मंगलवार, 21 सितंबर 2010

स्‍वाभिमानी राष्‍ट्र गुलामी के कलंकों को बर्दाश्‍त नहीं करते : आर्नोल्‍ड टॉयन्‍बी

आर्नोल्ड टॉयन्‍बी आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ इतिहासकार माने जाते हैं। सन 1960 में श्री टॉयन्‍बी ‘एक व्याख्यानमाला’ में बोलने के लिए दिल्ली आये। ‘भारत और एक विश्व’ विषय पर उनके तीन भाषण हुए। ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ ने ये तीनों भाषण एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किये हैं। श्री टॉयन्‍बी ने अपने भाषण में पोलैंड का एक उदाहरण दिया कि किस प्रकार पोलैंड ने स्वतंत्र होते ही रूसियों द्वारा बनवाया गया चर्च ध्‍वस्त कर दिया। श्री टॉयन्‍बी के शब्‍दों में,

”सन् 1914-15 में रूसियों ने पोलैंड की राजधानी वार्सा को जीत लिया तो उन्‍होंने शहर के मुख्य चौक में एक चर्च बनवाया। रूसियों ने यह पोलैंडवासियों को निरन्‍तर याद करवाने के लिए बनवाया कि पोलैंड में रूस का शासन है। जब पोलैंड 1918 में आजाद हुआ तो पोलैंडवासियों ने पहला काम उस चर्च को ध्‍वस्त करने का किया, हालांकि नष्ट करने वाले सभी लोग ईसाई मत को मानने वाले ही थे। मैं जब पोलैंड पहुंचा तो चर्च ध्‍वस्त करने का काम समाप्‍त हुआ ही था। मैं एक चर्च को ध्‍वस्‍त करने के लिए पोलैंड को दोषी नहीं मानता क्‍योंकि रूस ने वह चर्च राजनीतिक कारणों से बनवाया था। उनका मन्‍तव्‍य पोल लोगों का अपमान करना था।‘’

उसी भाषण में श्री टॉयन्‍बी ने आगे कहा कि, ‘इसी सिलसिले में मैं काशी और मथुरा की मस्जिदों का जिक्र करना चाहूंगा। औरंगजेब ने अपने दुश्मनों को अपमानित करने के लिए जान-बूझकर इन मंदिरों को मस्जिदों में बदल डाला, उसी दुर्भावना के कारण जिसके कारण कि रूसियों ने वार्सा में चर्च बनाया था। इन मस्जिदों का उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि हिन्‍दुओं के पवित्रतम स्थानों पर भी मुसलमानों की हुकूमत चलती है।”

श्री टॉयन्‍बी के अनुसार पोलिश लोगों ने समझदारी का काम किया क्‍योंकि चर्च ध्‍वस्त करने से रूस और पोलैंड के बीच की शत्रुता की भावना समाप्‍त हो गई। वह चर्च पोल लोगों को रूस के आक्रमण की याद दिलाता रहता था। आर्नोल्ड टॉयन्‍बी ने इस बात पर खेद प्रकट किया कि हिन्‍दुस्थान के लोग हिन्‍दू और मुस्लिमों में तनाव की जड़ इन मस्जिदों को हटा नहीं रहे हैं। उन्‍होंने यह कह कर अपनी बात समाप्‍त की कि, ‘’भारत की इस सहिष्‍णुता से मैं स्‍तभ्भित हूं साथ इससे मुझे अपार पीड़ा भी हुई है।‘’

नास्तिक रूसियों ने मूर्तियां स्‍थापित कीं

यह उन दिनों की घटना है जब रूस में साम्यवाद अपने उफान पर था। सन 1968 में भारत के सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल लोकसभा के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष नीलम संजीव रेड्डी के नेतृत्‍व में रूस गया। रूसी दौरे के समय सांसदों को लेनिनग्राद शहर का एक महल दिखाने भी ले जाया गया। वह रूस के ‘जार’ (राजा) का सर्दियों में रहने के लिए बनवाया गया महल था। महल को देखते समय संसद सदस्यों के ध्‍यान में आया कि पूरा महल तो पुराना लगता था किन्‍तु कुछ मूर्तियां नई दिखाई देती थीं। पूछताछ करने पर पता लगा कि वे मूर्तियां ग्रीक देवी-देवताओं की हैं। सांसदों में प्रसिद्ध विचारक तथा भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी भी थे। उन्‍होंने सवाल किया कि, ‘आप तो धर्म और भगवान के खिलाफ हैं, फिर आपकी सरकार ने देवी-देवताओं की मूर्तियों को फिर से बनाकर यहां क्‍यों रखा है?’ इस पर साथ चल रहे रूसी अधिकारी ने उत्तर दिया, ‘इसमें कोई शक नहीं कि हम घोर नास्तिक हैं किन्‍तु महायुद्ध के दौरान जब हिटलर की सेनाएं लेनिनग्राद पर पहुंच गई तो वहां हम लोगों ने उनसे जमकर संघार्ष किया। इस कारण जर्मन लोग चिढ़ गये और हमारा अपमान करने के लिए उन्‍होंने यहां की देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां तोड़ दी। इसके पीछे यही भाव था कि रूस का राष्ट्रीय अपमान किया जाये। हमारी दृष्टि में हमें ही नीचा दिखाया जाये। इस कारण हमने भी प्रणा किया कि महायुद्ध में हमारी विजय होने के पश्चात् राष्ट्रीय सम्मान की पुनर्स्थापना करने के लिए हम इन देवताओं की मूर्तियां फिर से स्थापित करेंगे।

रूसी अधिकारी ने आगे कहा कि, ‘हम तो नास्तिक हैं ही किन्‍तु मूर्ति भंजन का काम हमारा अपमान करने के लिए किया गया था और इसलिए इस राष्‍ट्रीय अपमान को धो डालने के लिए हमने इन मूर्तियों का पुनर्निर्माण किया।‘

ये मूर्तियां आज भी जार के ‘विन्‍टर पैलेस’ में रखी हैं और सैलानियों के मन में कौतुहल जगाती हैं।

दक्षिण कोरिया की कैपिटल बिल्डिंग

दक्षिण कोरिया अनेक वर्षों तक जापान के कब्‍जे में रहा है। जापानी सत्ताधारियों ने अपनी शासन सुविधा के लिए राजधानी सिओल के बीचों-बीच एक भव्य इमारत बनाई और उसका नाम ‘कैपिटल बिल्डिंग’ रखा। इस समय इस भवन में कोरिया का राष्ट्रीय संग्रहालय है। इस संग्रहालय में अनेक प्राचीन वस्तुओं के साथ जापानियों के अत्‍याचारों के भी चित्रा हैं।

वर्ष 1995 में दक्षिण कोरिया को आजाद हुए पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं। अत: वहां की सरकार आजादी का स्‍वर्ण जयंती वर्ष’ धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रही है। इस स्वतंत्राता प्राप्ति की स्‍वर्णा जयंती महोत्‍सव का एक प्रमुख कार्यक्रम होगा ‘कैपिटल बिल्डिंग’ को ध्‍वस्त करना। दक्षिण कोरिया की सरकार ने इस विशाल भवन को गिराने का निर्णय ले लिया है। इसमें स्थित संग्रहालय को नये बन रहे दूसरे भवन में ले जाया जायेगा। इस पूरी कार्रवाई में 1200 करोड़ रुपये खर्च होंगे।

यह समाचार 2 मार्च 1995 को बी.बी.सी. पर प्रसारित हुआ था। कार्यक्रम में ‘कैपिटल बिल्डिंग’ को भी दिखाया गया। इस भवन में स्थित ‘राष्ट्रीय वस्तु संग्रहालय’ के संचालक से बीबीसी संवाददाता की बातचीत भी दिखाई गई। जब उनसे इस इमारत को नष्ट करने का कारण पूछा गया तो संचालक महोदय ने बताया कि, ‘इस इमारत को देखते ही हमें जापान द्वारा हम पर लादी गई गुलामी की याद आ जाती है। इसको गिराने से जापान और दक्षिण कोरिया के बीच सम्‍बंधों का नया दौर शुरु हो सकेगा। इसके पीछे बना हमारे राजा का महल लोगों की नजरों से ओझल रहे यही इसको बनाने का उद्देश्‍य था और इसी कारण हम इसको गिराने जा रहे हैं।‘
दक्षिण कोरिया की जनता ने भी सरकार के इस निर्णय का उत्‍साहपूर्वक स्‍वागत किया। (यह भवन उसी वर्ष ध्‍वस्‍त कर दिया गया।)
पांच सौ साल पुराने गुलामी के निशान मिटाये कुछ वर्ष पहले तक युगोस्‍लाविया एक राज्‍य था जिसके अन्‍तर्गत कई राष्‍ट्र थे। साम्‍यवाद के समाप्‍त होते ही ये सभी राष्‍ट्र स्‍वतंत्र हो गये तथा सर्बिया, क्रोशिया, मान्‍टेनेग्रो, बोस्निया हर्जेगोविना आदि अलग-अलग नाम से देश बन गये। बोस्निया में अभी भी काफी संख्‍या में सर्ब लोग हैं। ऐसे क्षेत्रों में जहां सर्ब काफी संख्‍या में हैं, इस समय (सन् 1995) सर्बियाई तथा बोस्निया की सेना में युद्ध चल रहा है। इस साल के शुरु में सर्ब सैनिकों ने बोस्निया के कब्‍जे वाला एक नगर ‘इर्वोनिक’ अपने अधिकार में ले लिया।
इर्वोनिक की एक लाख की आबादी में आधे सर्ब हैं और शेष मुसलमान। सर्ब फौजों के कब्‍जे के बाद मुसलमान इस शहर से भाग गये तथा बोस्निया के ईसाई यहां आ गये। ब्रंकों ग्रूजिक नाम के एक सर्ब नागरिक को शहर का महापौर भी बना दिया गया। महापौर ने सबसे पहले यह काम किया कि नगर के बाहर बहने वाली ड्रिना नदी के किनारे बनी एक टेकड़ी पर एक ‘क्रास’ लगा दिया। महापौर ने बताया कि, ‘इस स्‍थान पर हमारा चर्च था जिसे तुर्की के लोगों ने सन् 1463 में ध्‍वस्‍त कर डाला था। अब हम उस चर्च को इसी स्‍थान पर पुन: नये सिरे से खड़ा करेंगे।‘ श्री ग्रूजिक ने यह भी कहा कि तुर्कों की चार सौ साल की सत्ता में उनके द्वारा खड़े किये गये सारे प्रतीक मिटाये जाएंगे। उसी टेकड़ी पर पुराने तुर्क साम्राज्‍य के रूप में एक मीनार खड़ी थी उसे सर्बों ने ध्‍वस्‍त कर दिया। टेकड़ी के नीचे ‘रिजे कॅन्‍स्‍का’ नाम की एक मस्जिद को भी बुलडोजर चलाकर मटियामेट कर दिया गया।
यह विस्‍तृत समाचार अमरीकी समाचार पत्र हेरल्‍ड ट्रिब्‍युन में 8 मार्च 1995 को छपा। समाचार लाने वाला संवाददाता लिखता है कि उस टेकड़ी पर पांच सौ साल पहले नष्‍ट किये गये चर्च की एक घंटी पड़ी हुई थी। महापौर ने अस्‍थायी क्रॉस पर घंटी टांककर उसको बजाया। घंटी गुंजायमान होने के बाद महापौर ने कहा कि, ‘मैं परमेश्‍वर से प्रार्थना करता हूं कि वह क्लिंटन (अमरीकी राष्‍ट्रपति) को थोड़ी अक्‍ल दे ताकि वह मुसलमानों का साथ छोड़कर उसके सच्‍चे मित्र ईसाइयों का साथ दे।

सोमनाथ का कलंक मिटाया गया

भारत में जब तक सत्ता की भूख नेताओं के सर पर सवार नहीं हुई थी, गुलामी के प्रतीकों को मिटाने का प्रयत्‍न किया गया। नागपुर के विधानसभा भवन के सामने लगी रानी विक्‍टोरिया की संगमरमर की मूर्ति आजादी के बाद हटा दी गई। मुम्‍बई के काला घोड़ा स्‍थान पर घोड़े पर सवार इंग्‍लैंड के राजा की प्रतिमा हटाई गई। विक्‍टोरिया, एंडवर्ड और जार्ज पंचम से जुड़े अस्‍पताल, भवन, सड़कों आदि तक के नाम बदले गये। लेकिन जब सत्ता का स्‍वार्थ और चाहे जैसे हो सत्ता में बने रहने की अंधी लालसा जगी तो दिल्‍ली की सड़कों के नाम अकबर, जहांगीर, शाहजहां तथा औरंगजेब रोड तक रख दिये गये।

भारत के आजाद होते ही सरदार पटेल ने सोमनाथ का जीर्णोद्धार कराया। उस स्‍थान पर बनी मस्जिदों व मजारों को ध्‍वस्‍त कर भव्‍य मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर की प्राण-प्रतिष्‍ठा के समारोह में सेकुलरवादी पं. नेहरु के विरोध के बावजूद तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद सम्मिलित हुए। उस समय किसी ने मुस्लिम भावनाओं की या मस्जिदें नष्‍ट न करने की बात नहीं उठाई। इसलिए कि उस समय सरदार पटेल जैसे राष्‍ट्रवादी नेता थे और देश की जनता में भी आजाद के आंदोलन का कुछ जोश बाकी था। (पाथेय कण)

इस्लाम और जापान के बारे मे क्या यह सच है ?

क्या आपने कभी यह समाचार पढ़ा कि किसी मुस्लिम राष्ट्र का कोई प्रधानमंत्री या बड़ा नेता तोकियो की यात्रा पर गया हो?
क्या आपने कभी किसी अखबार में यह भी पढ़ा कि ईरान अथवा सऊदी अरब के राजा ने जापान की यात्रा की हो?
कारण·
जापान में अब किसी भी मुसलमान को स्थायी रूप से रहने की इजाजत नहीं दी जाती है।·
जापान में इस्लाम के प्रचार-प्रसार पर कड़ा प्रतिबंध है।·
जापान के विश्वविद्यालयों में अरबी या अन्य इस्लामी राष्ट्रों की भाषाएं नहीं पढ़ायी जातीं।·
जापान में अरबी भाषा में प्रकाशित कुरान आयात नहीं की जा सकती है।
इस्लाम से दूरी·
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जापान में केवल दो लाख मुसलमान हैं। और ये भी वही हैं जिन्हें जापान सरकार ने नागरिकता प्रदान की है।·
सभी मुस्लिम नागरिक जापानी बोलते हैं और जापानी भाषा में ही अपने सभी मजहबी व्यवहार करते हैं।·
जापान विश्व का ऐसा देश है जहां मुस्लिम देशों के दूतावास न के बराबर हैं।·
जापानी इस्लाम के प्रति कोई रुचि नहीं रखते हैं।·
आज वहां जितने भी मुसलमान हैं वे ज्यादातर विदेशी कम्पनियों के कर्मचारी ही हैं।·
परन्तु आज कोई बाहरी कम्पनी अपने यहां से मुसलमान डाक्टर, इंजीनियर या प्रबंधक आदि को वहां भेजती है तो जापान सरकार उन्हें जापान में प्रवेश की अनुमति नहीं देती है।
अधिकतर जापानी कम्पनियों ने अपने नियमों में यह स्पष्ट लिख दिया है कि कोई भी मुसलमान उनके यहां नौकरी के लिए आवेदन न करे।·
जापान सरकार यह मानती है कि मुसलमान कट्टरवाद के पर्याय हैं इसलिए आज के इस वैश्विक दौर में भी वे अपने पुराने नियम नहीं बदलना चाहते हैं।·
जापान में किराए पर किसी मुस्लिम को घर मिलेगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
यदि किसी जापानी को उसके पड़ोस के मकान में अमुक मुस्लिम के किराये पर रहने की खबर मिले तो सारा मोहल्ला सतर्क हो जाता है।·
जापान में कोई इस्लामी या अरबी मदरसा नहीं खोल सकता है।
मतांतरण पर रोक·
जापान में मतान्तरण पर सख्त पाबंदी है।·
किसी जापानी ने अपना पंथ किसी कारणवश बदल लिया है तो उसे और साथ ही मतान्तरण कराने वाले को सख्त सजा दी जाती है।·
यदि किसी विदेशी ने यह हरकत की होती है उसे सरकार कुछ ही घंटों में जापान छोड़कर चले जाने का सख्त आदेश देती है।·
यहां तक कि जिन ईसाई मिशनरियों का हर जगह असर है, वे जापान में दिखाई नहीं देतीं।
वेटिकन के पोप को दो बातों का बड़ा अफसोस होता है। एक तो यह कि वे 20वीं शताब्दी समाप्त होने के बावजूद भारत को यूनान की तरह ईसाई देश नहीं बना सके। दूसरा यह कि जापान में ईसाइयों की संख्या में वृध्दि नहीं हो सकी।
·जापानी चंद सिक्कों के लालच में अपने पंथ का सौदा नहीं करते। बड़ी से बड़ी सुविधा का लालच दिया जाए तब भी वे अपने पंथ के साथ धोखा नहीं करते हैं।·
जापान में 'पर्सनल ला' जैसा कोई शगूफा नहीं है। यदि कोई जापानी महिला किसी मुस्लिम से विवाह कर लेती है तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। जापानियों को इसकी तनिक भी चिंता नहीं है कि कोई उनके बारे में क्या सोचता है। तोकियो विश्वविद्यालय के विदेशी अध्ययन विभाग के अध्यक्ष कोमिको यागी के अनुसार, इस्लाम के प्रति जापान में हमेशा यही मान्यता रही है कि वह एक संकीर्ण सोच का मजहब है। उसमें समन्वय की गुंजाइश नहीं है।
स्वतंत्र पत्रकार मोहम्मद जुबेर ने 9/11 की घटना के पश्चात अनेक देशों की यात्रा की थी। वह जापान भी गए, लेकिन वहां जाकर उन्होंने देखा कि जापानियों को इस बात पर पूरा भरोसा है कि कोई आतंकवादी उनके यहां पर भी नहीं मार सकता।

सन्दर्भ·
जापान सम्बंधी इस चौंका देने वाली जानकारी के स्रोत हैं शरणार्थी मामले देखने वाली संस्था 'सॉलीडेरिटी नेटवर्क' के महासचिव जनरल मनामी यातु।
मुजफ्फर हुसैन द्वारा लिखित लेख के कुछ मुख्य बिन्दु जो कि पांचजन्य, के 30 मई, 2010 के अंक से लिए गए हैं।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

इंडियन मीडिया सेंटर की बैठक में मीडिया में भारतीय मूल्यों तलाश


प्रेस कौंसिल की जगह नई मीडिया कौंसिल बनाने की वकालत
भोपाल। भौतिकता से दग्ध मानवता को शांति और दिशा देने का काम भारतीय मूल्य और दर्शन ही करेंगे। भारतीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावना को संरक्षित करने और प्रसारित करने की जिम्मेदारी मीडिया को निभानी होगी। आज भारतीय मूल्यों और परंंपराओं को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। मीडिया भी इसमें शामिल है। मीडिया को मर्यादित होना होगा। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने इंडियन मीडिया सेंटर की बैठक में समापन उद्बोधन देते हुए ये बातें कही। श्री चैहान ने आजादी के पूर्व और बाद के मीडिया की सकारात्मक और संर्घषशील भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि आज मीडिया व्यावसायिक हो रहा है जिसके कारण वह संकट के दौर से गुजर रहा है। श्री चौहान ने पेड न्यूज की चर्चा करते हुए इसे समाज के लिए जहर के समान बताया। उन्होंने कहा कि देश तब मजबूत होगा जब नागरिक राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होंगे। मीडिया को समाज में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने का कार्य करना चाहिए।

मीडिया के बाजारीकरण और व्यापारीकरण से सभी परेशान हैं - क्या नेता और क्या पत्रकार! पेड न्यूज के रोग ने पत्रकारिता ही नही, बल्कि तो समूची मीडिया को ही बदनाम कर दिया है। लेकिन इन सब के बीच एक शुभ लक्षण भी दिख रहे हैंं। जिन हाथों की उंगलियां दूसरों की ओर उठती थी, अब अपनी ओर उठी उंगलियों को भी देखने लगी हैं। मीडिया और पत्रकारों के बीच भी आत्मनिरीक्षण व आत्मावलोकन का दौर शुरु हो गया है। भोपाल में इंडियन मीडिया सेंटर की गवर्निंग बोर्ड की दो दिवसीय बैठक में यही सब कुछ हुआ।
आईएमसी की संगठनात्मक बैठक के बहाने आयोजकों, देशभर के प्रतिनिधि पत्रकारों और मीडिया से जुड़े विशेषज्ञों ने मीडिया की चुनौतियों से लेकर पत्रकारों के हितों से जुड़े सवालों पद गंभीर चर्चा की। उद्घाटन सत्र में मध्यप्रदेश के जनसंपर्क और संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा और समापन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने आज की मीडिया को लेकर अपनी राय व्यक्त की।
राजनेता और मध्यप्रदेश शासन में मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने कहा कि पहले जो पत्रकारिता भारतीय मूल्यों को लेकर की जाती थी आज उसके स्वरूप मे व्यापारिक मूल्य अधिक हावी होते जा रहे है इसे देखते हुए मीडिया की कार्यप्रणाली में सुधार की जरुरत है और मीडिया को स्वयं ही इसकी शुुरुआत करनी होगी। उन्होंने कहा कि आज मीडिया में नकारात्मक बातों को विशेष रूप से प्रभावी बनाया जा रहा है। सरकार व प्रशासन में जो गलत हो रहा है उसे मीडिया को जरुर छापना व दिखाना चाहिये। पर जब अच्छा काम हो तो वह भी सामने लाने का प्रयत्न करना चाहिये। उन्होंने मीडिया में भारतीय मूल्यों का समावेश करने के लिए मीडिया के लोगों से भारतीय साहित्य के अध्ययन का आग्रह भी किया।
इंडियन मीडिया सेंटर के अध्यक्ष डॉ. चंदन मित्रा ने कहा कि पत्रकारिता में हो रहे अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें समाज का नैतिक अवमूल्यन रोकना होगा। इस लिहाज से हमें मीडिया की कमजोरियों पर व्यापक दृष्टिकोण से विचार करना चाहिये। मीडिया की विकृतियों पर अंकुश लगाने के लिये मीडिया को स्वयं रास्ता तलाशना होगा। पेड न्यूज की बढती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा कि पिछले चुनावों में मीडिया की इस प्रवृत्ति के सामने राजनैतिक दल झुक गये, यदि वे ऐसा नहीं करते तो इस पर अंकुश लग सकता था। उन्होंने कहा कि अकेले पत्रकार यह लडाई नहीं लड़ पायेंगे। इसके लिये समाज और राजनीतिक दलों को जागरुक करना होगा।
वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा सदस्य डॉ मित्रा ने कहा कि भारतीय मूल्यों की रचना में गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण योगदान रहा है पर आज उस इतिहास की उपेक्षा हो रही है जिसके परिणामस्वरूप भारतीय मूल्यों में गिरावट आ रही है। नई पीढ़ी इतिहास और परम्पराओं से अनभिज्ञ है। मीडिया भी भारतीय मूल्यों पर हमला कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पत्रकारिता में राष्ट्रीय भावना को हीन करने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने मीडिया से शाश्वत भारतीय मूल्यों को सामने लाने का आहवान किया। .श्री मित्रा ने नई पीढ़ी को भारतीय इतिहास और मूल्यों से परिचित करवाने हेतु इसे पाठ्यक्रमों में शामिल करने की बात कही।
इंडियन मीडिया सेंटर के निदेशक और वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम खोसला ने कहा कि पत्रकारिता नाजुक और चुनौती से भरे दौर से गुजर रही है और यह खतरे बाहर के नहीं मीडिया के भीतर से ही पैदा हुये हैं। मीडिया को अपने इन संकटों और कमजोरियों को पहचानना होगा। और आत्म निरीक्षण करना होगा। श्री खोसला ने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता घटी है। पत्रकारों में सच्चाई ढूंढने की प्रवृत्ति कम हुई है। पेड न्यूज की चर्चा करते हुये श्री खोसला ने कहा कि प्रेस कौंसिल के वर्तमान स्वरुप में बदलाव करते हुए एक नई मीडिया कौंसिल बनाये जाने की जरुरत पर जोर दिया। एक शक्तिशाली और प्रभावी कौंसिल ही मीडिया को नियंत्रित करने में कारगर हो सकती है।। उन्होंनेे कहा कि इंडियन मीडिया संंेटर समर्पित व्यक्तियों के माध्यम से मीडिया को बदलने का एक प्रयास है।
इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार वि.वि. के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि जिस तरह का बदलाव हो रहा है उसे देखते हुए भविष्य में समाज की रचना मीडिया संवाद पर ही निर्भर करेगी। इसलिए यदि समाज को सुनियोजित करना है तो मीडिया को सुनियोजित करना होगा। इसके लिए मीडिया और समाज दोनों को मिलकर भी कार्य करना होगा। प्रो. कुठियाला ने कहा कि आज देश में जो पत्रकारिता की जा रही है वह भारत के लिए तो है लेकिन भारतीयों के लिए नहीं है। इस प्रवृत्ति का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया की उत्पत्ति, सिद्धांत और आधार पश्चिमी रहे हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का आधार सत्य है पर आज की पत्रकारिता अप्रिय और अधूरे सत्य को अभिव्यक्त कर रही है। श्री कुठियाला ने कहा कि पत्रकारिता का व्यापारीकरण उचित नहीं है समाज उसे बल देकर सामाजिक उददेश्यों की प्राप्ति का साधन बना सकता है।
इंडियन मीडिया सेंटर के संयोजक और मध्यप्रदेश राष्ट्रीय एकता समिति के उपाध्यक्ष श्री रमेश शर्मा ने कहा कि आज देश का मीडिया भारत की प्राथमिकताओं के साथ नहीं है वह विदेशी ताकतोंे के साथ दिखता है। मीडिया राष्ट्र और राष्ट्रवाद को अनदेखा कर रहा है जो कि हमारी मानसिक दासता का द्योतक है।
कार्यक्रम में, पेड न्यूज और मीडिया में भारतीय मूल्यों का समावेश - दो विषयों पर प्रस्तुति और चर्चा भी हुई। मीडिया में भारतीय मूल्यों का समावेश पर श्री रमेश शर्मा और प्रो. कुठियाला ने अपनी प्रस्तुति दी। जबकि पेड न्यूज वरिष्ठ पत्रकार श्री के. जी सुरेश और भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रोफेसर पदीप माथुर ने प्रस्तुति दी। के जी सुरेश ने कहा कि आज विज्ञापनों और पेड न्यूज को बतौर समाचार दिखाया जा रहा है। आज पत्रकारों को आत्ममंथन की आवश्यकता है क्योंकि उनकी इस कमजोरी के कारण राजनेता उनको कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। इस विषय पर पत्रकारों को सोचना होगा कि यदि उन्होंेने अपनी इस कमजोरी को खत्म नहीं किया तो हमारी विश्वनीयता समाप्त हो जाएगी। प्रो.प्रदीप माथुर ने कहा कि मीडिया में आ रही गिरावट के लिए सिर्फ पत्रकार ही जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि समाज को भी इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। समाज को घटिया सामग्री वाले मीडिया को नकारना होगा। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज के लिए पैसे देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है जितना कि लेने वाला। इसलिए मीडिया और पत्रकारों के साथ ही समाज को भी जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा।
बैठक के अंतिम दिन इंडियन मीडिया सेंटर के मध्यप्रदेश चैप्टर का गठन भी हुआ। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पीसी डोगरा और निदेशक श्याम खोसला की उपस्थिति में हुई बैठक में वरिष्ठ पत्रकार श्री रमेश शर्मा अध्यक्ष, श्री राघवेन्द्र सिंह उपाध्यक्ष, श्री अनिल सौमित्र महासचिव और श्री अनिल शर्मा कोषाध्यक्ष निर्वाचित किए गए।

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

गुलामी के द्योतक शब्द इंडिया से छुटकारा पाए भारत

- अरविन्द सीसोदिया
गोवा से कांग्रेस के राज्य सभा सांसद , शांताराम नाईक ने एक गैर सरकारी संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से २७ अगुस्त २०१० को सदन में भारत के संविधान से इंडिया शब्द हटाने की मांग की , संसद में दोनों सदनों में बहुत सारे गैर सरकारी विधेयक रखे जाते रहते हैं और वे अंततः वापिस ले लिए जाते हैं , मुख्य रूप से किसी विसंगती या सुधार विशेष के लिए ये लाए जाते हैं , यह भी ध्यानकर्षण का एक तरीका है..!

Rajya Sabha , August 27, 2010
Shantaram Naik, Congress MP from Goa , on Friday sought a Constitution amendment bill in the Rajya Sabha to call the country simply 'Bharat' and not 'India'
His private member bill seeks to amend the Preamble and Article 1 of the Constitution of India to drop India and use 'Bharat'. It says the words 'India, that is Bharat' in sub-clause 1 of Article be replaced with just 'Bharat'.The grounds for changing the name of the country into simply 'Bharat' are many but, more than the grounds or reasons, it is the sense of patriotism that the name generates and electrifies the people of this country that is relevant, Naik noted.The Congress MP quoted a lyric from the 1965 film Sikandar-E-Aazam to buttress his case: "Jahan daal daal par sone ki chidiyan karti hai basera, woh Bharat desh hai mera."
What are your views on the debate? Should India be called just 'Bharat'?

मुझे लगा कि इस विषय पर संविधान सभा के समय की कुछ बातें सामनें रखीं जाएँ ...
ज्ञात रहे कि भारत के संविधान निर्माण के दौरान कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरु ही सर्वे सर्वा थे , उनकी ही हर बात मानी जाती थी अडंगा लगाने वाले मुस्लिम लीग के सदस्य संविधान सभा में आये ही नहीं वे पाकिस्तान की मांग में ही व्यस्त थे और उन्हें पाकिस्तान मिल भी गया था! कुल मिला कर पूर्ण स्वतंत्र स्थिती थी , इस के बावजूद संविधान भारतीयता का प्रतीरूप नहीं बन पाया इसके लिए जवाहरलाल नेहरु और उस समय की कांग्रेस को ही अपराधी माना जाएगा...!
भारतीय संविधान को सामान्यतः विधि क्षैत्र और लोक प्रसाशन के विद्यार्थी गंभीरता से पढ़ते हैं , मगर जो इस संविधान सभा के वाद विवाद को पढ़ते हैं वे सहज ही समझ जाते हैं कि संविधान निर्माण के दौरान कांग्रेस और जवाहर लाल नेहरु जी ने , बड़ी ही निर्ममता से अपनी मनमानी की..! जिसका नतीजा यह हुआ कि देश को आजाद हुए जितने साल नहीं हुए उससे ज्यादा उसमें संविधान - संसोधन हो गए...!!
संविधान सभा में जब अनुच्छेदवार विचार हुआ तो आपको आश्चर्य होगा कि अनुच्छेद - १ पर , जो कि देश के नाम से संम्बन्धित था , पहला अनुच्छेद था उस पर , आखिरी में विचार हुआ, और उससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी की देखरेख में बनें संविधान की प्रथम मसौदा प्रती में देश का नाम भारत कहीं दर्ज नहीं था... उसमें सिर्फ इण्डिया शब्द मात्र था..! जब यह बात उजागर हो गई तब पूरे देश में आलोचनाएँ हुई सर्व व्यापी निंदा के बाद, कहीं प्रारूप समीति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संशोधन प्रस्तुत किया जिसकी भाषा भी भारत नाम के प्रती अपमान जनक थी , यह संशोधन निम्न प्रकार से है " India , that is, Bhart shall be a Union of states " अर्थात " इण्डिया अर्थात भारत राज्यों का संघ होगा |" इससे पूर्व राष्ट्रवादी विचारधारा वाले सदस्यों ने एक संशोधन पेश कर भारत शब्द कि इज्जत बनाये रखने की कोशिश की थी " भारत अथवा अंग्रेजी भाषा में इण्डिया राज्यों का संघ होगा | " मगर यह संशोधन ३८ मतों के मुकावले ५१ मतों से हार गया , देखिये दुर्भाग्य की इण्डिया शब्द भारतवासियों के मत से ही जीता , वे वही लोग थे जिन्हें कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरु ने चुनवा कर संविधान सभा में लाया गया था , साफतौर पर बात यह है कि नेहरूजी चाहते तो संविधान में इण्डिया शब्द नहीं होता...!
इस मुद्दे पर जो बहस हुई और उसमे जो भारत के पक्षधर सदस्यों ने तर्क दिए उनमें से कुछ इस प्रकार से हैं ....
१- हरिविष्णु कामत :-
संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर के द्वारा प्रस्तुत संशोधन पर अपना संशोधन प्रस्तुतइस प्रकार प्रस्तुत किया ' भारत अथवा अंग्रेजी भाषा में इण्डिया , राज्यों का संघ होगा | ' विकल्प के तौर पर उन्होंने यह भी सुझाया कि ' हिंद अथवा अंग्रेजी भाषा में इण्डिया , राज्यों का संघ होगा |' उन्होंने अपने तर्क में कहा 'में समझता हूँ कि "इण्डिया अर्थात भारत " पद का अर्थ "इण्डिया जिसको भारत कहा जाता है " है , यह संविधान में कुछ भद्दा सा लगेगा | ' इस तर्क के पक्ष में उन्होंने आयरलैंड के संविधान की धारा को बताया जिसमें लिखा है ' राज्य का नाम एयर अथवा अंग्रेजी भाषा में आयरलैंड है | '
२- सेठ गोविन्द दास :-
उन्होंने सुझाव देते हुए कहा " हमारे देश का प्राचीन नाम है , वह हम रख सकते हैं , परन्तु वह जिस सुन्दर तरीके से रखा जाना चाहिए था, डॉ. अम्बेडकर मुझे क्षमा करेंगे , उस तरह से नहीं रखा जा रहा |" उन्होंने आगे कहा '.......वेदों , उपनिषदों तथा ब्राह्मण ग्रंथो के पश्चात हमारा सबसे प्राचीन और महान ग्रन्थ जो 'महा भारत 'है, हमको उससे भारत का नाम मिलता है | '
" अथते कीर्ति पष्यामी , वर्ष भारत भारतं | " - भीष्म पर्व , महाभारत
'गायन्तिः देवा किल गीत कानी , धन्यान्तु ने भारत भूमि भागे ' - विष्णु पुराण
" भरणाच्य प्रजानावै मनुर्भरत उच्यते |
निरुक्त वाचनाचेव वर्ष तद भारतं स्मृतं || " - ब्रम्हांड पुराण
चीनी यात्री इत्सिग ने देश के रूप में अपने यात्रा वृतांत में 'भारत ' नाम ही प्रयोग किया है |
३- कल्लूर सुब्बा राव :-
मद्रास के इस सम्मानीय सदस्य ने तर्क उपस्थित करते हुए कहा , मैं भारत नाम का हार्दिक समर्थन करता हूँ , जो प्राचीन है , भरत नाम ऋग्वेद में है, ३, ४, २३.४ में है | ' इम इंद्र भरतस्य पुत्रा '
४- हरगोविंद पन्त :-
उत्तर प्रदेश के इस सदस्य ने ठोस तर्क देते हुए कहा.., " भारत वर्ष या भारत यह नाम तो हमारे दैनिक धार्मीक संकल्प में कहा जाता है जो नित्य स्नान में भी काम आता है : जम्बू दीपे भरत खण्डे आर्यावते...... "
उन्होंने इण्डिया शब्द का विरोध करते हुए कहा था "... इण्डिया नाम , इस शब्द से न जाने क्यों हमारी ममता सी हो गई है, यह नाम इस देश को विदेशियों ने दिया है , यह नामकरण भी विदेशियों ने ही किया है , उनको इस देश के वैभव का हाल सुन का लालच हुआ था, और अपनी लालसा को पूरा करने के लिए उन्होंने हमारी स्वाधीनता पर आक्रमण किया था , अगर हाँ इण्डिया शब्द को अब भी अपने ह्रदय से लगाए रखें तो इसके माने यह होता है कि हमको इस नाम से , जो हमारे लिए अपमान जनक है , जिस नाम को विदेशियों ने हमारे ऊपर थोपा है , और जिसका नामकरण उन्होंने किया है , उससे हमको कोई दुःख नहीं है | मेरी समझ में यह बातें नहीं आती कि क्यों हम इस नाम को अपने पास रख रहे हैं..? "
".....यह हमारे लिए लज्जा का विषय होगा |"=====
मेरा मत
मेरा मानना है कि जब हम बहुत से नामों को देश में उनकी पुरानी पहचान के कारण संसोधित कर पुनः बहाल चुके हैं , तो हब संविधान से इण्डिया शब्द हटा कर पूरे विश्व को भारत लिखने के लिए मजबूर कर सकते हैं , अभी इण्डिया शब्द हमारे भारत को रोक लेता है , अर्थात हमें संविधान से इण्डिया शब्द तुरत हटाना चाहिए..!
भारत की किसीभी राष्ट्रिय वंदना में , कहीं भी इण्डिया शब्द की कोई आराधना नहीं है.., हमारे अधिकृत राष्ट्रगान में भी भारत शब्द ही है , ऐसी स्थिती में इण्डिया शब्द का क्या ओचित्य है..?
Sarsanghachalak interacts: Indian women's press corp PDF Print E-mail
Written by Administrator
Wednesday, 15 September 2010

कानून व संविधान के तहत ही मंदिर बने
नई दिल्ली।
दिनांक १४ सितम्बर

आयोध्या मामले में अदालत के निर्णय से पहले सरसंघचालक श्री. मोहनजी भागवत ने मंगलवार को कहा कि वह विवादास्पद स्थल पर संसद द्वारा बनाए गए कानून के माध्यम से राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में हैं और अयोध्या मामले पर अदालत के फैसले पर संघ की प्रतिक्रिया 'कानून एवं संविधान' के दायरे में होगी।

इंडियन विमेंस प्रेस कॉर्प द्वारा आयोजित एक वार्तालाप में महिला संवाददाताओं से बात करते हुए उन्होंने कहा, “निश्चित तौर पर, हिंदू समाज की आकांक्षा है कि रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाया जाना चाहिए। इस संबंध में फैसले पर हमारी प्रतिक्रिया इन इच्छाओं के अनुरूप होगी। हम सुनिश्चित करना चाहेंगे कि वहां राम मंदिर का निर्माण हो”।
अदालत के निर्णय के बारे में पूछे जाने पर सरसंघचालक ने कहा, “फैसला आने के बाद ही हम प्रतिक्रिया दे सकते हैं, आगे के कानूनी विकल्प भी मौजूद होंगे”।उन्होंने संकेत दिया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला जिस संबंधित पार्टी के पक्ष में नहीं जाता है, वह उच्चतम न्यायालय जा सकता है।
इस विषय में 24 सितंबर को अदालत का फैसला आने के बाद कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होने की आशंकाओं के बारे में बार बार पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि फैसले पर संघ की प्रतिक्रिया 'कानून, संविधान औरलोकतांत्रिक सीमाओं में' होगी। भागवत ने पत्रकारों से कहा, 'हमारे तरफ से कोई झंझट नहीं होगा।'
मोहनजी भागवत ने कहा, “हम समाज में किसी तरह का विभाजन नहीं चाहते, हम इसे हिंदू-मुस्लिम विवाद के रूप में नहीं देखते बल्कि इसे हम राष्ट्रीय मूल्यों के आदर के रूप में देखते हैं। वास्तव में अगर मंदिर बनता है तो इससे समाज में एकता स्थापित करने में मदद मिलेगी”।
यह पूछने पर कि क्या इस मुद्दे पर वह बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी से वार्ता करेंगे तो उन्होंने कहा कि समाज में खाई को कम करने के लिए आरएसएस धार्मिक नेताओं के साथ वार्ता कर रहा है लेकिन मंदिर मुद्दे पर कोई भी वार्ता मंदिर आंदोलन के 'संतों' की समिति की परिधि में किया जाएगा।
यह पूछने पर कि क्या मंदिर मुद्दे पर भाजपा के रूख से आरएसएस हताश है ?तो उन्होंने कहा, 'राम मंदिर आंदोलन से भाजपा को सहायता मिली है। परन्तु इस बारेमें निर्णय भाजपा को ही करना होगा. बहरहालअपने आंदोलन को चलाने के लिए हमें किसी के सहयोग की जरूरत नहीं है।'
भगवा आतंकवाद ग़लत
गृह मंत्री के भगवा आतंकवाद से देश को खतरे और संघ के कुछ कार्यकर्ताओं के बम विस्फोटो की जांच में नाम सामने आने परसरसंघचालक ने कहा कि ‘भगवा आतंकवाद’ सही शब्द नहीं है.
जहां तक संघ के कुछ लोगो के नाम है, आरएसएस इन्हें अपवाद के रुप में देखता है और अगर कोई पकड़ा जाता है तो कानून को अपना काम करना चाहिए.
लेकिन उन्होंने गृह मंत्री पी चिदंबरम को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ''ये कुछ ताक़तो के देश को बदनाम करने की कोशिश है. जब आप भगवा आतंकवाद कहते है तो कहते है कि ये देश के अंदर पैदा हुआ आतंकवादहै. दुनिया के सामने इसका क्या संदेश जाएगा. लोग हमें ‘अराजक देश’ कहेंगे. गृह मंत्री को ज़िम्मेदारी से शब्दों का चयन करना चाहिए. हिंदू और आतंकवाद कभी साथ नहीं हो सकते.’’
कश्मीर
कश्मीर की स्थिति और स्वायत्तता के सवाल पर उन्होंने कहा, 'हम आजादी या स्वायत्तता जैसे शब्दों को पसंद नहीं करते। हम अलगाववादियों से बात करने की जरूरत नहीं समझते। हमारा मानना है कि कश्मीर को पूरी तरह भारत में मिला देना चाहिए।'उनका मानना है कि सरकार का रूख और नीतियां इसी विचार पर आधारित होनी चाहिए न कि क्षेत्र के साथ अलग व्यवहार करना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों में विश्वास बढ़ाने की जरूरत है।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

श्रीराम जन्मभूमि वाद का निर्णय

विश्व हिन्दू परिषद्

संकटमोचन आश्रम, (हनुमान मंदिर) से0-6,रामकृष्णपुरम,नई दिल्ली- 110 022
दूर-011-26178992, 26103495 फैक्स-26195527,
वि0हि0प0/12/2010 09 सितम्बर, 2010

प्रेस विज्ञप्ति
नई दिल्ली, 09 सितम्बर, 2010


पूज्य सन्तों के पूर्वानुमान के अनुसार ही दिनांक 24 सितम्बर, 2010 को अयोध्या प्रकरण पर 60 वर्षों तक बहुप्रतीक्षित श्रीराम जन्मभूमि वाद का निर्णय सुनाया जाएगा, ऐसी सूचना प्राप्त हुई है। पूज्य सन्तों ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायालय का निर्णय कुछ भी हो पूर्व घोषित श्रीहनुमत् शक्ति जागरण अनुष्ठान के कार्यक्रम मन्दिरों में अनवरत रूप से शान्तिपूर्वक चलते रहेंगे। हम अपने कार्यक्रम को पूर्ण शान्ति के साथ पूर्व नियोजित रूप से सम्पन्न करेंगे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पूर्णपीठ द्वारा 24 सितम्बर, 2010 को दिए जाने वाले निर्णय के सम्बन्ध में समग्र विचार करने हेतु सन्तों की उच्चाधिकार समिति जिसको देश के लाखों सन्तों ने श्रीराम जन्मभूमि भूमि हेतु निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया है, की बैठक आगामी 24-25 सितम्बर, 2010 को दिल्ली में बुलाई गई है। जिसमें सब प्रकार का विचार विमर्श करके आगे की कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी। सन्तों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हमें हर परिस्थिति में कानून व्यवस्था बनाए रखनी है।

क्या आप धर्मनिरपेक्ष हैं ?

जरा फ़िर सोचिये और स्वयं के लिये इन प्रश्नों के उत्तर खोजिये.....


१. विश्व में लगभग ५२ मुस्लिम देश हैं, एक मुस्लिम देश का नाम बताईये जो हज के लिये "सब्सिडी" देता हो ?

२. एक मुस्लिम देश बताईये जहाँ हिन्दुओं के लिये विशेष कानून हैं, जैसे कि भारत में मुसलमानों के लिये हैं ?

३. किसी एक देश का नाम बताईये, जहाँ ८५% बहुसंख्यकों को "याचना" करनी पडती है, १५% अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिये ?

४. एक मुस्लिम देश का नाम बताईये, जहाँ का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री गैर-मुस्लिम हो ?

५. किसी "मुल्ला" या "मौलवी" का नाम बताईये, जिसने आतंकवादियों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया हो ?

६. महाराष्ट्र, बिहार, केरल जैसे हिन्दू बहुल राज्यों में मुस्लिम मुख्यमन्त्री हो चुके हैं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मुस्लिम बहुल राज्य "कश्मीर" में कोई हिन्दू मुख्यमन्त्री हो सकता है ?
७. १९४७ में आजादी के दौरान पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 24% थी, अब वह घटकर 1% रह गई है, उसी समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब आज का अहसानफ़रामोश बांग्लादेश) में हिन्दू जनसंख्या 30% थी जो अब 7% से भी कम हो गई है । क्या हुआ गुमशुदा हिन्दुओं का ? क्या वहाँ (और यहाँ भी) हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार हैं ?
८. जबकि इस दौरान भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10.4% से बढकर 14.2% हो गई है, क्या वाकई हिन्दू कट्टरवादी हैं ?
९. यदि हिन्दू असहिष्णु हैं तो कैसे हमारे यहाँ मुस्लिम सडकों पर नमाज पढते रहते हैं, लाऊडस्पीकर पर दिन भर चिल्लाते रहते हैं कि "अल्लाह के सिवाय और कोई शक्ति नहीं है" ?
१०. सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिये देश के पैसे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये ऐसा गाँधीजी ने कहा था, लेकिन 1948 में ही दिल्ली की मस्जिदों को सरकारी मदद से बनवाने के लिये उन्होंने नेहरू और पटेल पर दबाव बनाया, क्यों ?
११. कश्मीर, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, क्या उन्हें कोई विशेष सुविधा मिलती है ?
१२. हज करने के लिये सबसिडी मिलती है, जबकि मानसरोवर और अमरनाथ जाने पर टैक्स देना पड़ता है, क्यों ?
१३. मदरसे और क्रिश्चियन स्कूल अपने-अपने स्कूलों में बाईबल और कुरान पढा सकते हैं, तो फ़िर सरस्वती शिशु मन्दिरों में और बाकी स्कूलों में गीता और रामायण क्यों नहीं पढाई जा सकती ?
१४. गोधरा के बाद मीडिया में जो हंगामा बरपा, वैसा हंगामा कश्मीर के चार लाख हिन्दुओं की मौत और पलायन पर क्यों नहीं होता ?

रविवार, 12 सितंबर 2010

मीडिया में भारतीय मूल्यों की जरूरत : आईएमसी

भोपाल 11 सितंबर 2010
पहले जो पत्रकारिता भारतीय मूल्यों को लेकर की जाती थी आज उसके स्वरूप मे व्यापारिक मूल्य अधिक हावी होते जा रहे है इसे देखते हुए मीडिया की कार्यप्रणाली में सुधार की जरुरत है और मीडिया को स्वयं ही इसकी शुरुआत करनी होगी। यह विचार जनसंपर्क,ं संस्कृति, एवं उच्च शिक्षा मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने इंडियन मीडिया सेंटर की गवर्निंग बोर्ड की दो दिवसीय राष्ट्ीय बैठक के उदृघटन सत्र में मुख्य अतिथि के रुप में व्यक्त किए।
बैठक की अध्यक्षता इंडियन मीडिया सेंटर के अध्यक्ष, वरिष्ठ पत्रकार एवं सांसद डॉ.चंदन मित्रा ने की। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं इंडियन मीडिया सेंटर के निदेशक श्याम खोसला एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता वि.वि.के कुलपति प्रो. ब्रजकिशोर कुठियाला, पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक श्री पी.सी. डोगरा विशिष्ट अतिथि के रुप में उपस्थित थे। बैठक का आयोजन इंडियन मीडिया सेंटर के मध्यप्रदेश चैप्टर द्वारा किया गया था। बैठक का समापन रविवार को मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान करेंगे।
श्री शर्मा ने कहा कि आज मीडिया में नकारात्मक बातों को विशेष रूप से प्रभावी बनाया जा रहा है। सरकार व प्रशासन में जो गलत हो रहा है उसे मीडिया को जरुर छापना व दिखाना चाहिये। पर जब अच्छा काम हो तो वह भी सामने लाया जाना चाहिये। उन्होंने युवा पत्रकारों का आहवान करते हुये कहा कि भारतीय मूल्यों की स्थापना के लिये अच्छे साहित्य का अध्ययन करना चाहिये।
कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. चंदन मित्रा ने कहा कि पत्रकारिता में हो रहे अवमूल्यन को रोकने के लिए हमें समाज का नैतिक अवमूल्यन रोकना होगा। इस लिहाज से हमें मीडिया की कमजोरियों पर व्यापक दृष्टिकोण से विचार करना चाहिये। मीडिया की विकृतियों पर अंकुश लगाने के लिये मीडिया को स्वयं रास्ता तलाशना होगा। पेड न्यूज की बढती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा कि पिछले चुनावों में मीडिया की इस प्रवृत्ति के सामने राजनैतिक दल झुक गये यदि वे ऐसा नहीं करते तो इस पर अंकुश लग सकता था। उन्होंने कहा कि अकेले पत्रकार यह लडाई नहीं लड़ पायेंगे। इसके लिये समाज और राजनीतिक दलों को जागरुक करना होगा।
वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम खोसला ने कहा कि पत्रकारिता नाजुक और चुनौती से भरे दौर से गुजर रही है और यह खतरे बाहर के नहीं मीडिया के भीतर से ही पैदा हुये हैं। मीडिया को अपने इन संकटों और कमजोरियों को पहचानना होगा। और आत्म निरीक्षण करना होगा। श्री खोसला ने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता घटी है। पत्रकारों में सच्चाई ढूंढने की प्रवृत्ति कम हुई है। आज पत्रकारों को सच को सामने रखना होगा। पेड न्यूज की चर्चा करते हुये श्री खोसला ने कहा कि प्रेस कौंसिल के वर्तमान स्वरुप में बदलाव करते हुए एक नई मीडिया कौंसिल बनाये जाने की जरुरत पर जोर दिया। एक शक्तिशाली और प्रभावी कौंसिल ही मीडिया को नियंत्रित करने में कारगर हो सकती है।। उन्होंनेे कहा कि इंडियन मीडिया संंेटर समर्पित व्यक्तियों के माध्यम से मीडिया को बदलने का एक प्रयास है।
इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार वि.वि. के कुलपति प्रो. ब्रजकिशोर कुठियाला ने कहा कि जिस तरह का बदलाव हो रहा है उसे देखते हुए भविष्य में समाज की रचना मीडिया संवाद पर ही निर्भर करेगी। इसलिए यदि समाज को सुनियोजित करना है तो मीडिया को सुनियोजित करना होगा। इसके लिए मीडिया और समाज दोनों को मिलकर भी कार्य करना होगा। कार्यक्रम में स्वागत उद्बोधन वरिष्ठ पत्रकार एवं उपाध्यक्ष राष्ट्रीय एकता समिति श्री रमेश शर्मा जी ने दिया। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार श्री राघवेन्द्र सिंह ने किया और आभार प्रदर्शन मीडिया कार्यकर्ता श्री अनिल सौमित्र ने किया।

भारतीय मूल्य ही मीडिया को दिशा देने में सक्षम : मुख्यमंत्री श्री चौहान

भोपाल 12 सितंबर 2010
भौतिकता से दग्ध मानवता को शांति और दिशा देने का काम भारतीय मूल्य और दर्शन करेंगे। भारतीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावना को संरक्षित करने और प्रसारित करने की जिम्मेदारी मीडिया को निभानी होगी। उक्त विचार प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान ने इंडियन मीडिया सेंटर की गवर्निंग बोर्ड की मीटिंग में मीडिया में भारतीय मूल्यों के समावेश विषय पर व्यक्त किए। इस दो दिवसीय बैठक का आयोजन इंडियन मीडिया सेंटर के भोपाल चैप्टर ने किया। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार डॉ. चंदन मित्रा ने की।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री चैहान ने कहा कि आज भारतीय मूल्यों और परंपराओं को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। मीडिया भी इसमें शामिल है। मीडिया को मर्यादित होना होगा। श्री चैहान ने आजादी के पूर्व और बाद के मीडिया की सकारात्मक और संर्घषशील भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि आज मीडिया व्यावसायिक हो रहा है जिसके कारण वह संकट के दौर से गुजर रहा है। श्री चैहान ने पेड न्यूज की चर्चा करते हुए इसे समाज के लिए जहर के समान बताया। उन्होंने कहा कि देश तब मजबूत होगा जब नागरिक राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होंगे। मीडिया को समाज में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने का कार्य करना चाहिए।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार डॉ चंदन मित्रा ने कहा कि भारतीय मूल्यों की रचना में गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण योगदान रहा है पर आज उस इतिहास की उपेक्षा हो रही है जिसके परिणामस्वरूप भारतीय मूल्यों में गिरावट आ रही है। नई पीढ़ी इतिहास और परम्पराओं से अनभिज्ञ है। मीडिया भी भारतीय मूल्यों पर हमला कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पत्रकारिता में राष्ट्रीय भावना को हीन करने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने मीडिया से शाश्वत भारतीय मूल्यों को सामने लाने का आहवान किया। .श्री मित्रा ने नई पीढ़ी को भारतीय इतिहास और मूल्यों से परिचित करवाने हेतु इसे पाठ्यक्रमों में शामिल करने की बात कही।
इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी. के. कुठियाला ने कहा कि आज देश में जो पत्रकारिता की जा रही है वह भारत के लिए तो है लेकिन भारतीयों के लिए नहीं है। इस प्रवृत्ति का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया की उत्पत्ति, सिद्धांत और आधार पश्चिमी रहे हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का आधार सत्य है पर आज की पत्रकारिता अप्रिय और अधूरे सत्य को अभिव्यक्त कर रही है। श्री कुठियाला ने कहा कि पत्रकारिता का व्यापारीकरण उचित नहीं है समाज उसे बल देकर सामाजिक उददेश्यों की प्राप्ति का साधन बना सकता है।
इंडियन मीडिया सेंटर के संयोजक और मध्यप्रदेश राष्ट्रीय एकता समिति के उपाध्यक्ष श्री रमेश शर्मा ने कहा कि आज देश का मीडिया भारत की प्राथमिकताओं के साथ नहीं है वह विदेशी ताकतोंे के साथ दिखता है। मीडिया राष्ट्र और राष्ट्रवाद को अनदेखा कर रहा है जो कि हमारी मानसिक दासता का द्योतक है।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में पेड न्यूज पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री के. जी सुरेश ने कहा कि आज विज्ञापनों और पेड न्यूज को बतौर समाचार दिखाया जा रहा है। आज पत्रकारों को आत्ममंथन की आवश्यकता है क्योंकि उनकी इस कमजोरी के कारण राजनेता उनको कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। इस विषय पर पत्रकारों को सोचना होगा कि यदि उन्होंेने अपनी इस कमजोरी को खत्म नहीं किया तो हमारी विश्वनीयता समाप्त हो जाएगी।
कार्यक्रम में उपस्थित भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रो.प्रदीप माथुर ने कहा कि मीडिया में आ रही गिरावट के लिए सिर्फ पत्रकार जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि समाज को भी इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी और घटिया सामग्री वाले मीडिया को नकारना होगा। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज के लिए पैसे देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है जितना कि लेने वाला। इसलिए मीडिया और पत्रकारों के साथ ही समाज को भी जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा।
कार्यक्रम में आए प्रतिभागियों का धन्यवाद श्री रमेश शर्मा ने किया। प्रथम सत्र में श्री संजय द्विवेदी तथा दूसरे सत्र में कार्यक्रम का संचालन श्री अनिल सौमित्र ने किया।

सोमवार, 6 सितंबर 2010

हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता



मीडिया आतंकवाद के लिए आॅक्सीजन का काम करती है
भोपाल। हिंदू कभी भी आतंकवादी नहीं हो सकता। हिंदू कट्टरपंथ भी विश्व शांति के लिए होगा क्योंकि वो तो हमें अपनी परंपराएं निभाना ही सिखाएगा, जिसमें आतंकवाद शामिल नहीं है। वर्तमान में भारतीय समाज आतंकवाद से लड़ाई की निर्णायक राह तलाश रहा है। इसी संदर्भ में कुछ लोगों ने भटक कर गलती कर दी। इसी वजह से गृहमंत्री चिदंबरम को ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द गढ़ने को मौका मिल गया। हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद का इसका सृजन इस्लामिक, माओवादी आतंकवाद तथा अन्य्ा समाज विरोधी गतिविधिय्ाों से लोगों का ध्य्ाान हटाने के उद्देश्य्ा से किय्ाा जा रहा है। भोपाल में स्वैच्छिक संस्था स्पंदन और मप्र राष्ट्रीय एकता समिति द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकारिणी सदस्य राममाधव यह बात कही। श्री राममाधव भोपाल के शहीद भवन में आयोजित एक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। संगोष्ठी का विषय था - ‘आतंकवाद की राजनीति और मीडिया’।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रवक्ता श्री राममाधव ने कहा कि आतंकवाद के बारे में पूरी दुनिय्ाा मे आम सहमति है और इसकी समाप्ति के लिए तमाम देश अनेक तैय्ाारिय्ाां भी कर रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य्ा से आतंकवाद के विषय्ा में भारत में कोई स्पष्टता नहीं है। वर्तमान केंद्र सरकार ने कई आतंकवादी घटनाओं पर कोई कार्रवाई नहीं की जबकि अजमेर शरीफ की घटना को लेकर भगवा आतंकवाद का शब्दजाल रच दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू आतंकवाद की घटनाओं से त्रस्त है और अगर हिन्दू आतंकवाद के रास्ते पर आ रहे हैं तो इसके जवाबदारों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने पूर्व सुरक्षा विशेषज्ञ के हवाले से य्ाह प्रश्न खडा किय्ाा कि भगवा आतंकवाद का हौवा खडा करने में कहीं सेक्य्ाूरिटी ब्य्ाूरों का हाथ तो नहीं। श्री राम माधव का कहना था कि अन्य्ा जरूरी मुद्दों से हट कर भगवा आतंकवाद की बात करना राजनीति का हिस्सा है, हमें इस बात को समझ्ाना होगा। आतंकवाद तथा माओवाद का उद्देश्य्ा बंदूक के बल पर सत्ता को हासिल करना होता है, जबकि हिन्दूवादी संगठन सत्ता की लालसा से कोई ऐसा कायर््ा नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष करना किसी वर्ग य्ाा संप्रदाय्ा के विरोध में जाना नहीं है। हम लडे न लडे तब भी इसके विरुद्ध्ा दुनिय्ाा लडेगी। जो लोग हिन्दू फण्डामेंटलिज्म की बात कह रहे हैं, तो उनके लिए य्ाही कहना सही होगा कि य्ाह है भी तो बुरा नहीं बल्कि अच्छा ही है।
उन्होंने मीडिया से आग्रह करते हुए कहा कि उसे हर मसले को राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। आतंकवाद से जुड़ी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन घटनाओं के प्रस्तुतीकरण में मीडिया को संतुलन का ध्यान रखना चहिए। उन्होंने पश्चिम की मीडिया की भारत के मीडिया से तुलना करते हुए कहा कि वहां आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं में मीडिया ने तथ्य राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए पेश किए, जबकि यहां पर अनेक अवसरों पर उचित संतुलन का आभाव नजर आता है। मीडिया को अपनी आजादी का उपयोग जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए।
हिन्दुवादी राजनीतिक दल शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादक प्रेम शुक्ल वक्ता के बतौर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आतंक का रंग निर्धारण करने से पहले आतंक के ढंग को समझना होगा. इस ढंग को समझने के लिए जिस आंख की जरूरत है उसका भारत में सर्वथा अभाव है. वह आंख कुछ और नहीं बल्कि मीडिया है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय मीडिया का चरित्र इस मामले में नासमझी वाला है, लेकिन अगर हमारे नेताओं के पास ही कोई विश्वदृष्टि नहीं है तो भला मीडिया से यह उम्मीद कैसे की जाए कि कि वे आतंकवाद की गंभीर चुनौती को आंकने के लिए अपनी कोई दृष्टि विकसित कर लेगी।
श्री शुक्ल ने कहा कि आतंकवाद की कल्पना बहुत प्राचीन है, हमारे सभी अवतारी पुरूषों ने जन-चेतना को आतंकवाद के खिलाफ खडा किय्ाा है। उन्होंने कहा कि भगवा आतंकवाद के विषय्ा में पी. चितम्बरम को जवाब देना चाहिए। धर्म के नाम पर जब जिéा ने देश को दो भागांे में बांटा, वह भी आतंकवादी घटना थी लेकिन उसे किसी ने आतंकवाद नहीं कहा। इसी तरह कश्मीर में लगातार हो रही आतंकी घटनाओं को आतंकवाद नहीं माना गय्ाा लेकिन 9@11 की घटना के बाद से इस्लामिक आतंकवाद का उदय्ा हुआ। उन्होंने कहा सनातन धर्म को मानने वालों ने हिन्दुत्व को स्थापित करने के लिए कभी आतंकवाद को नहीं अपनाय्ाा। साध्वी प्रज्ञा सिंह तथा कर्नल पुरोहित की कायर््ाशैली और अलकाय्ादा की कायर््ाशैली में बहुत भिéता है। जेहाद पर खडा आतंकवाद पूरी तरह से सुनिय्ाोजित और इस्लाम का परचम लहराने के उद्देश्य्ा से कायर््ारत है। जबकी कोई भी हिन्दूवादी लोक कल्य्ााण के बारे में ही सोचता है। जिन हिन्दूवादी लोगों को आतंक फैलाने के नाम पर हिरासत में लिय्ाा गय्ाा है। उनकी नार्को टेस्ट जैसी जांच करने के बाद भी कोई पुख्ता सबूत न मिलने पर कहा जाता है कि य्ो लोग य्ाोग करते हैं इसलिए इनसे सच नहीं उगलवाय्ाा जा सका।
उन्होंने कहा कि हमारा मीडिया आतंकवाद से लड़ने के बजाए लोगों में भय पैदा करता है, जबकि यूरोप और अमेरिका ने मीडिया को आतंकवाद के खिलाफ हथियार की तरह उपयोग किया है। इराक की घटना इसका उदाहरण है जहां बिना किसी रासायनिक हथियार के मिले पूरे देश पर कब्जा कर लिया गया जबकि भोपाल गैस त्रासदी में 15000 से भी अधिक लोगों के मारे जाने के बाद भी हम एक गुनाहगार तक को सजा नहीं दिलवा पाए। अमेरिका का मीडिया अपने देश के हित में काम करता है जबकि भारत का मीडिया देश का मनोबल तोड़ने का काम करता है। श्री शुक्ल ने मार्गे्रट थैचर के वक्तव्य को उद्धृत करते हुए कि भारत में भी मीडिया आतंकवाद के लिए आॅक्सीजन का काम कर रही है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ राजनेता महेश जोशी ने कहा कि हिंदू इसलिए कभी आतंकवादी नहीं हो सकता क्योंकि हमारे यहां जीव हत्या को पाप माना गया है। हमारे घरों की माताएं-बहनें हमें कीड़े तक नहीं मारने देतीं, ऐेसी शिक्षा के बाद हम किसी की जान कैसे ले सकते हैं। उन्होंने कहा कि अगर हमस ब एक हो जाएं तो आतंकवाद जड़ से समाप्त हो सकता है। कार्यक्रम का आयोजन स्वैच्छिक संस्था स्पंदन और राष्ट्रीय एकता समिति ने किया था।
अनिल सौमित्र भोपाल से

शनिवार, 28 अगस्त 2010

संघ के पूर्व प्रवक्ता राम माधव और सामना के संपादक एक सितम्बर को भोपाल में

मुंबई 9/11,दिल्ली बटाला हाउस मुठभेड़ जैसी आतंकी घटनाओं में मीडिया की भूमिका को लेकर लोगों के मन में अनेक प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। जहंा अन्य मसलों पर मीडिया का प्रभाव सीमित रहा लेकिन आतंकवादी घटनाओं की व्यापकता और घातकता ने समाज को गहरे तक प्रभावित किया है। चूंकि 21वीं सदी में आतंकवाद की भयावह स्थिति को देखते हुए मीडिया के समक्ष एक बड़ी चुनौती है। कभी -कभी ऐसा लगता है कि मीडिया आतंकवाद की राजनीति का एक पुर्जा बनता जा रहा है।

इसी माह संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका ने हजरत - उल - जिहाद इस्लामिया को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन घोषित किया है जिसमें इसे हैदराबाद के मक्का/मस्जिद में हुए विस्फोट के लिए जिम्मेदार मानते हुए विशेष उल्लेख किया है। ज्ञात है कि इस विस्फोट के लिए भारतीय सुरक्षा संगठन हिन्दुओं को दोषी बता रहे है और सारे मीडिया जगत में हिन्दू आतंकवाद का नया शब्द गढ लिया है। लेकिन किसी भी मीडिया इले., प्रिंट में संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अमेरिका की रिपोर्ट को नहीं बताया जा रहा है एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र ने इस खबर को छापा लेकिन संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका के दावे को झुठलाने वाली रिपोर्ट को साबित किया। ऐसे में जनमानस पर मीडिया की भूमिका को लेकर प्रश्नचिन्ह् लगना स्वभाविक है साथ ही स्वयं मीडिया भी इस चुनौती को लेकर गंभीर हैं।

इसी संदर्भ में मीडिया के समक्ष मौजूद इस चुनौती को स्वीकार कर, एक सार्थक एवं ठोस पहल के लिए, शोध, जागरूकता एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन संस्थान, स्पंदन एवं राष्टीय एकता समिति प्रदेश स्तरीय के साथ आतंकवाद की राजनीति एवं मीडिया विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इस संगोष्ठी में मीडिया वर्ग, जनप्रतिनिधि एवं जनसामान्य को आमंत्रित किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रवक्ता ंव केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति के सदस्य राम माधव एवं सामना मुंबई के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल, उपनेता प्रतिपक्ष चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी वक्तव्य देंगे। कार्यकम की अध्यक्षता वरिष्ठ राजनेता श्री महेश जोशी करेंगे।


मीडिया प्रभारी

;मदन मोहन मालवीयद्ध

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

विधान की मर्यादा पर प्रहार

Aug 23, 11:33 pm

हिंदुओं खासकर कश्मीरी पंडितों के बाद कश्मीर घाटी के अलागाववादियों के
निशाने पर अब सिख समुदाय है। यह बात धीरे-धीरे अब इतिहास का तथ्य बन चुकी
है कि घाटी में कभी बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों के बसेरे थे। उनके घर
थे, खेत-खलिहान थे और तमाम अन्य संपत्तिया थीं। फिर उन्हें धमकिया मिलने
लगीं, उन पर हमले होने लगे। स्थितिया यहा तक पहुंचीं कि उनका धन-मान कुछ
भी सुरक्षित नहीं रह गया। उन्हें अपनी सारी संपदा छोड़ अपने घरों से बेदखल
होना पड़ा और फिर अपने ही देश में इधर-उधर शरणार्थी बनना पड़ा। वे अभी भी
शरणार्थी बन जी रहे हैं और उनके दुखों का कोई अंत नहीं है। यह अलग बात है
राजनेताओं की ओर से उनके पुनर्वास के आश्वासन सैकड़ों बार दिए जा चुके
हैं, लेकिन इस दिशा में ऐसा कुछ वास्तव में हुआ हो, ऐसा कहीं दिखाई नहीं
देता है। वे अब भी दर-बदर हैं और इतने दिनों में

आई-गई हमारी सभी केंद्र और राज्य सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई हैं।
राजनीतिक आश्वासनों और सरकार पर भरोसे का इससे बुरा हश्र और क्या होगा कि
अब तो कश्मीरी पंडितों ने अपने पुनर्वास की उम्मीद भी छोड़ दी है। उनके
नाम पर राजनीतिक लाभ चाहे कितने भी उठाए जा चुके हों, पर इसका कोई लाभ
उन्हें मिला हो, ऐसा मालूम नहीं हुआ।

क्या यही अब सिखों के साथ होने जा रहा है? सिख समुदाय की देशभक्ति की
इतनी मिसालें हैं कि उनकी गिनती करना मुश्किल है। मामला चाहे मध्यकालीन
बर्बरता के खिलाफ संघर्ष का रहा हो, या अंग्रेजी शासन से देश को आजाद
कराने या फिर बाद में देश पर हुए बाहरी आक्त्रमणों का, हर स्थिति में
सिखों ने कुर्बानिया दी हैं। अब उन्हें धमकिया दी जा रही हैं। कहा जा रहा
है कि या तो वे अपना धर्म छोड़ दें या घाटी। उन्हें जबरन इस्लाम कबूल
करवाने की साजिश रची जा रही है और उनके घरों पर पत्थर तक फेंके जाने की
खबरें भी आ रही हैं। सिख समुदाय ऐसे किसी दबाव में आएगा, यह सोचना बिलकुल
गलत होगा। लेकिन इतना जरूर है कि अपनी आस्था पर दृढ़ रहने के कारण उसे
मुश्किलें उठानी पड़ सकती हैं। मुश्किलें वह उठा भी रहा है। इसे लेकर
हंगामा भी हो चुका। घाटी से लेकर दिल्ली में संसद तक हर तरफ यह सवाल
उठाया जा चुका है। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से आश्वासनों की झड़ी भी
लग चुकी है। लेकिन ऐसे आश्वासनों का क्या भरोसा? कौन नहीं जानता कि एक
समय में ऐसे ही आश्वासन बहुत बड़ी मात्रा में कश्मीरी पंडितों को भी दिए
गए थे। आखिर उनका क्या हुआ?

हमला चाहे हिंदुओं पर हो या सिखों पर, या फिर किसी और समुदाय पर. वह हर
हाल में समुदाय पर तो बाद में, सबसे पहले राष्ट्र की मर्यादा पर है। सच
तो यह है कि समुदायों के बहाने ये हमले हमारे संविधान की मर्यादा पर किए
जा रहे हैं। भारतीय संविधान के लिए धर्मनिरपेक्षता सर्वोपरि मूल्य है।
यहा ऐसे किसी भी समूह को किसी भी कीमत पर माफ नहीं किया जाना चाहिए जो
धर्मनिरपेक्षता की हमारी मूल भावना पर हमला कर रहा हो। घाटी में यह कोई
पहली बार नहीं हो रहा है।

पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है। कुछ चुटकी भर देशद्रोही तत्व हैं, जो
आईएसआई के टुकड़ों पर पल रहे हैं और इसीलिए वे बार-बार भारतीय संविधान की
मर्यादाओं को चुनौती दे रहे हैं। यह चुनौती कभी कश्मीरी पंडितों पर हमले
के रूप में होती है तो कभी यहा पाकिस्तानी मुद्रा को मान्यता देने की माग
के रूप में, कभी भारतविरोधी नारेबाजी के रूप में तो कभी पत्थरबाजी और कभी
सिखों को धमकी के रूप में। बात हर तरह से एक ही की जा रही है, सिर्फ रूप
बदल-बदल कर।

अपने हर रूप में यह चुनौती भारतीय संविधान को दी जा रही है। यह कहने की
जरूरत नहीं है कि हमारी व्यवस्था में संविधान सर्वोपरि है। इन हरकतों के
पीछे जो तत्व हैं, वे भी किसी से छिपे नहीं हैं। सभी जानते हैं वे चुटकी
भर अलगाववादी तत्व हैं, जो आईएसआई के टुकड़ों पर पल रहे हैं। वे ही कभी
आतंकवादियों की घुसपैठ कराते हैं तो कभी कुछ भाड़े के लोगों से पत्थरबाजी
करवाते हैं, कभी हिंसक प्रदर्शन करवाते हैं और कभी बेसिर-पैर की मागें
उठाते हैं। आईएसआई के एजेंटों की भारत में घुसपैठ कराने और यहा की खुफिया
सूचनाएं लीक करवाने के पीछे भी उनके ही हाथ हैं। हैरत की बात यह है कि
उनकी इन बेजा हरकतों पर हमारी सरकारें सब कुछ जानते-समझते हुए भी आम जनता
को कोरे आश्वासन और अराजक तत्वों को घुड़की देने के अलावा कुछ भी नहीं
करती हैं। अभी भी यही हो रहा है। बहरहाल यह संतोषजनक बात है कि पहली बार
पत्थरबाजों पर नकेल कसने की कोशिश भी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि यह
नीति कब तक चल सकेगी?

हम यह देख चुके हैं कि शाति के सभी प्रयास विफल रहे हैं। शाति के नाम पर
तो हालत यह है कि मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की। भारत सरकार ने
कश्मीर घाटी में शाति की बहाली के लिए जितने शातिपूर्ण प्रयास किए हैं,
विश्व में कहीं भी ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। दुनिया के किसी भी देश
ने इतने धैर्य का परिचय नहीं दिया होगा, जितना भारत सरकार ने दिया। इसके
बावजूद इसका हमें कोई लाभ नहीं मिला। शायद हमारी सदाशयता और उदारता को ही
अराजक तत्वों ने हमारी कमजोरी मान लिया है। यही वजह है जो अब वे इस हद तक
आ गए। इस स्थिति को तुरंत रोका जाना चाहिए। इसके पहले कि सिखों या किसी
भी समुदाय को दुबारा ऐसी धमकिया मिलें या उन पर ऐसी किसी बात के लिए किसी
भी तरह से दबाव बनाया जाए, धमकिया देने वालों की अक्ल ठिकाने लगा दी जानी
चाहिए।

सच तो यह है कि अराजक तत्व कभी भी शातिपूर्ण समाधान का कोई प्रयास सफल
होने ही नहीं देते। क्योंकि उनके लिए शाति का अर्थ भय होता है। वे सिर्फ
तभी शात होते हैं, जब उन्हें भय दिखाया जाता है। जब अराजक तत्वों को सजा
नहीं दी जाती तो इससे उनका और उनके जैसे दूसरे लोगों का मनोबल बढ़ता है।
वे शात होने के बजाय और अधिक उद्दंड होते चले जाते हैं।

संप्रग अध्यक्ष सोनिया गाधी ने भी कश्मीर के हालात पर चिंता जताई है,
लेकिन इससे स्थितिया सुधरने वाली नहीं हैं। स्थितिया सुधरें, इसके लिए
भारत सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे। सिर्फ कहने से काम नहीं चलेगा, साफ
तौर पर खुलकर सामने आना होगा। उन सभी तत्वों को बिना किसी संकोच के
नेस्तनाबूद करना होगा जो घाटी में आतंकवाद फैलाने, आतंकवादियों की मदद या
किसी भी तरह से अलगाववाद को हवा देने में लगे हुए हैं। उन सब को चुन-चुन
कर कड़ी सजा देनी होगी, ताकि दूसरे ऐसा कुछ करने की हिम्मत न जुटा सकें।
सिर्फ बातें करने से कुछ होने वाला नहीं है।

[निशिकान्त ठाकुर: लेखक दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक हैं]

महिदपुर:मुस्लिम शिक्षक द्वारा छात्रों पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव

उज्जैन जिले की महिदपुर तहसील के ग्राम लसुडिया मन्सूर में 22 जुलाई , बुधवार की शाम कक्षा सातवीं के छात्र श्रीपाल राजपूत (आयु 15 वर्ष) ने ग्राम के एक मन्दिर मे जाकर गणेशजी की मूर्ति को नीचे गिरा दिया । ग्राम के कुछ लोगों ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया और पकड्कर उसकी पिटाई की । जब ग्रामवालो ने उससे पूछ्ताछ की तो उसने बताया कि उसके स्कूल के शिक्षक शकील अहमद नागोरी छात्रो को बन्द कमरे मे इस्लाम धर्म की सीडी दिखाते हैं । उन्हे इस्लाम की विशेषता समझाते हैं और हिन्दू धर्म की बुराइयाँ बताते हैं । आरोपी शिक्षक एक वर्ष से शासकीय स्कूल में छात्रों को अपने लेपटाप पर इस्लाम धर्म की सीडी दिखाकर न केवल उन्हे धर्म-परिवर्तन के लिये प्रेरित कर रहा था बल्कि उनपर धर्म-परिवर्तन के लिये सतत दबाव भी बना रहा था । आरोपी शिक्षक के पास प्रधानाध्यापक का प्रभार भी होने के कारण वह छात्रों कों धमकाता था कि यदि कोई भी बात घरवालों को बताई तो वह उन्हे फेल कर देगा ।
इस धर्मान्ध और मतान्ध शिक्षक ने बच्चों के दिमाग मे इतना जहर घोल दिया और बच्चों पर इतना दबाव बना दिया कि श्रीपाल ने मन्दिर मे जाकर गणेशजी की प्रतिमा को खन्डित करने के लिये उसे ओट्ले से नीचे गिरा दिया।इस खुलासे के होते ही ग्रामवाले आक्रोशित हो गये और स्थिती को भाँपकर शकील रात को ही गाँव से फरार हो गया।सुबह गाँववाले रिपोर्ट लिखवाने के लिये थाने पहुँचे और श्रीपाल की रिपोर्ट पर पुलिस थाना प्रभारी एसएल तोमर ने आरोपी शिक्षक शकील अहमद नागोरी निवासी शफी कालोनी महिदपुर के खिलाफ भादवि की धारा 295(किसी वर्ग की धार्मिक भावनाएं आहत करने के लिये धर्मस्थल को नुक़सान पहुँचाना ),धारा 153(दन्गा भडकाने की कोशिश करना)और धारा 342(अवैध रुप से निरुद्ध करना) का प्रकरण दर्ज कर लिया।
आरोपी शिक्षक को तुरन्त प्रभाव से निलम्बित कर दिया गया और गिरफ्तारी के पश्चात लोअर कोर्ट और सेशन कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया।22 दिन जेल मे रहने के पश्चात हाईकोर्ट से आरोपी को जमानत मिल पाई है ।
समीर चौधरी (महानगर प्रचार प्रमुख,उज्जैन)
सम्पर्क-9425091013

सोमवार, 23 अगस्त 2010

कोटि हिन्दु जन का ज्वार, मंदिर के लिए सब तैयार ......

0 डॉ0 नवीन जोशी
क्या सूरज को सूरज होने का प्रमाण देना पड़ता है या चाँद को अपनी चांदनी साबित करना पड़ती है, मगर ये भारतीय जन के विश्वास पर चोट है कि इस देश में ‘राम जन्मभूमि’ को प्रामाणिकता की जंग लड़ना पड़ रही है । कोटि-कोटि हिन्दु जन के मन में आस्था का प्रतीक बने रामलला के मन्दिर निर्माण में बरसों से दांव पेंच चले जा रहे हैं । राजनीतिज्ञों ने मंदिर को मुद्दे की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है ।
यदि राष्ट्र की धरती छिन जाए तो शौर्य उसे वापस ला सकता है, यदि धन नष्ट हो जाए तो परिश्रम से कमाया जा सकता है, यदि राज्य सत्ता छिन जाए तो पराक्रम उसे वापस ला सकता है परन्तु यदि राष्ट्र की चेतना सो जाए, राष्ट्र अपनी पहचान ही खो दे तो कोई भी शौर्य, श्रम या पराक्रम उसे वापस नहीं जा सकता । इसी कारण भारत के वीर सपूतों ने, भीषण विषम परिस्थितियों में, लाखों अवरोधों के बाद भी राष्ट्र की इस चेतना को जगाए रखा । इसी राष्ट्रीय चेतना और पहचान को बचाए रखने का प्रतीक है श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण का संकल्प ।
अयोध्या की गौरवगाथा अत्यन्त प्राचीन है । अयोध्या का इतिहास भारत की संस्कृति का इतिहास है । अयोध्या सूर्यवंशी प्रतापी राजाओं की राजधानी रही, इसी वंश में महाराजा सगर, भगीरथ तथा सत्यवादी हरिशचन्द्र जैसे महापुरूष उत्पन्न हुए, इसी महान परम्परा में प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ । पाँच जैन तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या है । गौतम बुद्ध की तपस्थली दंत धावन कुण्ड भी अयोध्या की ही धरोहर है । गुरूनानक देव जी महाराज ने भी अयोध्या आकर भगवान श्रीराम का पुण्य स्मरण किया था, दर्शन किए थे । श्रीराम जन्मभूमि पर कभी एक भव्य विशाल मन्दिर खड़ा था । मध्ययुग में धार्मिक असहिष्णु, आतताई, इस्लामिक आक्रमणकारी बाबर के क्रूर प्रहार से जन्मभूमि पर खड़े सदियों पुराने मन्दिर को ध्वस्त कर दिया । आक्रमणकारी बाबर के कहने पर उसके सेनापति मीरबाकी ने मन्दिर को तोड़कर ठीक उसी स्थान पर एक मस्जिद जैसा ढांचा खड़ा कराया । 1528 ई. के इस कुकृत्य से सदा-सदा के लिए हिन्दू समाज के मस्तक पर अपमान का कलंक लग गया । श्रीराम जन्मस्थान पर मन्दिर का पुनःनिर्माण इस अपमान के कलंक को धोने के लिए तथा हमारी आस्था की रक्षा के साथ-साथ भावी पीढ़ी को प्रेरणा देने के लिए आवश्यक है ।
हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर बने मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बनाने का वर्णन अनेक विदेशी लेखकों और भ्रमणकारी यात्रियों ने किया है । फादर टाइफैन्थेलर का यात्रा वृत्तन्त इसका जीता-जागता उदाहरण है । आस्ट्रिया के इस पादरी ने 45 वर्षो तक (1740 से 1785) भारतवर्ष में भ्रमण किया, अपनी डायरी लिखी । लगभग पचास पृष्ठों में उन्होंने अवध का वर्णन किया, उन्होंने लिखा कि रामकोटि में तीन गुम्बदों वाला ढांचा है उसमें 14 काले कसौटी पत्थर के खम्भे लगे हैं, इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने तीन भाइयों के साथ जन्म लिया । भावी मन्दिर का प्रारूप बनाया गया । अहमदाबाद के प्रसिद्ध मन्दिर निर्माण कला विशेषज्ञ श्री सी.बी. सोमपुरा ने प्रारूप बनाया । इन्हीं के दादा ने सोमनाथ मन्दिर का प्रारूप बनाया था । मन्दिर निर्माण के लिए जनवरी, 1989 में प्रयागराज में कुम्भ मेला के अवसर पर पूज्य देवराहा बाबा की उपस्थिति में गांव-गांव में शिलापूजन कराने का निर्णय हुआ । पौने तीन लाख शिलाएं पूजित होकर अयोध्या पहुँची । विदेश में निवास करने वाले हिन्दुओं ने भी मन्दिर निर्माण के लिए शिलाएं पूजित करके भारत भेजीं । पूर्व निर्धारित दिनांक 09 नवम्बर, 1989 को सब अवरोधों को पार करते हुए सबकी सहमति से मन्दिर का शिलान्यास बिहार निवासी श्री कामेश्वर चौपाल के हाथों सम्पन्न हुआ । तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री कांग्रेस के श्री नारायण दत्त तिवारी और भारत सरकार के गृहमंत्री श्री बूटा सिंह तथा प्रधानमंत्री स्व0 राजीव गांधी थे ।
24 मई, 1990 को हरिद्वार में विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ । सन्तों ने घोषणा की कि देवोत्थान एकादशी (30 अक्टूबर, 1990) को मन्दिर निर्माण के लिए कारसेवा प्रारम्भ करेंगे । यह सन्देश गांव-गांव तक पहुँचाने के लिए 01 सितम्बर, 1990 को अयोध्या में अरणी मंथन के द्वारा अग्नि प्रज्जवलित की गई, इसे ‘रामज्योति’ कहा गया । दीपावली 18 अक्टूबर, 1990 के पूर्व तक देश के लाखों गांवों में यह ज्योति पहुँचा दी गई । उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने अहंकारपूर्ण घोषणा की कि ‘अयोध्या में परिन्दा भी पर नहीं मार सकता, उन्होंने अयोध्या की ओर जाने वाली सभी सड़कें बन्द कर दीं, अयोध्या को जाने वाली सभी रेलगाड़ियाँ रद्द कर दी गईं, 22 अक्टूबर से अयोध्या छावनी में बदल गई । फैजाबाद जिले की सीमा से श्रीराम जन्मभूमि तक पहुँचने के लिए पुलिस सुरक्षा के सात बैरियर पार करने पड़ते थे । फिर भी रामभक्तों ने 30 अक्टूबर को वानरों की भांति गुम्बदों पर चढ़कर झण्डा गाड़ दिया । सरकार ने 02 नवम्बर, 1990 को भयंकर नरसंहार किया । 3 दिसम्बर, 1992 को जब ढांचा गिर रहा था तब उसकी दीवारों से शिलालेख प्राप्त हुआ । विशेषज्ञों ने पढ़कर बताया कि यह शिलालेख 1154 ई. का संस्कृत में लिखा है, इसमें 20 पंक्तियाँ हैं । ऊँ नमः शिवाय से यह शिलालेख प्रारंभ होता है । विष्णुहरि के स्वर्ण कलशयुक्त मन्दिर का इसमें वर्णन है । अयोध्या के सौन्दर्य का वर्णन है । दशानन के मान-मर्दन करने वाले का वर्णन है । ये समस्त पुरातात्त्विक साक्ष्य उस स्थान पर कभी खड़े रहे भव्य एवं विशाल मन्दिर के अस्तित्व को ही सिद्ध करते हैं । सरकारें और न्यायालय भी इस सच को झुठला नहीं सके ।
6 दिसम्बर, 1992 का ढांचा ढह जाने के बाद तत्काल बीच वाले गुम्बद के स्थान पर ही भगवान का सिंहासन और ढांचे के नीचे परम्परा से रखा चला आ रहा विग्रह सिंहासन पर स्थापित कर पूजा प्रारंभ कर दी । हजारों भक्तों ने रात और दिन लगभग 36 घण्टे मेहनत करके बिना औजारों के केवल हाथों से उस स्थान के चार कोनों पर चार बल्लियाँ खड़ी करके कपड़े लगा दिए 5-5 फीट ऊँची, 25 फीट लम्बर, 25 फीट चौड़ी ईंटों की दीवार खड़ी कर दी और बन गया मन्दिर । आज भी इसी स्थान पर पूजा हो रही है, जिसे अब भव्य रूप देना है, जो विशाल हिन्दू जन किसी भी वक्त कर देगा ।
07 जनवरी 1993 को भारत सरकार ने ढांचे वाले स्थान को चारों ओर से घेरकर लगभग 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया । इस भूमि के चारों ओर लोहे के पाईपों की ऊँची-ऊँची दोहरी दीवारें खड़ी कर दी गईं । भगवान तक पहुँचने के लिए बहुत संकरा गलियारा बनाया, दर्शन करने जाने वालों की सघन तलाशी की जाने लगी । जूते पहनकर ही दर्शन करने पड़ते हैं । आधा मिनट भी ठहर नहीं सकते । वर्षा, शीत, धूप से बचाव के लिए कोई व्यवस्था नहीं है । इन कठिनाइयों के कारण अतिवृद्ध भक्त दर्शन करने जा ही नहीं सकते । अपनी इच्छा के अनुसार प्रसाद नहीं ले जा सकते । जो प्रसाद शासन ने स्वीकार किया है वही लेकर अन्दर जाना पड़ता है । दर्शन का समय ऐसा है मानो सरकारी दफ्तर हो । दर्शन की यह अवस्था अत्यन्त पीड़ादायी है । इस अवस्था में परिवर्तन लाना है जो इस वर्ष संभव होता प्रतीत है ।
अब नए स्वरूप में मंदिर बनेगा:- श्रीराम जन्मभूमि पर बनने वाला मन्दिर तो केवल पत्थरों से बनेगा । सीमेन्ट, कांक्रीट से नहीं । मन्दिर में लोहा नहीं लगेगा । नींव में भी नहीं । मन्दिर दो मंजिला होगा । भूतल पर रामलला और प्रथम तल पर राम दरबार होगा । सिंहद्वार, नृत्य मण्डप, रंग मण्डप, गर्भगृह और परिक्रमा मन्दिर के अंग हैं । 270 फीट लम्बा, 135 फीट चौड़ा तथा 125 फीट ऊँचा शिखर है । 10 फीट चौड़ा परिक्रमा मार्ग है । 106 खम्भे हैं । 6 फीट मोटी पत्थरों की दीवारें लगेंगी । दरवाजों की चोखटें सफेद संगमरमर पत्थर की होंगी । 1993 में मन्दिर निर्माण की तैयारी तेज कर दी गई । मन्दिर में लगने वाले पत्थरों की नक्काशी के लिए अयोध्या, राजस्थान के पिण्डवाड़ा व मकराना में कार्यशालाएं प्रारम्भ हुई । अब तक मन्दिर के फर्श पर लगने वाला सम्पूर्ण पत्थर तैयार किया जा चुका है । भूतल पर लगने वाले 16.6 फीट के 108 खम्भे तैयार हो चुके हैं । रंग मण्डप एवं गर्भगृह की दीवारों तथा भूतल पर लगने वाली संगमरमर की चौखटों का निर्माण पूरा किया जा चुका है । खम्भों के ऊपर रखे जाने वाले पत्थर के 185 बीमों में 150 बीम तैयार हैं । मन्दिर में लगने वाले सम्पूर्ण पत्थरों का 60 प्रतिशत से अधिक कार्य पूर्ण हो चुका है । हम समझ लें कि श्रीराम जन्मभूमि सम्पत्ति नहीं है बल्कि हिन्दुओं के लिए श्रीराम जन्मभूमि आस्था है । भगवान की जन्मभूमि स्वयं में देवता है, तीर्थ है व धाम है ।
क्या है कोर्ट के हालात
श्रीराम जन्मभूमि के लिए पहला मुकदमा हिन्दु की ओर से जिला अदालत में जनवरी, 1950 में दायर हुआ । दूसरा मुकदमा रामानन्द सम्प्रदाय के निर्मोही अखाड़ा की ओर से 1959 में दायर हुआ । सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड की ओर से तो दिसम्बर, 1961 में मुकदमा दायर हुआ । 40 साल तक फैजाबाद की जिला अदालत में ये मुकदमे ऐसे ही पड़े रहे । वर्ष 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवकीनन्दन अग्रवाल (अब स्वर्गीय) ने स्वयं रामलला और राम जन्मस्थान को वादी बनाते हुए अदालत में वाद दायर कर दिया, मुकदमा स्वीकार हो गया । सभी मुकदमें एक ही स्थान के लिए हैं अतः सबको एक साथ जोड़ने और एक साथ सुनवाई का आदेश भी हो गया । सितम्बर 2010 में फैसला आना है, निर्णय जो भी हो, अब जनमेदिनी की अटूट आस्था पर ‘ मुहर ’ लगना ही है । मंदिर निर्माण को लेकर सभी हिन्दू एक स्वर में उद्घोष कर रहे हैं - ‘‘ कोटि हिन्दु जन का ज्वार बन कर रहेगा मंदिर इस बार ।’’

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

राम मंदिर पर मुसलमानों की रहस्यमयी चुप्पी


अनिल सौमित्र
रामजन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद पर फैसला आने ही वाला है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बहुप्रतीक्षित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुकदमे में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया है। उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा एवं न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल हैं। चूंकि न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा सितंबर के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसलिए माना जा रहा है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में फैसला सितंबर महीने के पूर्व कभी भी आ सकता है। लेकिन इस मसले पर आम मुसलमान और मुस्लिम संगठनों की चुप्पी रहस्यमय दिखती है। क्या यह तूफान के पहले की शांति है! उर्दू मीडिया ने पहले से ही कहना शुरु कर दिया है कि न्यायालय का निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में आ सकता है। इस मामले में मुस्लिम संगठनों के दोनों हाथों में लड्डू दिखता है। अगर निर्णय उनके पक्ष में आया तो वे नष्ट हो चुके जर्जर बाबरी मस्जिद ढांचे के स्थान पर भव्य मस्जिद की मांग सरकार के सामने रखेंगे। अगर हाईकोर्ट का निर्णय सुन्नी वक्फ बोर्ड के खिलाफ और हिन्दू पक्षकारों के पक्ष में हुआ तो क्या होगा? न्यायालय के निर्णय के संदर्भ में सबसे अहम बात तो यह है कि जिन संगठनों या व्यक्तियों की ओर से न्यायालय में पक्ष रखा जा रहा है क्या उन्हें अपने कौम का समर्थन और सहमति प्राप्त है? संभव है न्यायालय के निर्णय के बाद हिन्दुओं या मुसलमानों का कोई संगठन यह कह दे कि हमें निर्णय मंजूर नहीं, क्योंकि यह हमारे श्रद्धा-आस्था या अक़ीदत का मामला है। ये अलग बात है कि मुस्लिम संगठनों ने इसे अपनी इज्जत का मामला बना रखा है।
उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ वर्ष 1996 से इस विवाद की सुनवाई कर रही थी। मुकदमे में चार पक्षकार हैं। हिंदुओं की ओर से तीन पक्षकार हैं जिसमें एक प्रमुख पक्षकार विवादित परिसर में विराजमान रामलला स्वयं हैं। दूसरे श्री गोपाल सिंह विशारद और तीसरा निर्मोही अखाड़ा हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड पक्षकार है। गोपाल सिंह विशारद ने रामलला के एक भक्त के रूप में निर्बाध दर्शन-पूजन की अनुमति के लिए जनवरी,1950 ईस्वी में अपना मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में दायर किया था। वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़े ने अपना मुकदमा जिला अदालत में दायर कर अदालत से मांग की थी कि सरकारी रिसीवर हटाकर जन्मभूमि मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था का अधिकार अखाड़े को सौंपा जाय। दिसंबर, 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड अदालत में गया। बोर्ड ने अदालत से मांग की कि विवादित ढांचे को मस्जिद घोषित किया जाए, वहां से रामलला की मूर्ति और अन्य पूजा सामग्री हटाई जाएं तथा परिसर का कब्जा सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंपा जाए। जुलाई, 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री देवकीनंदन अग्रवाल ने एक भक्त के रूप में खुद को रामलला का अभिन्न मित्र घोषित करते हुए न्यायालय के समक्ष रामलला की ओर से वाद दाखिल किया। 40 साल तक मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में लंबित पड़ा रहा। शीघ्र सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय के आदेश से सभी मुकदमे सामुहिक सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को सौंपे गए। गौरतलब है कि राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से वर्ष 1993 में एक प्रश्न पूछा गया था कि क्या विवादित स्थल पर 1528 ईस्वी के पहले कभी कोई हिंदू मंदिर था अथवा नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उच्च न्यायालय ने विवादित परिसर की राडार तरंगों से फोटोग्राफी और पुरातात्विक खुदाई भी करवाई। जजों के सेवानिवृत्त होते रहने के कारण उच्च न्यायालय की विशेष पीठ का लगभग 13 बार पुनर्गठन हो चुका है। अंतिम पुनर्गठन 11 जनवरी, 2010 को हुआ।
इसी बीच 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा हिन्दुओं ने जमींदोज कर दिया। अक्तूबर, 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने विवाद के मामले में अंतिम निर्णय की सारी जिम्मेदारी उच्च न्यायालय के हवाले कर दी। तब से उच्च न्यायालय इस मामले की निरंतर सुनवाई कर रहा है। उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए विशेष अदालत का गठन कर संपूर्ण मामला दो हिंदू और एक मुस्लिम जज की पूर्ण पीठ के हवाले कर दिया। शायद इसके पीछे यह सोच रही हो कि मुसलमानों के साथ कोई अन्याय न हो जाये। इसीलिए एक मुसलमान जज भी पीठ में रखा गया।
हालांकि न्यायालय में सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाडा आमने-सामने है, लेकिन अदालत के बाहर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और विश्व हिन्दू परिषद् है। इनके अलावा भी हिन्दुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन हैं। आम हिन्दुओं को डर सता रहा है कि अदालत का फैसला खिलाफ आने पर आम मुसलमान किसकी सुनेगा, किसकी नहीं सुनेगा? मुस्लिम जनता हमेशा अपने कट्टर नेतृत्व का कहा ही मानती आई है। देश विभाजन के समय से लेकर शाहबानों, तस्लीमा, घुसपैठ, आतंकवाद समेत ऐसे अनेक मामले हैं जिन पर उदार मुस्लिम नेतृत्व को मुंह की खानी पड़ी है। आम मुसलमान कट्टर और रूढ़िवादी नेतृत्व की ही सुनता आया है। बंगलादेशी घुसपैठियों का मामला हो या आतंकी और आतंकी संगठनों को पनाह देने का मामला, आम मुसलमानों का सहयोग हमेशा इन्हें ही मिलता आया है। आज भले ही बाबरी एक्शन कमेटी के संयोजक और अदालत में मुसलमानों की तरफ से पैरवी कर रहे जफरयाब जिलानी और बाबरी एक्शन कमेटी के संस्थापक रह चुके जावेद हबीब न्यायालय का फैसला मानने और किसी आंदोलन के इरादे को नकार रहे हों, लेकिन क्या पता कल ‘हिन्दुओ के खिलाफ डायरेक्ट एक्शन’’ का फतवा या आह्वान आ जाये। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की हालत भले ही खराब हो चुकी हो, लेकिन इतनी भी खराब नहीं कि देश का मुसलमान उनकी बातों की अनदेखी कर दे। मुसलमानों के लिए देश के भीतर और बाहर संघर्ष करने वालों की कमी नहीं है। कांग्रेस समेत देश की सभी राजनैतिक पार्टियां, सरकारें, न्यायालय, मीडिया और अ-हिन्दू भारतीय सब मुसलमानों के प्रति जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हैं। मुसलमान अपनी मर्जी से न्यायालय का और न्यायाधीश का चयन कर सकता है। उसके लिए गुजरात का मामला दिल्ली में और मध्यप्रदेश का मामला मुम्बई में ले जाया जा सकता है। जो काम हिन्दुओं के लिए पूरा संघ परिवार नहीं कर सकता वह अकेले जफरयाब जिलानी कर सकते हैं, बखूबी कर रहे हैं। अगर मामला मुसलमानों से जुड़ा हो तो न्यायालय की सुनता कौन है? शाहबानों और अफजल का उदाहरण सबके सामने है। एक में कांग्रेस ने कानून बना कर सर्वोच्च न्यायालय को आइना दिखाया तो दूसरे में सजा का क्रियान्वयन ही रोक दिया। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर-फारुख अब्दुल्ला ने खुलेआम कहा कि अफजल को फांसी देने से कश्मीर के हालात बिगड़ सकते हैं।
पुराने अनुभव तो यही बताते हैं कि आम मुसलमान अपने कट्टरपंथी नेतृत्व के साथ पहले न्यायालय पर दबाव बनायेंगे, फैसला अनुकूल आया तो ठीक वर्ना कह देंगे- फैसला कूड़ेदान के लायक है। केन्द्र सरकार समेत अनेक आयोग उस कचरे को सुरक्षित करने के लिए कूड़ेदान की तलाश में लग जायेंगे। न्यायालय का फैसला न मानने के लिए ‘वोट की राजनीति’ का दबाव तो मुसलमानों के लिए हमेशा से उपलब्ध है ही। देश के प्रधानमंत्री भी ‘देश के संसाधनों’ पर मुसलमानों का पहला हक देकर उनके वोट पर अपना पहला और आखिरी हक अख्तियार करना चाहते हैं। उन्हें अपराध या आतंक के लिए आरोपी मत बनाइये, क्योंकि वे मुसलमान हैं। उन्हें न्यायालय में अपराधी या आतंकी सिद्ध करने का प्रयास मत कीजिये क्योंकि वे ‘‘बेचारे मुसलमान’‘ हैं। सजा सुनाये जाने के बाद भी उसे लागू मत कीजिये क्योंकि उससे अल्पसंख्यकों में तनाव पैदा होने, मानवाधिकार को चोट पहुंचने का खतरा है। अब हिन्दू बेचारा क्या करे। कब तक वह तथाकथित सेक्यूलर संविधान और न्याय व्यवस्था पर भरोसा करे। शायद इसीलिए विहिप ‘जनता के न्यायालय’ में जाने को विवश हुई हो। विहिप या संघ परिवार का प्रयास देश की जनता-जर्नादन को जागृत करने का है। ताकि इससे देश की राजनैतिक व्यवस्था पर कोई प्रभाव पड़े। संभव है ‘‘बहुसंख्यक दबाव की राजनीति’’ का कुछ असर हो जाये और राम मंदिर विवाद का समाधान जनता के सदन ‘संसद’ में हो जाये।
सच बात तो यह है कि न तो हिन्दुओं को चिढ़ाने या अनावश्यक जिद्द करने से मामला सुलझने वाला है और न ही मुसलमानों के तुष्टीकरण से। विभिन्न राजनैतिक दल अगर ईमानदार प्रयास करें तो अयोध्या विवाद का राजनैतिक हल निकल सकता है। इस मामले में मुसलमानों के उदार नेतृत्व को आगे आना ही होगा। पहल उन्हें ही करनी है। समस्या निराकरण नुख्सा उन्ही के पास है। अमन पसंद और विकास की चाहत रखने वाले राजनैतिक दल आगे आएं तो समस्या का निराकरण और भ्री आसान हो जायेगा। सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कर कांग्रेस और उनके नेताओं न एक नजीर पेश की है। अयोध्या समझदारी का दूसरा उदाहरण हो सकता है। कांग्रेस पहल करे, भाजपा और अन्य दल मदद करें- राम मंदिर की भव्यता का प्रश्न संसद से हल करें। यह शांति और भाइचारे का तकाजा भी है।
(लेखक पत्रकार और मीडिया एक्टिवीस्ट हैं)

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

तनाव के मूल कारण को पहचानें : डॉ. नागेन्द्र

तनाव के मूल कारण को पहचानें : डॉ. नागेन्द्र


भोपाल। 29 जंलाई। बढ़ते तनाव के उचित प्रबंधन के लिए हमें कारणों को समझना होगा। इसमें योग की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। यह विचार डॉ. एच.आर. नागेन्द्र ने ‘विज्ञान की बात सबके साथ’ अभियान के तहत आयोजित एक कार्यक्रम में व्यक्त किए। स्पंदन एवं पुलिस कल्याण केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में डॉ0 नागेन्द्र ने तनाव पबंधन एवं योग विषय पर चर्चा की। डॉ. नागेन्द्र हिन्दू यूनिवर्सिटी आॅफ अमेरिका के अध्यक्ष और स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान बैंगालूरू के कुलपति हैं।
स्पंदन एवं पुलिस कल्याण केन्द्र द्वारा आयोजित इस परिचर्चा में बोलते हुए डॉ. नागेन्द्र ने बताया कि तनाव के फलस्वरूप अनेक मनोकायिक रोग जैसे - डायविटीज, ब्लडप्रेशर, डिप्रेशन आदि होते हैं जिन्हे केवल दवाओं के द्वारा ठीक करना कारगर सिद्ध नहीं होता। इसके लिए हमें योग आधारित जीवन शैली को अपनाना होगा। विदेशों में योग के बारे में हो रहे अनुसंधानों का उल्लेख करते हुए डॉ. नागेन्द्र ने कहा कि अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस बात को माना जाने लगा है कि तनाव के बेहतर प्रबंधन के लिए योग अत्यन्त उपयोगी है। डॉ. नागेन्द्र ने परिचर्चा में योग के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब भी दिया।
कार्यक्रम का आयोजन टी.टी. नगर स्टेडियम के ध्यानचंद हॉल में हुआ। कार्यक्रम में पुलिस कल्याण केन्द्र की संरक्षिका श्रीमती रीता राउत, भोपाल आईजी श्री शैलेन्द्र श्रीवास्तव, आईजी इंटेलिजेंस श्रीमती अनुराधा शंकर, खेल एवं युवा कल्याण विभाग के संचालक श्री संजय चैधरी, डीआईजी राजेश गुप्ता, भोज वि.वि. के कुलपति एस.एस. सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता जी.के. छिब्बर के अलावा बड़ी संख्या में पुलिस अधिकारी और अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन श्रीमती आरती राव ने किया। स्पंदन संस्था के सचिव अनिल सौमित्र ने आभार प्रकट किया।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

हिन्दू आतंक पर एक और आलेख

Hindu terrorism doesn’t exist, but do we want one?
By - Rajeev Srinivasan

If you tell a lie big enough and keep repeating it, people will eventually come to believe it. The lie can be maintained only for such time as the state can shield the people from the political, economic and/or military consequences of the lie.

It thus becomes vitally important for the state to use all of its powers to repress dissent, for the truth is the mortal enemy of the lie, and thus by extension, the truth is the greatest enemy of the state.

Joseph Goebbels pithily described propaganda thus. And by this measure, there appears to be a conspiracy in India to propagate a certain set of views, and in Noam Chomsky's words, to "manufacture consent". Like the military-industrial complex in the US, there is a media-state nexus in India, whereby the mass media unquestioningly regurgitates the state's perspective.

A recent example is the fuss about a new Indian 'laptop' for $35. It is virtually impossible to get a large portable display for less than $50, and with the electronics and packaging, even if the software is free, there is no way the bill of materials can be less than $100. Yet the media swallows this story whole.

This is far from the most egregious example. Bafflingly, the media repeats the government's anodyne, statements that inflation will subside "in the next six months". This is ludicrous and has no rationale, yet mandarins mouth it regularly. But it is never challenged by the media; meanwhile, food inflation continues.

But the cravenness of the media is most evident when it comes to that pet project of the state, known as 'secularism'. The actual meaning of the term, which emerged in the context of the interference of the Catholic Church in the affairs of the state in medieval Europe, is that the state is fully indifferent to religion.

However, in India, so-called 'secularism' means precisely the opposite — the state looks upon every individual primarily based on his religion. For instance, the PM made the statement in December, 2006, that Muslims should have first rights to the resources of the country. This violates the Constitution, but it has become part of the accepted ethos through repetition.

The most blatant example of this propaganda is the current feeding frenzy about 'Hindu terror'. The fact is that there is practically no history of Hindu terror. Religious terrorism has traditionally been the monopoly of the Abrahamic traditions, including Communism. Monotheists by definition divide the world into 'us' and 'them', and demonise the Other, probably a necessary condition for terror.

Communist terrorists regularly massacre people in central India, West Bengal and Kerala. There was Jewish terrorism — the Stern gang in Palestine, which had as a member Yitzhak Shamir, later prime minister of Israel, comes to mind. There are many historical examples of Christian religious terrorism, going back to the liquidation of the Albigensians and other heretics around 345 CE, the horrors of the Spanish Inquisition (and especially the version in Goa), all the way to assassinations by radical anti-abortionists in the US.

The National Liberation Movement of Tripura is an explicitly Christian terrorist group, forcibly converting people. The National Socialist Council of Nagaland has unleashed terrorism in its pursuit of "Nagalim for Christ". The assassination of Swami Lakshmananda in Orissa, when his major 'sin' was that he was defending tribals against the depredations of Christian missionaries, is another example.

But clearly Islamic terrorism is the biggest example of religion-based terrorism today. Suicide bombings, the fatwas on Salman Rushdie and others, 9/11 and 26/11, the periodic bombings in many parts of India, college professor TJ Joseph's hand getting sliced off as retaliation for alleged blasphemy, all these are instances of Islamic religious terrorism. The terrorists themselves take pains to point out that their acts have religious sanction.

Compared to all this, there is no evidence whatsoever that there is Hindu terrorism. The so-called Malegaon blast case and other alleged instances of Hindu terrorism languish because of lack of evidence, although, those accused such, as Sadhvi Pragya, are also rotting away in jail. If there are incidents of Hindu violence, these are almost inevitably reactions to terrorism imposed on them.

The moral equivalence drawn between the Abrahmics' inherent tendency to violence and the non-existent Hindu or Indic terrorism is abhorrent. There is the Panchatantra story about the man with the goat and the three rogues. The rogues convince the gullible man, via the ruse of repeatedly telling him that he is carrying a dog, to abandon the goat, which of course was their original intent. The rogues in the media and the state are, through repeated assertion, convincing people of the 'fact' of Hindu terrorism. Do we want to make it a self-fulfilling prophesy?

मीडिया में आतंकवाद से सम्बन्धित यह आलेख दैनिक जागरण मे प्रकाशित हुआ है

हिन्दू आतंकवादी प्रमाणित करने का षड़यंत्र

-रमेश पतंगे
‘आज तक’ समाचार चैनल का आक्रोश अधिकांश दर्शकों ने देखा ही है। लोकतंत्र में प्रचार माध्यम यह एक चैथा स्तंभ होता है। यह स्तंभ सत्य का अन्वेषण करने वाला, किसी भी कीमत पर न बिकने वाला, निस्पृह एवं निरपेक्ष होना चाहिए। हमारे देश में लोकतंत्र के सभी स्तंभों की दशा दयनीय ही है। चैथा स्तंभ भी उसका अपवाद नहीं है। पैसा लेकर समाचार देना यह एक सामान्य सी बात हो गई है। मुंबई में एकाध नेता को अपना आलेख छपवाना हो तो प्रमुख समाचार पत्र दस लाख से शुरू होते हैं। किस खबर को देना और किसे नहीं इसके लिए भी सौदेबाजी चलती है। किसको सिर पर बिठाना और किसका मान मर्दन करना इसके लिए भी सौदेबाजी चलती है। इसलिए चैथे स्तंभ पर हमला याने लोकतंत्र पर हमला यह भाषा का प्रयोग ठीक नहीं, ‘आज तक’ के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। हिंसक घटना अनुचित है, उसका समर्थन किया ही नहीं जा सकता, कारण हिंसा, हिंसा को ही जन्म देती है यह एक शाश्वत सत्य है। इसलिए इस संदर्भ में यह घटना खराब है। परंतु ‘आज तक’ उसी लायक है और सत्य के नाम पर जो झूठ उसने दिखाया है उसने चैथे स्तंभ की प्रामाणिकता को रसातल पर पहुंचा दिया है।
टीवी टुडे के एंकर ‘सेफरन टेररिजम’ पर एक स्टोरी दे रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मा. श्री इन्द्रेश जी को दिखाते हुए बार-बार यह बताया जा रहा था कि वे अजमेर एवं मक्का मस्जिद के बम विस्फोट में प्रमुख आरोपी हैं। यह सुनकर वाकई सुनने वालों के खून में उबाल आ रहा था। एंकर यानी तोता। वह वही बोलता या दिखाता है जो उसका मालिक उसे कहता है। कारण वह सिर्फ नौकरी कर रहा होता है अपने पेट के लिए। इसलिए एक क्षण उस पर दया भी आती है। पेट के लिए मनुष्य का कितना अधः पतन हो सकता है यह हम टीवी पर देख सकते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दहशतगर्दी जारी है, यह टीवी टुडे चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था। और इसके लिए जो प्रमाण दिए वह स्तरहीन हास्यास्पद थे। पत्रकारिता के सामान्य मूल्यों के खिलाफ थे। कल श्रीमती सोनिया गांधी पर एक फिल्म तैयार की जा सकती है। इटली से भारत पर कब्जे के लिए वे क्या-क्या षड़यंत्र कर रही हैं। क्वात्रोची ने कितना पैसा दिया, कब दिया? कांग्रेेस के खास लोगों को कैसे खरीदा गया? दलितों का कैसे ईसाईकरण किया गया। पैसा लेकर एक एंकर यह फिल्म दिखाए तो उसकी क्या विश्वसनीयता रहेगी? समझदार आदमी कहेगा कि ऐसी फिल्म बनाने वाले को हंटर से पीटना चाहिए। टीवी टुडे इसी लायक है।
टीवी टुडे स्वयं होकर यह साहस नहीं कर सकता। उसे बुलवाने वाला कोई और हैै। हिन्दू आतंकवाद शब्द का पहला प्रयोग श्री शरद पवार ने 2009 के आम चुनाव में पहली बार किया था। मालेगांव बम विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा का नाम घसीटा गया। प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है पर इससे पहले ही उन्हें हिन्दू आतंकवादी प्रमाणित करने का षड़यंत्र जारी है। पवार का दल भले ही राष्ट्रवादी कांग्रेस के नाम से हो पर मूल रूप से वे कांग्रेसी ही है। कांग्रेसवाद क्या है यह हमें समझना चाहिए।
कांग्रेस ने देश विभाजन का जघन्य अपराध किया। देश के साथ विश्वासघात किया। कांग्रेस तो एक दो आम चुनाव के बाद स्वतः ही साफ हो जाती। पर इससे पहले ही नाथूराम गोडसे ने कांग्रेस को एक महाअस्त्र दे दिया। महात्मा गांधी की प्रतिमा मुस्लिमों के हितचिंतक के रूप में थी। गोडसे ने विभाजन के लिए प्रमुख दोषी जिéा के स्थल पर महात्मा गांधी की हत्या की। कांग्रेस ने इस दुर्भाग्यपूर्ण हत्या का राजनीतिक लाभ लेते हुए गांधी हत्या का आरोप संघ के ऊपर मढ़ दिया। साथ ही मुस्लिमों के मन में संघ के प्रति विद्वेष एवं कांग्रेस के प्रति सहानुभूति के बीज बो दिए। मुस्लिमों का रक्षण कांग्रेस ही कर सकती है ऐसा प्रचार किया। मुस्लिमों का वोट बैंक तैयार कर राज करने की नीति ही कांग्रेसवाद कहलाता है।
पं. नेहरू ने इसी नीति के तहत धारा 370 का प्रयोग शुरू किया। कश्मीर को स्वतंत्र दर्जा दिया गया। कश्मीर के लिए अलग ध्वज, अलग कानून एवं कश्मीर घाटी में हिन्दुओं की हत्या पर मौन, मुस्लिमों के लिए उदार आर्थिक पैकेज शुरू किए गए। इंदिरा गांधी ने इससे अलग कुछ नहीं किया। राजीव गांधी ने शाहबानों प्रकरण के लिए संविधान में ही संशोधन कर दिया। इसके बाद मुस्लिमों के तुष्टिकरण के और प्रयास शुरू किए। बात यहीं तक नहीं रूकी है। अब एक और चिंताजनक तथ्य यह है कि अब मुस्लिम आतंकियों का तुष्टिकरण प्रारंभ हो गया है। आतंकवाद पर पाकिस्तान से बातचीत जारी है। इसी तरह गौ हत्या बंद होनी चाहिए इस मांग को कांग्रेस महत्व नहीं देती है यही कांग्रेसवाद है।
सत्ता अगर चाहिए तो मुस्लिम वोट मिलने ही चाहिए। और मुस्लिम वोट पाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कठघरे मे खड़ा करना ही होगा। गांधी हत्या का विषय कई चुनावों तक चला। अब वो पीढ़ी गई। गांधीवाद भी आज अप्रासंगिक है। गांधीजी का उपयोग अब सिर्फ कर्मकांड के लिए है। कांग्रेस के नेता यह कर्मकांड पूर्ण करके स्वयं को गांधीवादी कहते हैं। गांधी जी का एक उपयोग और है वह है राष्ट्रवादियों के खिलाफ उनका प्रयोग करना।
इसके लिए हिन्दुओं को गाली देना आवश्यक है। उन्हें हिंसक बताना पड़ता है, मुस्लिम विरोधी बताना पड़ता है। शरद पवार ने इसीलिए वर्ष 2009 में मुस्लिम वोटों के लिए हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया और मुस्लिम वोट प्राप्त कर चुनावों में सफलता प्राप्त की।
टीवी टुडे ने 16 जुलाई को जो बचकानापन किया, वह दिखने में जितना बचकाना है उतना है नहीं। कांग्रेस की व्यूह रचना का एक भाग है। इसके लिए लोकतंत्र के चैथे खम्बे के साथ करोड़ों का सौदा भी हुआ होगा इसकी पूरी-पूरी संभावना है। अभी बिहार में चुनाव है। फिर उत्तर प्रदेश में बंगाल में और फिर पूरे देश में है। एक बात पर कोई विषय परिणाम नहीं देता है। चावल धीरे-धीरे पकते हैं। वोटों का चावल भी धीरे-धीरे ही पकेगा। हिन्दू वोटों की कांग्रेस को चिन्ता नहीं है। कांग्रेस को जातिगत वोटों की चिंता है। शरद पवार मराठा हिन्दू हैं पर हिन्दुओं के नेता नहीं हैं। वे भी ऐसा ही मानते हैं। इसलिए वे मराठा समाज और मुस्लिम वोट की चिंता करते हैं और सत्ता प्राप्त करते हैं। सत्ता का यह सरल सूत्र है।
इस सूत्र को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आज समग्र दृष्टिकोण के साथ सम्पूर्ण देश में लागू करने का आव्हान कर रहा है। संघ सत्ता की राजनीति नहीं करता। परंतु संघ के विचार से मत प्रभावित होते हैं। संघ जातिगत राजनीति को मान्यता नहीं देता। संघ पंथ भेद भी नहीं मानता। कारण धर्म एक ही है वह है सनातन धर्म। शेष सभी उपासना मार्ग हैं। प्रत्येक अपनी इच्छा के अनुरूप उपासना पद्धति का पालन करें।
यह संघ की मान्यता है। यह मान्यता जातिगत एवं पंथ आधारित वोटों की राजनीति के विरुद्ध आव्हान खड़ी करती है। संघ की आलोचना कौन करता है? संघ की आलोचना सर्वश्री दिग्विजय सिंह, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह, रामविलास पासवान, आदि नेता करते हैं जो स्वयं जातिगत या पंथ आधारित राजनीति करते हैं। धर्म पंथ आधारित राजनीति के स्थान पर हम इसे मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति भी कह सकते हैं। देशभर में ऐसे सत्ता केन्द्र संघ के विरुद्ध स्थान-स्थान पर खड़े हैं। सत्ता की सहायता से वे सीबीआई, एटीएस का दुरुपयोग कर संघ को बदनाम भी करते हैं।
संघ के सामने आव्हान की यह परिस्थिति इन दुष्ट प्रवृत्तियों ने निर्मित की है। थोड़ा विचार करें तो यह परिस्थिति आज ही निर्मित हुई है ऐसा नहीं है। संघ के खिलाफ संघर्ष उसकी स्थापना काल से ही है। संघ का स्वयंसेवक संघर्ष से घबराता भी नहीं है। कारण उसे मालूम है कि यह संघर्ष अधर्म के विरुद्ध धर्म का है। रावण प्रवृत्ति साधन संपन्न हैं। रावण रथी है तो राम विरथी है। पर राम तो धर्म के लिए संघर्ष कर रहे थे इसलिए उनकी विजय हुई।
गहराई में इस संघर्ष का विचार करें तो यह संघर्ष संघ विरुद्ध दुष्ट प्रवृत्ति का न होकर हिन्दू समाज में एवं हिन्दू समाज की दुष्ट प्रवृत्ति के बीच है। संघ के खिलाफ हमला मुल्ला मौलवी या फादर नहीं करते यह हमला अपने समाज के लोग ही करते हैं। आने वाले समय में सज्जन शक्ति को खड़ा होना ही पड़ेगा। इसे संगठित करना ही पड़ेगा। यह संघर्ष सभी मोर्चों पर है। प्रचार माध्यम भी एक ऐसा ही मोर्चा है तो दूसरा मोर्चा राजकीय है। एक मोर्चा सड़क पर है तो दूसरा न्यायालय है। एक मोर्चा बौद्धिक क्षेत्र का है तो दूसरा मोर्चा बाहुबल के स्तर पर भी है। सभी मोर्चों पर संघर्ष अटल है। ऐसे समय में संघ का एक गीत याद आता है। संकट की बेला है शत्रुओं ने घेरा है। हम अजेय राष्ट्र शक्ति संगठित करें। नगर, ग्राम डगर, डगर संघमंत्र दें।
अनुवाद अतुल तारे