ को छूने वाला है। इसका आप लोग व्यापक प्रचार क्यों नहीं करते? कई चीजें तो ऐसी हैं, जिनको व्यवहार में लाया जाये तो हिन्दुस्थान की सब समस्याएँ हल हो जाएँगी। मैं नहीं समझता था कि तुम्हारे गुरुजी धर्म परिवर्तन किए बिना मुसलमान और ईसाइयों को राष्ट्रजीवन का अंग मानने के लिए तैयार हो सकते हैं। गुरुजी के सारे विचार देखकर लगता है कि यदि मुसलमानों ने थोड़ा-सा भी दृष्टिकोण में परिवर्तन किया और हिन्दुस्थान की गौरवमयी राष्ट्रीय परम्परा का अभिमान रखा, तो तुम्हारे गुरुजी को उन्हें राष्ट्रीय एकात्मता के अंग मानने में कोई एतराज नहीं होगा। यह एक बहुत बड़ी बात मैं गुरुजी की समझ पाया हूँ। गुरुजी के उस विचार से मतभेद नहीं रखा जा सकता। मेरे मन में उनके प्रति आदर बढ़ गया है।'
दीनदयाल जी के प्रति स्नेह-विश्वास
दीनदयाल जी के प्रति गुरुजी के मन में बड़ा स्थान था, बड़ा स्नेह और अटूट विश्वास।
बात उस समय की है जब कालीकट के अधिवेशन के पूर्व दीनदयाल जी जनसंघ के अधयक्ष निर्वाचित हुए। कालीकट के अधिवेशन के बाद हम लोग कार से बंगलौर होते हुए डोंडबल्लापुर पहुँचे। वहाँ संघ कार्यकर्ताओं का एक वर्ग लग रहा था। गुरुजी संघ कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन दे रहे थे।
नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के परभानी जिले के कदोली नामक छोटे से कस्बे में सन् १९११ में हुआ था। नानाजी का बचपन अभावों में बीता। उनके पास शुल्क देने और पुस्तकें खरीदने के लिये पैसे नहीं थे किन्तु उनके अन्दर शिक्षा और ज्ञानप्राप्ति की उत्कट अभिलाषा थी। अत: इस कार्य के लिये उन्होने शब्जी बेचकर पैसे की व्यवस्था की। उनका निधन चित्रकूट में २७ फरवरी २०१० को हो गया।
कार में दीनदयाल जी, सुन्दरसिंह जी भण्डारी, जगन्नाथराव जी जोशी भी थे। हम लोगों को देखते ही गुरुजी बोले - 'तुम सब नेता लोग यहाँ कहाँ आ गए?'
भोजन, विश्राम के बाद गुरुजी के साथ चाय के लिए बैठे। गुरुजी का बौध्दिक होने वाला था। चाय के समय गुरुजी बोले - 'आज दीनदयाल बोलेगा।' हम सब आश्चर्यचकित रह गए। किसी ने कहा कि वर्ग में सभी लोग आपसे मार्गदर्शन पाने के लिए एकत्रित हुए हैं। सभी कार्यक्रम आप ही को लेने हैं।
गुरुजी बोले - 'नहीं भाई, दीनदयाल ही बोलेगा।' फिर किसी ने कहा, 'गुरुजी वे तो जनसंघ के अध्यक्ष हैं।' गुरुजी ने तत्काल उत्तर दिया - 'नहीं, दीनदयाल स्वयंसेवक है। स्वयंसेवक के नाते बोलेगा, जनसंघ अध्यक्ष के रूप में नहीं।' और वस्तुत: दीनदयाल जी का जब बौध्दिक हुआ, तो गुरुजी ने भी बहुत सराहा।
प्रसिद्ध समाजसेवी नानाजी देशमुख नहीं रहे
नई दिल्ली। प्रसिद्ध समाजसेवी और भारतीय जन संघ के पूर्व नेता नानाजी देशमुख का आज दिल का दौरा पड़ने के कारण निधन हो गया। नानाजी 94 वर्ष के थे। वे दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे तथा समाजसेवा, विशेषकर चित्रकूट क्षेत्र में रेन वाटर हार्वेस्टिंग के लिए काम करने के लिए उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया
नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के परभनी जिले में हुआ था। नानाजी देशमुख एक समाजसेवक होने के साथ-साथ भारतीय राजनीति में भी रहे तथा राज्यसभा सांसद के रूप में काम किया। जनसंघ की स्थापना और इसके बाद गठबंधन की राजनीति के सूत्रपात में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
मूलत: राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के प्रचारक रहे देशमुख ने चित्रकूट में खासा काम किया। पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी उनसे खासे प्रभावित रहे हैं। जब वाजपेयी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा था तो देशमुख ही उनके मार्गदर्शक की भूमिका में रहे। चित्रकूट में समाजसेवा के रूप में उनके किए कार्यों की पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी तारीफ की थी।
प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख का यहाँ लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 97 वर्ष के थे। उनके परिवार के सदस्यों के अनुसार उनका निधन शाम यहाँ एक अस्पताल में हुआ।
नानाजी देशमुख दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे तथा समाजसेवा विशेषकर चित्रकूट क्षेत्र में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के लिए काम करने के लिए उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया था। वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
नानाजी अटल बिहारी वाजपेयी समेत सभी भाजपा के बड़े नेताओं के पथप्रदर्शक रहे। उन्होंने चित्रकूट में जो कार्य किया, उसकी प्रशंसा पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम आजाद ने भी की थी। कलाम ने कहा था कि नानाजी ने कभी सत्ता की राजनीति नहीं की।
महाराष्ट्र में जन्में नानाजी देशमुख ने सादगी और ईमानदारी की मिसाल पेश की। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सबसे वृद्ध प्रचारक नानाजी की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कितनी आस्था दृढ़ थी, इसकी मिसाल 2000 में उस वक्त देखने को मिली जब वे व्हीलचेयर पर बैठकर मतदान करने पहुँचे।
नानाजी की भारतीय लोकतंत्र में गहरी आस्था थी और वे कहते थे कि देश के हर नागरिक को मतदान का उपयोग करके अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। यही कारण था कि चलने-फिरने में लाचार होने के बावजूद उन्होंने मतदान में हिस्सा लिया था। (वेबदुनिया/वार्ता)
सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत भोपाल में
सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम में शामिल हुए
भोपाल 26 फरवरी। अपने तीन दिवसीय प्रवास पर 26 फरवरी को सांय 7ः25 बजे मुंबई से भोपाल पधार रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत शनिवार, 27 फरवरी को सुबह 10ः00 बजे सामाजिक सद्भावना बैठक में भाग लेंगे। सद्भावना बैठक को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी संबोधित करेंगे। बैठक का आयोजन शहीद भवन, विधायक विश्राम गृह के पास, मालवीय नगर, में किया गया है। बैठक में 100 से अधिक विभिन्न जाति, धर्म, संप्र्रदाय के भोपाल जिले के पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे। हिन्दू समागम आयोजन समिति के महासचिव श्री दीपक शर्मा ने बताया कि सरसंघचालक श्री मोहनजी भागवत रविवार, 28 फरवरी को सांय 4 बजे लाल परेड मैदान में होने जा रहे हिन्दू समागम को संबोधित करेंगे। इस दौरान उनके साथ अखिल भारतीय सह शारीरिक प्रमुख श्री अनिल ओक, अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख श्री हस्तीमलजी, क्षेत्र संघचालक श्रीकृष्ण माहेश्वरी सहित समिति व संघ के पदाधिकारी भी उपस्थित रहेंगे।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक कांतिलाल चतर ने बताया कि हिन्दू समागम के लिये भोपाल महानगर के 40 हजार परिवारों से सीधा संपर्क किया जा चुका है। विभिन्न समूह बनाकर सामाजिक व धासद्भावना समाज और राष्ट्र को विकसित और सुरक्षित करने का आधार है ः परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत
भोपाल 27 फरवरी। समाज में सुधार, विकास, सेवा का कार्य करते हुए अपने कार्य में अन्य समाज के लोगों को बुलाने से समाज में सामाजिक सद्भाव उत्पन्न किया जा सकता है। समाज को विकसित और सुरक्षित रखने के लिये एक रहना आवश्यक है। सद्भावना समाज और राष्ट्र को विकसित और सुरक्षित करने का आधार है। मनुष्य को आपस में भेदभाव नहीं करनी चाहिये। उक्त बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी ने आज यहां सामाजिक सद्भावना बैठक में प्रस्ताविक उद्बोधन देते हुए कही। यह उनकी 24वीं बैठक थी इसके पूर्व 23 प्रांतों के प्रांतीय मुख्यालयों इसी तरह की बैठकों को सम्बोधित कर चुके हैं। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र संचालक श्री श्रीकृष्ण माहेश्वरी, क्षेत्रीय प्रचारक विनोद कुमार, मध्य भारत प्रांत के संघचालक श्री शशिभाई सेठ, विभाग संघचालक श्री कांतिलाल चतर, हिन्दू समागम आयोजन समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आर.डी. शुक्ला, महासचिव दीपक शर्मा सहित हिन्दू समाज के संत, धर्माचार्य तथा 100 से अधिक सामाजिक संगठनों के सैकड़ों पदाधिकारी व प्रतिनिधि उपस्थित थे।
प.पू. सरसंघचालक श्री भागवतजी ने सामाजिक समरसता के लिये दलितों, पिछड़ों, उपेक्षितों, अनुसूचित जाति@जनजाति की उपेक्षा नहीं करने, उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने तथा उनके दुःख में शामिल होते हुए उन्हें समाज में यथोचित सम्मान और सत्कार दिये जाने की अपील की।
डॉ. भागवतजी ने कहा कि भारत आक्रमणग्रस्त है। यदि हिन्दू समाज एकजुट होकर खड़ा हो जाता है तो भविष्य में भारत किसी भी आक्रमण को सहन कर सकता है। इनसे भली-भांति परिचित विदेशी ताकतें अपने स्वार्थ और एकाधिकार के चलते हिन्दू समाज को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं जो कदापि नहीं होने दिया जायेगा। इसके लिए उन्होंने हिन्दू समाज को एकजुट होने का आव्हान किया।
श्री भागवतजी ने प्रांत स्तर पर वर्ष में दो बार सामाजिक सद्भावना बैठक करने और उसे विकासखण्ड स्तर से नीचे गांवों तक ले जाने की बात पर जोर दिया।
कार्यक्रम में समाज के विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों ने सामाजिक कार्यों के बारे में जानकारी दी और समाज को एकजुट रखने के लिये सुझाव भी दिये।
प्रारंभ में आमंत्रित संतों, धर्माचार्यों को श्री कांतिलालजी चतर द्वारा तिलक लगाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का समापन वंदेमातरम् गीत से किया गया जिसे बालिका पूर्वी सप्रे ने प्रस्तुत किया। संचालन सोमकांत उमालकर ने किया।
र्मिक संगठनों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, सीए, शिक्षकों, प्रोफेसरों, पत्रकारों, लेखकों, रंगकर्मियों, विद्यार्थियों आदि से सम्पर्क किया जा चुका है। हिन्दू समागम में नारी शक्ति की विशेष सहभागिता दिखाई दें इसके लिये सभी क्षेत्रों में कार्यरत् बहिनों से सम्पर्क हेतु अब तक महिलाओं की 50 बैठकें की जा चुकी हैं।
सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम में शामिल हुए
भोपाल 26 फरवरी। अपने तीन दिवसीय प्रवास पर 26 फरवरी को सांय 7ः25 बजे मुंबई से भोपाल पधार रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत शनिवार, 27 फरवरी को सुबह 10ः00 बजे सामाजिक सद्भावना बैठक में भाग लेंगे। सद्भावना बैठक को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी संबोधित करेंगे। बैठक का आयोजन शहीद भवन, विधायक विश्राम गृह के पास, मालवीय नगर, में किया गया है। बैठक में 100 से अधिक विभिन्न जाति, धर्म, संप्र्रदाय के भोपाल जिले के पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे। हिन्दू समागम आयोजन समिति के महासचिव श्री दीपक शर्मा ने बताया कि सरसंघचालक श्री मोहनजी भागवत रविवार, 28 फरवरी को सांय 4 बजे लाल परेड मैदान में होने जा रहे हिन्दू समागम को संबोधित करेंगे। इस दौरान उनके साथ अखिल भारतीय सह शारीरिक प्रमुख श्री अनिल ओक, अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख श्री हस्तीमलजी, क्षेत्र संघचालक श्रीकृष्ण माहेश्वरी सहित समिति व संघ के पदाधिकारी भी उपस्थित रहेंगे।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक कांतिलाल चतर ने बताया कि हिन्दू समागम के लिये भोपाल महानगर के 40 हजार परिवारों से सीधा संपर्क किया जा चुका है। विभिन्न समूह बनाकर सामाजिक व धासद्भावना समाज और राष्ट्र को विकसित और सुरक्षित करने का आधार है ः परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत
भोपाल 27 फरवरी। समाज में सुधार, विकास, सेवा का कार्य करते हुए अपने कार्य में अन्य समाज के लोगों को बुलाने से समाज में सामाजिक सद्भाव उत्पन्न किया जा सकता है। समाज को विकसित और सुरक्षित रखने के लिये एक रहना आवश्यक है। सद्भावना समाज और राष्ट्र को विकसित और सुरक्षित करने का आधार है। मनुष्य को आपस में भेदभाव नहीं करनी चाहिये। उक्त बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी ने आज यहां सामाजिक सद्भावना बैठक में प्रस्ताविक उद्बोधन देते हुए कही। यह उनकी 24वीं बैठक थी इसके पूर्व 23 प्रांतों के प्रांतीय मुख्यालयों इसी तरह की बैठकों को सम्बोधित कर चुके हैं। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र संचालक श्री श्रीकृष्ण माहेश्वरी, क्षेत्रीय प्रचारक विनोद कुमार, मध्य भारत प्रांत के संघचालक श्री शशिभाई सेठ, विभाग संघचालक श्री कांतिलाल चतर, हिन्दू समागम आयोजन समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति आर.डी. शुक्ला, महासचिव दीपक शर्मा सहित हिन्दू समाज के संत, धर्माचार्य तथा 100 से अधिक सामाजिक संगठनों के सैकड़ों पदाधिकारी व प्रतिनिधि उपस्थित थे।
प.पू. सरसंघचालक श्री भागवतजी ने सामाजिक समरसता के लिये दलितों, पिछड़ों, उपेक्षितों, अनुसूचित जाति@जनजाति की उपेक्षा नहीं करने, उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने तथा उनके दुःख में शामिल होते हुए उन्हें समाज में यथोचित सम्मान और सत्कार दिये जाने की अपील की।
डॉ. भागवतजी ने कहा कि भारत आक्रमणग्रस्त है। यदि हिन्दू समाज एकजुट होकर खड़ा हो जाता है तो भविष्य में भारत किसी भी आक्रमण को सहन कर सकता है। इनसे भली-भांति परिचित विदेशी ताकतें अपने स्वार्थ और एकाधिकार के चलते हिन्दू समाज को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं जो कदापि नहीं होने दिया जायेगा। इसके लिए उन्होंने हिन्दू समाज को एकजुट होने का आव्हान किया।
श्री भागवतजी ने प्रांत स्तर पर वर्ष में दो बार सामाजिक सद्भावना बैठक करने और उसे विकासखण्ड स्तर से नीचे गांवों तक ले जाने की बात पर जोर दिया।
कार्यक्रम में समाज के विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों ने सामाजिक कार्यों के बारे में जानकारी दी और समाज को एकजुट रखने के लिये सुझाव भी दिये।
प्रारंभ में आमंत्रित संतों, धर्माचार्यों को श्री कांतिलालजी चतर द्वारा तिलक लगाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का समापन वंदेमातरम् गीत से किया गया जिसे बालिका पूर्वी सप्रे ने प्रस्तुत किया। संचालन सोमकांत उमालकर ने किया।
र्मिक संगठनों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, सीए, शिक्षकों, प्रोफेसरों, पत्रकारों, लेखकों, रंगकर्मियों, विद्यार्थियों आदि से सम्पर्क किया जा चुका है। हिन्दू समागम में नारी शक्ति की विशेष सहभागिता दिखाई दें इसके लिये सभी क्षेत्रों में कार्यरत् बहिनों से सम्पर्क हेतु अब तक महिलाओं की 50 बैठकें की जा चुकी हैं।
सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम में शामिल हुए
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत भोपाल में
सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम में शामिल हुए
भोपाल 26 फरवरी। अपने तीन दिवसीय प्रवास पर 26 फरवरी को सांय 7ः25 बजे मुंबई से भोपाल पधार रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत शनिवार, 27 फरवरी को सुबह 10ः00 बजे सामाजिक सद्भावना बैठक में भाग लेंगे। सद्भावना बैठक को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी संबोधित करेंगे। बैठक का आयोजन शहीद भवन, विधायक विश्राम गृह के पास, मालवीय नगर, में किया गया है। बैठक में 100 से अधिक विभिन्न जाति, धर्म, संप्र्रदाय के भोपाल जिले के पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे। हिन्दू समागम आयोजन समिति के महासचिव श्री दीपक शर्मा ने बताया कि सरसंघचालक श्री मोहनजी भागवत रविवार, 28 फरवरी को सांय 4 बजे लाल परेड मैदान में होने जा रहे हिन्दू समागम को संबोधित करेंगे। इस दौरान उनके साथ अखिल भारतीय सह शारीरिक प्रमुख श्री अनिल ओक, अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख श्री हस्तीमलजी, क्षेत्र संघचालक श्रीकृष्ण माहेश्वरी सहित समिति व संघ के पदाधिकारी भी उपस्थित रहेंगे।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक कांतिलाल चतर ने बताया कि हिन्दू समागम के लिये भोपाल महानगर के 40 हजार परिवारों से सीधा संपर्क किया जा चुका है। विभिन्न समूह बनाकर सामाजिक व धार्मिक संगठनों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, सीए, शिक्षकों, प्रोफेसरों, पत्रकारों, लेखकों, रंगकर्मियों, विद्यार्थियों आदि से सम्पर्क किया जा चुका है। हिन्दू समागम में नारी शक्ति की विशेष सहभागिता दिखाई दें इसके लिये सभी क्षेत्रों में कार्यरत् बहिनों से सम्पर्क हेतु अब तक महिलाओं की 50 बैठकें की जा चुकी हैं।
सद्भावना बैठक और हिन्दू समागम में शामिल हुए
भोपाल 26 फरवरी। अपने तीन दिवसीय प्रवास पर 26 फरवरी को सांय 7ः25 बजे मुंबई से भोपाल पधार रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत शनिवार, 27 फरवरी को सुबह 10ः00 बजे सामाजिक सद्भावना बैठक में भाग लेंगे। सद्भावना बैठक को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी संबोधित करेंगे। बैठक का आयोजन शहीद भवन, विधायक विश्राम गृह के पास, मालवीय नगर, में किया गया है। बैठक में 100 से अधिक विभिन्न जाति, धर्म, संप्र्रदाय के भोपाल जिले के पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे। हिन्दू समागम आयोजन समिति के महासचिव श्री दीपक शर्मा ने बताया कि सरसंघचालक श्री मोहनजी भागवत रविवार, 28 फरवरी को सांय 4 बजे लाल परेड मैदान में होने जा रहे हिन्दू समागम को संबोधित करेंगे। इस दौरान उनके साथ अखिल भारतीय सह शारीरिक प्रमुख श्री अनिल ओक, अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख श्री हस्तीमलजी, क्षेत्र संघचालक श्रीकृष्ण माहेश्वरी सहित समिति व संघ के पदाधिकारी भी उपस्थित रहेंगे।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक कांतिलाल चतर ने बताया कि हिन्दू समागम के लिये भोपाल महानगर के 40 हजार परिवारों से सीधा संपर्क किया जा चुका है। विभिन्न समूह बनाकर सामाजिक व धार्मिक संगठनों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, सीए, शिक्षकों, प्रोफेसरों, पत्रकारों, लेखकों, रंगकर्मियों, विद्यार्थियों आदि से सम्पर्क किया जा चुका है। हिन्दू समागम में नारी शक्ति की विशेष सहभागिता दिखाई दें इसके लिये सभी क्षेत्रों में कार्यरत् बहिनों से सम्पर्क हेतु अब तक महिलाओं की 50 बैठकें की जा चुकी हैं।
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
हिन्दू समागम को सफल बनाने में महिलाएं प्राणपण से जुटेंगी
राष्ट््रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के भोपाल आगमन पर 28 फरवरी को भोपाल में आयोजित किये जा रहे हिन्दू समागम की तैयारियंा जोर शोर से जारी हैं। कार्यक्रम की सफलता के लिए स्थान स्थान पर बैठकों के दौर शुरू हो गए हैं। इसी तारतम्य में विभिन्न समाजों की महिला पदाधिकारियों की एक बैठक आयोजित की गई जिसमें आयोजन समिति की सदस्य महापौर श्रीमती कृष्णा गौर ने कहा कि हिन्दू समागम भोपाल के इतिहास में एक यादगार कार्यक्रम होगा। श्रीमती गौर ने कहा कि महिलाएं परिवार की धुरी हैं और परिवार हिन्दू समाज का आधार है। इसीलिए इस आयोजन की सफलता में महिलाओं को बहुत महती भूमिका निभानी है। इस अवसर पर श्रीमती कृष्णा गौर ने कहा कि देश तीन चीजों से चलता है शक्ति बुद्धि और समृद्धि । और भारतीय चिंतन में इन तीनों शक्तियों की प्रतीक लक्ष्मी सरस्वती और दुर्गा ही हैं। उन्होंने कहा कि 28 फरवरी का हिन्दू समागम एक ऐसा अवसर है जब हिन्दू मातृशक्ति बडी संख्या में लाल परेड मैदान में एकत्रित हो कर अपने सामाजिक दायित्व को पूरा करने की दिशा में आगे बढ सकती है।
उन्होंने कहा कि जैसे महिलाओं का परिवार के प्रति दायित्व है वैसे ही उनका देश व समाज के प्रति भी एक दायित्व है और हिन्दू समागम इस दायित्व को निभाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। श्रीमती गौर ने महिलाओं से आव्हान किया कि 28 फरवरी को वे मातृशक्ति का भव्य स्वरूप उपस्थित करने मेे प्राणपण से जुट जाएं।
उन्होंने कहा कि जैसे महिलाओं का परिवार के प्रति दायित्व है वैसे ही उनका देश व समाज के प्रति भी एक दायित्व है और हिन्दू समागम इस दायित्व को निभाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। श्रीमती गौर ने महिलाओं से आव्हान किया कि 28 फरवरी को वे मातृशक्ति का भव्य स्वरूप उपस्थित करने मेे प्राणपण से जुट जाएं।
सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
न्यायमूर्ति आर डी शुक्ला हिन्दू समागम आयोजन समिति के नए अध्यक्ष होंगे
राष्ट््रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के भोपाल आगमन पर हिन्दू समागम आयोजित करने हेतु एक आयोजन समिति का गठन किया गया है जिसके अध्यक्ष पद पर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री एच एम जोशी का निर्वाचन किया गया था । श्री जोशी द्वारा निजी कारणों से अध्यक्ष के रूप में कार्य करने में असमर्थता व्यक्त किये जाने के उपरंात आयोजन समिति की कार्यकारिणी की बैठक में प्रदेश के पूर्व विधि सचिव एवं मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्री आर. डी शुक्ला का निर्वाचन किया गया है । श्री पी एल चतुर्वेदी ने श्री शुक्ल का नाम प्रस्तावित किया एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीपति खिरवडकर ने इसका समर्थन किया । इस मौके पर नवनियुक्त अध्यक्ष श्री शुक्ला ने सहर्ष यह दायित्व स्वीकार करते हुए हिन्दू समाज को जातिभेद से मुक्त और समरसता से युक्त बनाने की आवश्यकता प्रतिपादित की और यह विश्वास व्यक्त किया कि सभी के सहयोग से यह हिन्दू समागम एक सफल आयोजन सिद्ध होगा।
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
संघ की ओर समाज की नज़र
यह पुराना आलेख है। यह आलेख तब लिखा गया था जब श्री मोहनराव भागवत संघ के सरसंघचालक बने थे।
अनिल सौमित्र
नागपुर में संघ की बहुप्रतीक्षित प्रतिनिधि सभा की बैठक चल रही है। औपचारिक तौर पर यह बैठक 21 से 23 तक होगी। संघ की परंपरा और संविधान के मुताबिक प्रतिनिधि सभा की बैठक प्रतिवर्ष होती है। लेकिन इस साल की बैठक का विशेष महत्व इसलिए है कि यह वर्ष संघ का चुनावी वर्ष है। प्रत्येक तीन साल पर संघ में सरकार्यवाह का चुनाव होता है। पहले प्रांत और उसके नीचे की इकाइयों में संघचालक का चुनाव होता है, तत्पश्चात् विभिन्न इकाइयों के प्रतिनिधि अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में सरकार्यवाह का चुनाव करते हैं। इस वर्ष यह बैठक इसलिए भी विशेष चर्चा में है कि काफी समय पहले से ही सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन के पदमुक्त होने का अनुमान लगाया जा रहा था।
मीडिया और समाज का अनुमान सच सिद्ध हुआ। प्रतिनिधि सभा बैठक के दूसरे दिन 21 मार्च को श्री सुदर्शन जी ने अपने दायित्व से मुक्त होने का निर्णय करते हुए वर्तमान सरकार्यवाह श्री मोहनराव भागवत को सरसंघचालक नियुक्त करने की घोषणा कर दी। यह घोषणा देश-दुनिया के लिए बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय है। ऐसा होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के प्रमुख का मनोनयन और दूसरे सबसे बड़े पद का निर्वाचन हुआ है। लेकिन यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ही संभव है कि इतने विशाल संगठन के मुखिया और अन्य पदाधिकारियों का मनोनयन ओर निर्वाचन इतने सरल और सहज तरीके से हो पाता है।
श्री मोहनराव भागवत, संघ के छठे सरसंघचालक होंगे। संघ के पहले सरसंघचालक, संघ के संस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार हुए। इसके पश्चात् श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर (श्रीगुरूजी), श्री बालासाहब देवरस, प्रो. श्री राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) और श्री कृप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन सरसंघचालक बने। उल्लेखनीय है कि 1939 डाॅ. हेडगेवार के जीवन काल में सिंदी संघ के शिविर में ही कार्यकर्ता जान चुके थे कि श्रीगुरूजी ही सरसंघचालक होंगे। वैसे ही, बल्कि उससे कहीं अधिक कल्पना देश के संघ कार्यकर्ताओं को श्री गुरूजी के बाद बालासाहब देवरस के सरसंघचालक बनने की हो गई थी। श्री गुरू जी 33 वर्षों तक सरसंघचालक रहे जबकि बालासाहब देवरस 21 वर्षों तक। श्री रज्जू भैया वर्ष 1994 से 2000 तक सरसंघचालक रहे। जबकि श्री सुदर्शन जी वर्ष 2000 से 2009 तक।
कार्य की दृष्टि से सरसंघचालकों के कार्यकाल का विश्लेषण काफी कठिन है। संघ का मूल कार्य तो शाखा कार्य विस्तार है। इस दृष्टि से शाखा कार्य का विस्तार तो सतत होता गया है। लेकिन विभिन्न सरसंघचालकों के कार्यकाल को देशकाल-परिस्थिति और तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संदर्भों में देखने पर समीचीन विश्लेषण संभव होगा।
संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक रहे मोरेश्वर गणेश तपस्वी ने अपनी पुस्तक ‘ राष्ट्राय नमः’ में लिखा है - संघकार्य के वास्तविक शुरूआत के कुछ महीनों बाद एक दिन डाॅ. हेडगेवार जब संघ के शाखा स्थान पर पहंुचे तो स्वयंसेवकों ने उन्हें अकल्पित रूप से ‘सरसंघचालक प्रणाम’ कहा। तभी से डाॅक्टर जी सरसंघचालक बन गए। पन्द्रह वर्षों तक उन्होंने अपना खून-पसीना एक कर संघ का विस्तार किया, उसे देश के सुदूर क्षेत्रों तक विस्तार दिया। एक तरफ साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष और दूसरी तरफ समाज को असन्न संकटों से जूझने के लिए समर्थ और सशक्त बनाने का दोहरा दायित्व डाॅ. हेडगेवार के जिम्मे था। श्रीगुरूजी के 33 वर्षों के कार्यकाल में संघ को देश के प्रत्येक जिले में विस्तार मिला, वहीं राजनीति सहित समाज जीवन से जुड़ी लगभग बीस से अधिक संगठनों की शुरूआत भी हुई। आज जिस ‘संघ परिवार’ शब्दावली की चर्चा होती है उसकी शुरूआत इसी समय हुई। श्रीगुरूजी के समय ही संघ को सर्वाधिक विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। गांधी-हत्या का ठीकरा संघ पर फोड़ा गया। तत्कालीन कांग्रेस की सरकार ने कलुषित राजनीति का परिचय देते हुए संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। एक विजयी योद्धा की तरह श्रीगुरूजी ने संघ को सामाजिक-राजनीतिक झंझावातों से बाहर निकाला।
श्री बाला साहब देवरस ने इक्कीस वर्षो। तक संघ को नेतृत्व दिया। इस दौरान संघ, समाजव्यापी बना। संघ परिवार अब समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचने लगा। देवरस जी के समय ही संघ को आपातकाल के दौरान दूसरे प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। निष्ठुर शासक वर्ग के खिलाफ जनांदोलन का शंखनाद संघ के अदृश्य नेतृत्व में ही हुआ। अस्वास्थ्य के कारण उन्होंने संघ प्रवाह का कार्य 1994 में श्री रज्जू भैया को सौंप दिया। श्री रज्जू भैया लगभग छह वर्षों तक सरसंघचालक के रूप में अपनी सेवाएं दे पाए। इस दौरान संघ कार्य का विस्तार दुनिया के अन्य देशों में काफी फैला। संघ के बारे में यह धारणा भी निर्मूल हुई कि संघ मराठी और उसमें भी एक विशेष ब्राह्मण समाज का संगठन है। जाति, भाषा और क्षेत्र आधारित धारणाएं इस दौरान मिथक सिद्ध हुई। संघ के वास्तविक रूप के बारे में समाज के सभी वर्गोंं में सकारात्मक संदेश गया। मीडिया भी संघ के बारे में सकारात्मक हुआ। संघ विचारों से प्रेरित राजनीतिक कार्यकर्ता भी उंचे शिखरों तक पहंचे। निवर्तमान सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी ने अपने कार्यकाल में ग्रामीण विकास, सामाजिक समरसता और संस्कृत व हिन्दी के विकास पर विशेष बल दिया। संघ विचारों से प्रेरित भारतीय जनता पार्टी का राजनैतिक उत्कर्ष भी उल्लेखनीय है।
नए सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के बारे में विभिन्न प्रकार के कयास लगाए जा रहे हैं। संघ और संघ के माध्यम से राष्ट्रीय फलक पर राजनैतिक-सामाजिक स्थितियों में बड़े युगान्तकारी परिवर्तन की अपेक्षा की जा रही है। श्री भागवत, संगठन और जमीनी काम को अन्य सभी कार्यों की शक्ति मानते हैं। इसलिए यह स्वाभावित है कि उनका ध्यान संघ के मूल कार्य, शाखा विस्तार की ओर होगा। संघ में शाखा कार्य और स्वयंसेवकों की गुणवत्ता को लेकर काफी चर्चा होती रही है। स्वयंसेवकों और शाखाकार्य में गुणात्मक विस्तार है देश के समक्ष आसन्न संकटों का समाधान दे सकेगा। श्री भागवत सरल और सहज व्यक्तित्व के धनी हैं। वे मीतभाषी और मृदुभाषी हैं। न दिखना और काम करते जाना उनके स्वाभाव में है। कार्यकर्ताओं के साथ वे छाया की तरह होते हैं, लेकिन मीडिया को ढूंढने पर भी नहीं मिलते। वे जानते हैं कार्य का विस्तार होगा तो उसका प्रचार भी होगा, प्रचार से कार्य का विस्तार नहीं। शायद इसीलिए वे अपने व्यक्तित्व को छुपाकर, गलाकर, मिटाकर संघ का व्यक्तिव गढ़ रहे हैं। वे सरकार्यवाह के रूप में संघ के कार्यकारी प्रमुख थे, अब सरसंघचालक के रूप में संवैधनिक प्रमुख के नाते संघ के दर्शन और नीतियों अभिव्यक्त करेंगे। संघ, संघ परिवार और संघ विचार को वही परंपरागत वैचारिक प्रतिबद्धता, अनुशासन और राष्ट्रधर्म का पुनस्र्मरण होगा। श्री भागवत के नेतृत्व मे संघ को न सिर्फ चतुर्दिक विस्तार मिलेगा, बल्कि देश को सभी क्षेत्रों में नई दिशा भी मिलेगी। देश और समाज को संघ से यही अपेक्षा है। संघ के नूतन सरसंघचालक का हार्दिक अभिनंदन!
अनिल सौमित्र
नागपुर में संघ की बहुप्रतीक्षित प्रतिनिधि सभा की बैठक चल रही है। औपचारिक तौर पर यह बैठक 21 से 23 तक होगी। संघ की परंपरा और संविधान के मुताबिक प्रतिनिधि सभा की बैठक प्रतिवर्ष होती है। लेकिन इस साल की बैठक का विशेष महत्व इसलिए है कि यह वर्ष संघ का चुनावी वर्ष है। प्रत्येक तीन साल पर संघ में सरकार्यवाह का चुनाव होता है। पहले प्रांत और उसके नीचे की इकाइयों में संघचालक का चुनाव होता है, तत्पश्चात् विभिन्न इकाइयों के प्रतिनिधि अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में सरकार्यवाह का चुनाव करते हैं। इस वर्ष यह बैठक इसलिए भी विशेष चर्चा में है कि काफी समय पहले से ही सरसंघचालक श्री कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन के पदमुक्त होने का अनुमान लगाया जा रहा था।
मीडिया और समाज का अनुमान सच सिद्ध हुआ। प्रतिनिधि सभा बैठक के दूसरे दिन 21 मार्च को श्री सुदर्शन जी ने अपने दायित्व से मुक्त होने का निर्णय करते हुए वर्तमान सरकार्यवाह श्री मोहनराव भागवत को सरसंघचालक नियुक्त करने की घोषणा कर दी। यह घोषणा देश-दुनिया के लिए बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय है। ऐसा होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के प्रमुख का मनोनयन और दूसरे सबसे बड़े पद का निर्वाचन हुआ है। लेकिन यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ही संभव है कि इतने विशाल संगठन के मुखिया और अन्य पदाधिकारियों का मनोनयन ओर निर्वाचन इतने सरल और सहज तरीके से हो पाता है।
श्री मोहनराव भागवत, संघ के छठे सरसंघचालक होंगे। संघ के पहले सरसंघचालक, संघ के संस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार हुए। इसके पश्चात् श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर (श्रीगुरूजी), श्री बालासाहब देवरस, प्रो. श्री राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) और श्री कृप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन सरसंघचालक बने। उल्लेखनीय है कि 1939 डाॅ. हेडगेवार के जीवन काल में सिंदी संघ के शिविर में ही कार्यकर्ता जान चुके थे कि श्रीगुरूजी ही सरसंघचालक होंगे। वैसे ही, बल्कि उससे कहीं अधिक कल्पना देश के संघ कार्यकर्ताओं को श्री गुरूजी के बाद बालासाहब देवरस के सरसंघचालक बनने की हो गई थी। श्री गुरू जी 33 वर्षों तक सरसंघचालक रहे जबकि बालासाहब देवरस 21 वर्षों तक। श्री रज्जू भैया वर्ष 1994 से 2000 तक सरसंघचालक रहे। जबकि श्री सुदर्शन जी वर्ष 2000 से 2009 तक।
कार्य की दृष्टि से सरसंघचालकों के कार्यकाल का विश्लेषण काफी कठिन है। संघ का मूल कार्य तो शाखा कार्य विस्तार है। इस दृष्टि से शाखा कार्य का विस्तार तो सतत होता गया है। लेकिन विभिन्न सरसंघचालकों के कार्यकाल को देशकाल-परिस्थिति और तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संदर्भों में देखने पर समीचीन विश्लेषण संभव होगा।
संघ के स्वयंसेवक और प्रचारक रहे मोरेश्वर गणेश तपस्वी ने अपनी पुस्तक ‘ राष्ट्राय नमः’ में लिखा है - संघकार्य के वास्तविक शुरूआत के कुछ महीनों बाद एक दिन डाॅ. हेडगेवार जब संघ के शाखा स्थान पर पहंुचे तो स्वयंसेवकों ने उन्हें अकल्पित रूप से ‘सरसंघचालक प्रणाम’ कहा। तभी से डाॅक्टर जी सरसंघचालक बन गए। पन्द्रह वर्षों तक उन्होंने अपना खून-पसीना एक कर संघ का विस्तार किया, उसे देश के सुदूर क्षेत्रों तक विस्तार दिया। एक तरफ साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष और दूसरी तरफ समाज को असन्न संकटों से जूझने के लिए समर्थ और सशक्त बनाने का दोहरा दायित्व डाॅ. हेडगेवार के जिम्मे था। श्रीगुरूजी के 33 वर्षों के कार्यकाल में संघ को देश के प्रत्येक जिले में विस्तार मिला, वहीं राजनीति सहित समाज जीवन से जुड़ी लगभग बीस से अधिक संगठनों की शुरूआत भी हुई। आज जिस ‘संघ परिवार’ शब्दावली की चर्चा होती है उसकी शुरूआत इसी समय हुई। श्रीगुरूजी के समय ही संघ को सर्वाधिक विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। गांधी-हत्या का ठीकरा संघ पर फोड़ा गया। तत्कालीन कांग्रेस की सरकार ने कलुषित राजनीति का परिचय देते हुए संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। एक विजयी योद्धा की तरह श्रीगुरूजी ने संघ को सामाजिक-राजनीतिक झंझावातों से बाहर निकाला।
श्री बाला साहब देवरस ने इक्कीस वर्षो। तक संघ को नेतृत्व दिया। इस दौरान संघ, समाजव्यापी बना। संघ परिवार अब समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचने लगा। देवरस जी के समय ही संघ को आपातकाल के दौरान दूसरे प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। निष्ठुर शासक वर्ग के खिलाफ जनांदोलन का शंखनाद संघ के अदृश्य नेतृत्व में ही हुआ। अस्वास्थ्य के कारण उन्होंने संघ प्रवाह का कार्य 1994 में श्री रज्जू भैया को सौंप दिया। श्री रज्जू भैया लगभग छह वर्षों तक सरसंघचालक के रूप में अपनी सेवाएं दे पाए। इस दौरान संघ कार्य का विस्तार दुनिया के अन्य देशों में काफी फैला। संघ के बारे में यह धारणा भी निर्मूल हुई कि संघ मराठी और उसमें भी एक विशेष ब्राह्मण समाज का संगठन है। जाति, भाषा और क्षेत्र आधारित धारणाएं इस दौरान मिथक सिद्ध हुई। संघ के वास्तविक रूप के बारे में समाज के सभी वर्गोंं में सकारात्मक संदेश गया। मीडिया भी संघ के बारे में सकारात्मक हुआ। संघ विचारों से प्रेरित राजनीतिक कार्यकर्ता भी उंचे शिखरों तक पहंचे। निवर्तमान सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी ने अपने कार्यकाल में ग्रामीण विकास, सामाजिक समरसता और संस्कृत व हिन्दी के विकास पर विशेष बल दिया। संघ विचारों से प्रेरित भारतीय जनता पार्टी का राजनैतिक उत्कर्ष भी उल्लेखनीय है।
नए सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के बारे में विभिन्न प्रकार के कयास लगाए जा रहे हैं। संघ और संघ के माध्यम से राष्ट्रीय फलक पर राजनैतिक-सामाजिक स्थितियों में बड़े युगान्तकारी परिवर्तन की अपेक्षा की जा रही है। श्री भागवत, संगठन और जमीनी काम को अन्य सभी कार्यों की शक्ति मानते हैं। इसलिए यह स्वाभावित है कि उनका ध्यान संघ के मूल कार्य, शाखा विस्तार की ओर होगा। संघ में शाखा कार्य और स्वयंसेवकों की गुणवत्ता को लेकर काफी चर्चा होती रही है। स्वयंसेवकों और शाखाकार्य में गुणात्मक विस्तार है देश के समक्ष आसन्न संकटों का समाधान दे सकेगा। श्री भागवत सरल और सहज व्यक्तित्व के धनी हैं। वे मीतभाषी और मृदुभाषी हैं। न दिखना और काम करते जाना उनके स्वाभाव में है। कार्यकर्ताओं के साथ वे छाया की तरह होते हैं, लेकिन मीडिया को ढूंढने पर भी नहीं मिलते। वे जानते हैं कार्य का विस्तार होगा तो उसका प्रचार भी होगा, प्रचार से कार्य का विस्तार नहीं। शायद इसीलिए वे अपने व्यक्तित्व को छुपाकर, गलाकर, मिटाकर संघ का व्यक्तिव गढ़ रहे हैं। वे सरकार्यवाह के रूप में संघ के कार्यकारी प्रमुख थे, अब सरसंघचालक के रूप में संवैधनिक प्रमुख के नाते संघ के दर्शन और नीतियों अभिव्यक्त करेंगे। संघ, संघ परिवार और संघ विचार को वही परंपरागत वैचारिक प्रतिबद्धता, अनुशासन और राष्ट्रधर्म का पुनस्र्मरण होगा। श्री भागवत के नेतृत्व मे संघ को न सिर्फ चतुर्दिक विस्तार मिलेगा, बल्कि देश को सभी क्षेत्रों में नई दिशा भी मिलेगी। देश और समाज को संघ से यही अपेक्षा है। संघ के नूतन सरसंघचालक का हार्दिक अभिनंदन!
विराट हिन्दू समागम के लिये आयोजन समिति गठित
भोपाल,विश्व संवाद केन्द्र. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भोपाल में हिन्दू समागम का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन के लिये एक आयोजन समिति का गठन किया गया है। 28 फरवरी को आयोजित होने वाले इस विराट हिन्दू समागम के सफल आयोजन हेतु इस समिति में भोपाल के विभिन्न वर्गों के नागरिकों का सहयोग संरक्षण, मार्गदर्शन एवं सहयोग लिया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्यभारत प्रांत के संघचालक श्री शशिभाई सेठ की उपस्थिति में आयोजन समिति की पहली बैठक आज सम्पन्न हुई है। इस बैठक में उपस्थित सभी विशिष्ठ नागरिकों की सहमति से तय हुआ कि आयोजन समिति में विभिन्न मत-पंथ एवं सम्प्रदायों के धर्माचार्य इस आयोजन समिति के संरक्षण होंगे। वरिष्ठ नागरिक एवं पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री एच.एम. जोशी की अध्यक्षता में गठित आयोजन समिति में एयर मार्शल विक्रम पेठिया, श्री हेमन्त सोनी, श्री विजय रामानी, डाॅ. मृणाली गोरे,, श्री श्रीपति खिरवडकर, श्री विशम्भर राजदेव, श्री कृष्णन, श्री संजीव अग्रवाल, श्री अजय गोयनका, श्री राजेश जैन और डाॅ. दीपक शाह उपाध्यक्ष होंगे। समिति के महासचिव श्री दीपक शर्मा एवं श्री राजूल अग्रवाल, श्री नैमेष सेठ, श्री विष्णु खत्री, श्री सुधीर दाते, श्रीमती सुप्रीत कौर एवं श्रीमती साधना जैन सचिव के रुप में कार्य करेंगे।
आयोजन समिति की बैठक में हिन्दू समागम के आयोजन एवं इसके महत्व के बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघचालक श्री शशिभाई सेठ ने बताया कि उन्होंने कहा कि यह संघ का नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज का कार्यक्रम होगा। कार्यक्रम को व्यापक एवं विराट स्वरुप देने के लिये इस समिति का गठन किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बड़ी संख्या में लोग प्रत्यक्ष जुड़े हैं, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में अभी भी ऐसे लोग है जो संघ को प्रसार माध्यमों या अन्य तरीकों से जानते हैं। श्री सेठ ने ऐसे सभी बन्धुओं से संघ के निकट आने व जानने समझने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि आज देश में देशभक्त और देशविरोधी लोगों का ध्रुवीकरण हो रहा है। देश में आज देवासुर संग्राम जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। संघ ने समाज के सज्जन और सात्विक शक्ति को संगठित करने का कार्य किया है । इस दिशा में अन्य अनेक संगठन भी कार्यरत् है।
हिन्दू समागम के अवसर पर भोपाल में सज्जन हिन्दू शक्ति के व्यापक प्रकटीकरण का प्रयास किया जायेगा। 28 फरवरी भोपाल के लिये ऐतिहासिक दिन बने हम सब इसका मिलकर प्रयास करें। इसके लिये अधिकाधिक लोगों तक सूचना, संदेश और सम्पर्क करने का आव्हान श्री सेठ ने किया। बैठक के अन्त में संघ के कार्यों से संबंधित छोटी सी फिल्म का प्रदर्शन भी हुआ।
बैठक में श्री सिद्धभाऊ जी, श्री बाबूलाल गौर,, डाॅ. अजय नारंग, डाॅ. शंकरलालजी पाटीदार,, श्री संतोष अग्रवाल, श्री महेन्द्र शुक्ला आदि विशेष रुप से उपस्थित थे।
भोपाल,विश्व संवाद केन्द्र. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भोपाल में हिन्दू समागम का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन के लिये एक आयोजन समिति का गठन किया गया है। 28 फरवरी को आयोजित होने वाले इस विराट हिन्दू समागम के सफल आयोजन हेतु इस समिति में भोपाल के विभिन्न वर्गों के नागरिकों का सहयोग संरक्षण, मार्गदर्शन एवं सहयोग लिया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्यभारत प्रांत के संघचालक श्री शशिभाई सेठ की उपस्थिति में आयोजन समिति की पहली बैठक आज सम्पन्न हुई है। इस बैठक में उपस्थित सभी विशिष्ठ नागरिकों की सहमति से तय हुआ कि आयोजन समिति में विभिन्न मत-पंथ एवं सम्प्रदायों के धर्माचार्य इस आयोजन समिति के संरक्षण होंगे। वरिष्ठ नागरिक एवं पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री एच.एम. जोशी की अध्यक्षता में गठित आयोजन समिति में एयर मार्शल विक्रम पेठिया, श्री हेमन्त सोनी, श्री विजय रामानी, डाॅ. मृणाली गोरे,, श्री श्रीपति खिरवडकर, श्री विशम्भर राजदेव, श्री कृष्णन, श्री संजीव अग्रवाल, श्री अजय गोयनका, श्री राजेश जैन और डाॅ. दीपक शाह उपाध्यक्ष होंगे। समिति के महासचिव श्री दीपक शर्मा एवं श्री राजूल अग्रवाल, श्री नैमेष सेठ, श्री विष्णु खत्री, श्री सुधीर दाते, श्रीमती सुप्रीत कौर एवं श्रीमती साधना जैन सचिव के रुप में कार्य करेंगे।
आयोजन समिति की बैठक में हिन्दू समागम के आयोजन एवं इसके महत्व के बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघचालक श्री शशिभाई सेठ ने बताया कि उन्होंने कहा कि यह संघ का नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज का कार्यक्रम होगा। कार्यक्रम को व्यापक एवं विराट स्वरुप देने के लिये इस समिति का गठन किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बड़ी संख्या में लोग प्रत्यक्ष जुड़े हैं, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में अभी भी ऐसे लोग है जो संघ को प्रसार माध्यमों या अन्य तरीकों से जानते हैं। श्री सेठ ने ऐसे सभी बन्धुओं से संघ के निकट आने व जानने समझने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि आज देश में देशभक्त और देशविरोधी लोगों का ध्रुवीकरण हो रहा है। देश में आज देवासुर संग्राम जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। संघ ने समाज के सज्जन और सात्विक शक्ति को संगठित करने का कार्य किया है । इस दिशा में अन्य अनेक संगठन भी कार्यरत् है।
हिन्दू समागम के अवसर पर भोपाल में सज्जन हिन्दू शक्ति के व्यापक प्रकटीकरण का प्रयास किया जायेगा। 28 फरवरी भोपाल के लिये ऐतिहासिक दिन बने हम सब इसका मिलकर प्रयास करें। इसके लिये अधिकाधिक लोगों तक सूचना, संदेश और सम्पर्क करने का आव्हान श्री सेठ ने किया। बैठक के अन्त में संघ के कार्यों से संबंधित छोटी सी फिल्म का प्रदर्शन भी हुआ।
बैठक में श्री सिद्धभाऊ जी, श्री बाबूलाल गौर,, डाॅ. अजय नारंग, डाॅ. शंकरलालजी पाटीदार,, श्री संतोष अग्रवाल, श्री महेन्द्र शुक्ला आदि विशेष रुप से उपस्थित थे।
मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010
राजा कृष्णदेव राय के राज्याभिषेक का ५०० वां वर्ष
हिंदुस्तान की महान विरासत का उत्सव
विजयनगर साम्राज्य एवं राजा कृष्णदेव राय के 500 वें राज्याभिषेक का आज शुभदिन है । कर्नाटक में इस त्रिदिविसीय समारोह के रूप में मनाया जा रहा है।
सर्वश्रेष्ठ राजा, महान शासक और एक न्याय-पुरुष।’ यह लिखा था सोलहवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आए एक पुर्तगाली यात्री डॉमिंगोज पेस ने। राजा थे कृष्णदेव राय, जो १५क्९ में विजयनगर की गद्दी पर बैठे थे और चालीस की उम्र में किसी अज्ञात बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई थी। उनके गद्दी पर बैठने के लगभग आधी सहस्राब्दी के बाद उनके राज्याभिषेक का उत्सव मनाया जा रहा है।वे महान योद्धा थे, लेकिन एक योग्य प्रशासक, सहिष्णु राजनीतिज्ञ और कलाओं के महान संरक्षक भी थे। 20 साल की अवधि में कृष्णदेव राय ने विजयनगर को एक विशालकाय साम्राज्य में तब्दील कर दिया था। उनके राज्य की राजधानी और अब विश्व की विरासतों में से एक हम्पी में कृष्णदेव राय की महानता घुली-मिली है। वस्तुत: लगातार हम्पी की तुलना अब रोम से की जाती है।उनके समय में दक्षिण भारत की कला और स्थापत्य अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया था। वास्तव में यहां के मिले-जुले स्थापत्य में हिंदू और इस्लामिक, दोनों ही कलाओं के तत्व मिलते हैं। हम्पी के लोटस महल में इस कला के दर्शन किए जा सकते हैं। भले ही कर्नाटक ने उनके राज्याभिषेक के ५०० वें varsh का समारोह मनाने की पहल की हो, लेकिन उनकी कभी न खत्म होने वाली महानता के दर्शन आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में भी किए जा सकते हैं। सम्पूर्ण राष्ट्र इसे समारोह पूर्वक मनाये ।
विजयनगर साम्राज्य एवं राजा कृष्णदेव राय के 500 वें राज्याभिषेक का आज शुभदिन है । कर्नाटक में इस त्रिदिविसीय समारोह के रूप में मनाया जा रहा है।
सर्वश्रेष्ठ राजा, महान शासक और एक न्याय-पुरुष।’ यह लिखा था सोलहवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आए एक पुर्तगाली यात्री डॉमिंगोज पेस ने। राजा थे कृष्णदेव राय, जो १५क्९ में विजयनगर की गद्दी पर बैठे थे और चालीस की उम्र में किसी अज्ञात बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई थी। उनके गद्दी पर बैठने के लगभग आधी सहस्राब्दी के बाद उनके राज्याभिषेक का उत्सव मनाया जा रहा है।वे महान योद्धा थे, लेकिन एक योग्य प्रशासक, सहिष्णु राजनीतिज्ञ और कलाओं के महान संरक्षक भी थे। 20 साल की अवधि में कृष्णदेव राय ने विजयनगर को एक विशालकाय साम्राज्य में तब्दील कर दिया था। उनके राज्य की राजधानी और अब विश्व की विरासतों में से एक हम्पी में कृष्णदेव राय की महानता घुली-मिली है। वस्तुत: लगातार हम्पी की तुलना अब रोम से की जाती है।उनके समय में दक्षिण भारत की कला और स्थापत्य अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया था। वास्तव में यहां के मिले-जुले स्थापत्य में हिंदू और इस्लामिक, दोनों ही कलाओं के तत्व मिलते हैं। हम्पी के लोटस महल में इस कला के दर्शन किए जा सकते हैं। भले ही कर्नाटक ने उनके राज्याभिषेक के ५०० वें varsh का समारोह मनाने की पहल की हो, लेकिन उनकी कभी न खत्म होने वाली महानता के दर्शन आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में भी किए जा सकते हैं। सम्पूर्ण राष्ट्र इसे समारोह पूर्वक मनाये ।
शनिवार, 23 जनवरी 2010
यह के लिए शुभ भी है और लाभकारी भी
कांग्रेस के महासचिव और राजीव-सोनिया पुत्र राहुल गांधी के मध्यपदेश आगमन और यहां के कुछेक विश्वविद्यालय परिसरों में उनके कार्यक्रमों से बवाल मचा है। यह विवाद भाजपा या अन्य के लिए अनपेक्षित हो सकता है, लेकिन राहुल गांधी के योजनाकारों के लिए यह अपेक्षित और उनकी योजना का परिणाम ही है। भाजपा के नेताओं और भाजपा सरकार के प्रतिनिधियों ने राहुल गांधी की यात्रा के बाद जो बयान, कायवाई या पहल की उसका सीधा या प्रकारान्तर से प्रचारात्मक लाभ राहुल गांधी को ही मिला।
यह पहली बार नहीं हुआ है कोई राजनीतिक व्यक्ति शैक्षणिक परिसर में गया हो। राहुल गांधी के पहले भी मंत्री, विधायक, सांसद, जनप्रतिनिधि और आकादमिक व्यक्ति का रूप धारण कर राजनैतिक लोग शिक्षा परिसरों में जाते रहे हैं। जाना भी चाहिए। अगर 18 साल से अधिक उम्र के युवाओं को मतदान का संवैधानिक अधिकार दिया गया है, काॅलेज और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ के चुनाव हो रहे हैं, वहां विभिन्न स्तरों पद राजनीति शास्त्र का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है तो कोई कारण नहीं कि शैक्षणिक परिसरों को राजनेताओं से अछूत रखा जाए। काॅलेज-विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं का राजनीतिक प्रशिक्षण हो यह देश की राजनीति के लिए शुभ भी है और लाभकारी भी। राजनेताओं का विश्वविद्यालय परिसरों में जाना और विद्याथियों से संवाद करना उपयुक्त भी है और आवश्यक भी। हां! इस दृष्टि से इतना अवश्य होना चाहिए कि इस संवाद हेतु कोइ नीति और पद्धति भी विकसित हो। भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को भी योजनापूर्वक यह प्रयास करना चाहिए कि वे भी छात्र-छात्राओं के बीच अपना विचार, संगठन और नीति लेकर जाएं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने छात्र राजनीति के मामले में एक नजीर पेश की है। वहां से राजनीतिक प्रशिक्षण प्राप्त छात्रों ने देश की राजनीति में काफी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।
राहुल गांधी के प्रकरण में भाजपा ने प्रतिक्रिया की है। इस प्रतिक्रिया से कांग्रेस और उनके नेताओं का प्रचार ही होगा। इस दिशा में भाजपा नेता, उनके युवा नेतृत्व अगर पिछलग्गू और प्रतिक्रिया व्यक्त करने की बजाए छात्र और युवा राजनीति के लिए योजनाबद्ध नेतृत्व प्रदान करें तो यह देश और प्रदेश की राजनीति के हित में ही होगा।
यह पहली बार नहीं हुआ है कोई राजनीतिक व्यक्ति शैक्षणिक परिसर में गया हो। राहुल गांधी के पहले भी मंत्री, विधायक, सांसद, जनप्रतिनिधि और आकादमिक व्यक्ति का रूप धारण कर राजनैतिक लोग शिक्षा परिसरों में जाते रहे हैं। जाना भी चाहिए। अगर 18 साल से अधिक उम्र के युवाओं को मतदान का संवैधानिक अधिकार दिया गया है, काॅलेज और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ के चुनाव हो रहे हैं, वहां विभिन्न स्तरों पद राजनीति शास्त्र का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है तो कोई कारण नहीं कि शैक्षणिक परिसरों को राजनेताओं से अछूत रखा जाए। काॅलेज-विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं का राजनीतिक प्रशिक्षण हो यह देश की राजनीति के लिए शुभ भी है और लाभकारी भी। राजनेताओं का विश्वविद्यालय परिसरों में जाना और विद्याथियों से संवाद करना उपयुक्त भी है और आवश्यक भी। हां! इस दृष्टि से इतना अवश्य होना चाहिए कि इस संवाद हेतु कोइ नीति और पद्धति भी विकसित हो। भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को भी योजनापूर्वक यह प्रयास करना चाहिए कि वे भी छात्र-छात्राओं के बीच अपना विचार, संगठन और नीति लेकर जाएं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने छात्र राजनीति के मामले में एक नजीर पेश की है। वहां से राजनीतिक प्रशिक्षण प्राप्त छात्रों ने देश की राजनीति में काफी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।
राहुल गांधी के प्रकरण में भाजपा ने प्रतिक्रिया की है। इस प्रतिक्रिया से कांग्रेस और उनके नेताओं का प्रचार ही होगा। इस दिशा में भाजपा नेता, उनके युवा नेतृत्व अगर पिछलग्गू और प्रतिक्रिया व्यक्त करने की बजाए छात्र और युवा राजनीति के लिए योजनाबद्ध नेतृत्व प्रदान करें तो यह देश और प्रदेश की राजनीति के हित में ही होगा।
प्रति,
महोदय,
आप विश्व संवाद केन्द्र से परिचित ही हैं। आपको विदित ही है कि केन्द्र मीडिया के क्षेत्र में शोध, जागरुकता, जनसंपर्क और संचार संबंधी कार्यो में गत कई वर्षों से कार्यरत है। विश्व संवाद केन्द्र विभिन्न विषयों पर विशेषांक, स्मारिका, पुस्तिकाएं और पुस्तकों का प्रकाशन भी करता रहा है। आपको स्मरण कराते हुए प्रसन्नता होती है कि विश्व संवाद केन्द्र ने गत 10 वर्षों में संवाद मंथन, साप्ताहिक लेख सेवा के अतिरिक्त - स्वतंत्रता के इक्शवन वर्ष: क्या खोया, क्या पाया, कश्मीर: कबिलाई आक्रमण से करगिल तक, जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन, भाई परमानन्द व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व, उत्सव मेरे प्राण जैसे विशेषांक और पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया है। अभी हाल में ही ‘‘तुष्टीकरण’’ विषय पद विशेषांक का प्रकाशन किया गया है। इसके लेख और अन्य सामग्रियों पर काफी चर्चा हुई।
विश्व संवाद केन्द्र द्वारा पूर्व की ही भांति अपने नए विशेषांक/स्मारिका के प्रकाशन की योजना बनी है। इस बार ‘‘मध्यप्रदेश में आंतरिक सुरक्षा’’ विषय पद विशेषांक का प्रकाशन किया जा रहा है। हमारा प्रयास आपके सहयोग के बिना तो पूरा हो सकता है और न ही प्रभावी। कृपया हमारे इस प्रयास में आप भी मदद करने का कष्ट करें। निम्न विषयों से संबंधित आलेख, जानकारी के साथ आंकड़े और दस्तावेज/अभिलेख आपके पास उपलब्ध हों तो कृपया हमें उपलब्ध कराने का कष्ट करें-
1. आंतरिक सुरक्षा के मायने
2. मध्यप्रदेश में आंतरिक सुरक्षा से संबंधित प्रमुख विषय/मुदृदे
3. प्रदेश के नागरिकों में आंतरिक सुरक्षा बोध
4. आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में व्यक्ति, समाज और सरकार की भूमिका
5. आंतरिक सुरक्षा के लिए प्रदेश सरकार की पहल
6. प्रदेश के लिए आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से प्रमुख खतरे
7. आंतरिक सुरक्षा: मध्यप्रदेश की चुनौतियां
8. मध्यप्रदेश में आंतरिक सुरक्षा
9. घुसपैठ, आतंकवाद, नक्सलवाद, मतान्मरण और आंतरिक सुरक्षा
10. मध्य्रपेदश का सांस्कृतिक ताना-बाना और आंतरिक सुरक्षा
11. अल्पसंख्यक दृष्टि से मध्यप्रदेश की आंतरिक सुरक्षा
12. चर्च, मदरसे, मिशनरियों और पादरियों की सक्रियता और आंतरिक सुरक्षा
13. आंतरिक सुरक्षा: केन्द्र और प्रदेश
14. आंतरिक सुरक्षा: रीति-नीति, कानून और क्रियान्वयन
15. आंतरिक सुरक्षा में नागरिक संगठनों की भूमिका
16. मध्यप्रदेश में विभिन्न आंदोलन और आंतरिक सुरक्षा
17. देश की सुरक्षा और मध्यप्रदेश की आंतरिक सुरक्षा
18. आंतरिक सुरक्षा: क्या करें, क्या न करें
19. संबंधित पुस्तकें
20. दुनिया में आंतरिक सुरक्षा
21. देश में आंतरिक सुरक्षा
22. मध्यपदेश में आंतरिक सुरक्षा
अन्य विषय जो आपको समीचीन, संदर्भित और उपयोगी लगते हों। विश्व संवाद केन्द्र इस सहयोग के लिए आपके प्रति ऋणी होगा। आपके सहयोग और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में।
सादर,
भवदीय
अनिल सौमित्र
संपादक
महोदय,
आप विश्व संवाद केन्द्र से परिचित ही हैं। आपको विदित ही है कि केन्द्र मीडिया के क्षेत्र में शोध, जागरुकता, जनसंपर्क और संचार संबंधी कार्यो में गत कई वर्षों से कार्यरत है। विश्व संवाद केन्द्र विभिन्न विषयों पर विशेषांक, स्मारिका, पुस्तिकाएं और पुस्तकों का प्रकाशन भी करता रहा है। आपको स्मरण कराते हुए प्रसन्नता होती है कि विश्व संवाद केन्द्र ने गत 10 वर्षों में संवाद मंथन, साप्ताहिक लेख सेवा के अतिरिक्त - स्वतंत्रता के इक्शवन वर्ष: क्या खोया, क्या पाया, कश्मीर: कबिलाई आक्रमण से करगिल तक, जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन, भाई परमानन्द व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व, उत्सव मेरे प्राण जैसे विशेषांक और पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया है। अभी हाल में ही ‘‘तुष्टीकरण’’ विषय पद विशेषांक का प्रकाशन किया गया है। इसके लेख और अन्य सामग्रियों पर काफी चर्चा हुई।
विश्व संवाद केन्द्र द्वारा पूर्व की ही भांति अपने नए विशेषांक/स्मारिका के प्रकाशन की योजना बनी है। इस बार ‘‘मध्यप्रदेश में आंतरिक सुरक्षा’’ विषय पद विशेषांक का प्रकाशन किया जा रहा है। हमारा प्रयास आपके सहयोग के बिना तो पूरा हो सकता है और न ही प्रभावी। कृपया हमारे इस प्रयास में आप भी मदद करने का कष्ट करें। निम्न विषयों से संबंधित आलेख, जानकारी के साथ आंकड़े और दस्तावेज/अभिलेख आपके पास उपलब्ध हों तो कृपया हमें उपलब्ध कराने का कष्ट करें-
1. आंतरिक सुरक्षा के मायने
2. मध्यप्रदेश में आंतरिक सुरक्षा से संबंधित प्रमुख विषय/मुदृदे
3. प्रदेश के नागरिकों में आंतरिक सुरक्षा बोध
4. आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में व्यक्ति, समाज और सरकार की भूमिका
5. आंतरिक सुरक्षा के लिए प्रदेश सरकार की पहल
6. प्रदेश के लिए आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से प्रमुख खतरे
7. आंतरिक सुरक्षा: मध्यप्रदेश की चुनौतियां
8. मध्यप्रदेश में आंतरिक सुरक्षा
9. घुसपैठ, आतंकवाद, नक्सलवाद, मतान्मरण और आंतरिक सुरक्षा
10. मध्य्रपेदश का सांस्कृतिक ताना-बाना और आंतरिक सुरक्षा
11. अल्पसंख्यक दृष्टि से मध्यप्रदेश की आंतरिक सुरक्षा
12. चर्च, मदरसे, मिशनरियों और पादरियों की सक्रियता और आंतरिक सुरक्षा
13. आंतरिक सुरक्षा: केन्द्र और प्रदेश
14. आंतरिक सुरक्षा: रीति-नीति, कानून और क्रियान्वयन
15. आंतरिक सुरक्षा में नागरिक संगठनों की भूमिका
16. मध्यप्रदेश में विभिन्न आंदोलन और आंतरिक सुरक्षा
17. देश की सुरक्षा और मध्यप्रदेश की आंतरिक सुरक्षा
18. आंतरिक सुरक्षा: क्या करें, क्या न करें
19. संबंधित पुस्तकें
20. दुनिया में आंतरिक सुरक्षा
21. देश में आंतरिक सुरक्षा
22. मध्यपदेश में आंतरिक सुरक्षा
अन्य विषय जो आपको समीचीन, संदर्भित और उपयोगी लगते हों। विश्व संवाद केन्द्र इस सहयोग के लिए आपके प्रति ऋणी होगा। आपके सहयोग और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में।
सादर,
भवदीय
अनिल सौमित्र
संपादक
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
प्रो. बी.के. कुठियाला बने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति

bk प्रो. बी.के. कुठियाला बने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपतिभोपाल। प्रो. बी. के. कुठियाला माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नए कुलपति बने हैं। वे विश्वविद्यालय के सातवें कुलपति हैं। इसके पूर्व श्री अच्युतानन्द मिश्र और संस्थापक कुलपति डॉ. राधेश्याम शर्मा ऐसे कुलपति रहे जो अकादमिक पृष्ठभूमि के हैं। उल्लेखनीय है कि डॉ. शर्मा के बाद और श्री मिश्र के पूर्व जिन चार लोगों ने कुलपति का दायित्व निर्वहन किया वे प्रशासनिक पृष्ठभूमि के थे। इनमें डॉ. भागीरथ प्रसाद, श्री शरदचन्द्र बेहार और श्री सुमित बोस तो भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे, जबकि श्री अरविन्द चतुर्वेदी राज्य प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे। श्री चतुर्वेदी जनसंपर्क विभाग में अपर संचालक के पद पर थे।
प्रो. ब्रजकिशोर कुठियाला कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष रहे हैं। वे भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली के निदेशक भी रह चुके हैं। विश्वविद्याल अनुदान आयोग से संबध्द रहे श्री कुठियाला मीडिया, जनसंचार, शोध और शिक्षण कार्यों से जुड़े रहे हैं। मानवशास्त्र और समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त प्रो. कुठियाला अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं। वे श्री अच्युतानन्द मिश्र के उतराधिकारी के रूप में विश्वविद्यालय की अकादमिक परंपरा का निर्वहन करेंगे। कार्यभार ग्रहण करते हुए प्रो. कुठियाला ने कहा कि वे विश्वविद्यालय की अकादमिक परंपरा का निर्वहन करते हुए कोशिश करेंगे कि वर्तमान संदर्भ में मीडिया की आवश्यकताओं के अनुरूप जनसंचार के क्षेत्र में कार्य करने वाले मूल्यनिष्ठ और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण हो।
सोमवार, 11 जनवरी 2010
आने वाले दिनों में कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रम आप भी प्रतिभागी हो सकते हैं, हिस्सेदारी कर सकते हैं
1. 14 जनवरी, 2010 9ः30 बजे से पानी, पर्यावरण और पत्रकारिता पद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एक दिवसीय कार्यशाला । यह कार्यक्रम हिन्दी वाटर पोर्टल के संयुक्त प्रयासों से हो रहा है।
2. 15, 16 और 17 जनवरी, 2010 को गढ़ी, टिमरनी में भाउ साहब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन। इस आयोजन में 15 जनवरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विश्व विभाग के सह-संयोजक श्री रवि कुमार अय्यर, ‘‘भारत महाशक्ति एवं विश्वगुरु बनने की ओर’’ विषय पद व्याख्यान देंगे। 16 और 17 जनवरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवर्तमान सरसंघचालक श्री कृप्.सी. सुदर्शन का व्याख्यान होगा। श्री सुदर्शन ‘‘पाश्चात्य चिन्तन और विकास पथ’’ और ‘‘हिन्दू चिन्तन और विकास पथ’’ विषय पद व्याख्यान देंगे।
3. 28 फरवरी, 2010 को भोपाल में विशाल हिन्दू संगम का आयोजन किया गया है। इस हिन्दू संगम को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डाॅ. मोहनराव भागवत संबोधित करेंगे। संघ के कार्यकर्ताओं ने एक लाख परिवारों को पंजीयन कर उन्हें इस संगम में भागीदार बनाने का लक्ष्य रखा है।
4. 9 और 10 मार्च, 2010 को हरिद्वार में ‘‘राष्ट्र रक्षा सम्मेलन’’ का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन में देशभर के सुरक्षा विशेषज्ञों, सुरक्षा विषय पद शोध, अन्वेषण, दस्तावेजीकरण और लेखन करने वालों का आमंत्रित किया जा रहा है। सेना, अर्द्धसेनिक बल, और पुलिस के सेवानिवृत्त अधिकारी भी इसमें बड़ी संख्या में भाग लेने वाले हैं।
2. 15, 16 और 17 जनवरी, 2010 को गढ़ी, टिमरनी में भाउ साहब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन। इस आयोजन में 15 जनवरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विश्व विभाग के सह-संयोजक श्री रवि कुमार अय्यर, ‘‘भारत महाशक्ति एवं विश्वगुरु बनने की ओर’’ विषय पद व्याख्यान देंगे। 16 और 17 जनवरी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवर्तमान सरसंघचालक श्री कृप्.सी. सुदर्शन का व्याख्यान होगा। श्री सुदर्शन ‘‘पाश्चात्य चिन्तन और विकास पथ’’ और ‘‘हिन्दू चिन्तन और विकास पथ’’ विषय पद व्याख्यान देंगे।
3. 28 फरवरी, 2010 को भोपाल में विशाल हिन्दू संगम का आयोजन किया गया है। इस हिन्दू संगम को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डाॅ. मोहनराव भागवत संबोधित करेंगे। संघ के कार्यकर्ताओं ने एक लाख परिवारों को पंजीयन कर उन्हें इस संगम में भागीदार बनाने का लक्ष्य रखा है।
4. 9 और 10 मार्च, 2010 को हरिद्वार में ‘‘राष्ट्र रक्षा सम्मेलन’’ का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन में देशभर के सुरक्षा विशेषज्ञों, सुरक्षा विषय पद शोध, अन्वेषण, दस्तावेजीकरण और लेखन करने वालों का आमंत्रित किया जा रहा है। सेना, अर्द्धसेनिक बल, और पुलिस के सेवानिवृत्त अधिकारी भी इसमें बड़ी संख्या में भाग लेने वाले हैं।
शुक्रवार, 8 जनवरी 2010
विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा अपने अंतिम चरण में गोविन्दाचार्य ने हरदा, खंडवा और बुरहानपुर में यात्रा को संबोधित किया
यात्रा से अनिल सौमित्र
भोपाल। विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा अब अब अंतिक चरण में है। पिछले साल विजयादशमी के दिन कुरूक्षेत्र से शुरू हुई यह यात्रा 17 जनवरी, 2010 को नागपुर में पूरी होगी। इस दौरान यह यात्रा 20 हजार किमी की देरी तय करेगी। 108 दिनों की इस यात्रा में 400 से अधिक धर्मसभाएं आयोजित होंगी। गौ को राष्ट्रीय प्राणी घोषित कराने के लिए करोड़ों हस्ताक्षर कराए जायेंगे। पूरे देशभर में जिला, तहसील और विकास खंडों में 15000 उप-यात्राएं के माध्यम से 10 लाख किमी की दूरी तय की जायेगी। इस बीच करोड़ों लोगों से संपर्क किया जायेगा।
उल्लेखनीय है कि यात्रा अपने प्रथम चरण में 14 अक्टूबर को मध्यप्रदेश के ग्वालियर से होकर निकली। इसी दिन मध्यभारत प्रांत में यात्रा का शुभारंभ भी हुआ। अब जबकि यात्रा अपने अंतिम दौर में है पुनः 02 जनवरी, 2010 को रतलाम में आई। 09 जनवरी को यह यात्रा जबलपुर से होकर छत्तीसगढ़ की सीमा में पहुचेगी। 10 जनवरी को कवर्धा में यात्रा का स्वागत होगा।
भोपाल में यह यात्रा 6 जनवरी को आई। इसके पूर्व 5 जनवरी को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के उप-नगर बैरसिया और बैरागढ़ में भी यात्रा का भव्य स्वागत हुआ। भोपाल की सभा को गोकर्णपीठ श्रीरामचन्द्रपुर मठ के शंकराचार्य पूज्य श्री राघवेश्वर भारती महास्वामी जी और प्रख्यात चिन्तक श्री गोविन्दाचार्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सेवा प्रमुख सीताराम जी के अलावा अनेक संतों और बुद्धिजीवियों ने संबोधित किया।
भोपाल की सभा को संबोधित करते हुए पूज्य शंकराचार्य जी ने कहा कि गो-माता विश्व पावनी, जननी और पोषिणी हैं। लेकिन यह दुःख का विषय है कि गो-माता की रक्षा के लिए यात्रा निकालने की नौबत आ गई है। आज का समय ऐसा आ गया है कि हम गोपाल बनने में सम्मान नहीं बल्कि अपमान महसूस करते हैं। उन्होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि इस यात्रा के कारण लोगों में जागरुका आ रही है। गो रक्षा और इसके संवर्द्धन के लिए संगठन भी खड़ा हो रहा है। शंकराचार्य जी विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा के उद्देश्यों पद प्रकाश डालते हुए कहा कि यह यात्रा व्यक्ति और समाज में परिवर्तन के लिए है। इसके माध्यम से कुछ ऐसा करना है ताकि देश की आने वाली पीढ़ियां खुशहाल रह सकें। हम इसके माध्यम से सरकार और समाज का ध्यान आकृष्ट कराना चाहते हैं। आज गौ माता की ऐसी दुर्दशा है इसीलिए यह यात्रा निकाली जा रही है। उन्होंने बताया कि गाय की उपेक्षा का एक बढ़ा कारण यह है कि हमें गाय का महत्व और उसका उपयोग ठीक से मालूम नहीं है। हमें गाय के बारे में आर्थिक और भावनात्मक दोनों पक्षों का उजागर करना है। गौ पालन के लिए भाव और इच्छा जागरण के साथ ही वातावरण निर्माण का कार्य भी करना आवश्यक है। इसके लिए हम सभी की सेवा चाहिए। श्री शंकराचार्य जी ने बताया कि यात्रा के बाद गौ-संरक्षण व संवर्द्धन के लिए विस्तृ त कार्य-योजना तैयार की जायेगी। स्थान-स्थान पद प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित करने की भी आवश्यकता है।
प्रख्यात चिंतक गोविन्दाचार्य ने स्वदेशी अर्थचिंतक श्री गोविंदाचार्य ने भी सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि गौ माता जगत जननी है, प्रत्येक भारतीय को इसकी रक्षा का संकल्प करना चाहिए। गाय की सेवा अर्थात 35 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा करना। अपनी पूरी जिंदगी और मरने के बाद भी गो-माता मनुष्य और प्रकृति के लिए उपयोगी है। भारत की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि भारत दुनिया का अनमोल देश है। अपने वैशिष्ट के कारण ही इसे देवभूमि और पुण्यभूमि का विशेषण मिला। चीन में एक कहावत सर्वत्र प्रचलित है कि इस जन्म में अच्छा काम करोगे तो अगला जन्म भारत में मिलेगा। भारत में 29 हजार किस्म की वनस्पति और 85 हजार से अधिक पशु-पक्षियों की नस्लें हैं। भारत में सूर्य देवता का प्रताप भी अद्वितीय है। दुनिया के अन्य देशों में भारत की तरह सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता है। इसका हमारे जीवन पद काफी प्रभाव है। सूर्य के इसी प्रभाव के कारण यहां की गायों को भी विशेष गुण प्राप्त हुआ है। भारतीय गायों के दुध और घी में जो पीलापन है वह सूर्यतत्व है। यह सूर्य तत्व अन्य किसी प्रणी के दूध या किसी अन्य देश की गाय को प्राप्त नहीं है। क्योंकि भारतीय नस्ल की गायों में ही सूर्य तत्व को ग्रहण करने की क्षमता है।
श्री गोविंदाचार्य ने अंगेजी हुकूमत और स्वतंत्रता के बाद काले अंग्रेजों की हुकूमत पर गोवंश की कमी का ठीकरा फोड़ा। उन्होंने कहा कि सन 1800 में एक भारतीय पद 6 मवेशी होते थे, जबकि आजादी के वक्त दो भारतीय पर एक मवेशी ही बच पाया। आज हालात यह है कि 100 करोड़ की जनसंख्या पद मात्र 25 करोड़ गौवंश ही बचा है। यह इसलिए हुआ कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी उन्हीं की नीतियों को जारी रखा गया। चूंकि अंग्रेजों का मुख्य भोजन गो-मांस था इसलिए उन्होंने ऐसी नीतियां बनाई कि अधिकाधिक गो-वंश का उनके भोजन के लिए मारा जा सके। जबकि भारत में गा-वंश का उपयोग हमेशा से गो-दुग्ध, अन्य गो-उत्पाद और खेती तथा परिवहन आदि कार्यों के लिए होता था। उल्लेखनीय है कि 1857 से 1947 के बीच लगभग 40 करोड़ गो-वंश का वध किया गया। यह आज भी जारी है। देश के लाखों बूचड़खाने इसकी मिसाल हैं। भारत से गो-मांस का निर्यात आज भी निर्बाध गति से जारी है।
श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि गाय का गोबर, मूत्र, और दुग्ध गुणकारी है। हम इसके बारे में जानते हुए भी लाभ नहीं ले पा रहे हैं। कृषि में मशीनीकरण के कारण गो-वंश का उपयोग निरंतर कम होता जा रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि हमें गो विरोधी स्थितियां, भावना और नीतियों को दूर करना है। भारतीय नौकरशाही और काले अंग्रेजों ने पिछले 50 वर्षों में गाय के लिए घातक नीतियां बनाई। उन्होंने कहा कि गोशाला और वृद्धाश्रम स्वस्थ्य समाज की निशानी नहीं है। वृद्धों का स्थान घरों में और गो-माता का स्थान किसान के खूंटे पर ही होना चाहिए। उन्होंने इस बात पद जोर दिया कि प्रत्येक विकासखंड पर नंदीशाला और पशु चिकित्सालय होना चाहिए। बेहतर चारे के लिए प्रत्येक जिले में गो-अनुसंधान केन्द्र विकसित होना चाहिए। सरकार को कृषि, सिंचाई, परिवहन और उर्जा नीति गाय के अनुकूल बनाना चाहिए। परिवहन के लिए भी मानव श्रम, पशु परिवहन और बस और रेल का अनुपात तय किया जाना चाहिए।
श्री गोविंदाचार्य ने जोर देकर कहा कि जैसी दृष्टि होगी वैसी ही सृष्टि होगी। हमारा नजरिया बदलेगा तभी नजारा बदलेगा। गौ और गंगा माता की रक्षा करने से ही राष्ट्रीय पुनर्निर्माण होगा। गौ माता का मुद्दा सांप्रदायिक नहीं राष्ट्रीय है। उन्होंने दावा किया कि जिस दिन गौ-वंश की संख्या इंसान से अधिक हो जायेगी उस दिन भारत पुनः विश्वगुरु बन जायेगा। इसके पूर्व श्री गोविन्दाचार्य ने हरदा, खंडवा और बुरहानपुर में भी यात्रा-सभा को संबोधित किया।
मध्यभात में आयोजित अनेक उप-यात्राओं का इसी सप्ताह समापन हुआ। 22 से 29 नवम्बर, 09 तक लाखों हस्ताक्षर कराए गए। ग्राम स्तर पद 5 से 15 दिसंबर तक और 15 से 25 दिसंबर तक उप यात्राओं का आयोजन हुआ था। उप यात्राओं के समापन पर गौ-भक्तों और विद्वानों ने सभा को संबोधित किया। भोपाल सहित सभी सभाओं में हजारों की संख्या में उपस्थित ग्रामीणों और नागरिकों को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने गाय की महिमा, गोवंश को खत्म करने के देशी-विदेशी षड्यंत्रों, सरकारी उपेक्षा, नागरिक लापरवाही और सज्जन शक्ति की उदासीनता पर प्रकाश डाला।
शुक्रवार, 1 जनवरी 2010
Launcing of Website of HSS and Sri Gurudakshina
Celebrated at Triolet, Mehashwarnath Mandir, Mauritius
( Dated : 27-Dec-2009)
Website was Launched by Swami Poornanand Ji, Organized by HSS Mauritius. The function was presided over by Sri Raghunath Deealji, Sanghchalak Mauritius and the chief speaker was Sri Prabhu Narain Srivastava(Prabhuji), Sah Prant Sangh Chalak, Avadh Prant, U.P., Rtd Chief Engineer and All Inda Organizing Secretary of Mahamana Malaviya Mission, India.
The website was launched in the presence of nearly hundred citizens of Mauritius. On this occasion Prabhuji highlighted the three Global problems .i.e. Global Terrorism, Global Recession and Global Warming. The entire world is engaged in resolving these subtle challenges mankind is ever facing. Hindu Dharam, since time immemorial has advocated life vision which addresses these problems in its entirety. It is because of this that the Hinduism has survived since thousands of centuries. The inclusiveness of Hinduism has the remedy of all these global problems. The mother earth should be milked not bled to satisfy the unending material desires of the mankind, which has resulted into global warming and global recession. The global terrorism is also the outcome of the life vision of exclusivist, who propagates their religion through violence. Shreemad Bhagwad Geeta and other Hindu Scriptures have been awakening the ill effects of Global Terrorism, Recession and Warming since beginning. It is a matter of satisfaction that mankind has at least started to recognize the efficacy of Hindu philosophy to bring about world piece and sustainable eco-friendly development, the testimony to which is the recitation of Vedic Richas in the Parliament of USA. It is a matter of pride that Mauritius has shown the path of cultural expansion for peace and brotherhood by Harmonizing French, English, Hindi, Bhojpuri and Creol languages. Besides this the foundation of Trayodash Maurisheshwar Nath Jyotirling, Gangal Talao( Grand Bassin) Mauritius is a step forward to expand its cultural identity across the world. Prabhuji requested all the Hindu saints of India to give the recognition to this Trayodash Maurisheshwar Nath Jyotirling.
After the speech of Prabhuji Swami Poornanand Blessed the HSS for expanding its work in Mauritius. The sanghchalak of Mauritius Sri Raghunath Deealji elaborated the importance of Gurupooja and Bhagwa Dhwaj. All the swayamsevaks offered their oblations and the program was concluded by prarthana.
By- Pragya Srivastava
Celebrated at Triolet, Mehashwarnath Mandir, Mauritius
( Dated : 27-Dec-2009)
Website was Launched by Swami Poornanand Ji, Organized by HSS Mauritius. The function was presided over by Sri Raghunath Deealji, Sanghchalak Mauritius and the chief speaker was Sri Prabhu Narain Srivastava(Prabhuji), Sah Prant Sangh Chalak, Avadh Prant, U.P., Rtd Chief Engineer and All Inda Organizing Secretary of Mahamana Malaviya Mission, India.
The website was launched in the presence of nearly hundred citizens of Mauritius. On this occasion Prabhuji highlighted the three Global problems .i.e. Global Terrorism, Global Recession and Global Warming. The entire world is engaged in resolving these subtle challenges mankind is ever facing. Hindu Dharam, since time immemorial has advocated life vision which addresses these problems in its entirety. It is because of this that the Hinduism has survived since thousands of centuries. The inclusiveness of Hinduism has the remedy of all these global problems. The mother earth should be milked not bled to satisfy the unending material desires of the mankind, which has resulted into global warming and global recession. The global terrorism is also the outcome of the life vision of exclusivist, who propagates their religion through violence. Shreemad Bhagwad Geeta and other Hindu Scriptures have been awakening the ill effects of Global Terrorism, Recession and Warming since beginning. It is a matter of satisfaction that mankind has at least started to recognize the efficacy of Hindu philosophy to bring about world piece and sustainable eco-friendly development, the testimony to which is the recitation of Vedic Richas in the Parliament of USA. It is a matter of pride that Mauritius has shown the path of cultural expansion for peace and brotherhood by Harmonizing French, English, Hindi, Bhojpuri and Creol languages. Besides this the foundation of Trayodash Maurisheshwar Nath Jyotirling, Gangal Talao( Grand Bassin) Mauritius is a step forward to expand its cultural identity across the world. Prabhuji requested all the Hindu saints of India to give the recognition to this Trayodash Maurisheshwar Nath Jyotirling.
After the speech of Prabhuji Swami Poornanand Blessed the HSS for expanding its work in Mauritius. The sanghchalak of Mauritius Sri Raghunath Deealji elaborated the importance of Gurupooja and Bhagwa Dhwaj. All the swayamsevaks offered their oblations and the program was concluded by prarthana.
By- Pragya Srivastava
सोमवार, 28 दिसंबर 2009
समाचार विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा
29 दिसंबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह सुरेश सोनी भोपाल में विवेकानन्द केन्द्र के कार्यकर्ता सम्मेलन में देश भर से आए कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करेंगे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक, भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव और वरिष्ठ चिंतक-विचारक के.एन.गोविन्दाचार्य मध्यप्रदेश के भोपाल, होशंगाबाद, हरदा, खंडवा और बुरहानपुर के दौरे पद हैं। 29 से 30 दिसंबर के बीच वे भोपाल में पत्रकार और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों से मुलाकात करेंगे, वहीं वे हरदा, खंडवा और बुरहानपुर में विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा को संबोधित करेंगे। 31 दिसंबर को वे राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की बैठक में भाग लेंगे।
अखिल भारतीय स्तर पद आयोजित विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा 5 जनवरी, 2010 को भोपाल पहुंचेगी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक, भाजपा के पूर्व संगठन महासचिव और वरिष्ठ चिंतक-विचारक के.एन.गोविन्दाचार्य मध्यप्रदेश के भोपाल, होशंगाबाद, हरदा, खंडवा और बुरहानपुर के दौरे पद हैं। 29 से 30 दिसंबर के बीच वे भोपाल में पत्रकार और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों से मुलाकात करेंगे, वहीं वे हरदा, खंडवा और बुरहानपुर में विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा को संबोधित करेंगे। 31 दिसंबर को वे राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की बैठक में भाग लेंगे।
अखिल भारतीय स्तर पद आयोजित विश्व मंगल गौ-ग्राम यात्रा 5 जनवरी, 2010 को भोपाल पहुंचेगी।
मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
राम मंदिर आंदोलन का शंखनाद अप्रैल में
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रवीणभाई तोगडिय़ा ने साफ कहा कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने का ब्लू प्रिंट 6 अप्रैल से शुरू हो रहे हरिद्वार के कुंभ मेले में साधु-संतों की अगुआई में तैयार होगा। वे कारसेवा या जो भी फैसला लेंगे, उसी आधार पर आंदोलन चलेगा। इसका नेतृत्व संत करेंगे। किसी नेता को मंच पर भी नहीं चढऩे देंगे। तोगडिय़ा ने कहा कुंभ में 6 अप्रैल को 20 हजार से ज्यादा साधु-संत मौजूद होंगे। विहिप संतों से आग्रह करेगी कि मंदिर आंदोलन का मार्ग प्रशस्त करें। उनकी मंशानुसार ही राममंदिर का संकल्प पूरा किया जाएगा। तोगडिय़ा ने कहा अलगाववाद, जेहाद, घुसपैठिए बांग्लादेशी और सच्चर कमेटी का समाधान इसी रास्ते से गुजरेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन चुनाव या वोटों के लिए नहीं होगा। इसका नेतृत्व साधु-संत ही करेंगे।
मंदिर निर्माण से मिटेगा जेहादी आतंकवादविहिप के हितरक्षक सम्मेलन में गरजे तोगडिय़ाइंदौर, सिटी रिपोर्टर। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रवीण भाई तोगडिय़ा ने ऐलान किया कि एक बार फिर राम मंदिर आंदोलन उठेगा। जेहादी आतंकवाद को मिटाने का रास्ता मंदिर निर्माण से ही गुजरेगा। यह लड़ाई कोई पीएम और सीएम बनाने की नहीं, बल्कि अखंड ब्रह्मांड के भगवान राम के मंदिर की है। वे विहिप के हित रक्षक सम्मेलन में गरज रहे थे। उन्होंने कहा कि अगर मो. कासिम से लेकर मो. जिन्ना तक की मंदिर तोडऩे वाली मानसिकता खत्म नहीं की तो देश बंट जाएगा। भारत में अवैध बसे तीन लाख बांग्लादेशियों की विदाई का रास्ता भी मंदिर बनने से ही होगा।वंदे मातरम् का फतवा राष्ट्रद्रोह
डॉ. तोगडिय़ा ने कहा कि एक लाख मौलवियों के सम्मेलन में वंदे मातरम् का फतवा जारी किया गया। यह राष्ट्रद्रोह है। रंगनाथ मिश्र आधुनिक जिन्ना है, जिसने संसद में मुस्लिमों को आरक्षण देने की रपट पेश की है।हर तहसील में जिन्ना की औलादें
उन्होंने कहा अब तो भारत की हर तहसील में जिन्ना की औलादें पैदा हो गई हैं। इंदौर और उज्जैन में सिमी के नाम पर इनकी कोई कमी नहीं है। सम्मेलन में विहिप संयुक्त मंत्री स्वामी विद्यानंदजी ने भी विचार रखे। इस मौके पर अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष एस. वेदांतम, संगठन महामंत्री दिनेशचंद्र, संयुक्त महामंत्री स्वामी विद्यानंद, वरिष्ठ सलाहकार मंडल गिरिराज किशोर, मालवा प्रांत अध्यक्ष जड़ावचंद्र जैन, प्रांत मंत्री नारायणजी और प्रशासनिक व्यवस्था व प्रचार-प्रसार प्रमुख मुकेश जैन भी मौजूद थे। स्वास्थ्य खराब होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल सम्मेलन में नहीं आ पाए। हिंदुत्व के लिए काम करें गडकरी
इंदौर। विहिप के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रवीण भाई तोगडिय़ा ने पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा में कहा कि भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को हिंदुत्व के लिए काम करना चाहिए। अगर वे ऐसा करते हैं तो करोड़ों हिंदुओं का भरोसा जीत पाएंगे।
मंदिर निर्माण से मिटेगा जेहादी आतंकवादविहिप के हितरक्षक सम्मेलन में गरजे तोगडिय़ाइंदौर, सिटी रिपोर्टर। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रवीण भाई तोगडिय़ा ने ऐलान किया कि एक बार फिर राम मंदिर आंदोलन उठेगा। जेहादी आतंकवाद को मिटाने का रास्ता मंदिर निर्माण से ही गुजरेगा। यह लड़ाई कोई पीएम और सीएम बनाने की नहीं, बल्कि अखंड ब्रह्मांड के भगवान राम के मंदिर की है। वे विहिप के हित रक्षक सम्मेलन में गरज रहे थे। उन्होंने कहा कि अगर मो. कासिम से लेकर मो. जिन्ना तक की मंदिर तोडऩे वाली मानसिकता खत्म नहीं की तो देश बंट जाएगा। भारत में अवैध बसे तीन लाख बांग्लादेशियों की विदाई का रास्ता भी मंदिर बनने से ही होगा।वंदे मातरम् का फतवा राष्ट्रद्रोह
डॉ. तोगडिय़ा ने कहा कि एक लाख मौलवियों के सम्मेलन में वंदे मातरम् का फतवा जारी किया गया। यह राष्ट्रद्रोह है। रंगनाथ मिश्र आधुनिक जिन्ना है, जिसने संसद में मुस्लिमों को आरक्षण देने की रपट पेश की है।हर तहसील में जिन्ना की औलादें
उन्होंने कहा अब तो भारत की हर तहसील में जिन्ना की औलादें पैदा हो गई हैं। इंदौर और उज्जैन में सिमी के नाम पर इनकी कोई कमी नहीं है। सम्मेलन में विहिप संयुक्त मंत्री स्वामी विद्यानंदजी ने भी विचार रखे। इस मौके पर अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष एस. वेदांतम, संगठन महामंत्री दिनेशचंद्र, संयुक्त महामंत्री स्वामी विद्यानंद, वरिष्ठ सलाहकार मंडल गिरिराज किशोर, मालवा प्रांत अध्यक्ष जड़ावचंद्र जैन, प्रांत मंत्री नारायणजी और प्रशासनिक व्यवस्था व प्रचार-प्रसार प्रमुख मुकेश जैन भी मौजूद थे। स्वास्थ्य खराब होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल सम्मेलन में नहीं आ पाए। हिंदुत्व के लिए काम करें गडकरी
इंदौर। विहिप के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ. प्रवीण भाई तोगडिय़ा ने पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा में कहा कि भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को हिंदुत्व के लिए काम करना चाहिए। अगर वे ऐसा करते हैं तो करोड़ों हिंदुओं का भरोसा जीत पाएंगे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करेगा राष्ट्रीय सुरक्षा पर चिंतन
9-10 मार्च, 2010 में हरिद्वार में होगा अखिल भारतीय राष्ट्र-रक्षा कुंभ
भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में सीमाई सुरक्षा के साथ देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर भी चिंतित है। संघ की चिंता समय-समय पर प्रस्तावों, वक्तव्यों और कार्यक्रमों के माध्यम से व्यक्त होती रही है। देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा केन्द्र और राज्यों की सरकारों के साथ ही आमलोगों की चिंता का विषय बने इस दिशा में कई प्रयास किए जा रहे हैं। संघ की प्रेरणा और पहल से देश के अनेक सुरक्षा विशेषज्ञों, सेना और पुलिस के सेवानिवृत्त अधिकारियों तथा अन्य तकनीकी और विशिष्ट क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने ‘फोरम फाॅर इंटीग्रेटेड नेशनल सिक्योरिटी’ (फिन्स) का गठन किया है। अखिल भारतीय स्तर पर गठित इस फोरम को सभी राज्यों में विस्तार दिया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि फिन्स को विस्तार देने और इसे प्रभावी बनाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य श्री इन्द्रेश कुमार देशभर में प्रवास कर रहे हैं। इसी सिलसिले में वे 21 दिसंबर को भोपाल आए थे। श्री इन्द्रेश कुमार ने 9-10 मार्च, 2010 में प्रस्तावित राष्ट्र रक्षा सम्मेलन के सिलसिले में भोपाल के विशिष्ट लोगों से चर्चा। यह सम्मेलन हरिद्वारा में होना प्रस्तावित है। इस सम्मेलन में देशभर से लगभग सात सौ प्रतिनिधि शामिल होंगे। ये सभी प्रतिनिधि सुरक्षा संबंधी मामलों से जुडे विशेषज्ञ होंगे। इन्द्रेश कुमार भोपाल के सेवानिवृत्त पुलिस, प्रशासन और सेना के लोगों से मिले और घंटो चर्चा की। उन्होंने बताया कि हरिद्वारा में आयोजित इस राष्ट्र रक्षा सम्मेलन में देश की आंतरिक, सीमाई और बाह्य सुरक्षा के विषयों पर विविध आयामों से विस्तृत चर्चा की जायेगी। विभिन्न तकनीकी सत्रों में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में सुरक्षा संबंधी समस्याओं और सरकार तथा सुरक्षा संबंधी एजेंसियों के साथ ही नागरिकों स्तर पर हाने वाली पहल के बारे में सुझाव, योजना और रणनीति संबंधी चर्चा भी होगी।
श्री इन्द्रश कुमार ने चर्चा उपस्थित सभी वरिष्ठ प्रतिभागियों से हरिद्वार में प्रस्तावित राष्ट्ररक्षा सम्मेलन में उपस्थित होने और इस सम्मेलन में अधिकाधिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति के लिए सभी से प्रयास करने का आग्रह भी किया। भोपाल की चर्चा में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस आर डी शुक्ला, सेवानिवृत्त डीजीपी एन. नटराजन,एचएम जोशी, सुभाषचन्द्र त्रिपाठी, वीपी साहनी, कैप्टन वीपी सिंह, सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी डीएस गिल और जयकृष्ण गौड़ आदि उपस्थित थे। अन्य राज्य की तरह ही मध्यप्रदेश से भी प्रतिनिधियों की सूची तैयार की जायेगी। मध्यप्रदेश के सुरक्षा और रक्षा विशेषज्ञों का भी अच्छी संख्या में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जायेगा।
गुरुवार, 3 दिसंबर 2009
इस लिंक पर जाइये और गौ को बचाने के लिये हस्ताक्षर किजिये
http://eng.gougram.org/signature-campaign-for-the-welfare-of-indian-cows/
सोमवार, 16 नवंबर 2009
‘हरित तकनीक द्वारा अक्षम विकास‘ पर केद्रित होगा
द्वितीय भारतीय विज्ञान सम्मेलन
3 दिसम्बर, 2009 से इंदौर में
भोपाल (म.प्र) विभिन्न भारतीय भाषाओं के माध्यम से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रकीर्णन हेतु आयोजित भारतीय विज्ञान सम्मेलन का द्वितीय आयोजन इंदौर में 3 दिसम्बर से होने जा रहा है। जो हरित तकनीक द्वारा अक्षम विकास पर केंद्रित होगा ।
सम्मेलन का आयोजन आमजन के बीच लाभार्थ विज्ञान आंदोलन ‘‘विज्ञान भारती‘‘ म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय भोपाल द्वारा किया जा रहा है। प्रथम भारतीय विज्ञान सम्मेलन का आयोजन भोपाल में किया गया था जिसमें प्रख्यात वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी भाग लिया था ।
ग्लोबल वार्मिग की विश्व व्यापी समस्या की भारतीय दृष्टि से समाधान प्रस्तुत करने के लिए द्वितीय भारतीय विज्ञान सम्मेलन का विषय हरित तकनीक द्वारा अक्षम विकास है ।
ज्ञात है कि भारतीय विज्ञान सम्मेलन एक ऐसा प्रयास है जिसमें समस्त भारतीय भाषाओं में शोध पत्रों को प्रस्तुत किया जा सकता है। इस सम्मेलन की मूल अवधारणा है कि भारतीय भाषाओं के उपयोग से ही विज्ञान को भारतीय समाज के लिए कल्याणकारी बनाया जा सकता है।
सम्मेलन के सफल आयोजन हेतु मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान द्वारा तैयारियों की समीक्षा की गई । श्री चैहान ने विज्ञान सम्मेलन को गरिमा तथा उद्देश्य परकता के साथ आयोजित करने पर बल दिया ।
इस वर्ष सम्मेलन के अध्यक्ष देश के परम कम्प्युटर के जनक डा. विजय भाटकर होंगे ं साथ ही पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. कलाम इसरो के चैयरमैन प्रो. जी माधवन नायर, सीएसआईआर के पूर्व महानिदेशक श्री मशालकर जी, स्वामीनायन, परमाणु उर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोड़कर भी सम्मिलित होंगे ।
इस अवसर पर 27 नवम्बर से देवी अहिल्या परिसर में एक अखिल भारतीय प्रदर्शनी का भी आयोजन किया जाएगा । जिसमें म0प्र0 शासन सहित भारत सरकार के प्रतिष्ठित विज्ञान संस्थानों की उपलब्धियों का चित्रण होगा ।
द्वितीय भारतीय विज्ञान सम्मेलन,2009 प्रो. (डा.) जे.सी.बोस की एक सौ पचासवी जन्म शताब्दी को समर्पित है। भारतीय विज्ञान उन वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है जो जीवन के प्रत्येक मार्ग पर वातावरण को बिना किसी क्षति के आगे बढ़ने का समाधान प्रस्तुत करता है। वर्तमान में पाश्चात्य जगत में आ रही नवीन उर्जा सम्बन्धी धारणाएं हमारे पुरातन ज्ञान की सार्थकता को प्रमाणित कर रही है ।
हरित तकनीकी द्वारा राष्ट्र और उनके समाजों की सामाजिक, आर्थिक विभिन्नताओं, शहरीकरण, ग्रामीण निर्धनता पर्यावरणीय क्षय और विषय विकास की समस्याओं को हल किया जा सकता है।
द्वितीय भारतीय विज्ञान सम्मेलन
3 दिसम्बर, 2009 से इंदौर में
भोपाल (म.प्र) विभिन्न भारतीय भाषाओं के माध्यम से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रकीर्णन हेतु आयोजित भारतीय विज्ञान सम्मेलन का द्वितीय आयोजन इंदौर में 3 दिसम्बर से होने जा रहा है। जो हरित तकनीक द्वारा अक्षम विकास पर केंद्रित होगा ।
सम्मेलन का आयोजन आमजन के बीच लाभार्थ विज्ञान आंदोलन ‘‘विज्ञान भारती‘‘ म.प्र. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय भोपाल द्वारा किया जा रहा है। प्रथम भारतीय विज्ञान सम्मेलन का आयोजन भोपाल में किया गया था जिसमें प्रख्यात वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी भाग लिया था ।
ग्लोबल वार्मिग की विश्व व्यापी समस्या की भारतीय दृष्टि से समाधान प्रस्तुत करने के लिए द्वितीय भारतीय विज्ञान सम्मेलन का विषय हरित तकनीक द्वारा अक्षम विकास है ।
ज्ञात है कि भारतीय विज्ञान सम्मेलन एक ऐसा प्रयास है जिसमें समस्त भारतीय भाषाओं में शोध पत्रों को प्रस्तुत किया जा सकता है। इस सम्मेलन की मूल अवधारणा है कि भारतीय भाषाओं के उपयोग से ही विज्ञान को भारतीय समाज के लिए कल्याणकारी बनाया जा सकता है।
सम्मेलन के सफल आयोजन हेतु मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान द्वारा तैयारियों की समीक्षा की गई । श्री चैहान ने विज्ञान सम्मेलन को गरिमा तथा उद्देश्य परकता के साथ आयोजित करने पर बल दिया ।
इस वर्ष सम्मेलन के अध्यक्ष देश के परम कम्प्युटर के जनक डा. विजय भाटकर होंगे ं साथ ही पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. कलाम इसरो के चैयरमैन प्रो. जी माधवन नायर, सीएसआईआर के पूर्व महानिदेशक श्री मशालकर जी, स्वामीनायन, परमाणु उर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोड़कर भी सम्मिलित होंगे ।
इस अवसर पर 27 नवम्बर से देवी अहिल्या परिसर में एक अखिल भारतीय प्रदर्शनी का भी आयोजन किया जाएगा । जिसमें म0प्र0 शासन सहित भारत सरकार के प्रतिष्ठित विज्ञान संस्थानों की उपलब्धियों का चित्रण होगा ।
द्वितीय भारतीय विज्ञान सम्मेलन,2009 प्रो. (डा.) जे.सी.बोस की एक सौ पचासवी जन्म शताब्दी को समर्पित है। भारतीय विज्ञान उन वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है जो जीवन के प्रत्येक मार्ग पर वातावरण को बिना किसी क्षति के आगे बढ़ने का समाधान प्रस्तुत करता है। वर्तमान में पाश्चात्य जगत में आ रही नवीन उर्जा सम्बन्धी धारणाएं हमारे पुरातन ज्ञान की सार्थकता को प्रमाणित कर रही है ।
हरित तकनीकी द्वारा राष्ट्र और उनके समाजों की सामाजिक, आर्थिक विभिन्नताओं, शहरीकरण, ग्रामीण निर्धनता पर्यावरणीय क्षय और विषय विकास की समस्याओं को हल किया जा सकता है।
प्रज्ञा प्रवाह द्वारा वंदेमातरम् पर विमर्श
मुस्लिम देशो के राष्ट्रगीत में मातृवंदना, फिर वंदेमातरम् गैर इस्लामी कैसे!
भोपाल। जब विश्व के अधिकांश मुस्लिम देशों के राष्ट्रगीतों में मातृभूमि प्रतीकों का चित्रण है फिर राष्ट्रगान वंदेमातरम् को गैर इस्लामी कैसे कहा जा सकता है। मुसलमानों द्वारा वंदेमातरम् गायन का विरोध अज्ञानता का परिचायक है। यह विचार मनोज श्रीवास्तव, आयुक्त जनसम्पर्क मध्यप्रदेश शासन ने ‘प्रज्ञा प्रवाह‘ संस्थान द्वारा वंदेमातरम् पर आयोजित परिचर्चा में व्यक्त किया।
वन्दे मातरम् - गीत के साहित्येतिहासिक महत्व का अध्ययन करने और इसी विषय पर पुस्तिका लिखने वाले श्री श्रीवास्तव ने विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वंदेमातरम् का विरोध करने वाले सबसे पहले इसका अध्ययन करें। उन्होंने इसे नापसंद करने वाले राजेन्द्र यादव, ए.जी.नूरानी, शम्सुल इस्लाम, अम्बरीश आदि के वक्तव्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राष्ट्रगान सांप्रदायिकता कट्टरपन से परे मातृभूमि के प्रति समर्पित भावना का प्रतीक है और इस संवैधानिक मान्यता मिली है।
वरिष्ठ समाजसेवी लज्जाशंकर हरदेनिया ने भी वंदेमातरम् की ऐतिहासिक और संवैधानिक भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब भी संवैधानिक और पारंपरिक मान्यताओं के बीच टकराव हो तो हमें संवैधानिक दायित्वों को पालन करना चाहिए। इसी से आपसी भाईचारा और राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत हो सकेगी। उन्होंने जमाएते उलेमा हिंद द्वारा देवबंद में जारी वंदेमातरम् के फतवे के साथ ही उलेमाओं के कट्टरपंथी अन्य प्रस्तावों की भी आलोचना की । म.प्र. अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष मो. अनवर खान ने उलेमाओं द्वारा वंदेमातरम् के खिलाफ जारी फतवे को ‘सियासी चाल‘ बताते हुए कहा कि जब उल्लमा इकबाल ने वंदेमातरम् का विरोध नहीं किया फिर आजकल के फिरकापरस्ती ताकतों द्वारा इसका विरोध गैर वाजिब है। वैसे भी इस फतवे की कोई शरियत हैसियत नहीं है और न ही यह कोई खुदा का हुक्म है जिसे माना जाए। उन्होंने मुस्लिम समाज को देश ओर इसकी संस्कृति के प्रति दायित्वपूर्ण रवैया अपनाने का आहवान किया। देवबंद से तालीम प्राप्त भोपाल के मौलाना अख्तर हाशमी ने भी इस तरह के फतवों को कोई अहमियत न दिए जाने की पुरजोर वकालत की । उन्होंने कहा कि मुझे और मेरे जैसे लाखों मुसलमानों को इस बात पर फक्र है कि वो पूरी आजादी और मजहबी उसूलों के साथ इस देश में रह रहे हैं। श्री हाशमी ने कहा कि उलेमा कौम को प्रगति के रास्ते पर ले जाने वाले कदम उठाएं न कि गैर जरूरी मुद्दों पर विवाद और फसाद वाले कदम।
प्रख्यात चिंतक और धर्मपाल शोधपीठ के निदेशक प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज‘ ने देवबंद में वंदेमातरम के खिलाफ जारी फतवे को गहरी सांस्कृतिक कशमकश से उपजी सोच बताते हुए कहा कि ऐसे मुद्दो पर फतवे जारी करने की बजाय मुस्लिम संवाद का रास्ता अपनाए जिससे सही रास्ता निकल सके। विमर्श का आयोजन स्वराज संस्थान के सभाकक्ष में ‘प्रज्ञा प्रवाह‘ द्वारा किया गया था। प्रज्ञा प्रवाह के प्रांत संयोज बालकृष्ण दवे ने उपस्थिति सुधीजन के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रज्ञा प्रवाह के सह-संयोजक दीपक शर्मा ने किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डाॅ. देवेन्द्र दीपक, अधिवक्ता परिषद् के ब्रजकिशोर सांघी, मध्यप्रदेश राष्ट्रीय एकता परिषद् के रमेश शर्मा, संस्कार भारती के कामतानाथ वैशम्पायन, राष्ट्र सेविका समिति की सुखप्रीत कौर सहित काफी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।
मुस्लिम देशो के राष्ट्रगीत में मातृवंदना, फिर वंदेमातरम् गैर इस्लामी कैसे!
भोपाल। जब विश्व के अधिकांश मुस्लिम देशों के राष्ट्रगीतों में मातृभूमि प्रतीकों का चित्रण है फिर राष्ट्रगान वंदेमातरम् को गैर इस्लामी कैसे कहा जा सकता है। मुसलमानों द्वारा वंदेमातरम् गायन का विरोध अज्ञानता का परिचायक है। यह विचार मनोज श्रीवास्तव, आयुक्त जनसम्पर्क मध्यप्रदेश शासन ने ‘प्रज्ञा प्रवाह‘ संस्थान द्वारा वंदेमातरम् पर आयोजित परिचर्चा में व्यक्त किया।
वन्दे मातरम् - गीत के साहित्येतिहासिक महत्व का अध्ययन करने और इसी विषय पर पुस्तिका लिखने वाले श्री श्रीवास्तव ने विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वंदेमातरम् का विरोध करने वाले सबसे पहले इसका अध्ययन करें। उन्होंने इसे नापसंद करने वाले राजेन्द्र यादव, ए.जी.नूरानी, शम्सुल इस्लाम, अम्बरीश आदि के वक्तव्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राष्ट्रगान सांप्रदायिकता कट्टरपन से परे मातृभूमि के प्रति समर्पित भावना का प्रतीक है और इस संवैधानिक मान्यता मिली है।
वरिष्ठ समाजसेवी लज्जाशंकर हरदेनिया ने भी वंदेमातरम् की ऐतिहासिक और संवैधानिक भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब भी संवैधानिक और पारंपरिक मान्यताओं के बीच टकराव हो तो हमें संवैधानिक दायित्वों को पालन करना चाहिए। इसी से आपसी भाईचारा और राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत हो सकेगी। उन्होंने जमाएते उलेमा हिंद द्वारा देवबंद में जारी वंदेमातरम् के फतवे के साथ ही उलेमाओं के कट्टरपंथी अन्य प्रस्तावों की भी आलोचना की । म.प्र. अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष मो. अनवर खान ने उलेमाओं द्वारा वंदेमातरम् के खिलाफ जारी फतवे को ‘सियासी चाल‘ बताते हुए कहा कि जब उल्लमा इकबाल ने वंदेमातरम् का विरोध नहीं किया फिर आजकल के फिरकापरस्ती ताकतों द्वारा इसका विरोध गैर वाजिब है। वैसे भी इस फतवे की कोई शरियत हैसियत नहीं है और न ही यह कोई खुदा का हुक्म है जिसे माना जाए। उन्होंने मुस्लिम समाज को देश ओर इसकी संस्कृति के प्रति दायित्वपूर्ण रवैया अपनाने का आहवान किया। देवबंद से तालीम प्राप्त भोपाल के मौलाना अख्तर हाशमी ने भी इस तरह के फतवों को कोई अहमियत न दिए जाने की पुरजोर वकालत की । उन्होंने कहा कि मुझे और मेरे जैसे लाखों मुसलमानों को इस बात पर फक्र है कि वो पूरी आजादी और मजहबी उसूलों के साथ इस देश में रह रहे हैं। श्री हाशमी ने कहा कि उलेमा कौम को प्रगति के रास्ते पर ले जाने वाले कदम उठाएं न कि गैर जरूरी मुद्दों पर विवाद और फसाद वाले कदम।
प्रख्यात चिंतक और धर्मपाल शोधपीठ के निदेशक प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज‘ ने देवबंद में वंदेमातरम के खिलाफ जारी फतवे को गहरी सांस्कृतिक कशमकश से उपजी सोच बताते हुए कहा कि ऐसे मुद्दो पर फतवे जारी करने की बजाय मुस्लिम संवाद का रास्ता अपनाए जिससे सही रास्ता निकल सके। विमर्श का आयोजन स्वराज संस्थान के सभाकक्ष में ‘प्रज्ञा प्रवाह‘ द्वारा किया गया था। प्रज्ञा प्रवाह के प्रांत संयोज बालकृष्ण दवे ने उपस्थिति सुधीजन के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रज्ञा प्रवाह के सह-संयोजक दीपक शर्मा ने किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डाॅ. देवेन्द्र दीपक, अधिवक्ता परिषद् के ब्रजकिशोर सांघी, मध्यप्रदेश राष्ट्रीय एकता परिषद् के रमेश शर्मा, संस्कार भारती के कामतानाथ वैशम्पायन, राष्ट्र सेविका समिति की सुखप्रीत कौर सहित काफी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।
सोमवार, 12 अक्टूबर 2009
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल, युगाब्द 5111
दिनांक: 9,10,11 अक्टूबर, 2009
राजगृह, नालन्दा (बिहार)
प्रस्ताव क्र॰: 1
सीमा सुरक्षा सुदृढ़ करें
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल भारत - तिब्बत (चीन अधिकृत) सीमा पर हुए हाल के घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त करता है। विस्तारवादी चीन द्वारा हमारे भू-भाग पर कब्जा जमाने के निरंतर प्रयासों को कई समाचार माध्यमों ने उजागर किया है और अपने सुरक्षा विभाग के जिम्मेवार अधिकारियों ने भी इसकी पुष्टि की है।
अकेले गत वर्ष में ही इन रपटों ने चीन की ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ द्वारा नियंत्रण रेखा के
270 उल्लंघन और ‘आक्रामक सीमा चैकसी’ की 2285 घटनाएँ होने की पुष्टि की है। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था पर दुःखद टिप्पणी है कि हमारे भू-भाग के बारे में विरोधियों की कुटिल योजनाओं के प्रति देश की जनता को सचेत करने के स्थान पर कानूनी कार्यवाही द्वारा मीडिया के स्वरों को दबाने का प्रयास हुआ है और आसन्न खतरे को निर्लज्जतापूर्वक कम दिखाने का भी प्रयास हुआ है। चीन की आक्रामक गतिविधियों के विरोध में अपनी तैयारी के विषय में हमारे नेताओं द्वारा दिये जा रहे पराभूत मनोवृत्ति वाले वक्तव्य अत्यन्त निराशाजनक एवं मनोबल गिराने वाले हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे आस-पास के देशों के आक्रामक व्यवहार के प्रति हमारी प्रतिक्रिया सदैव ढीली-ढाली रहती है। परम श्रद्धेय दलाई लामा को शरण देने के ऐतिहासिक निर्णय को छोड़ दें तो, तिब्बत के प्रश्न पर हमने निरंतर गलतियाँ की हैं और अंततः सार्वभौम व स्वतंत्र तिब्बत पर चीनी कब्जे को मान्यता ही दे दी है। चीन ने 50 के दशक में लद्दाख के अक्साई चिन पर कब्जा जमा लिया। हमारे अन्य भी भू-भाग हड़पने के चीन के षड्यंत्र के परिणामस्वरूप 1987 में सुंदोरांग चू घाटी के विषय में हमें अपमानजनक समझौता करना पड़ा। हमारी कमजोरी का लाभ उठाकर अब तो चीन ने पूरे अरुणाचल प्रदेश पर ही अपना दावा करना प्रारम्भ कर दिया है।
अ.भा.का.मं. का मानना है कि इस प्रकार के आक्रमणकारी रवैये पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया सर्वथा अपर्याप्त रही है। कार्यकारी मंडल सरकार से आवाहन करता है कि भारत-तिब्बत सीमा को और साथ ही साथ समुद्री सीमा, भारत-पाक एवं भारत-बांग्लादेश सीमा को भी सुदृढ़ करने के लिए तुरन्त कदम उठाए। चीन द्वारा सीमा के उस पार भारी सैन्य बल का एकत्रीकरण और ढाँचागत व्यवस्थाओं के निर्माण को देखते हुए हमें भारत-तिब्बत सीमा पर अपने सैन्य बल की प्रत्युत्तर क्षमता को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है।
कूटनीतिक संवाद, घेरना और हमारे शत्रुओं को प्रोत्साहन देना - इन तीन बातों का भारत को परेशान करने के लिए चीन व्यूहात्मक शस्त्र के रूप में प्रयोग करता है। दक्षिण म्यांमा के
कोको द्वीप में स्थित उनकी गश्ती चैकी को उन्होंने पूर्णरूपेण सेना चैकी के रूप में विकसित कर लिया है। श्रीलंका में चीन एक वाणिज्य बंदरगाह का निर्माण कर रहा है जबकि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में उसके द्वारा बनाया गया ग्वादर सैनिक बंदरगाह कामकाज के लिये तैयार हो चुका है। एक ओर वह भारत-तिब्बत सीमा को सैनिकी उŸोजना के लिये उपयोग में ला रहा है तो दूसरी ओर पूर्वोŸार भारत में स्थित आतंकवादी और राष्ट्रविरोधी तत्वों की मदद करने के लिए भारत-म्यांमा सीमा का दुरुपयोग कर रहा है। वह भारत को तोड़ने की बात तक करने लगा है।
कार्यकारी मंडल को खेद के साथ कहना पड़ता है कि सरकार के इस ढुलमुल रवैये
की कीमत भारत को न केवल सीमा पर अपितु कूटनीतिक मोर्चे पर भी चुकानी पड़ रही है।
‘ एशियन डेवलपमेंट बैंक ’ में अरुणाचल प्रदेश का मुद्दा उठाकर उस राज्य के विकास के लिए ऋण प्राप्त करने के भारत के प्रयासों को बाधित करने में चीन सफल हुआ है। चीन ने परमाणु आपूर्ति समूह के देशों को भारत के विरुद्ध लगे प्रतिबंधों को हटाने से रोकने का असफल प्रयास भी किया है।
अ.भा.का.मं. सरकार को स्मरण दिलाना चाहता है कि उसे संसद द्वारा 14 नवम्बर, 1962 को पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव की भावना के प्रकाश में कदम उठाना चाहिए, जिसमें चीन द्वारा हड़पी गई सारी भूमि वापस प्राप्त करने की बात स्पष्ट रूप से कही गई थी। भारत सरकार को चीन से स्पष्ट रूप से कह देना चाहिए कि वह पश्चिमी क्षेत्र में हड़पे गये भू-भाग को वापस करे और अन्य क्षेत्रों के संदर्भ में कोई दावा पेश न करे। चीन से कहा जाए कि वह मैकमोहन रेखा को भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में उसी तरह मान्यता दे जिस तरह उसने चीन-म्यांमा सीमा पर उसे दी है।
यह बात चिन्ताजनक है कि अरुणाचल प्रदेश व कश्मीर के नागरिकों को चीन ‘पेपर वीसा’ दे रहा है। इस उकसाने वाली कारवाई से चीन दिखाना चाहता है कि अरुणाचल प्रदेश व कश्मीर को वह भारत के अविभाज्य अंग के रूप में स्वीकार नहीं करता। कार्यकारी मंडल माँग करता है कि सरकार आव्रजन अधिकारियों को आदेश दे कि, लोगों को देश से बाहर जाने के लिये इस प्रकार के ‘पेपर वीसा’ के प्रयोग पर तत्काल प्रतिबंध लगाये। आक्रामक दौत्य नीति के साथ इस प्रकार के दृढ़ कदम ही चीन के संबंध में अनुकूल परिणाम दे सकते हैं।
भारत-पाक मोर्चे पर भी इसी तरह की चिंताओं को कार्यकारी मंडल रेखांकित करना चाहता है। विशेषकर 9 जुलाई 2009 का भारत और पाक के प्रधानमंत्रियों का शर्म-अल-शेख का
संयुक्त वक्तव्य देश को स्तब्ध कर देने वाला है। अनेक विशेषज्ञ और विभिन्न राजनीतिक दलो के नेताओं ने इस वक्तव्य की दौत्य संबंधी भारी भूलों को उजागर किया है, जैसे - बलूचिस्तान मुद्दे को उसमें लाना और पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को जारी रखने पर भी उससे वात्र्ता पुनः प्रारम्भ करने की सहमति व्यक्त करना।
अ.भा.का.मं. माँग करता है कि पाकिस्तान के संबंध में भी संसद के 22 फरवरी 1994 के सर्वसम्मत प्रस्ताव की भावना का सरकार पालन करे, जिसमें कहा गया है कि पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में वापस लाना ही एक मात्र मुद्दा है।
कार्यकारी मंडल हमारी सीमाओं की रक्षा में लगे बहादुर जवानों एवं अधिकारियों के शौर्यपूर्ण कृत्यों का अभिनंदन करता है और देशवासियों से आवाहन करता है कि वे सदैव सतर्क रह कर सरकार को अपनी भौगोलिक अखंडता एवं स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए बाध्य करें ।
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल, युगाब्द 5111
दिनांक: 9,10,11 अक्टूबर, 2009
राजगृह, नालन्दा (बिहार)
प्रस्ताव क्र॰: 1
सीमा सुरक्षा सुदृढ़ करें
अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल भारत - तिब्बत (चीन अधिकृत) सीमा पर हुए हाल के घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त करता है। विस्तारवादी चीन द्वारा हमारे भू-भाग पर कब्जा जमाने के निरंतर प्रयासों को कई समाचार माध्यमों ने उजागर किया है और अपने सुरक्षा विभाग के जिम्मेवार अधिकारियों ने भी इसकी पुष्टि की है।
अकेले गत वर्ष में ही इन रपटों ने चीन की ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ द्वारा नियंत्रण रेखा के
270 उल्लंघन और ‘आक्रामक सीमा चैकसी’ की 2285 घटनाएँ होने की पुष्टि की है। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था पर दुःखद टिप्पणी है कि हमारे भू-भाग के बारे में विरोधियों की कुटिल योजनाओं के प्रति देश की जनता को सचेत करने के स्थान पर कानूनी कार्यवाही द्वारा मीडिया के स्वरों को दबाने का प्रयास हुआ है और आसन्न खतरे को निर्लज्जतापूर्वक कम दिखाने का भी प्रयास हुआ है। चीन की आक्रामक गतिविधियों के विरोध में अपनी तैयारी के विषय में हमारे नेताओं द्वारा दिये जा रहे पराभूत मनोवृत्ति वाले वक्तव्य अत्यन्त निराशाजनक एवं मनोबल गिराने वाले हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे आस-पास के देशों के आक्रामक व्यवहार के प्रति हमारी प्रतिक्रिया सदैव ढीली-ढाली रहती है। परम श्रद्धेय दलाई लामा को शरण देने के ऐतिहासिक निर्णय को छोड़ दें तो, तिब्बत के प्रश्न पर हमने निरंतर गलतियाँ की हैं और अंततः सार्वभौम व स्वतंत्र तिब्बत पर चीनी कब्जे को मान्यता ही दे दी है। चीन ने 50 के दशक में लद्दाख के अक्साई चिन पर कब्जा जमा लिया। हमारे अन्य भी भू-भाग हड़पने के चीन के षड्यंत्र के परिणामस्वरूप 1987 में सुंदोरांग चू घाटी के विषय में हमें अपमानजनक समझौता करना पड़ा। हमारी कमजोरी का लाभ उठाकर अब तो चीन ने पूरे अरुणाचल प्रदेश पर ही अपना दावा करना प्रारम्भ कर दिया है।
अ.भा.का.मं. का मानना है कि इस प्रकार के आक्रमणकारी रवैये पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया सर्वथा अपर्याप्त रही है। कार्यकारी मंडल सरकार से आवाहन करता है कि भारत-तिब्बत सीमा को और साथ ही साथ समुद्री सीमा, भारत-पाक एवं भारत-बांग्लादेश सीमा को भी सुदृढ़ करने के लिए तुरन्त कदम उठाए। चीन द्वारा सीमा के उस पार भारी सैन्य बल का एकत्रीकरण और ढाँचागत व्यवस्थाओं के निर्माण को देखते हुए हमें भारत-तिब्बत सीमा पर अपने सैन्य बल की प्रत्युत्तर क्षमता को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है।
कूटनीतिक संवाद, घेरना और हमारे शत्रुओं को प्रोत्साहन देना - इन तीन बातों का भारत को परेशान करने के लिए चीन व्यूहात्मक शस्त्र के रूप में प्रयोग करता है। दक्षिण म्यांमा के
कोको द्वीप में स्थित उनकी गश्ती चैकी को उन्होंने पूर्णरूपेण सेना चैकी के रूप में विकसित कर लिया है। श्रीलंका में चीन एक वाणिज्य बंदरगाह का निर्माण कर रहा है जबकि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में उसके द्वारा बनाया गया ग्वादर सैनिक बंदरगाह कामकाज के लिये तैयार हो चुका है। एक ओर वह भारत-तिब्बत सीमा को सैनिकी उŸोजना के लिये उपयोग में ला रहा है तो दूसरी ओर पूर्वोŸार भारत में स्थित आतंकवादी और राष्ट्रविरोधी तत्वों की मदद करने के लिए भारत-म्यांमा सीमा का दुरुपयोग कर रहा है। वह भारत को तोड़ने की बात तक करने लगा है।
कार्यकारी मंडल को खेद के साथ कहना पड़ता है कि सरकार के इस ढुलमुल रवैये
की कीमत भारत को न केवल सीमा पर अपितु कूटनीतिक मोर्चे पर भी चुकानी पड़ रही है।
‘ एशियन डेवलपमेंट बैंक ’ में अरुणाचल प्रदेश का मुद्दा उठाकर उस राज्य के विकास के लिए ऋण प्राप्त करने के भारत के प्रयासों को बाधित करने में चीन सफल हुआ है। चीन ने परमाणु आपूर्ति समूह के देशों को भारत के विरुद्ध लगे प्रतिबंधों को हटाने से रोकने का असफल प्रयास भी किया है।
अ.भा.का.मं. सरकार को स्मरण दिलाना चाहता है कि उसे संसद द्वारा 14 नवम्बर, 1962 को पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव की भावना के प्रकाश में कदम उठाना चाहिए, जिसमें चीन द्वारा हड़पी गई सारी भूमि वापस प्राप्त करने की बात स्पष्ट रूप से कही गई थी। भारत सरकार को चीन से स्पष्ट रूप से कह देना चाहिए कि वह पश्चिमी क्षेत्र में हड़पे गये भू-भाग को वापस करे और अन्य क्षेत्रों के संदर्भ में कोई दावा पेश न करे। चीन से कहा जाए कि वह मैकमोहन रेखा को भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा के रूप में उसी तरह मान्यता दे जिस तरह उसने चीन-म्यांमा सीमा पर उसे दी है।
यह बात चिन्ताजनक है कि अरुणाचल प्रदेश व कश्मीर के नागरिकों को चीन ‘पेपर वीसा’ दे रहा है। इस उकसाने वाली कारवाई से चीन दिखाना चाहता है कि अरुणाचल प्रदेश व कश्मीर को वह भारत के अविभाज्य अंग के रूप में स्वीकार नहीं करता। कार्यकारी मंडल माँग करता है कि सरकार आव्रजन अधिकारियों को आदेश दे कि, लोगों को देश से बाहर जाने के लिये इस प्रकार के ‘पेपर वीसा’ के प्रयोग पर तत्काल प्रतिबंध लगाये। आक्रामक दौत्य नीति के साथ इस प्रकार के दृढ़ कदम ही चीन के संबंध में अनुकूल परिणाम दे सकते हैं।
भारत-पाक मोर्चे पर भी इसी तरह की चिंताओं को कार्यकारी मंडल रेखांकित करना चाहता है। विशेषकर 9 जुलाई 2009 का भारत और पाक के प्रधानमंत्रियों का शर्म-अल-शेख का
संयुक्त वक्तव्य देश को स्तब्ध कर देने वाला है। अनेक विशेषज्ञ और विभिन्न राजनीतिक दलो के नेताओं ने इस वक्तव्य की दौत्य संबंधी भारी भूलों को उजागर किया है, जैसे - बलूचिस्तान मुद्दे को उसमें लाना और पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को जारी रखने पर भी उससे वात्र्ता पुनः प्रारम्भ करने की सहमति व्यक्त करना।
अ.भा.का.मं. माँग करता है कि पाकिस्तान के संबंध में भी संसद के 22 फरवरी 1994 के सर्वसम्मत प्रस्ताव की भावना का सरकार पालन करे, जिसमें कहा गया है कि पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में वापस लाना ही एक मात्र मुद्दा है।
कार्यकारी मंडल हमारी सीमाओं की रक्षा में लगे बहादुर जवानों एवं अधिकारियों के शौर्यपूर्ण कृत्यों का अभिनंदन करता है और देशवासियों से आवाहन करता है कि वे सदैव सतर्क रह कर सरकार को अपनी भौगोलिक अखंडता एवं स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए बाध्य करें ।
मध्यप्रदेश में एनजीओ पंचायत के मायने
अनिल सौमित्र
12 अक्टूबर को प्रदेश की राजधानी भोपाल में एनजीओ पंचायत आहूत की गई है। पहले यह पंचायत 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन किया जाना था। सरकार ने गांधीजी से संबंधित दिवस पर एनजीओ पंचायत कर कुछ विशेष संदेश देने की सोची होगी। लेकिन किन्ही कारणों से यह पंचायत अब 12 अक्टूबर को की जा रही है। दिवस चाहे कोई भी हो, इस पंचायत का पूर्व नियोजित कोई उद्देश्य अवश्य होगा। प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चैहान ने ‘‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’’ का नारा दिया है। सरकार ने 2013 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा है। उल्लेखनीय है कि सिर्फ भाजपा सरकार ही नहीं, संपूर्ण भाजपा और कहें तो संपूर्ण राष्ट्रवादी शक्तियों की यही अभीप्सा है - परम् वैभवम् नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्’ अर्थात् अपने देश को परम वैभव के शिखर तक ले जाना है। राष्ट्र के परम वैभव का सपना तभी सकार होगा जब एक-एक प्रदेश परम् वैभव की ओर अग्रसर होगा।
स्वप्न का संबंध स्वप्नद्रष्ट्रा से भी है। स्वप्न तो कोई भी देख सकता है, लेकिन उसे साकार वहीं कर सकता है जो कुशल योजनाकार और रणनीतिकार हो। स्वप्न को नीति, योजना और रणनीति दिए बिना साकार करना संभव नहीं है। आजादी के बाद अनेक पार्टियों और सरकारों ने सुखद स्वप्न देखे। लेकिन ये स्वप्न नारों में तब्दिल होकर रह गए। क्या भाजपा सरकार के मुखिया शिवराज का स्वप्न भी नारे में तब्दील होकर रह जायेगा! अन्य पार्टियों और सरकारों की तुलना में भाजपा और भाजपा सरकारों में थोड़ा ही सही, लेकिन फर्क तो जरूर है। यही फर्क उसे स्वप्न को साकार करने का जज्बा, उर्जा और कौशल देता है। भाजपा के पास आज भी प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज है। सैकड़ों समविचारी संगठनों का सहयोग और उर्जा है। अगर शिवराज सरकार ने पार्टी के कार्यकर्ताओं और समविचारी संगठनों की उर्जा और कौशल का उपयोग किया तो स्वर्णिम मध्यप्रदेश का स्वप्न साकार होने में देर नहीं लगेगी।
शिवराज सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में भी विभिन्न पंचायतों के माध्यम से जनमत का आगाज किया था। इस कार्यकाल में भी प्रदेश के मुखिया ने पंचों को मंच देने का सिलसिला जारी रखा है। वे जानते हैं पंच ही परमेश्वर है। भाजपा सरकार हकदारों को सुनना चाहती है, जिनका हक है उनसे दो बातें करना चाहती है। मुख्यमंत्री की चैपाल में पंचायत का आयोजन सबको सुनने का एक उपक्रम है। लेकिन सुने हुए को गुना जाए और गुने हुए को वापस सब तक पहुचाया जाए, यह जनता-जनार्दन की अपेक्षा है। महिला पंचायत, किसान पंचायत, जनजाति (आदिवासी) पंचायत, वन पंचायत, अनुसूचित जाति पंचायत, कोटवार पंचायत, खेल पंचायत, लघु उद्योग पंचायत तथा कारीगर-शिल्पी पंचायत, किसान महापंचायत, निःशक्तजन पंचायत, मछुआ पंचायत, स्व-सहायता समूह पंचायत, हम्माल-तुलावट पंचायत और रिक्शा-ठेला चालक पंचायत के बाद इस एनजीओ पंचायत के अपने मायने हैं। इसके बाद कामकाजी महिलाओं की पंचायत भी की जा रही है।
यह पंचायत पूर्व में आयोजित पंचायतों से कई मायनों में भिन्न है। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मध्यप्रदेश ही नहीं, देश और दुनियाभर में सार्वजनिक और निजी (सेक्टर) क्षेत्र की तरह एनजीओ सेक्टर का भी विस्तार हुआ है। पूर्व में आयोजित विभिन्न पंचायतों के बरक्स, राजनीति और वैचारिक क्षेत्र में एनजीओ सेक्टर का उन सबसे अधिक दखल और प्रभाव है। प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एनजीओ की अलग किस्म की राजनीति है। एनजीओ के अनेक समूहों का न सिर्फ सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में दखल है, बल्कि वे देश और दुनिया की राजनीति को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं। आज कुकुरमुत्ते की तरह पनप रहे पनप रहे एनजीओ की चर्चा छोड़ दे ंतो मध्यप्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में स्थापित एनजीओ अपनी-अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि के साथ अपने उद्देश्यों को अंजाम देने में लगे हैं। अमेरिका जैसे पूंजीवादी देशों से लेकर सोवियत रूस तक एनजीओ के माध्यम से अपने नियोजित उद्देश्यों को पूरा करते रहे हैं। अनेक सरकारों की खुफिया एजेंसियां भी अपनी विदेश नीति को क्रियान्वित करने में एनजीओ को माध्यम की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। लगभग सभी बड़ी रानीतिक पार्टियों ने एनजीओ प्रकोष्ठ की स्थापना कर रखी है। लेकिन अभी इस क्षेत्र में वाम राजनीति का एकछत्र कब्जा है। शिक्षा, शोध, मानवाधिकार, गरीबी, सूचना और ऐसे लगभग सभी क्षेत्रों में वाम राजनीति ने एनजीओ के माध्यम से अपना दखल और रूतबा बनाए रखा है। आज तक देशभर में माक्र्सवाद, लेनिनवाद, माओवाद और कुल मिलाकर वाम (कम्युनिस्ट) राजनीति को स्थापित करने, उसे विस्तार देने में एनजीओ को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। भारत में एनजीओ सेक्टर अपेक्षाकृत नया और कच्चा है। इस लिए अभी से इस दिशा में जागरुक, सचेत और सावधानी पूर्वक पहल व प्रयोग की दरकार है।
मध्यप्रदेश में जन अभियान परिषद् के रूप में एक अभिनव प्रयोग हुआ है। स्वैच्छिक संस्थाओं को संस्कार और प्रशिक्षण के माध्यम से सशक्त करने का प्रयास भले ही दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में शुरु हुआ, लकिन तब तक यह सुप्तावस्था में ही था। भाजपा सरकार ने पहली बार इस दिशा में एक सार्थक और सकारात्मक पहल की। भारत सरकार का योजना विभाग, योजना आयोग के माध्यम से इस दिशा में सक्रिय प्रयोग कर रहा है। इस प्रयोग के परिणाम भी आने लगे हैं। मध्यप्रदेश सरकार की पहल को और अधिक सक्रियता की दरकार है। जन अभियान परिषद् को कार्य करते हुए दशक बीत गए, लेकिन अभी तक कोई उल्लेखनीय परिणाम नहीं दिखा। अच्छे बजट और भारी-भरकम अमले के बावजूद जन अभियान परिषद् का कार्य-निष्पादन संतोषजनक नहीं है। स्वैच्छिक संस्थाओं और सरकार के बीच नीति, योजना और क्रियान्वयन के स्तर पर अभी बहुत कुछ किया जाना है। संभव है 12 अक्टूबर को आयोजित इस एनजीओ पंचायत में किसी एनजीओ नीति के प्रारूप की घोषणा हो। मुख्यमंत्री चाहें तो जन अभियान परिषद् के बैनर तले एक नीति-निर्माण समिति का गठन भी कर सकते हैं। ग्राम पंचायत से लेकर प्रदेश स्तर तक न सिर्फ विकास योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में, बल्कि आम जनता तक सुशासन सुनिश्चित करने में भी एनजीओ की भूमिका तय की जा सकती है।
जब कभी विकास की बात होती है तो उसके साथ विभिन्न ‘‘सिद्धांतों-वादों’’ की चर्चा भी होती है। विकास का चाहे पूंजीवादी, समाजवादी या माक्र्सवादी सिद्धांत हो या हिन्दुत्ववादी सिद्धांत, सबका लक्ष्य व्यक्ति को सुखी और सम्पन्न बनाना है। हिन्दुत्ववादी चिन्तन विशेष रूप से सभी प्रकार के संघर्षों का निषेध करते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता देता है। यह विविधताओं और श्रेष्ठताओं को सहज स्वीकार करता है। गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय का विकास चिन्तन इसी हिन्दुत्व से प्रेरित और पोषित है। भारतीय समाज ने इसे सहज स्वीकार किया है। लेकिन माक्र्सवादी, माओवादी और लेनिनवादी अपने विकास सिद्धांतों को जबरन थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जो न माने उसे हथियारों का भय दिखाने और भयभीत न होने वालों को खत्म कर देने का खूनी खेल हैं। भाजपा और भाजपा सरकार के मुखिया गाहे-बगाहे हिन्दुत्व, एकात्ममानववाद, अन्त्योदय और सर्वोदय की चर्चा करते ही रहे हैं। सर्वे भवन्तु सुखिनः की कल्पना साकार करने में प्रदेश के हजारों स्वैच्छिक संगठन समाज के प्रतिनिधि के तौर पर सरकार की मदद के लिए आगे आ सकते हैं। बशर्ते वे प्रशिक्षित और संस्कारित किए जाएं। प्रदेश के स्थापित एनजीओ स्वयं के प्रशिक्षण और संस्कार का विरोध भी कर सकते हैं। उन्हें अपने प्रशिक्षण और संस्कार का गुमान भी है। सरकार का राजधर्म तो यही है कि नये-पुराने, छोटे-बड़े सभी को साथ लेकर चले। वैचारिक अंतरद्र्वन्दों के बीच आपसी समन्वय स्थापित हो। प्रदेश की स्वैच्छिक संस्थाएं अपने शासकीय मुखिया के साथ कदम मिलाने, साथ चलने की चेष्टा करें तो ही बीमारू मध्यप्रदेश, स्वस्थ होकर स्वर्णिम प्रदेश बन सकेगा। यही स्वर्णिम प्रदेश, परम वैभवशाली राष्ट्र के लिए देश का नेतृत्व कर सकेगा। स्वर्णिम मध्यप्रदेश की चाह, कांग्रेस के गरीबी हटाओ और अनुशासन लाओ के नारे की तरह न हो जाए, इसलिए प्रदेश के विकास के प्रति अटूट प्रतिबद्धता विकसित करने की जरूरत है। इस दृष्टि से निश्चित ही इस एनजीओ पंचायत के मायने हैं। यह पंचायत इस आर्षवाणी की साक्षी बनेगी -
समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहिचित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमिभिमन्त्रये वः
समानने दो हविषा जुहोमि।।
अर्थात् मिलकर कार्य करने वालों का मन्त्र समान होता है, ये परस्पर मंत्रणा करके एक निर्णय पर पहंुचते हैं, चित्तसहित इनका मन समान होता है। मैं तुम्हे मिलकर समान निष्कर्ष पर पहंुचने की प्रेरणा देता हूं। यह एनजीओ पंचायत स्वर्णिम मध्यप्रदेश के लिए प्रदेश के मुखिया द्वारा समन्वय और उर्जा संचय का एक आह्वान भी है।
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)
ई-31, 45 बंगले, भोपाल
12 अक्टूबर को प्रदेश की राजधानी भोपाल में एनजीओ पंचायत आहूत की गई है। पहले यह पंचायत 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन किया जाना था। सरकार ने गांधीजी से संबंधित दिवस पर एनजीओ पंचायत कर कुछ विशेष संदेश देने की सोची होगी। लेकिन किन्ही कारणों से यह पंचायत अब 12 अक्टूबर को की जा रही है। दिवस चाहे कोई भी हो, इस पंचायत का पूर्व नियोजित कोई उद्देश्य अवश्य होगा। प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चैहान ने ‘‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’’ का नारा दिया है। सरकार ने 2013 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा है। उल्लेखनीय है कि सिर्फ भाजपा सरकार ही नहीं, संपूर्ण भाजपा और कहें तो संपूर्ण राष्ट्रवादी शक्तियों की यही अभीप्सा है - परम् वैभवम् नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्’ अर्थात् अपने देश को परम वैभव के शिखर तक ले जाना है। राष्ट्र के परम वैभव का सपना तभी सकार होगा जब एक-एक प्रदेश परम् वैभव की ओर अग्रसर होगा।
स्वप्न का संबंध स्वप्नद्रष्ट्रा से भी है। स्वप्न तो कोई भी देख सकता है, लेकिन उसे साकार वहीं कर सकता है जो कुशल योजनाकार और रणनीतिकार हो। स्वप्न को नीति, योजना और रणनीति दिए बिना साकार करना संभव नहीं है। आजादी के बाद अनेक पार्टियों और सरकारों ने सुखद स्वप्न देखे। लेकिन ये स्वप्न नारों में तब्दिल होकर रह गए। क्या भाजपा सरकार के मुखिया शिवराज का स्वप्न भी नारे में तब्दील होकर रह जायेगा! अन्य पार्टियों और सरकारों की तुलना में भाजपा और भाजपा सरकारों में थोड़ा ही सही, लेकिन फर्क तो जरूर है। यही फर्क उसे स्वप्न को साकार करने का जज्बा, उर्जा और कौशल देता है। भाजपा के पास आज भी प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज है। सैकड़ों समविचारी संगठनों का सहयोग और उर्जा है। अगर शिवराज सरकार ने पार्टी के कार्यकर्ताओं और समविचारी संगठनों की उर्जा और कौशल का उपयोग किया तो स्वर्णिम मध्यप्रदेश का स्वप्न साकार होने में देर नहीं लगेगी।
शिवराज सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में भी विभिन्न पंचायतों के माध्यम से जनमत का आगाज किया था। इस कार्यकाल में भी प्रदेश के मुखिया ने पंचों को मंच देने का सिलसिला जारी रखा है। वे जानते हैं पंच ही परमेश्वर है। भाजपा सरकार हकदारों को सुनना चाहती है, जिनका हक है उनसे दो बातें करना चाहती है। मुख्यमंत्री की चैपाल में पंचायत का आयोजन सबको सुनने का एक उपक्रम है। लेकिन सुने हुए को गुना जाए और गुने हुए को वापस सब तक पहुचाया जाए, यह जनता-जनार्दन की अपेक्षा है। महिला पंचायत, किसान पंचायत, जनजाति (आदिवासी) पंचायत, वन पंचायत, अनुसूचित जाति पंचायत, कोटवार पंचायत, खेल पंचायत, लघु उद्योग पंचायत तथा कारीगर-शिल्पी पंचायत, किसान महापंचायत, निःशक्तजन पंचायत, मछुआ पंचायत, स्व-सहायता समूह पंचायत, हम्माल-तुलावट पंचायत और रिक्शा-ठेला चालक पंचायत के बाद इस एनजीओ पंचायत के अपने मायने हैं। इसके बाद कामकाजी महिलाओं की पंचायत भी की जा रही है।
यह पंचायत पूर्व में आयोजित पंचायतों से कई मायनों में भिन्न है। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मध्यप्रदेश ही नहीं, देश और दुनियाभर में सार्वजनिक और निजी (सेक्टर) क्षेत्र की तरह एनजीओ सेक्टर का भी विस्तार हुआ है। पूर्व में आयोजित विभिन्न पंचायतों के बरक्स, राजनीति और वैचारिक क्षेत्र में एनजीओ सेक्टर का उन सबसे अधिक दखल और प्रभाव है। प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एनजीओ की अलग किस्म की राजनीति है। एनजीओ के अनेक समूहों का न सिर्फ सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में दखल है, बल्कि वे देश और दुनिया की राजनीति को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं। आज कुकुरमुत्ते की तरह पनप रहे पनप रहे एनजीओ की चर्चा छोड़ दे ंतो मध्यप्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में स्थापित एनजीओ अपनी-अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि के साथ अपने उद्देश्यों को अंजाम देने में लगे हैं। अमेरिका जैसे पूंजीवादी देशों से लेकर सोवियत रूस तक एनजीओ के माध्यम से अपने नियोजित उद्देश्यों को पूरा करते रहे हैं। अनेक सरकारों की खुफिया एजेंसियां भी अपनी विदेश नीति को क्रियान्वित करने में एनजीओ को माध्यम की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। लगभग सभी बड़ी रानीतिक पार्टियों ने एनजीओ प्रकोष्ठ की स्थापना कर रखी है। लेकिन अभी इस क्षेत्र में वाम राजनीति का एकछत्र कब्जा है। शिक्षा, शोध, मानवाधिकार, गरीबी, सूचना और ऐसे लगभग सभी क्षेत्रों में वाम राजनीति ने एनजीओ के माध्यम से अपना दखल और रूतबा बनाए रखा है। आज तक देशभर में माक्र्सवाद, लेनिनवाद, माओवाद और कुल मिलाकर वाम (कम्युनिस्ट) राजनीति को स्थापित करने, उसे विस्तार देने में एनजीओ को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। भारत में एनजीओ सेक्टर अपेक्षाकृत नया और कच्चा है। इस लिए अभी से इस दिशा में जागरुक, सचेत और सावधानी पूर्वक पहल व प्रयोग की दरकार है।
मध्यप्रदेश में जन अभियान परिषद् के रूप में एक अभिनव प्रयोग हुआ है। स्वैच्छिक संस्थाओं को संस्कार और प्रशिक्षण के माध्यम से सशक्त करने का प्रयास भले ही दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में शुरु हुआ, लकिन तब तक यह सुप्तावस्था में ही था। भाजपा सरकार ने पहली बार इस दिशा में एक सार्थक और सकारात्मक पहल की। भारत सरकार का योजना विभाग, योजना आयोग के माध्यम से इस दिशा में सक्रिय प्रयोग कर रहा है। इस प्रयोग के परिणाम भी आने लगे हैं। मध्यप्रदेश सरकार की पहल को और अधिक सक्रियता की दरकार है। जन अभियान परिषद् को कार्य करते हुए दशक बीत गए, लेकिन अभी तक कोई उल्लेखनीय परिणाम नहीं दिखा। अच्छे बजट और भारी-भरकम अमले के बावजूद जन अभियान परिषद् का कार्य-निष्पादन संतोषजनक नहीं है। स्वैच्छिक संस्थाओं और सरकार के बीच नीति, योजना और क्रियान्वयन के स्तर पर अभी बहुत कुछ किया जाना है। संभव है 12 अक्टूबर को आयोजित इस एनजीओ पंचायत में किसी एनजीओ नीति के प्रारूप की घोषणा हो। मुख्यमंत्री चाहें तो जन अभियान परिषद् के बैनर तले एक नीति-निर्माण समिति का गठन भी कर सकते हैं। ग्राम पंचायत से लेकर प्रदेश स्तर तक न सिर्फ विकास योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में, बल्कि आम जनता तक सुशासन सुनिश्चित करने में भी एनजीओ की भूमिका तय की जा सकती है।
जब कभी विकास की बात होती है तो उसके साथ विभिन्न ‘‘सिद्धांतों-वादों’’ की चर्चा भी होती है। विकास का चाहे पूंजीवादी, समाजवादी या माक्र्सवादी सिद्धांत हो या हिन्दुत्ववादी सिद्धांत, सबका लक्ष्य व्यक्ति को सुखी और सम्पन्न बनाना है। हिन्दुत्ववादी चिन्तन विशेष रूप से सभी प्रकार के संघर्षों का निषेध करते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता देता है। यह विविधताओं और श्रेष्ठताओं को सहज स्वीकार करता है। गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय का विकास चिन्तन इसी हिन्दुत्व से प्रेरित और पोषित है। भारतीय समाज ने इसे सहज स्वीकार किया है। लेकिन माक्र्सवादी, माओवादी और लेनिनवादी अपने विकास सिद्धांतों को जबरन थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जो न माने उसे हथियारों का भय दिखाने और भयभीत न होने वालों को खत्म कर देने का खूनी खेल हैं। भाजपा और भाजपा सरकार के मुखिया गाहे-बगाहे हिन्दुत्व, एकात्ममानववाद, अन्त्योदय और सर्वोदय की चर्चा करते ही रहे हैं। सर्वे भवन्तु सुखिनः की कल्पना साकार करने में प्रदेश के हजारों स्वैच्छिक संगठन समाज के प्रतिनिधि के तौर पर सरकार की मदद के लिए आगे आ सकते हैं। बशर्ते वे प्रशिक्षित और संस्कारित किए जाएं। प्रदेश के स्थापित एनजीओ स्वयं के प्रशिक्षण और संस्कार का विरोध भी कर सकते हैं। उन्हें अपने प्रशिक्षण और संस्कार का गुमान भी है। सरकार का राजधर्म तो यही है कि नये-पुराने, छोटे-बड़े सभी को साथ लेकर चले। वैचारिक अंतरद्र्वन्दों के बीच आपसी समन्वय स्थापित हो। प्रदेश की स्वैच्छिक संस्थाएं अपने शासकीय मुखिया के साथ कदम मिलाने, साथ चलने की चेष्टा करें तो ही बीमारू मध्यप्रदेश, स्वस्थ होकर स्वर्णिम प्रदेश बन सकेगा। यही स्वर्णिम प्रदेश, परम वैभवशाली राष्ट्र के लिए देश का नेतृत्व कर सकेगा। स्वर्णिम मध्यप्रदेश की चाह, कांग्रेस के गरीबी हटाओ और अनुशासन लाओ के नारे की तरह न हो जाए, इसलिए प्रदेश के विकास के प्रति अटूट प्रतिबद्धता विकसित करने की जरूरत है। इस दृष्टि से निश्चित ही इस एनजीओ पंचायत के मायने हैं। यह पंचायत इस आर्षवाणी की साक्षी बनेगी -
समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहिचित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमिभिमन्त्रये वः
समानने दो हविषा जुहोमि।।
अर्थात् मिलकर कार्य करने वालों का मन्त्र समान होता है, ये परस्पर मंत्रणा करके एक निर्णय पर पहंुचते हैं, चित्तसहित इनका मन समान होता है। मैं तुम्हे मिलकर समान निष्कर्ष पर पहंुचने की प्रेरणा देता हूं। यह एनजीओ पंचायत स्वर्णिम मध्यप्रदेश के लिए प्रदेश के मुखिया द्वारा समन्वय और उर्जा संचय का एक आह्वान भी है।
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)
ई-31, 45 बंगले, भोपाल
शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
ऊँ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
’’समिधा‘‘ संघ कार्यालय, ई-2/187, महावीर नगर, भोपाल-462016
दूरभाष-07ःः7241004, फैक्स-07ःः-2421055, अणुडाक-ोेनकंतेींद2009/तमकपििउंपसण्बवउ
कुप्. सी. सुदर्षन
तिथि: कार्तिक कृष्ण 2 ईसवी दिनांक 06.10.2009
कलियुग-5111 पटना, बिहार
आज पटना पहुंचते ही यह अति दुःखद समाचार मिला कि हमारे वरिष्ठ प्रचारक श्री प्यारेलाल जी खण्डेलवाल हम सबको छोड़कर परमधाम सिधार गये। सन् 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगे प्रथम प्रतिबंध के समय संघ कार्य पर आए संकट को दूर करने और आगे उसकी अभिवृद्धि के लिए जिन प्रचारकों ने अपना जीवन लगाने का संकल्प किया उनमें श्री प्यारेलाल जी भी एक थे। इंदौर नगर के प्रचारक के रुप में कार्यारम्भ कर उन्होंने जिला, विभाग ऐसे अनेक दायित्व सम्हाले और सन् 1964 में जनसंघ की मध्यप्रदेष इकाई में उनकी योग्यता हुई। तब से कुछ वर्षों पूर्व तक उन्होंने राजनैतिक क्षेत्र में अपनी सेवाएं समर्पित की।
पहल जनसंघ और बाद में आपातकाल के पश्चात् भारतीय जनता पार्टी में न एक कर्मठ, निरलस, अकुतोभय एवं कुषल संगठन के रुप में विख्यात रहे। आज की मूल्यविहीन राजनीति में जिन कुछ लोगों ने आचरण का आदर्ष प्रस्तुत किया उनमें श्री प्यारेलाल जी भी एक रहे। मूल्यों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। सन् 1989 मे लोकसभा सदस्य के रुप में निर्वाचित होकर ढ़ाई वर्ष तक लोकसभा में तथा सन् 1998 से लेकर जब तक राज्यसभा में उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया।
गत तीन वर्षों से वे बीमार चल रहे थे। बीच में अ.भा.आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती रहे तथा हम लोगों में से अनेक उनसे मिलने भी गये थे। अपनी प्रवास इच्छा-षक्ति के बल पर वे रोगों से जूझते रहे। शारीरिक दुर्बलता के बाद भी उन्हें कार्य की सतत चिन्ता रहा करती थी, यहां तक कि अस्वस्थ होते हुये भी 29 जुलाई 2009 केा दिल्ली में स्वयंसेवक सांसदों के श्री गुरुदक्षिणा उत्सव के कार्यक्रम में वे सम्मिलित हुये। इतने वर्षों के उनके सार्वजनिक जीवन में समाज का जो बहुत बड़ा वर्ग जो उनके सम्पर्क में आया था उन सबका शोक संतप्त होना स्वाभाविक है। पर नियति के आगे किसी का बस नहीं चलता और वे हम सबको छोड़ गये।
दिनांक 07 अक्टूबर से राजगीर में प्रारंभ हो रही अ.भा.कार्यकारी मंडल की बैठक के पूर्व संघ के केन्द्रीय पदाधिकारियों की यह बैठक श्री प्यारेलालजी के बड़े भाई श्री गुलाबचन्द खण्डेलवाल, उनके परिवारजनों तथा स्नेहीजनों एवं सहयोगियों के शोक में सहभागी होतु हुये स्व. श्री प्यारेलालजी को अश्रुपूर्ण श्रद्धाजंलि अर्पित करती हैं।
ऊँ पूर्णमदःपूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावषिष्यते।
ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः
अपठित हस्ताक्षर सहित केन्द्रीय पदाधिकारियों की सूची -
सरसंघचालक - पू. श्री मोहनराव भागवत
सरकार्यवाह - मा. श्री भैयाजी जोषी
सह सरकार्यवाह - मा. सुरेषजी सोनी
सह सरकार्यवाह - मा. दत्तात्रय होसबाले
अ.भा. बौद्धिक प्रमुख - मा. भागय्या जी
अ.भा. शारीरिक प्रमुख - मा. कण्णन जी
अ.भा. प्रचार प्रमुख - मा. मनमोहनजी
अ.भा. सह सेवा प्रमुख - मा. सुहास हिरेमठ
अ.भा. प्रचारक प्रमुख - मा. मदनदासजी
अ.भा. सह प्रचारक प्रमुख - मा. श्रीकृष्णजी मोतलग
अ.भा. कार्यकारिणी सदस्य - मा. इंदे्रषजी
निवृत्त सरसंघचालक - मा. सुदर्षनजी
अ.भा. कार्यकारिणी सदस्य - मा. मधुभाई कुलकर्णी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
’’समिधा‘‘ संघ कार्यालय, ई-2/187, महावीर नगर, भोपाल-462016
दूरभाष-07ःः7241004, फैक्स-07ःः-2421055, अणुडाक-ोेनकंतेींद2009/तमकपििउंपसण्बवउ
कुप्. सी. सुदर्षन
तिथि: कार्तिक कृष्ण 2 ईसवी दिनांक 06.10.2009
कलियुग-5111 पटना, बिहार
आज पटना पहुंचते ही यह अति दुःखद समाचार मिला कि हमारे वरिष्ठ प्रचारक श्री प्यारेलाल जी खण्डेलवाल हम सबको छोड़कर परमधाम सिधार गये। सन् 1948 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगे प्रथम प्रतिबंध के समय संघ कार्य पर आए संकट को दूर करने और आगे उसकी अभिवृद्धि के लिए जिन प्रचारकों ने अपना जीवन लगाने का संकल्प किया उनमें श्री प्यारेलाल जी भी एक थे। इंदौर नगर के प्रचारक के रुप में कार्यारम्भ कर उन्होंने जिला, विभाग ऐसे अनेक दायित्व सम्हाले और सन् 1964 में जनसंघ की मध्यप्रदेष इकाई में उनकी योग्यता हुई। तब से कुछ वर्षों पूर्व तक उन्होंने राजनैतिक क्षेत्र में अपनी सेवाएं समर्पित की।
पहल जनसंघ और बाद में आपातकाल के पश्चात् भारतीय जनता पार्टी में न एक कर्मठ, निरलस, अकुतोभय एवं कुषल संगठन के रुप में विख्यात रहे। आज की मूल्यविहीन राजनीति में जिन कुछ लोगों ने आचरण का आदर्ष प्रस्तुत किया उनमें श्री प्यारेलाल जी भी एक रहे। मूल्यों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। सन् 1989 मे लोकसभा सदस्य के रुप में निर्वाचित होकर ढ़ाई वर्ष तक लोकसभा में तथा सन् 1998 से लेकर जब तक राज्यसभा में उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया।
गत तीन वर्षों से वे बीमार चल रहे थे। बीच में अ.भा.आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती रहे तथा हम लोगों में से अनेक उनसे मिलने भी गये थे। अपनी प्रवास इच्छा-षक्ति के बल पर वे रोगों से जूझते रहे। शारीरिक दुर्बलता के बाद भी उन्हें कार्य की सतत चिन्ता रहा करती थी, यहां तक कि अस्वस्थ होते हुये भी 29 जुलाई 2009 केा दिल्ली में स्वयंसेवक सांसदों के श्री गुरुदक्षिणा उत्सव के कार्यक्रम में वे सम्मिलित हुये। इतने वर्षों के उनके सार्वजनिक जीवन में समाज का जो बहुत बड़ा वर्ग जो उनके सम्पर्क में आया था उन सबका शोक संतप्त होना स्वाभाविक है। पर नियति के आगे किसी का बस नहीं चलता और वे हम सबको छोड़ गये।
दिनांक 07 अक्टूबर से राजगीर में प्रारंभ हो रही अ.भा.कार्यकारी मंडल की बैठक के पूर्व संघ के केन्द्रीय पदाधिकारियों की यह बैठक श्री प्यारेलालजी के बड़े भाई श्री गुलाबचन्द खण्डेलवाल, उनके परिवारजनों तथा स्नेहीजनों एवं सहयोगियों के शोक में सहभागी होतु हुये स्व. श्री प्यारेलालजी को अश्रुपूर्ण श्रद्धाजंलि अर्पित करती हैं।
ऊँ पूर्णमदःपूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावषिष्यते।
ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः
अपठित हस्ताक्षर सहित केन्द्रीय पदाधिकारियों की सूची -
सरसंघचालक - पू. श्री मोहनराव भागवत
सरकार्यवाह - मा. श्री भैयाजी जोषी
सह सरकार्यवाह - मा. सुरेषजी सोनी
सह सरकार्यवाह - मा. दत्तात्रय होसबाले
अ.भा. बौद्धिक प्रमुख - मा. भागय्या जी
अ.भा. शारीरिक प्रमुख - मा. कण्णन जी
अ.भा. प्रचार प्रमुख - मा. मनमोहनजी
अ.भा. सह सेवा प्रमुख - मा. सुहास हिरेमठ
अ.भा. प्रचारक प्रमुख - मा. मदनदासजी
अ.भा. सह प्रचारक प्रमुख - मा. श्रीकृष्णजी मोतलग
अ.भा. कार्यकारिणी सदस्य - मा. इंदे्रषजी
निवृत्त सरसंघचालक - मा. सुदर्षनजी
अ.भा. कार्यकारिणी सदस्य - मा. मधुभाई कुलकर्णी
गोवंश के बिना विश्व मंगल की कामना नहीं
गोवंश के बिना विश्व मंगल की कामना नहीं
नादौन 8 october : विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के नादौन स्थित श्रीराम लीला मैदान में वीरवार सुबह नौ बजे पहुंचते ही पंडाल वंदे गो मातरम् के जयघोष से गूंज उठा।समारोह में भारत माता मंदिर हरिद्वार से यात्रा के साथ आए अखिलेश्वरानंद महाराज ने जनसमूह को संबोधित करते कहा कि जो देश आदिकाल से ही गोमाता का पुजारी था। वहां आज गोवंश की निर्मम हत्या की जा रही है जिसके लिए देश के कर्णधार शासकों की नीतियां जिम्मेवार हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे शासकों को न तो गोमाता की महिमा का पता है और न ही परलोक का ज्ञान है। उन्होंने कहा कि जब हमारे बुजुर्ग बूढ़े हो जाते हैं तो क्या हम उनके प्रति श्रद्धा का भाव नहीं रखते हैं। उन्होंने कहा कि संपूर्ण गोवंश देश के विकास में काम आता है और इसके बिना भारत तो क्या विश्व के मंगल की कामना करना भी मुश्किल है।
उन्होंने गाय माता के प्रति वचनबद्धता के संकल्प से लोगों को प्रतिज्ञा भी दिलवाई। सभी लोगों से गाय को माता मानकर उसे सम्मान देने का आह्वान किया गया। समारोह यात्रा के प्रदेशाध्यक्ष महंत सूर्यनाथ ने कहा कि माता नाम ही ऐसा है जिसमें करुणा बसी है। सूर्यनाथ ने कहा कि जब-जब भी गोवंश का सम्मान हुआ भारत सोने की चिड़िया कहलाया।
इस अवसर पर दंगड़ी मठ के संत श्रीमद भक्ति प्रसाद विष्णु महाराज भी उपस्थित थे। समारोह में गोशाला भड़ाली भगोर के संस्थापक सुखदेव शास्त्री तथा भदरूं गोशाला के संयोजक पाधा मंशा राम को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर श्रीनिवास मूर्ति, कैलाश, वेद प्रकाश, विवेक, सोहन सिंह, विजय अग्निहोत्री, राजकुमार शर्मा, किशोर शर्मा, सुभाष, अजय सौंधी, जसवीर सिंह, दिनेश, प्रमोद कपिल, त्रिभुवन सिंह आदि उपस्थित थे।
गाय में समाहित हैं सभी शास्त्र – स्वामी अखिलेश्वरानंद
पठाणकोट, अक्तूबर ७ – गाय भारतीय समाज – जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श और प्रभावित करती है । गाय में अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, चिकित्साशास्त्र का समावेश है । यह कहना है स्वामी अखिलेश्वरानंद का । स्वामी जी विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के स्वागत के लिए पठाणकोट में आयोजित एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे ।
स्वामी जी ने कहा कि गाय अपने आप में एक संपूर्ण विज्ञान है । गोमूत्र सभी रोगों की रामबाण औषधि है । यह संपूर्ण शरीर का शोधन करके रोगों का नाश करता है । उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रों में गोविज्ञान की बात कही गयी है । गाय का दूध, मूत्र, गोबर आर्थिक विकास में उपयोगी है और वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरे उतरे हैं । उन्होंने कहा कि गाय को अपने जीवन से दूर करन के कारण ही पंजाब की समृद्धि में कमी आयी है ।
इससे पहले कठुआ में आयोजित स्वागत सभा में बोलते हुए गो विज्ञान अनुसंधान केन्द्र के सुरेश धवन ने गाय की उपयोगिता और पंचगव्य को लेकर हुए आधुनिक शोधों के बारे में जानकारी दी । उन्होंने कहा कि बाजार में उपलब्ध घी बनाने की प्रक्रिया दोषपूर्ण है । बाजारु घी स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है । जबकि ठीक प्रकार से बनाया गया गाय का घी हृदयरोगियों के लिए भि लाभदायक है ।
यात्रा को जम्मू से हिमाचल प्रदेश में प्रवेश करने पर नूरपुर में यात्रा का भव्य स्वागत किया गया । कांगडा में आयोजित स्वागत सभा में बोलते हुए ज्वाला देवी मंदिर के स्वामी सूर्यनाथ ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद पं. जवाहर लाल नेहरु और उनके समर्थकों के कारण गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला प्रस्ताव संसद में पारित नही हो सका । उन्होंने गोशालाओं में सुधार करने की भी बात कही ।
गोकर्णा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने आंकडो का हवाला देते हुए कहा कि १९४७ में एक हजार भारतीयों पर ४३० गोवंश उपलब्ध थे । २००१ में यह आंकडा घटकर ११० हो गयी । और २०११ में यह आंकडा घटकर २० गोवंश प्रति एक हजार व्यक्ति हो जाने का अनुमान है ।
उन्होंने कहा कि गोमाता की रक्षा करके ही भारतमाता और प्रकृति माता की रक्षा की जा सकती है ।
फिल्म अभिनेता सुरेश ओबेराय ने अपना व्यक्तिगत अनुभव बताते हुए कहा कि गोदुग्ध के सेवन से उनके पूरे परिवार में प्यार का माहौल बन गया है । उन्होंने कहा कि गोवंश के महत्व को तार्किक रूप से समझने की आवश्यकता है ।
विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा अब मैदानी हिस्से छोडकर पहाडी क्षेत्रों में प्रवेश कर चुकी है । लेकिन यात्रा के स्वागत कार्यक्रमों और जनसमुदाय की भागीदारी में कोई कमी नहीं आयी है
नादौन 8 october : विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के नादौन स्थित श्रीराम लीला मैदान में वीरवार सुबह नौ बजे पहुंचते ही पंडाल वंदे गो मातरम् के जयघोष से गूंज उठा।समारोह में भारत माता मंदिर हरिद्वार से यात्रा के साथ आए अखिलेश्वरानंद महाराज ने जनसमूह को संबोधित करते कहा कि जो देश आदिकाल से ही गोमाता का पुजारी था। वहां आज गोवंश की निर्मम हत्या की जा रही है जिसके लिए देश के कर्णधार शासकों की नीतियां जिम्मेवार हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे शासकों को न तो गोमाता की महिमा का पता है और न ही परलोक का ज्ञान है। उन्होंने कहा कि जब हमारे बुजुर्ग बूढ़े हो जाते हैं तो क्या हम उनके प्रति श्रद्धा का भाव नहीं रखते हैं। उन्होंने कहा कि संपूर्ण गोवंश देश के विकास में काम आता है और इसके बिना भारत तो क्या विश्व के मंगल की कामना करना भी मुश्किल है।
उन्होंने गाय माता के प्रति वचनबद्धता के संकल्प से लोगों को प्रतिज्ञा भी दिलवाई। सभी लोगों से गाय को माता मानकर उसे सम्मान देने का आह्वान किया गया। समारोह यात्रा के प्रदेशाध्यक्ष महंत सूर्यनाथ ने कहा कि माता नाम ही ऐसा है जिसमें करुणा बसी है। सूर्यनाथ ने कहा कि जब-जब भी गोवंश का सम्मान हुआ भारत सोने की चिड़िया कहलाया।
इस अवसर पर दंगड़ी मठ के संत श्रीमद भक्ति प्रसाद विष्णु महाराज भी उपस्थित थे। समारोह में गोशाला भड़ाली भगोर के संस्थापक सुखदेव शास्त्री तथा भदरूं गोशाला के संयोजक पाधा मंशा राम को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर श्रीनिवास मूर्ति, कैलाश, वेद प्रकाश, विवेक, सोहन सिंह, विजय अग्निहोत्री, राजकुमार शर्मा, किशोर शर्मा, सुभाष, अजय सौंधी, जसवीर सिंह, दिनेश, प्रमोद कपिल, त्रिभुवन सिंह आदि उपस्थित थे।
गाय में समाहित हैं सभी शास्त्र – स्वामी अखिलेश्वरानंद
पठाणकोट, अक्तूबर ७ – गाय भारतीय समाज – जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श और प्रभावित करती है । गाय में अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, चिकित्साशास्त्र का समावेश है । यह कहना है स्वामी अखिलेश्वरानंद का । स्वामी जी विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के स्वागत के लिए पठाणकोट में आयोजित एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे ।
स्वामी जी ने कहा कि गाय अपने आप में एक संपूर्ण विज्ञान है । गोमूत्र सभी रोगों की रामबाण औषधि है । यह संपूर्ण शरीर का शोधन करके रोगों का नाश करता है । उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रों में गोविज्ञान की बात कही गयी है । गाय का दूध, मूत्र, गोबर आर्थिक विकास में उपयोगी है और वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरे उतरे हैं । उन्होंने कहा कि गाय को अपने जीवन से दूर करन के कारण ही पंजाब की समृद्धि में कमी आयी है ।
इससे पहले कठुआ में आयोजित स्वागत सभा में बोलते हुए गो विज्ञान अनुसंधान केन्द्र के सुरेश धवन ने गाय की उपयोगिता और पंचगव्य को लेकर हुए आधुनिक शोधों के बारे में जानकारी दी । उन्होंने कहा कि बाजार में उपलब्ध घी बनाने की प्रक्रिया दोषपूर्ण है । बाजारु घी स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है । जबकि ठीक प्रकार से बनाया गया गाय का घी हृदयरोगियों के लिए भि लाभदायक है ।
यात्रा को जम्मू से हिमाचल प्रदेश में प्रवेश करने पर नूरपुर में यात्रा का भव्य स्वागत किया गया । कांगडा में आयोजित स्वागत सभा में बोलते हुए ज्वाला देवी मंदिर के स्वामी सूर्यनाथ ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद पं. जवाहर लाल नेहरु और उनके समर्थकों के कारण गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला प्रस्ताव संसद में पारित नही हो सका । उन्होंने गोशालाओं में सुधार करने की भी बात कही ।
गोकर्णा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने आंकडो का हवाला देते हुए कहा कि १९४७ में एक हजार भारतीयों पर ४३० गोवंश उपलब्ध थे । २००१ में यह आंकडा घटकर ११० हो गयी । और २०११ में यह आंकडा घटकर २० गोवंश प्रति एक हजार व्यक्ति हो जाने का अनुमान है ।
उन्होंने कहा कि गोमाता की रक्षा करके ही भारतमाता और प्रकृति माता की रक्षा की जा सकती है ।
फिल्म अभिनेता सुरेश ओबेराय ने अपना व्यक्तिगत अनुभव बताते हुए कहा कि गोदुग्ध के सेवन से उनके पूरे परिवार में प्यार का माहौल बन गया है । उन्होंने कहा कि गोवंश के महत्व को तार्किक रूप से समझने की आवश्यकता है ।
विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा अब मैदानी हिस्से छोडकर पहाडी क्षेत्रों में प्रवेश कर चुकी है । लेकिन यात्रा के स्वागत कार्यक्रमों और जनसमुदाय की भागीदारी में कोई कमी नहीं आयी है
वंदेमातरम कहने से सहमत नहीं
सहारनपुर। दारुल उलूम देवबंद को लेकर जमीयत उलेमा द्वारा आयोजित जलसे में वक्ताओं ने कहा कि इस देश का मुसलमान राष्ट्रगान का सम्मान करता है। खुदा के अलावा किसी और को सजदा इस्लाम में जायज न होने के कारण धार्मिक तौर पर वंदेमातरम कहने से सहमत नहीं हैं। इसलिए देश के लिए तो जान दे सकते हैं परंतु वंदेमातरम नहीं कह सकते।
इस्लामिया इंटर कालेज की मस्जिद में आयोजित जलसे में वक्ताओं ने कहा कि दारुल उलूम देवबंद का मकसद कुरान व इस्लाम की तालीम देना रहा है। देश की आजादी में इस संस्था का योगदान रहा है। जमीयतुल उलेमा के अध्यक्ष मौलवी जहूर अहमद ने कहा कि जिन लोगों ने दारुल उलूम का पुतला जलाया उनके कार्य से राजद्रोह की बू आ रही है। उनका यह कार्य न केवल असंवैधानिक बल्कि अपराध की श्रेणी में आता है। उन्होंने वंदेमातरम का सहारा लेकर समाज को बांटने और सांप्रदायिकता फैलाने का काम किया है। वतन से मोहब्बत नबी का फरमान है इसलिए वे देश से प्यार करते हैं और राष्ट्रगान का सम्मान करते हैं। जलसे के बाद में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सीओ को ज्ञापन दिया।
इस्लामिया इंटर कालेज की मस्जिद में आयोजित जलसे में वक्ताओं ने कहा कि दारुल उलूम देवबंद का मकसद कुरान व इस्लाम की तालीम देना रहा है। देश की आजादी में इस संस्था का योगदान रहा है। जमीयतुल उलेमा के अध्यक्ष मौलवी जहूर अहमद ने कहा कि जिन लोगों ने दारुल उलूम का पुतला जलाया उनके कार्य से राजद्रोह की बू आ रही है। उनका यह कार्य न केवल असंवैधानिक बल्कि अपराध की श्रेणी में आता है। उन्होंने वंदेमातरम का सहारा लेकर समाज को बांटने और सांप्रदायिकता फैलाने का काम किया है। वतन से मोहब्बत नबी का फरमान है इसलिए वे देश से प्यार करते हैं और राष्ट्रगान का सम्मान करते हैं। जलसे के बाद में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सीओ को ज्ञापन दिया।
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