रविवार, 1 दिसंबर 2013
हारेंगे या हरायेंगे !
अनिल सौमित्र
बात अजीब-सी है, लेकिन सच है. मामला मध्यप्रदेश भाजपा से सम्बन्धित है. विधानसभा चुनाव के महज तीन हफ्ते ही बचे हैं. लेकिन पार्टी में असंतोष, बगावत और विरोध अपने चरम पर है. भाजपा के नेता अपनी-अपनी दावेदारी के लिये नेताओं, खासकर प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, संगठन महामंत्री अरविंद मेनन और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दरवाजों पर लगातार, अहर्निश दस्तक दे रहे हैं. वर्तमान विधायकों के विरोधी भी दल-बल के साथ अपना असंतोष व्यक्त कर रहे हैं. इस विरोध और असंतोष में अनुशासन और मर्यादा नदारद है. विधायकी का टिकट पाने के लिये दावेदार किसी भी हद तक जाने को तैयार है. भले ही दल में दलदल हो जाए, दल में दरार पड़ जाए. वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर उतारू हैं.
इस बीच भाजपा ने अपने सारे नीति-नियमों को ताक पर रख एक ही कसौटी रखा है- टिकट उसे ही मिलेगा जो जीत सकेगा. अर्थात पार्टी की एकमात्र कसौटी है जिताउपन. हालांकि कुछ वरिष्ठ नेता जरूर संतानमोह से ग्रस्त होकर धृतराष्ट की तरह व्यवहार कर रहे हैं. संगठन और विचारधारा पर उनका संतानमोह हावी हो गया है. इस मामले में कई नेता मानसिक संकीर्णताओं से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं. यह सच है कि पार्टी में सबकुछ तिकड़ी कहे जाने वाले चौहान, तोमर और मेनन के के ईर्द-गिर्द सिमट गया है. बाकि नेता या तो उपेक्षित हैं या असंतुष्ट. पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष साध्वी उमाश्री भारती की उपेक्षा और उनका संतोष भाजपा के लिये महँगा सिद्ध हो सकता है. ऐसे ही पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा की उपेक्षा संगठन के नुकसान की कीमत पर की जा रही है. पार्टी में प्रदेशव्यापी असंतोष और बगावत को शांत करने के लिये पूर्व संगठन महामंत्री माखन सिंह चौहान और सहसंगठन मंत्री रहे भागवत शरण माथुर को मोर्चे पर लगाया गया है. लेकिन वे मोर्चे पर तब आये हैं जब समस्याएँ फ़ैल चुकी हैं. सच बात तो यह है कि उनके पास असंतोष और बगावत से निपटने के लिये न तो अधिकार है और ना ही कोई साजो-सामान! दोनों के मन में संगठन से बेदखली की टीस जरूर है. इस टीस को लेकर वे बगावत प्रबंधन में कितने सफल हो पायेंगे यह तो समय ही बताएगा. ऐसे ही उमाश्री भारती और प्रभात झा भी बहुत कुछ कर सकते हैं, बहुत कुछ करना चाहते हैं, लेकिन फिलहाल प्रदेश भाजपा उनको इसकी इजाजत नहीं देता. संभव है आने वाले दिनों में दोनों अपनी-अपनी शर्तों पर सक्रिय हों भी, लेकिन तब तक समय और परिस्थितियाँ उनकी जद से बाहर जा चुकी होंगी! तब वे चाहकर भी कुछ नहीं पायेंगे.
इन सबके बीच जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वो है भाजपा प्रत्याशियों की दावेदारी. दावेदारों का हुजूम अपने-अपने क्षेत्रों को छोड़ भोपाल में भाजपा कार्यालय, प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के बंगले पर नजरें गराए, डेरा डाले बैठा है. दावेदारों के समर्थक और विरोधी एक-दूसरे के आमने-सामने हैं. हर दावेदार स्वयं को श्रेष्ठ और अन्य को निकृष्ट सिद्ध करने में लगा है. हर दावेदार अपने को लायक और अन्य को नालायक बता रहा है. वर्तमान विधायकों और मंत्रियों में से अनेक के खिलाफ उनके क्षेत्र में हारने लायक माहौल तैयार है. मध्यप्रदेश भाजपा के लिये सबसे बड़ा खतरा विधायकों और मंत्रियों के प्रति पैदा हुई सत्ता-विरोधी भावना है. ऐसे तकरीबन ६०-७० विधायक हैं जिनका हारना तय है. पार्टी के तमाम सर्वे, संघ का फीडबैक, खुफिया और मीडिया रिपोर्ट इन विधायकों के खिलाफ है. यही कारण है की भाजपा के रणनीतिकारों ने इन विधायकों को टिकट न देने और किसी कारण से टिकट काटना संभव न होने पर क्षेत्र बदलने का नीतिगत फैसला किया है. लेकिन इस फैसले को लागू करने में पार्टी के प्रदेश और केन्द्रीय नेतृत्व को पसीना छूट रहा है. ऐसे ५० से अधिक विधायकों को लेकर पार्टी की हालत यह हो गई है कि या तो हारेंगे या हराएंगे. मतलब साफ़ है पार्टी ने इन्हें टिकट दिया तो ये हार जायेंगे, अगर नहीं दिया तो ये हरा देंगे. पार्टी की स्थिति सांप-छछून्दर की हो गई है. ये हारने-हराने वाले पार्टी के गले में अटक गए हैं. भाजपा ने इसे ही "डैमेज-कंट्रोल" का नाम दिया है. भाजपा इसी डैमेज कंट्रोल में चोट खाये नेताओं को लगाने वाली है. भाजपा दोहरे संकट में है. जिस विधानसभा में जीत पक्की है वहाँ दावेदारों की संख्या परेशानी का सबब है. जहां वर्तमान विधायक की हालत पतली है, लेकिन नए चहरे को सफलता मिल सकती है, वहाँ विधायक अपनी दावेदारी छोडने को तैयार नहीं है. दावेदार धमकी, भयादोहन और विद्रोह की चाल चल रहे हैं. तवज्जो न दिए जाने से तिलमिलाए नेताओं ने अपने समर्थकों को त्रिदेव (शिव-मेनन-तोमर) की ओर हकाल दिया है. भाजपा का संगठन सबसे मजबूत है, लेकिन टिकट वितरण की गलत पद्धति के कारण जिले और संभाग का तंत्र फेल हो गया है. सारा दारोमदार त्रिदेव पर ही आ टिका है. केन्द्रीय नेतृत्व भी सांसत में है. विधानसभा का परिणाम, लोकसभा के परिणाम का निर्धारक होगा. अब मोदी का भविष्य शिवराज के भविष्य से जुड़ा है.
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश विधानसभा में सदस्यों की कुल संख्या २३० है. इसमें जनशक्ति पार्टी को मिलाकर भाजपा की संख्या १४३ है जो २००३ की विधानसभा के मुकाबले ३० कम है. इसी प्रकार मतों के प्रतिशत के मामले में २००३ और २००८ में ४.८६ प्रतिशत का अंतर हो गया. कांग्रेस की निष्क्रियता और अयोग्यता के बावजूद उसके मतों और सीटों में वृद्धि हुई. कांग्रेस की संख्या विधानसभा में ३८ से बढ़कर ७१ हो गई और मतों में .७९ प्रतिशत की बढोतरी हुई. मतलब साफ़ है कि भाजपा जनता का मन जीतने में असफल रही. २००३ में कांग्रेस को भाजपा की तुलना में १०.८९ प्रतिशत कम मत मिले थे. जबकि २००८ में यह अंतर कम होकर ५.२४ प्रतिशत हो गया. मध्यप्रदेश भाजपा के सन्दर्भ में दो महत्वपूर्ण आंकड़े उल्लेखनीय हैं - २००३ के चुनाव में बसपा को ७.२६ प्रतिशत, जबकि २००८ में ८.९७ प्रतिशत मत मिले. बसपा की सीटें २ से बढ़कर ७ हो गईं. जबकि सपा के साथ उलटा हुआ. सपा को २००३ में ३.७१ प्रतिशत मत और ७ सीटें मिली थी जो घटकर २००८ में १.९९ प्रतिशत मत और १ सीट पर सिमट गई. भाजपा भले ही महत्त्व दे या न दे लेकिन उमाश्री भारती के नेतृत्व में बनी भाजश को २००८ के चुनाव में मिले ४.७१ प्रतिशत मत और ५ सीटों को नकारा नहीं जा सकता. गौरतलब है कि भाजश के ये विजयी प्रत्याशी तब भाजपा और कांग्रेस दोनों को हरा कर विधानसभा की दहलीज तक पहुंचे थे. इसके अलावा पिछोर, टीकमगढ़, जतारा, चांदला, पवई, बोहरीबंद और मनासा ऐसे क्षेत्र थे जहां मामूली अंतर से भाजश की हार हुई थी. राजनीति का सामान्य तकाजा तो यही है कि भाजश के सभी विजयी और हारे, किन्तु दूसरे नंबर पर रहे प्रत्याशियों को पुन: उम्मीदवार बनाया जाए. लेकिन प्रदेश भाजपा नेतृत्व इस तकाजे को नजरअंदाज करता दिख रहा है.
लब्बोलुआब यह है कि भाजपा ने अपनी मनमर्जी की राजनीति के कारण एक तरफ जहाँ अपना वोटबैंक खोया है वहीं अनीति और अनियोजन के कारण बसपा और कांग्रेस को बढ़त बनाने का मौक़ा दिया है. बुंदेलखंड, विंध्यप्रदेश और ग्वालियर-चम्बल में उमा भारती का सुनियोजित उपयोग बसपा के बढते प्रभाव को रोक सकता था. लेकिन नेतृत्व की जिद्द, संगठन की उदासीनता और राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण भाजश के नेताओं का विलय तो भाजपा में होने के बावजूद भाजश के मतदाताओं और समर्थकों का विलय नहीं हो पाया. वे अब भी अनिर्णय की स्थिति में हैं. प्रदेश भाजपा में मुख्यमंत्री का व्यक्तित्व इतना बड़ा हो गया कि सभी नेता बौने हो गए. संगठन, विचारधारा और देश भी पीछे छूट गया. राजनीति में व्यक्ति का विकास आनुपातिक न हो तो ईर्ष्या, द्वेष, छल-प्रपंच और कटुता बढ़ती ही है. नेता और नेता में, नेता और कार्यकर्ता में तथा कार्यकर्ता और कार्यकर्ता में एक निश्चित दूरी तो जायज है, लेकिन दूरी अगर नाजायज हो जाए तो उसके दुष्परिणाम होते ही हैं. भाजपा के नेता अपनी श्रेष्ठता का बखान करते हुए कहते है- भाजपा कार्यकर्ता आधारित पार्टी है, जबकि कांग्रेस नेता आधारित. भाजपा संगठन आधारित है, जबकि कांग्रेस सत्ता आधारित. भाजपा विचारधारा आधारित है, जबकि कांग्रेस विचारविहीन. भाजपा का कैडरबेस है, जबकि कांग्रेस कैडरलेस. कांग्रेस के लिए सत्ता साध्य है, जबकि भाजपा के लिये साधन. कांग्रेस में एकानुवर्ती संगठन संचालन है, भाजपा अनेकानुवर्ती, अर्थात लोकतांत्रिक है. भाजपा में व्यक्ति से बड़ा दल है और दल से बड़ा देश, जबकि कांग्रेस में इसका उलटा है. ऐसे अनेक विशेषण हैं जिनका उल्लेख कर भाजपा स्वयं को अन्य दलों, खासकर कांग्रेस से भिन्न बताती रही है. लेकिन जब इन कसौटियों पर राजनीतिक दलों की तुलना की जाती है तो अंतर शून्य मिलता है. यह एक बड़ा कारण है जो भाजपा के मतों और सीटों में वृद्धि को स्थायित्व नहीं देता.
अब जबकि पांच राज्यों में विधानसभा का चुनाव सर पर है, और इसके परिणामों के आधार पर लोकसभा का चुनाव लड़ा जाना है. देश की जनता सचमुच कांग्रेस से ऊब गई है, उसके विरोध में है. लेकिन कांग्रेस से ऊब और उसके विरोध का मतलब भाजपा का समर्थन नहीं हो सकता. भाजपा को परेशान, त्रस्त, असंतुष्ट, दुखी और आक्रोशित जनता का समर्थन पाने के लिये सुपात्र बनना होगा. इसके लिये एक समग्र नीति-रणनीति और योजना की जरूरत होगी. इन योजनाओं को लागू करने के लिये सुयोग्य, सक्षम, सरल, सहज, सुलभ, शांत, संयमित, सहिष्णु, सजग और सक्रिय नेताओं-कार्यकर्ताओं का होना जरूरी है. वांछित सफलता के लिये यह जरूरी है की नेताओं-कार्यकर्ताओं के द्वारा ईमानदार प्रयास किया जाए. लेकिन फिलहाल मध्यप्रदेश भाजपा में यह सब होता हुआ नहीं दिख रहा. विरोध, विवाद और असंतोष को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा कहकर नजरअंदाज किया जा रहा है. सरेआम लोकतांत्रिक प्रक्रिया को महज औपचारिकता कह कर मजाक बनाया जा रहा है. यह सब अशुभ लक्षण हैं. अशुभ लक्षण, शुभ परिणाम नहीं दे सकते. भाजपा नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस का जनाधार हो न हो, देशभर में उसका आधार पुराना है. बुरी-से बुरी स्थिति में वह भाजपा से उत्तराखंड, कर्नाटक और हिमाचल की सत्ता ले चुकी है. जर्जर स्थिति में भी पिछले १० सालों से देश पर शासन कर रही है. मध्यप्रदेश सहित, छात्तीसगढ़, राजस्थान दिल्ली और मिजोरम में वह सत्ता से बहुत दूर नहीं है. राजस्थान, दिल्ली और मिजोरम में तो वे पहले से ही सत्ता में है.
वक्त भले ही कम हो, लेकिन भाजपा के पास कार्यकर्ताओं, शुभचिंतक संगठनों और समर्थकों की संख्या आज भी ज्यादा है. बेहतर समन्वय और सद्भाव का लाभ भाजपा को मिल सकता है. लेकिन फिलहाल ऐसा कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा. कांग्रेस के लिये यह फायदे की स्थिति है. अगर मध्यप्रदेश की बात है तो कांग्रेस गत चुनाव से इस बार बेहतर तैयारी में है. वहाँ नेताओं में फूट भले हो, लेकिन उनके कार्यकर्ता अपेक्षाकृत अधिक अनुशासित और उत्साहित हैं. भाजपा में उठे असंतोष के उबाल का लाभ भी कांग्रेस को ही मिलेगा. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की निष्क्रियता और नकारात्मक सक्रियता कांग्रेस के लिये वरदान साबित होगी. कांग्रेस और बसपा का प्रत्यक्ष-परोक्ष समझौता भाजपा की सत्ता संभावनाओं पर पानी फेर सकता है.
मध्यप्रदेश में नई सरकार के गठन की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. नामांकन की अंतिम तिथि ८ नवंबर है. मतदान २५ नवंबर को होगा. ८ दिसंबर को मतगणना और १२ के पहले सरकार का गठन होना तय है. इस कम समय में भाजपा के लिये नया राजनीतिक इतिहास रचने की चुनौती है. कांग्रेस अपनी खोई सत्ता पाने की जद्दोजहद कर रही है. सफल वही होगा जो जन-मन को जीत पायेगा. जन-मन पल-पल बदला रहा है. कुशल रणनीति और सफल क्रियान्वयन से ही सफलता सुनिश्चित होगी. इतिहास ने पछताने का मौक़ा खूब दिया है. इतिहास वही बदल पाता है जो इन पछताने के अवसरों से सीख लेता है.
(लेखक मीडिया एक्टिविस्ट और स्टेट न्यूज टीवी के सलाहकार संपादक है.)
बुधवार, 21 अगस्त 2013
मीडिया चौपाल - 2013
मंगलवार, 13 अगस्त 2013
14-15 सितम्बर को भोपाल में "मीडिया चौपाल 2013" का आयोजन
गुरुवार, 1 अगस्त 2013
वैकल्पिक राजनीति की राजनीति
सोमवार, 13 मई 2013
सबक सीखे भाजपा
कर्नाटक विधानसभा का परिणाम आ चुका है। दलीलें चाहे जो भी हों, सच्चाई सबके सामने है। भाजपा और जनता दल सेकुलर बराबरी पर आ खड़े हुए हैं। राज्य में कांग्रेस को 121, जनता दल (एस) और भाजपा को 40-40 तथा अन्य को 21 सीट मिली है। प्रदेश में भाजपा को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा है। भले ही भाजपा के प्रवक्ता सार्वजनिक तौर पर इस बात को स्वीकार न करें, लेकिन वे भी इस बात को मानते हैं कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति का प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ना तय है। यह प्रभाव भाजपा के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में है।
भाजपा को सबसे अधिक नुकसान पार्टी से अलग हुए पूर्व मुख्यमंत्री येदियुररप्पा के कारण हुआ है। हालांकि इस तरह की स्थिति का सामना भाजपा पूर्व में भी कर चुकी है। लेकिन हमेशा सबक न लेने और अपने नेताओं को कमतर आंकने के कारण भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा है। झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात का उदाहरण सबके सामने है। झारखंड में बाबूलाल मरांडी, उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह और मध्यप्रदेश में उमा भारती के कारण भाजपा को काफी हानि हुई। यह बात दीगर है कि मध्यप्रदेश और गुजरात में नुकसान इतना नहीं था कि भाजपा कांग्रेस से पीछे रह जाती। फिर भी सीटों और वोटों के मामले में 2003 की तुलना में काफी बड़ा फर्क देखने को मिला था। झारखंड और उत्तरप्रदेश में अपेक्षाकृत अधिक नुकसान हुआ।
सवाल यह है कि क्या बदली हुई परिस्थितियों भाजपा कोई सबक लेगी? क्या राष्ट्रहित के मददेनजर वह अपने मतभेदों को भुलाकर एकजुटता प्रदर्शित करते हुए कांग्रेस को परास्त करने की रणनीति पर काम करेगी? क्योंकि आने वाले कुछ ही महीनों में चार बड़े महत्व के राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। राष्ट्रीय राजनीति में मनोवैज्ञानिक रूप से हार चुकी कांग्रेस को कर्नाटक चुनाव से संजीवनी मिली गई है। इस संजीवनी के सहारे वह भाजपा और अन्य विपक्षी दलों को कुछ समय तक जवाब देती रहेगी। कुछ समय के लिए भाजपा निश्चित तौर पर एक कदम पीछे आ गई है। भ्रष्टाचार, महंगाई और चीन के मुददे पर मुहं छुपाती कांग्रेस को कर्नाटक में जीत का मास्क मिल गया है। अब कांग्रेस यही मुखौटा लगाकर अपने विरोधियों का सामना करेगी।
भाजपा ने दक्षिणी मुहाने पर सरकार बनाकर एक बड़ी सफलता अर्जित की थी। लेकिन नेताओं की आपसी प्रतिस्पद्र्धा और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की ओछी मानसिकता के कारण कर्नाटक में लंबे समय तक उठा-पटक चलती रही। कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए भाजपा को सिर-आंखों पर बैठाया था, उसी ने भाजपा को अपनी नजरों से गिरा दिया। राजनीति में, खासकर चुनावी राजनीति में नेता क्या सोचते हैं इससे अधिक यह महत्वपूर्ण है कि जनता क्या सोचती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या भाजपा नेताओं को दक्षिण में अपने एकमात्र किले के हाथ से जाने का दर्द है? क्या भाजपा के बड़े कद वाले नेता अपना मन बड़ा करने के लिए तैयार हैं? उमा भारती और कल्याण सिंह की ही तरह बाबूलाल मरांडी, येदियुररप्पा और गुजरात के नेता पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल जैसे कई नेता हैं जिन्हें भाजपा से अलग होकर लाभ तो नहीं मिला, लेकिन पार्टी को काफी नुकसान हुआ। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह कि भाजपा के बड़े नेताओं ने हंसते-हंसते इस नुकसान को लंबे समय तक देखा। उन्हें कोई मलाल नहीं हुआ। आपसी अहं और प्रतिस्पद्र्धा के कारण उन्होंने जनता की नजरों में एक-दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे कई अवसर आए जब भाजपा ने अपनों को छोड़ परायों को गले लगाया। भाजपा के वरिष्ठ नेता और विचारक के एन गोविन्दाचार्य भी एक ऐसा ही नाम है। जिन्हें दूसरे दल के नेता तो तवज्जो देते हैं, लेकिन भाजपा नेता ही उन्हें अपना नहीं मानते। आम धारणा तो यही है कि गोविन्दाचार्य जैसे नेता अगर भाजपा जैसे स्थापित और बड़े संगठन के माध्यम से अपना योगदान दें तो परिणाम दूरगामी और असरकारक होगा।
खैर ! कर्नाटक चुनाव से एक बात तो स्पष्ट है कि कांग्रेस चाहे कुछ भी करती रहे, देशभर में उसकी पैठ है। कांग्रेस का राष्ट्रव्यापी जनाधार है। भ्रष्टाचार, महंगाई या किन्हीं और कारणों से थोड़ा-बहुत अन्तर जरूर पड़ता है, लेकिन इतना नहीं कि कांग्रेस का आधार खत्म हो जाये। देश और प्रदेश में कांग्रेस का एकछत्र राज भले न रहा हो, लेकिन वह सरकार बनाने का एक सशक्त विकल्प तो है ही। यही कारण है कि मनमोहन सिंह और राहुल-सोनिया गांधी जैसे जनाधारविहीन नेताओं के रहते भी कांग्रेस का आधार बरकरार है। ऐसे एक नहीं अनेक अवसर आए जब देश में कांग्रेस के खिलाफ जबर्दस्त माहौल देखा गया। लेकिन संगठित और सक्रिय प्रतिपक्ष न होने के कारण कांग्रेस को जनता ने बक्श दिया। कई चुनावों में भाजपा के नकारात्मक वोट कांग्रेस को मिले हैं। कर्नाटक चुनाव में भी यही हुआ। वहां जातीय प्रभाव और भाजपा के नकारात्मक मतों का धु्रवीकरण कांग्रेस के पक्ष में हो गया। भाजपा के राजनीतिक प्रबंधक असफल सिद्ध हुए। जीती हुई बाजी कांग्रेस के हाथ में दे दी।
अब जबकि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनना तय हो चुका है, भाजपा को सबक लेने और चेत जाने का वक्त आ गया है। अगर बड़े नेताओं ने बड़प्पन नहीं दिखाई, बिछुडे़ नेताओं को नहीं अपनाया, अपना अहं नहीं त्यागे और कार्यकर्ताओं के महत्व को नहीं समझा तो आने वाले विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में भी ऐसा ही हश्र हो तो कोई आश्चर्य नहीं। भाजपा के लिए एक सबक यह भी है कि किसी एक नेता पर आश्रित होने की बजाए सामूहिक नेतृत्व को स्थापित करे। नरेन्द्र मोदी हों या कि शिवराज सिंह चैहान - इनके नाम पर हवाई किले बनाने की बजाए मध्यम दर्जे के नेताओं को भी अग्रिम पंक्ति में लाने की कवायद जरूरी है। संगठन को किसी भी कीमत पर सत्ता का अनुचर बनने से अगर भाजपा रोक पाई तभी वह जनता और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं पर खरी हो सकती है। भाजपा की सफलता के लिए यह जरूरी है कि वह समन्वय और संवाद को भाषणों और किताबों से परे जमीन पर उतारने की दिशा में प्रयास करे। राजनीति में मीडिया और प्रचार की भूमिका तो है, लेकिन सीमित है। सिर्फ इसी के भरोसे न तो नरेन्द्र मोदी और न ही शिवराज देश के नेता बन सकते हैं। भाजपा में देश का नेता बनने वाले तो बहुत हैं, लेकिन बनाने वालों की कमी हो गई है। भाजपा में ऐसे नेताओं को भी आगे आने की जरूरत है जो पर्दे के पीछे रहकर अपने नेताओं को देश का नेता बनाएं। इस काम में निजी एजेंसियों से अधिक संगठन की भूमिका है। देश का नेता बनाने में निजी एजेंसियों और सत्ता की भूमिका जितनी बढ़ती जायेगी भाजपा पीछे और कांग्रेस आगे बढ़ती जायेगी। भाजपा के लिए कर्नाटक चुनाव का यह भी एक सबक है। कर्नाटक चुनाव ने आने वाले चुनावों के लिए कांग्रेस को नहीं,भाजपा को कई सबक दिए हैं। सिर्फ पार्टी हित में ही नहीं बल्कि देश हित में भी यह जरूरी है कि भाजपा सबक सीखे और चेते।
शुक्रवार, 10 मई 2013
गुरुवार, 9 मई 2013
चरैवेति प्रकरण : सौमित्र का पत्र सुमित्रा के नाम
प्रति,
माननीया सुमित्रा महाजन
अध्यक्ष, पं. दीनदयाल विचार प्रकाशन
भोपाल
आदरणीया ताईजी,
सादर प्रणाम !
चरैवेति संपादक दायित्व से मुक्ति की घोषणा के दो दिन बाद पत्र लिखने का मन बना पाया हूँ| इन दो दिनों में मन:स्थिति ऐसी नहीं थी कि कुछ लिखा जा सके| लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं और संगठनों में दायित्व मिलने और मुक्त या च्युत होने की एक प्रक्रिया होती है| दायित्व मिलना और मुक्त होना सामान्य और स्वाभाविक बात है| मुझे आज नहीं अपनी नियुक्ति के दिन से ही अंदाजा था कि जिस प्रकार मेरी मौखिक नियुक्ति हुई थी, मुक्ति भी मौखिक ही होगी| लेकिन आपने जिस अंदाज में मुझे मुक्त किया उसका अंदाजा कत्तई न था, क्योंकि संपादक की कुर्सी पर बैठने के पहले मैंने भगवान और माँ सरस्वती-लक्ष्मी के चित्र पर फूल-माला चढाई और धूप-अगरबत्ती दिखाई थी| दायित्व मिलने से पहले कम से कम दो महीने तक, कई बार अलग-अलग स्तरों पर चर्चा में भागीदार हुआ था मैं| अपेक्षा तो यही थी कि विदाई भी कुछ इसी तरह होती| ईमानदारी, मेहनत और लगन से काम करने का पुरस्कार-सम्मान न सही, थोड़ी शाबासी का हकदार तो था ही मैं| खैर हकदार को हमेशा और सब जगह हक मिले ये जरूरी नहीं होता| लेकिन आपसे एक सामान्य प्रेमपूर्ण और निश्छल व्यवहार की स्वाभाविक अपेक्षा थी| आप सुमित्रा ताई हैं, और मैं अनिल सौमित्र| मेरी माँ का नाम भी सुमित्रा ही है| इससे पहले आपसे कभी भी राजनीतिक सम्बन्ध नहीं रहा| हमेशा ही आपके चहरे पर मातृत्व देखता रहा हूँ| जब आपके बुलावे पर मैं इंदौर गया था, तब भी यही सोचा था कि चरैवेति प्रकरण में भी आप एक माँ के समान ही न्याय करेंगी| लेकिन रविवार (बैठक) के दिन आपके प्रति मेरा विश्वास और मेरी धारणाएं सब खंडित हुई| मैं समझ नहीं पाया कि आपने जो घोषणा की वह सच था या संगठन महामंत्री श्री अरविंद मेनन जी ने मुझे जो बताया वह झूठ था! या दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे! आपने मुझे मुक्त करने और आगे का काम श्री जयकृष्ण गौड़ जी द्वारा किये जाने की घोषणा की, जबकि श्री मेनन जी फोन पर मुझसे खुलकर, अच्छे से काम करने की बात कर रहे थे| उनके शब्द थे- गौड़ जी अपना काम करेंगे और आप अपना काम करो| खैर तब तक मैं चरैवेति से स्वयं को समेट चुका था| बाद में पत्रकार मित्रों ने बैठक के भीतर का आँखों देखा हाल बताया और यह सूचना भी दी की आपके अतिरिक्त समिति में सभी पदाधिकारियों का बदलाव हो गया है| गौड़ जी का आना सुखद है, लेकिन वे जिस तरह से आये वो जरूर दुख:द है|
आपके बारे में मेरी एक और धारणा खंडित हुई कि आप सच कहती हैं और हमेशा सच का पक्ष लेती हैं| मुझे वो वाकया याद आया जब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया को आपने गलत बताते हुए बैठक का बहिष्कार कर दिया था| तब अप्रिय सत्य कहने के लिए आपके प्रति मेरी श्रद्धा और सम्मान में बढोत्तरी हुई थी| लेकिन तब मैं दुखी और निराश हुआ जब चरैवेति की नवगठित कार्यकारिणी की चुनाव प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिली, जिसमें आप स्वयं अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित हुई| दूसरे दिन के अखबारों में इसका थोड़ा जिक्र हुआ था, सही और विस्तृत प्रक्रिया की जानकारी तो आपको होगी ही! प्रक्रिया गलत हो या सही, लेकिन एक सामान्य परंपरा तो है ही कि नव-निर्वाचित को पुराने पदाधिकारी और सदस्य बधाई देते, गले मिलते और आगे के काम में सहयोग का आश्वासन देते| पता नहीं यह सब कुछ हुआ कि नहीं, लेकिन मुझे तो ऐसा ही लगा कि सब कुछ चोरी-चोरी चुपके-चुपके हो गया| आपके बारे में नहीं, लेकिन नए सचिव के बारे में कह सकता हूँ कि उनके चहरे के हाव-भाव से लग रहा था कि कोई चोरी का माल उनको मिल गया है जिसे वे अपराधभाव से ग्रहण कर रहे हैं| पुराने सचिव भी चोरी का माल अपने दुश्मन को टिका देने की चाल में सफल होने की खुशी में थे| साथ ही उन्हें अपने विरोधी संपादक को निपटा देने की खुशी भी थी| वे इस बात से भी खुश थे कि लाखों की हेरा-फेरी करने, तीन साल में एक भी बैठक न बुलाने, ऑडिट और आयकर रिटर्न जमा न करने, फर्म्स एंड सोसायटीज को जानकारी न देने तथा इसके अलावा अपने ही सहयोगी को लांछित करने, मीडिया के द्वार संगठन को नुकसान पहुंचाने के बावजूद उसका कोई बाल-बांका नहीं कर सका|
आप भी पिछले तीन सालों से चरैवेति प्रकाशित करने वाली संस्था की अध्यक्ष हैं, फिर से तीन सालों के लिए बन गईं| पिछले तीन सालों में समिति की कितनी बैठकें हुई? समिति की अनियमितताओं और निष्क्रियता के बारे में आपने सचिव या अन्य पदाधिकारी से कितनी बार पूछा? संगठन के पदाधिकारियों से आपने कितनी बार बात की? मुझे पता नहीं इसलिए जिज्ञासा है| आप फिर भी दुबारा अध्यक्ष बन गईं| क्या भाजपा संगठन में अनियमितता को नजरअंदाज करने, दायित्व का निर्वहन न करने और गलत करने वालों को प्रश्रय देने से ही पुरस्कार और सम्मान मिलता है? क्या यह नई परम्परा है?
यहाँ एक बात उल्लेख करना जरूरी है कि दिसंबर अंक में चर्च से सम्बंधित दो आलेख थे| इसके बारे में किसी ने कोई चर्चा नहीं की, लेकिन अप्रैल माह में यही विषय विवादित हो गया| शायद आपको भी याद नहीं होगा कि इसके पहले आपने चरैवेति के अंक को कब देखा था! वैसे भी पत्रिका देखने-पढने की किसी को कहाँ फुर्सत है| लेकिन मुझे खुशी और संतुष्टि है कि मैंने पत्रिका को पाठकों के लिए पढने लायक बनाया| पाठकों और आलोचकों से मुझे प्रशंसा मिली| हाँ ! आपसे और समिति के अन्य पदाधिकारियों से की गयी अपेक्षा व्यर्थ ही गई |
सबसे पहले चर्च वाले आलेख में मुझे आरोपित करने की कोशिश की गई| उसमें कोई मामला नहीं बना तो फर्जी वेबसाईट बनाकर विज्ञापन लेने का आरोप लगाया गया| वह भी झूठा सिद्ध हुआ तो मुझे श्री प्रभात झा का आदमी सिद्ध करने की कोशिश की गयी| आज भले ही चरैवेति में व्यवस्थाओं को बढाने की बात हो रही है| लेकिन पिछले डेढ़ साल में कोई व्यक्ति चरैवेति कार्यालय में झांकने तक नहीं गया| एक कमरे में, जर्जर संसाधनों और बिना सम्पादकीय सहयोगी के पत्रिका का प्रकाशन हुआ| अगर विश्लेषण करना हो तो चरैवेति के पुराने अंको और पिछले डेढ़ साल के अंकों की तुलना की जा सकती है|
जहां तक मेरी बात है तो मैं अपने को ठगा-सा महसूस कर रहा हूँ | लोग सवाल पूछ रहे हैं, मेरे पास जवाब नहीं है| चरैवेति संपादक दायित्व से मैं क्यों मुक्त हुआ? क्या कोई गलती हुई? मैंने कोई भ्रष्टाचार किया? मेरा काम संतोषजनक नहीं था? मैंने भाजपा की विचारधारा के खिलाफ काम किया ? या कोई और वजह थी? जहाँ तक मुझे पता है मैंने जानबूझकर किसी के काम में कोई हस्तक्षेप भी नहीं किया| अपनी किताबों, अपने कम्पयुटर और अपने संसाधनों से मैं चरैवेति पत्रिका का काम करता रहा | क्या मेरे कारण चरैवेति, भाजपा या विचार परिवार को किसी प्रकार की कोई हानि हुई ? या फिर मैंने चरैवेति का उपयोग कर किसी प्रकार का राजनैतिक-आर्थिक लाभ ले लिया ? तो फिर ऐसी क्या वजह थी जो मुझसे एक दोषी और अपराधी की तरह व्यवहार किया गया? मेरे साथ धोखा क्यों हुआ ? हो सकता है आपके लिए ये सामान्य बात हो, लेकिन मैं तो इस क्षेत्र में नया हूँ, इसलिए मेरे लिए तो यह हादसे के सामान हो गया|
चरैवेति संपादक के रूप में मेरी नियुक्ति भाजपाई होने के कारण नहीं, बल्कि संघ पृष्ठभूमि, पत्रकारीय योग्यता, वैचारिक निष्ठा और सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण हुई थी| आपके निर्णय से मेरा पूरा व्यक्तित्व सवालों के घेरे में आ गया| अब लोग सिर्फ मुझसे ही नहीं, बल्कि मेरे परिवार से भी सच्चाई जानना चाहते हैं| घर में, पड़ोस में और समाज में शुभचिंतक ताना दे रहे हैं - क्या मिला संपादक जी? आर्थिक नुकसान की भरपाई तो हो जायेगी, लेकिन मैं अपनी धूमिल हुई प्रतिष्ठा और सामाजिक छवि को कैसे पुनर्स्थापित करूं? आपने अपने निर्णय से संघ के एक स्वयंसेवक, एक पत्रकार और एक कार्यकर्ता को कटघरे में खड़ा कर दिया | चर्च आलेख विवाद के बाद कांग्रेस और ईसाई संगठनों ने जरूर संपादक के खिलाफ कार्यवाई की मांग की थी| क्या आपने कांग्रेस और ईसाई संगठनों की मांग के आधार पर यह कार्यवाई की?
अपने बारे में विश्लेषण करने पर एक बात समझ में आई कि मैं किसी का आदमी नहीं बन पाया| यहाँ भी एक स्वयंसेवक की तरह काम करता रहा| राजनीतिक क्षेत्र में अराजनैतिक काम करने के लिए भी यह जरूरी है कि आप किसी के खास हों| मुझे बात देर से समझ आई, मैं पत्रकारिता कर रहा था और मैं जिनके बीच काम कर रहा था वे मेरे साथ राजनीति कर रहे थे|
जो भी हो इस पूरे प्रकरण से झूठ जीतता हुआ दिखाई दे रहा है| क्योंकि लोगों को सच पता भी चल गया हो तो आपके माध्यम से उसे उजागर नहीं किया गया| सच और झूठ एक बराबर हो गया| जिसने गलती की उसे भी फांसी और जिसने गलती नहीं की उसे भी फांसी| कोई नया कार्यकर्ता कैसे किसी पर भरोसा करेगा? अगर भरोसा और सम्मान ही नहीं रहेगा तो कार्यकर्ता काम कैसे करेगा? बस ! मुझे एक ही बात कचोट रही है कि डा. हितेष वाजपेयी से किसी ने यह क्यों नहीं पूछा कि चार-पांच दिनों तक वे किसके इशारे पर अखबारों में बयानबाजी करते रहे? मेरे ऊपर कानूनी कार्यवाई करने की धौंस अखबारों में देते रहे! क्या एक संपादक को बदलने के लिए इतनी मशक्कत करनी पडती है? बस ! एक ही सवाल आपसे और श्री मेनन जी से है - जब पैसे डा. हितेष वाजपेयी ने खाए, अखबारों में बयान उसने दिए तो फिर मेरे साथ अन्याय क्यों हुआ? आपके निर्णय से तो डा. हितेष वाजपेयी सच्चे और मैं झूठा सिद्ध हुआ, क्या वाकई ऐसा ही है? कुछ पत्रकार यह कह रहे हैं कि आपने अपने राजनीतिक भविष्य के लिए श्री मेनन जी के एजेंडे को पूरा किया, क्या यह भी सच है?
अंत में एक बात और - मैं चापलूसी, चाटुकारिता और प्रपंच करने में फेल हो गया| किसी का आदमी नहीं बन सका| अगर इसके कारण मेरी ऐसी विदाई हुई है तो मुझे बहुत खुशी है| भाजपा ही नहीं पूरे विचार परिवार से जुडने और बिछुडने वालों के लिए चरैवेति का यह प्रसंग एक मिसाल की तरह काम करेगा| मेरे बहाने एक अच्छा उदाहरण स्थापित हो गया | कोई भी नया व्यक्ति जब विचार परिवार से जुडने की सोचेगा तो उसे अपने साथ होने वाले छल, प्रपंच, धोखे और अपमान का अंदाजा जरूर होगा| मैं राजनैतिक व्यक्ति नहीं हूँ, एक स्वयंसेवक, कार्यकर्ता और पत्रकार के रूप में यह सब कुछ लिखा है| अगर कुछ अन्यथा हो तो उसे आप नजरंदाज कर देंगी, यही अपेक्षा है| मेरे पास अपनी बात रखने का यही एकमात्र उपाय बचा था, क्योंकि अन्य असफल कोशिशें मैं पहले ही कर चुका हूँ|
भवदीय
अनिल सौमित्र
प्रतिलिपि,
१. माननीय डा. मोहनराव भागवत, परमपूज्य सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
२. माननीय सुरेश भैया जी जोशी, सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
३. माननीय सुरेश सोनी, सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
४. समस्त केन्द्रीय, क्षेत्रीय और प्रांतीय पदाधिकारी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
५. माननीय श्री राजनाथ सिंह, अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी
६. माननीय श्री लालकृष्ण आडवाणी, वरिष्ठ नेता, भारतीय जनता पार्टी
७. माननीय श्री रामलाल, संगठन महामंत्री, भारतीय जनता पार्टी
८. समस्त केन्द्रीय पदाधिकारी, भारतीय जनता पार्टी
९. माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश
१०. माननीय श्री नरेन्द्र सिंह तोमर, अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश
११. माननीय श्री अरविंद मेनन, संगठन महामंत्री, भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश
शनिवार, 12 जनवरी 2013
प्रवेश परीक्षा के मुद्दे पर निजी मेडिकल कालेजों और एमसीआई के बीच तकरार
सुप्रीम कोर्ट ने निजी कालेजों, विश्वविद्यालयों और राज्य सरकारों को मेडिकल की पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों के लिए अपने प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की अंतरिम अनुमति दी है। एमबीबीएस औऱ बीडीएस कोर्सेज़ के लिए सरकार द्वारा कराये जाने वाले राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा पर आपत्ति कर रही प्राइवेट मेडिकल कालेजों को सुप्रीम कोर्ट ने खुद की प्रवेश परीक्षा संचालित करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मामले पर अगले आदेश आने तक प्रवेश परीक्षा के परिणाम न घोषित किए जाएं। गत 13 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के बाद ये फैसला दिया। कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 15 से 17 जनवरी को करेगा।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर , न्यायामूर्ति एस एस निज्झर और जे छेलेमश्वर की तीन सदस्यीय बेंच ने अपने अंतरिम आदेश में तकरीबन 76 प्राइवेट मेडिकल कालेजों जिसमें से कई धार्मिक औऱ भाषायी अल्पसंख्यक कालेज हैं को ये राहत देते हुए कहा है कि 18 जनवरी तक ये कालेज अपनी प्रवेश परीक्षा के परिणाम घोषित न करें जब तक की प्राइवेट कालेजों के इस समूह की आपत्तियों पर बेंच फैसला न दे। कोर्ट के इस अंतरिम फैसले को क्रिश्चियन मेडिकल कालेज वेल्लोर और उन तमाम मेडिकल कालेजों के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है जिन्होंने प्रवेश परीक्षाओं के लिए तारीखों का एलान कर दिया था। कुछ कालेजों ने अभ्यर्थियों से आवेदन भी मंगवा लिए थे। क्रिसमस की आगामी छुट्टियों के मद्देनज़र निजी संस्थानों ने कोर्ट से प्रार्थना किया था कि कालेजों और छात्रों के हितों को नुकसान न पहुंचे इसके लिए सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अंतरिम निर्देश दे।
मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया ने वर्ष 2013 -14 के लिए राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा ( नेशनल इलिजिब्लिटी इंट्रेस टेस्ट, एनईईटी) के आयोजन के लिए हाल ही में अधिसूचना जारी की थी। कई राज्यों ने पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में नामांकन के लिए एनईईटी का विरोध किया है क्योंकि इससे प्राइवेट कालेज और विश्वविद्यालय अपनी तरफ से ली जाने वाली प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन नहीं कर सकेंगे। आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों ने इस राष्ट्रीय प्रवेश पात्रता परीक्षा का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरबाजा खटखटाते हुए इससे छूट पाने के लिए याचिका दायर की। इस प्रवेश परीक्षा से संबंद्ध और भी कई मामले विभिन्न उच्च न्यायालयों में दायर किए गए जिसे मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया के अनुरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित कर लिया गया। निजी मेडिकल कालेजों की तरफ से एनईईटी का हिस्सा बनने का इस वजह से भी विरोध किया गया कि अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को इसके लिए संवैधानिक छूट प्राप्त है।
प्रवेश पात्रता परीक्षा पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया , निजी मेडिकल कालेज और राज्य सरकारों को इस मामले से संबंधित अपना पक्ष लिखित रूप में सात जनवरी 2013 से पहले सुप्रीम कोर्ट के सामने रखने के निर्देश दिए हैं। विभिन्न राज्यों ने राष्ट्रीय प्रवेश पात्रता परीक्षा का विरोध करते हुए ये दलील दी है कि उनके राज्य में ग्रामीण इलाकों में क्षेत्रीय भाषा में इंटरमीडिएड की पढ़ाई कर रहे छात्रों को एनईईटी में नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके साथ ही ये भी कहा गया है कि चूंकि सभी राज्यों में इंटरमीडिएट के पाठ्यक्रम में एकरूपता नहीं है, इसलिए छात्रों को एक राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा में कठिनाइयां आ सकती हैं।
हालांकि एमसीआई का पक्ष रख रहे वकील निधेश गुप्ता ने निजी मेडिकल कालेजों द्वारा प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की मांग का विरोध करते हुए कहा गया कि इससे छात्रों को अनावश्यक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ सकता है। और छात्रों को ऐसी परेशानी से बचाने के लिए ही राष्ट्रीय पात्रता कम प्रवेश परीक्षा का संधान किया गया था। एमसीआई की ओर से बेंच के सामने ये तर्क भी दिया गया कि अगर जनवरी तक भी फैसला आता है तो भी प्राइवेट कालेजों के पास फरवरी में प्रवेश परीक्षा आयोजित कराने का विकल्प है। बेंच ने बीच का रास्ता निकालते हुए प्राइवेट कालेजों और केंद्र सरकार दोनों को प्रवॆश परीक्षा आयोजित करने की अनुमति दे दी। साथ ही ये निर्देश भी दिया कि परिणाम न घोषित किए जाएं जब तक कि याचिका पर पुरी सुनवाई न हो जाए। कोर्ट को अब ये तय करना है कि क्या प्राइवेट कालेज एनईईटी के परिणाम से बाध्य हैं या नहीं।
हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के अपने फैसले में अखिल भारतीय स्तर पर कामन एंट्रेस टेस्ट कराने की बात कही है। एमसीआई के रिटेलर अमीत कुमार के मुताबिक पी ए इनामदार बनाम भारत सरकार के 2005 के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने ये कहा था कि पूरे देश के लिए एक कामन एंट्रेस टेस्ट होना चाहिए जो किसी एक एजेंसी के नियमन में किया जाना चाहिए। अमित कुमार मानते हैं कि इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम निर्देश को सकारात्मक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन जब देश में मेडिकल शिक्षा का नियमन करने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया ने निजी कालेजों के लिए कामन एंट्रेस टेस्ट कराने की शुरूआत की तो फिर इस पर बवाल क्यों ? जानकार मानते हैं कि इसके पीछे मेडिकल शिक्षा में चल रही भ्रष्ट तंत्र का बहुत बड़ा हाथ है जिसमें न केवल निजी कालेज बल्कि एमसीआई भी बढ़ावा देती रही है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में फैले 150 से ज्यादा निजी मेडिकल कालेजों और डिम्ड विश्वविद्यालयों में एमबीबीएस की मौजूदा चालीस हजार से भी अधिक सीटों पर डोनेशन के जरिए खड़े भ्रष्टाचार के तंत्र में सालाना पंद्रह हज़ार करोड़ रूपए के वारे न्यारे किए जाते हैं। इसमें दस हजार से भी अधिक पीजी सीट पर जहां रेडियोलाजी जैसी लोकप्रिय विभागों में प्रति सीट एक करोड़ रूपए से भी अधिक का रेट फिक्स है, का सालाना लेन देन का हिसाब शामिल नहीं है। ज़ाहिर है ये सब देश में डाक्टर बनाने के नाम पर होता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने हरीश भल्ला बनाम भारत सरकार के मामले में 23 नवंवर 2001 को निजी मेडिकल सीटों पर डोनेशन के जरिए एडमिशन और निजी मेडिकल कालेजों की मान्यता को लेकर एमसीआई में चल रहे पैसे के खुले खेल पर पहली बार कहा कि एमसीआई भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई है। मामला सिर्फ कोर्ट के इस बयान तक ही सीमित नहीं रहा , कोर्ट ने एमसीआई में धांधली की जांच के लिए सीबीआई को निर्देश दिए और एमसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष केतन देसाई को उनकी संदिग्ध भूमिका के लिए उनके पद से हटाने के आदेश दिए। इस पूरे मामले में केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगे और उन आरोपों को बल मिला कि पैसे के इस खुले खेल में सबकी साझेदारी है। केतन देसाई को उनके पद से हटाने के ठीक बाद केंद्र सरकार ने कोर्ट में हलफनामा देकर ये कहा कि केतन देसाई को उनके पद से हटाया जाना ठीक नहीं था। हालांकि केतन देसाई पद से हटकर भी एमसीआई पर साए की तरह मंडराते रहे। पहले देसाई की कोर्स करिकुलम कमिटी के अध्यक्ष के तौर पर वापसी हुई और फिर सुप्रीम कोर्ट से 2009 में चुनाव की अनुमति मिलने के बाद वो निर्विरोध फिर से एमसीआई के अध्यक्ष पद पर आसीन हुए। हालांकि बाद में फिर 2010 में सीबीआई की एक छापेमारी में एडमिशन के नाम पर दो करोड़ की घूस लेने के आरोप में केतन देसाई सीबीआई के हत्थे चढ़ा। केतन देसाई की कारगुजारियों से संबंधित सौ से भी ज्यादा शिकायतें सीबीआई ने एमसीआई को सौंपे। इसके अलावा कैसे केतन देसाई के जमाने में निजी मेडिकल कालेजों को मान्यता देने और इंश्पेक्सन का भय दिखाना, और एमसीआई की बैठकों के एजेंडे को अपने एजेंडे में बदलने का खुला खेल फर्रूखाबादी चलता रहा , उससे सीबीआई और कोर्ट भी वाकिफ है। बहरहाल आनन फानन में सरकार की ओर अध्यादेश लाकर केतन देसाई को अध्यक्ष पद से हटाया गया और एमसीआई को एक छह सदस्यीय कमिटी के हवाले कर दिया गया।
हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के अपने फैसले में अखिल भारतीय स्तर पर कामन एंट्रेस टेस्ट कराने की बात कही है। एमसीआई के रिटेलर अमीत कुमार के मुताबिक पी ए इनामदार बनाम भारत सरकार के 2005 के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने ये कहा था कि पूरे देश के लिए एक कामन एंट्रेस टेस्ट होना चाहिए जो किसी एक एजेंसी के नियमन में किया जाना चाहिए। अमित कुमार मानते हैं कि इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम निर्देश को सकारात्मक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन जब देश में मेडिकल शिक्षा का नियमन करने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया ने निजी कालेजों के लिए कामन एंट्रेस टेस्ट कराने की शुरूआत की तो फिर इस पर बवाल क्यों ? जानकार मानते हैं कि इसके पीछे मेडिकल शिक्षा में चल रही भ्रष्ट तंत्र का बहुत बड़ा हाथ है जिसमें न केवल निजी कालेज बल्कि एमसीआई भी बढ़ावा देती रही है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में फैले 150 से ज्यादा निजी मेडिकल कालेजों और डिम्ड विश्वविद्यालयों में एमबीबीएस की मौजूदा चालीस हजार से भी अधिक सीटों पर डोनेशन के जरिए खड़े भ्रष्टाचार के तंत्र में सालाना पंद्रह हज़ार करोड़ रूपए के वारे न्यारे किए जाते हैं। इसमें दस हजार से भी अधिक पीजी सीट पर जहां रेडियोलाजी जैसी लोकप्रिय विभागों में प्रति सीट एक करोड़ रूपए से भी अधिक का रेट फिक्स है, का सालाना लेन देन का हिसाब शामिल नहीं है। ज़ाहिर है ये सब देश में डाक्टर बनाने के नाम पर होता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने हरीश भल्ला बनाम भारत सरकार के मामले में 23 नवंवर 2001 को निजी मेडिकल सीटों पर डोनेशन के जरिए एडमिशन और निजी मेडिकल कालेजों की मान्यता को लेकर एमसीआई में चल रहे पैसे के खुले खेल पर पहली बार कहा कि एमसीआई भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई है। मामला सिर्फ कोर्ट के इस बयान तक ही सीमित नहीं रहा , कोर्ट ने एमसीआई में धांधली की जांच के लिए सीबीआई को निर्देश दिए और एमसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष केतन देसाई को उनकी संदिग्ध भूमिका के लिए उनके पद से हटाने के आदेश दिए। इस पूरे मामले में केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगे और उन आरोपों को बल मिला कि पैसे के इस खुले खेल में सबकी साझेदारी है। केतन देसाई को उनके पद से हटाने के ठीक बाद केंद्र सरकार ने कोर्ट में हलफनामा देकर ये कहा कि केतन देसाई को उनके पद से हटाया जाना ठीक नहीं था। हालांकि केतन देसाई पद से हटकर भी एमसीआई पर साए की तरह मंडराते रहे। पहले देसाई की कोर्स करिकुलम कमिटी के अध्यक्ष के तौर पर वापसी हुई और फिर सुप्रीम कोर्ट से 2009 में चुनाव की अनुमति मिलने के बाद वो निर्विरोध फिर से एमसीआई के अध्यक्ष पद पर आसीन हुए। हालांकि बाद में फिर 2010 में सीबीआई की एक छापेमारी में एडमिशन के नाम पर दो करोड़ की घूस लेने के आरोप में केतन देसाई सीबीआई के हत्थे चढ़ा। केतन देसाई की कारगुजारियों से संबंधित सौ से भी ज्यादा शिकायतें सीबीआई ने एमसीआई को सौंपे। इसके अलावा कैसे केतन देसाई के जमाने में निजी मेडिकल कालेजों को मान्यता देने और इंश्पेक्सन का भय दिखाना, और एमसीआई की बैठकों के एजेंडे को अपने एजेंडे में बदलने का खुला खेल फर्रूखाबादी चलता रहा , उससे सीबीआई और कोर्ट भी वाकिफ है। बहरहाल आनन फानन में सरकार की ओर अध्यादेश लाकर केतन देसाई को अध्यक्ष पद से हटाया गया और एमसीआई को एक छह सदस्यीय कमिटी के हवाले कर दिया गया।
यहीं से शुरूआत हुई कि आखिर काले धन के इस साम्राज्य को कैसे तोड़ा जाए और कैसे मेडिकल शिक्षा को डोनेशन के दुश्चक्र से मुक्ति दिलाई जाए। इसी पृष्ठभूमि में कमिटी के चैयरमैन डा एस के सरीन और गवर्नर डा साल्हान और ओएसडी डा प्रेम कुमार के प्रयासों से एमसीआई के बोर्ड आफ गर्वनर ने पहली बार कामन एंट्रेस टेस्ट के प्रस्ताव को परवान चढ़ाने की कोशिश की। हालांकि खुद केंद्र सरकार की तरफ से इस प्रस्ताव के रास्ते में रोड़े अटकाने की कई कोशिशें हुईं। पहले दो अक्टूबर 2010 को तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव के सुजाता राव ने एमसीआई की गर्वनिंग बाडी को सुधार के रास्ते पर आगे बढ़ने से पहले सरकार की स्वीकृति जरूरी है का डर दिखाया। के सुजाता राव द्वारा एमसीआई के चैयरमैन एस के सरीन को लिखा गए उस पत्र की कापी जिसमें सुजाता राव सुधार के मुद्दे पर सरकार की स्वीकृति की याद दिलाती है सरीन को, और ये भी कहती हैं कि याद रखिए सरकार केवल रबर स्टांप नहीं है। ऐसा ही एक दूसरा पत्र तीन जनवरी 2011 को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के एक उप सचिव सुबे सिंह के अधोहस्ताक्षरी से एमसीआई के अध्यक्ष को भेजा जाता है जिसमें साफ तौर पर लिखा जाता है कि सरकार की अनुमति के बगैर आखिर कैसे एमसीआई कामन एंट्रेस टेस्ट कराने की अधिसूचना जारी कर सकती है। पत्र में संबंधित अधिसूचना को तुरंत वापिस लेने का निर्देश एमसीआई को दिया जाता है।
एमसीआई की कारगुजारियों को करीब से देखने वाले कई जानकार मानते हैं कि इसी पृष्टभूमि में राष्ट्रीय स्तर पर एक पात्रता प्रवेश परीक्षा का विरोध हो रहा है। नाम न छापे जाने की शर्त पर बातचीत में एमसीआई के कई पूर्व और वर्तमान अधिकारियों ने बताया कि निजी मेडिकल कालेजों और सरकार की तरफ से इसके विरोध के पीछे की वजह भी डोनेशन के खुले खेल को जारी रखने का स्वार्थ ही है। हालांकि वो भी ये मानते हैं कि इससे भ्रष्टाचार के पूरे खेल पर पूरे हद तक न सही लेकिन बहुत हद तक काबू पाया जा सकेगा। निजी मेडिकल कालेजों की ओर से स्वायत्ता की दलील को ये जानकार डोनेशन के नाम पर पैसे लेते रहने का सिस्टम जिंदा रहे, इसका बहाना मानते हैं । उनका कहना है कि अगर एमसीआई अपने खर्च पर देश भर के निजी मेडिकल कालेजों के लिए मेरिट लिस्ट तैयार करती है तो उन्हें तो सहर्ष इसे स्वीकार करना चाहिए। आगे कहते हैं कि इससे हरेक मेडिकल कालेज या राज्य सरकार को अपने तरफ से आयोजित किए जाने वाले प्रवेश परीक्षा में होने वाले खर्च की भी बचत होगी। निजी मेडिकल कालेजों की ओर से दिए जा रहे इस दलील को की इससे अल्पसंख्यक चरित्र वाले संस्थानों को नुकसान होगा , उनका कहना है कि मेरिट लिस्ट से अपने अपने हिसाब के अल्पसंख्यक अभ्यर्थी चुन लें, उन कालेजों का ये संकट भी दूर हो जाएगा। जानकार मानते हैं कि इससे छात्रों को भी सुविधा होगी। फिलहाल छात्रों को कम से कम दो तीन दर्जन अलग अलग प्रवेश परीक्षाएं देनी पढ़ती हैं। अलग अलग पाठ्यक्रम के संकट का तर्क को कुछ हद तक यानि अंडर ग्रेजुएट कोर्सेज या एमबीबीएस के लिए तो ये लोग सही मानते हैं लेकिन पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सेज के लिए इस तर्क को भी ये खारिज करते हुए कहते हैं कि पूरे देश की सभी मेडिकल कालेजों में एमसीआई द्वारा तय की गई पाठ्यक्रम के मुताबिक ही एमबीबीएस की पढ़ाई होती है। लिहाजा पीजी कोर्सेज के लिए एक प्रवेश परीक्षा नहीं होने देने के लिए ये तर्क कहीं से भी उचित नहीं है।
राष्ट्रीय स्तर पर एक पात्रता एवं प्रवेश परीक्षा का तर्क देने वाले मानते हैं कि सिर्फ निजी मेडिकल कालेज संचालक ही नहीं राजनीतिज्ञों की भी इसको लेकर चिंताएं सिर्फ पैसे की माया है। उनका मानना है कि वर्तमान व्यवस्था का समर्थन करना सिर्फ डाक्टरी के पेशे में प्रवेश के पिछले दरबाजे को खोले रखने की कबायद है।
दूसरी तरफ एमसीआई के अतीत को देखते हुए जानकार ये भी मानते हैं कि एनईईटी खुद लूटतंत्र का नया पैमाना खड़ा न कर दे,इसकी क्या गारंटी है। प्रवेश परीक्षा की नियमन के लिए कौन सी एजेंसी जिम्मेदार होगी। विजिलेंस की क्या व्यवस्था होगी। सिलेबस औऱ पूछे जाने वाले प्रश्नों को लेकर क्या मापदंड होगा और उसकी वस्तुनिष्ठता कैसे सुनिश्चित की जाएगी। इन सवालों का जबाव अब भी एमसीआई और परीक्षा लेने वाली एजेंसी को देना होगा।
ऐसे में डाक्टरी पेशे से जुड़े हर व्यक्ति को बेसब्री से इंतजार है 18 जनवरी का जब सुप्रीम कोर्ट एक बेहद अहम और संवेदनशील मसले पर पक्ष और विपक्ष के तर्कों को सुनकर एक एतिहासिक फैसला सुनाएगी।
मंगलवार, 25 दिसंबर 2012
सैन्य अधिकारियों के चयन में धांधली पर उठते सवाल
भारतीय सेना , देश की गौरव का प्रतीक। आज भी जब देश के राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही को लेकर आम आदमी के मन में संशय घर कर चुका है। भारतीय सेना की गौरवमयी परंपराओं के प्रति उसी आम आदमी के मन में एक प्रतिष्ठा है। यही भारतीय सेना एक तरफ अधिकारियों की कमी का सामना कर रही है तो दूसरी तरफ सिविल पेशेवरों को सेना से जोड़ने के लिए जो योजनाएं बनी उसमें बहाली के दौरान सेना के उच्चाधिकारी जम कर मनमानी कर रहे हैं। लोकस्वामी/ न्यूज़लिक्स को मिले दस्तावेजों के मुताबिक टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स से लेकर मिलिट्री नर्सिंग सर्विस , युनिवर्सिटी इंट्री स्कीम और आर्म्ड मेडिकल कार्प्स के जरिए कमिशंड रैंक के प्रोफेश्नल्स को लेने के लिए बनाई गई योजनाओं में पेशेवरों को मेडिकल चेकअप में फीट और अनफीट करके न केवल नियमों को अपनी सुविधा के मुताबिक तोड़ा मरोड़ा जा रहा है बल्कि हमारे सूत्र यहां तक दावा कर रहे हैं कि इस तरह मनमाने तरीके से काम करने के पीछे सेना के उच्चाधिकारियों का काकस है जो इन योजनाओं के जरिए अपने रिश्तेदारों को कमिशनिंग दिलाते हैं जो कई मामलों में सच भी है।
कई मामलों में एक बार नहीं कई बार रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाया जाता है, उसकी सिफारिश को भी चुनौती दी जाती है, बदला जाता है और अभ्यर्थियों को ज्वाइनिंग दी जाती है। कई मामलों में मेडिकल जांच में फीट अभ्यर्थी को मेडिकल तौर पर चुस्त दुरस्त बताए जाने के बाद ज्वाइनिंग के वक्त दुबारा मेडिकल बोर्ड बनाकर अनफिट घोषित कराकर ज्वाइन करने से रोक दिया जाता है। न्यूजलिक्स / लोकस्वामी को मिले दस्तावेजों में से एक मामले में तो नियमों की धज्जियां उडाते हुए टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स -115 के एक अभ्यर्थी सचिन कश्यप को जिसे मेडिकल बोर्ड में अनफिट करार दिया जाता है, अपील मेडिकल बोर्ड में भी इस फैसले को बरकरार रखा जाता है। फिर ये अभ्यर्थी रिव्यु मेडिकल बोर्ड में जाता है। मजे की बात ये कि रिव्यू मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का इंतजार किये बना ही टेलिफोन पर ही अभ्यर्थी के फीट होने की जानकारी ली जाती है, और उन्हें ज्वाइन करा लिया जाता है। हालांकि बाद में रिव्यू मेडिकल बोर्ड उसे अनफीट करार देता है। हद तो तब होती है जब कानूनी पचड़े में फंसने से बचने की सलाह देते हुए सेना के उच्च अधिकारी उस अभ्यर्थी के उपर एक बार फिर रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की उदारता दिखाते हैं और अंतत उसे ज्वाइनिंग दे देते हैं। पूरे मामले में अंतिम दफे जो मेडिकल रिव्यू बोर्ड बैठता है उसमें अध्यक्ष सहित दो सदस्य से पहले आएमबी से लिए जाते हैं, लेकिन एक सदस्य को बदल दिया जाता है और अंतत सचिन कश्यप टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स के लिए अंतिम तौर पर चयनित कर लिए जाते हैं।
अब दूसरा मामला देखिए साहिल बेनीवाल का जो भारतीय सेना के ऐसे ही एक योजना युनिवर्सिटी इंट्री स्कीम के जरिए भारतीय सेना में अधिकारी बनने के लिए लिखित और मौखिक परीक्षा पास करके मेडिकल जांच परीक्षा तक पहुँचते हैं। साहिल बेनिवाल का परीक्षा क्रमांक 625829, UES ENTRY Candidate है। मेडिकल परीक्षा में बेनिवाल को हार्निया की वजह से मेडिकल तौर पर अनफिट करार दिया जाता है। बेनिवाल सेना से रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की मांग करता है जिसे सेना के स्वास्थ्य महानिदेशक द्वारा यह कह कर अस्वीकार कर दिया जाता है कि डीजीएएफएमएस के अनुमोदन के बाद रिव्यू मेडिकल बोर्ड का जो परीक्षण है वो अंतिम है जिसके बाद फिर किसी रिव्यू मेडिकल बोर्ड की गुंजाइश नहीं रह जाती है। पत्रांक 76054/comp/DGMS-5A। हालांकि बाद में न केवल इस मामले में बल्कि पेशेवरों को भारतीय सेना में शामिल किए जाने को लेकर आयोजित किए जाने कई और योजनाओँ में सफल अभ्यर्थियों के मामले में भी नहीं माना जाता है। बेनिवाल के ही मामले में पुराने पत्र में बताए गए नियम को मनमाने तरीके से बदलते हुए फीट करार देकर नियुक्ति दे दी जाती है। पत्रांक 76064/DGMS-5A । न्यूजलिक्स / लोकस्वामी को मिली जानकारी के मुताबिक बेनिवाल के मामले में उसकी नियुक्ति के पीछे ब्रिगेडियर रैंक के उनके रिश्तेदारों का दबाव भी काम कर रहा था।
न्यूज़लिक्स / लोकस्वामी को मिले दस्तावेजों में से तीसरा मामला और भी मजेदार है जिसमें टेक्निक्ल इंट्री स्कीम के एक अभ्यर्थी पंकज मेहरा जो की स्वास्थ्य परीक्षण में अनफीट करार दिये गये। बाद में रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की दरख्वास्त को डीजीएएफएमएस की तरफ से ठुकरा दी जाती है ( पत्रांक 76064/DGMS - 5A )। लेकिन फिर आनन फानन में रिव्यू मेडिकल बोर्ड स्वीकार कर उन्हें मेडिकली फीट घोषित कर नियुक्ति के योग्य बना दिया जाता है।
दरअसल इन सारे मामले में नियुक्ति को लेकर बनाए गए सेना के ही नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाई गई। सेना भवन के हमारे सूत्र बताते हैं कि भर्ती के लिए पहुंचे अभ्यर्थी के मेडिकल जांच में एक बार अनफिट होने के बाद अभ्यर्थी स्पेशल मेडिकल बोर्ड यानि एसएमबी में सात दिन के अंदर अंदर अपील कर सकता है। वहां भी अनफिट होने के बाद अभ्यर्थी अपील मेडिकल बोर्ड यानि एएमबी में अपील करता है। 42 दिन के भीतर एएमबी के सामने पहुंचना होता है। इसके बाद अंतिम विकल्प के तौर पर अभ्यर्थी के पास आरएमबी रिव्यू मेडिकल बोर्ड का विकल्प होता है जो पूरी तरह से प्राधिकरण के विवेक पर निर्भर करता है। लेकिन आरएमबी के पास अपील पर जाने के लिए एक दिन के अंदर दरख्वास्त देनी होती है। रेग्युलेशन फार मेडिकल सर्विस आफ द आर्म्ड फोर्सेज यानि आरएमएसएएफ के पारा 482 के मुताबिक रिव्यू मेडिकल बोर्ड यानि आरएमबी का फैसला अंतिम होता है और उसको किसी भी कीमत पर नहीं बदला जा सकता है।
जबकि इन सभी मामले में इन नियमों का पालन किया गया हो , ऐसा शायद ही लगता है। ऐसे में सेना में नियुक्ति के मामलों के जानकार दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील ओ पी सक्सेना कहते हैं कि इन सभी मामलों में न केवल सेना की नियुक्ति संबंधी नियमों को तोड़ा मरोड़ा गया और मनमाने तरीके से उसका उपयोग किया गया बल्कि भारतीय संविधान की अनुच्छेद 14 के जरिए हर व्यक्ति को मिले समता के अधिकार का भी ये सरासर उल्लंघन है। जाहिर है गोपनीयता कानून का हवाला देते हुए ये मामले सेना की फाइलों में ही दम तोड़ जाते हैं , लेकिन क्या ये भारतीय सेना की गौरवमयी परंपरा पर एक दाग की तरह नहीं है। सक्सेना आगे कहते हैं कि ऐसे मामले में जहाँ मेडिकल बोर्ड और अपील मेडिकल बोर्ड और रिव्यू मेडिकल बोर्ड के बीच विरोधाभास की स्थिति बनती है तो उन मामलों को सिविल मेडिकल बोर्ड में जांच के लिए भेजा जाना चाहिए ताकि चयन में किसी भी तरह की पूर्वाग्रह से बचा जा सके।
ज़ाहिर है सेना की नियुक्ति के दौरान स्वास्थ्य परीक्षण के नाम पर धांधली के आरोप अपने आप में गंभीर मामला है। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इन मामलों को कही न कहीं सेना को और सरकार को गंभीरता से लेने की जरूरत है ताकि किसी भी अभ्यर्थी के साथ इस तरह मनमाने तरीके से व्यवहार न किया जा सके। साथ ही एक ऐसी प्रक्रिया विकसित की जा सके जो पूरी तरह से पारदर्शी हो।
( पाक्षिक पत्रिका लोकस्वामी से साभार)
कई मामलों में एक बार नहीं कई बार रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाया जाता है, उसकी सिफारिश को भी चुनौती दी जाती है, बदला जाता है और अभ्यर्थियों को ज्वाइनिंग दी जाती है। कई मामलों में मेडिकल जांच में फीट अभ्यर्थी को मेडिकल तौर पर चुस्त दुरस्त बताए जाने के बाद ज्वाइनिंग के वक्त दुबारा मेडिकल बोर्ड बनाकर अनफिट घोषित कराकर ज्वाइन करने से रोक दिया जाता है। न्यूजलिक्स / लोकस्वामी को मिले दस्तावेजों में से एक मामले में तो नियमों की धज्जियां उडाते हुए टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स -115 के एक अभ्यर्थी सचिन कश्यप को जिसे मेडिकल बोर्ड में अनफिट करार दिया जाता है, अपील मेडिकल बोर्ड में भी इस फैसले को बरकरार रखा जाता है। फिर ये अभ्यर्थी रिव्यु मेडिकल बोर्ड में जाता है। मजे की बात ये कि रिव्यू मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का इंतजार किये बना ही टेलिफोन पर ही अभ्यर्थी के फीट होने की जानकारी ली जाती है, और उन्हें ज्वाइन करा लिया जाता है। हालांकि बाद में रिव्यू मेडिकल बोर्ड उसे अनफीट करार देता है। हद तो तब होती है जब कानूनी पचड़े में फंसने से बचने की सलाह देते हुए सेना के उच्च अधिकारी उस अभ्यर्थी के उपर एक बार फिर रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की उदारता दिखाते हैं और अंतत उसे ज्वाइनिंग दे देते हैं। पूरे मामले में अंतिम दफे जो मेडिकल रिव्यू बोर्ड बैठता है उसमें अध्यक्ष सहित दो सदस्य से पहले आएमबी से लिए जाते हैं, लेकिन एक सदस्य को बदल दिया जाता है और अंतत सचिन कश्यप टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स के लिए अंतिम तौर पर चयनित कर लिए जाते हैं।
अब दूसरा मामला देखिए साहिल बेनीवाल का जो भारतीय सेना के ऐसे ही एक योजना युनिवर्सिटी इंट्री स्कीम के जरिए भारतीय सेना में अधिकारी बनने के लिए लिखित और मौखिक परीक्षा पास करके मेडिकल जांच परीक्षा तक पहुँचते हैं। साहिल बेनिवाल का परीक्षा क्रमांक 625829, UES ENTRY Candidate है। मेडिकल परीक्षा में बेनिवाल को हार्निया की वजह से मेडिकल तौर पर अनफिट करार दिया जाता है। बेनिवाल सेना से रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की मांग करता है जिसे सेना के स्वास्थ्य महानिदेशक द्वारा यह कह कर अस्वीकार कर दिया जाता है कि डीजीएएफएमएस के अनुमोदन के बाद रिव्यू मेडिकल बोर्ड का जो परीक्षण है वो अंतिम है जिसके बाद फिर किसी रिव्यू मेडिकल बोर्ड की गुंजाइश नहीं रह जाती है। पत्रांक 76054/comp/DGMS-5A। हालांकि बाद में न केवल इस मामले में बल्कि पेशेवरों को भारतीय सेना में शामिल किए जाने को लेकर आयोजित किए जाने कई और योजनाओँ में सफल अभ्यर्थियों के मामले में भी नहीं माना जाता है। बेनिवाल के ही मामले में पुराने पत्र में बताए गए नियम को मनमाने तरीके से बदलते हुए फीट करार देकर नियुक्ति दे दी जाती है। पत्रांक 76064/DGMS-5A । न्यूजलिक्स / लोकस्वामी को मिली जानकारी के मुताबिक बेनिवाल के मामले में उसकी नियुक्ति के पीछे ब्रिगेडियर रैंक के उनके रिश्तेदारों का दबाव भी काम कर रहा था।
न्यूज़लिक्स / लोकस्वामी को मिले दस्तावेजों में से तीसरा मामला और भी मजेदार है जिसमें टेक्निक्ल इंट्री स्कीम के एक अभ्यर्थी पंकज मेहरा जो की स्वास्थ्य परीक्षण में अनफीट करार दिये गये। बाद में रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की दरख्वास्त को डीजीएएफएमएस की तरफ से ठुकरा दी जाती है ( पत्रांक 76064/DGMS - 5A )। लेकिन फिर आनन फानन में रिव्यू मेडिकल बोर्ड स्वीकार कर उन्हें मेडिकली फीट घोषित कर नियुक्ति के योग्य बना दिया जाता है।
दरअसल इन सारे मामले में नियुक्ति को लेकर बनाए गए सेना के ही नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाई गई। सेना भवन के हमारे सूत्र बताते हैं कि भर्ती के लिए पहुंचे अभ्यर्थी के मेडिकल जांच में एक बार अनफिट होने के बाद अभ्यर्थी स्पेशल मेडिकल बोर्ड यानि एसएमबी में सात दिन के अंदर अंदर अपील कर सकता है। वहां भी अनफिट होने के बाद अभ्यर्थी अपील मेडिकल बोर्ड यानि एएमबी में अपील करता है। 42 दिन के भीतर एएमबी के सामने पहुंचना होता है। इसके बाद अंतिम विकल्प के तौर पर अभ्यर्थी के पास आरएमबी रिव्यू मेडिकल बोर्ड का विकल्प होता है जो पूरी तरह से प्राधिकरण के विवेक पर निर्भर करता है। लेकिन आरएमबी के पास अपील पर जाने के लिए एक दिन के अंदर दरख्वास्त देनी होती है। रेग्युलेशन फार मेडिकल सर्विस आफ द आर्म्ड फोर्सेज यानि आरएमएसएएफ के पारा 482 के मुताबिक रिव्यू मेडिकल बोर्ड यानि आरएमबी का फैसला अंतिम होता है और उसको किसी भी कीमत पर नहीं बदला जा सकता है।
जबकि इन सभी मामले में इन नियमों का पालन किया गया हो , ऐसा शायद ही लगता है। ऐसे में सेना में नियुक्ति के मामलों के जानकार दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील ओ पी सक्सेना कहते हैं कि इन सभी मामलों में न केवल सेना की नियुक्ति संबंधी नियमों को तोड़ा मरोड़ा गया और मनमाने तरीके से उसका उपयोग किया गया बल्कि भारतीय संविधान की अनुच्छेद 14 के जरिए हर व्यक्ति को मिले समता के अधिकार का भी ये सरासर उल्लंघन है। जाहिर है गोपनीयता कानून का हवाला देते हुए ये मामले सेना की फाइलों में ही दम तोड़ जाते हैं , लेकिन क्या ये भारतीय सेना की गौरवमयी परंपरा पर एक दाग की तरह नहीं है। सक्सेना आगे कहते हैं कि ऐसे मामले में जहाँ मेडिकल बोर्ड और अपील मेडिकल बोर्ड और रिव्यू मेडिकल बोर्ड के बीच विरोधाभास की स्थिति बनती है तो उन मामलों को सिविल मेडिकल बोर्ड में जांच के लिए भेजा जाना चाहिए ताकि चयन में किसी भी तरह की पूर्वाग्रह से बचा जा सके।
ज़ाहिर है सेना की नियुक्ति के दौरान स्वास्थ्य परीक्षण के नाम पर धांधली के आरोप अपने आप में गंभीर मामला है। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इन मामलों को कही न कहीं सेना को और सरकार को गंभीरता से लेने की जरूरत है ताकि किसी भी अभ्यर्थी के साथ इस तरह मनमाने तरीके से व्यवहार न किया जा सके। साथ ही एक ऐसी प्रक्रिया विकसित की जा सके जो पूरी तरह से पारदर्शी हो।
( पाक्षिक पत्रिका लोकस्वामी से साभार)
रविवार, 7 अक्टूबर 2012
सुदर्शन जी का होना, जाना और बार-बार आना
अनिल सौमित्र
81 वर्ष की उम्र में भी बच्चों के बीच बाल-सुलभ व्यवहार। सुबह और सायं काल दोनों वक्त शाखा जाने का स्वयं का आग्रह। किसी भी बीमारी के लिये आयुर्वेद, योग और भारतीय पद्धति से इलाज का आग्रह। दवाई कम परहेज ज्यादा। देश-समाज की उन्नति के लिये देशज और परंपरागत उपायों का आग्रह। यह सब कुछ अपने अंतिम क्षणों तक करते रहे सुदर्शन जी। सुदर्शन जी का आयुर्वेद पर बहुत विश्वास था। लगभग 20 वर्ष पूर्व हृदयरोग से पीडि़त होने पर चिकित्सकों ने उन्हें बाइपास सर्जरी ही एकमात्र उपाय बताया; किंतु उन्होंने अपने उपर आयुर्वेद का ही प्रयोग किया।
सुदर्शन जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में स्वयंसेवक से सरसंघचालक बने। इस दौरान उनके निर्दोष, सरल और सहज किंतु स्पष्ट और बेबाक विचारों के कारण कई बार विवाद भी हुआ। श्रीमती सोनिया माइनों पर उनकी टिप्पणी हो या गांधी हत्या के बारे में उनके विचार, अपने तथ्यपरक विचारों को उन्होंने कभी छुपाया नहीं। वे मतभेद और प्रेम कभी छुपाते नहीं थे। एनडीए सरकार की नीतियों और कार्यपद्धति पर उनकी प्रतिक्रियाओं से खासा विवाद भी हुआ था। वे राजनीति की कुटिलता और प्रपंच को बखूबी समझते थे, लेकिन अपने व्यक्तित्व की सरलता के कारण वे कुटिलताओं और प्रपंचों से हमेशा हारते रहे। कई दफे विवादित भी हुए। शायद यही कारण था कि बाद के दिनों में अपना अधिक समय ग्राम विकास, हिन्दी के विकास और विस्तार, तकनीकों के स्थानीकरण और उसे लोकोपयोगी बनाने के रचनात्मक काम में लग गये थे। अगर कोई उनसे मिलने जाता तो पहले तो वे उससे परंपरागत तकनीक और देशभर में हो रहे सैकडों प्रयोगों के बारे में घंटों बताते। फिर अपने पास संग्रहित दसियों माडल बताते। ग्राम विकास, कृषि, गौ-पालन और उर्जा आदि के देशज और परंपरागत अनुभवों और जानकारियों के बारे में बात करके कोई भी उन्हें अपना प्रशंसक बना सकता था।
खालिस्तान समस्या हो या घुसपैठ विरोधी आन्दोलन, उन्होंने संगठन के माध्यम से देश को ठोस सुझाव और सही निदान दिये। संघ के कार्यकर्ताओं को उस दिशा में सक्रिय कर आन्दोलन को गलत दिशा में जाने से रोका। पंजाब के बारे में उनकी यह सोच थी कि प्रत्येक केशधारी हिन्दू हैं तथा प्रत्येक हिन्दू दसों गुरुओं व उनकी पवित्र वाणी के प्रति आस्था रखने के कारण सिख है। इस सोच के कारण खालिस्तान आंदोलन की चरम अवस्था में भी पंजाब में गृहयुद्ध से बचा रहा। खालिस्तान आन्दोलन के दिनों में ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ नामक संगठन की नींव उन्हीं की प्रेरणा से रखी गयी, जो आज विश्व भर के सिखों का एक सशक्त मंच बन चुका है। इसी प्रकार उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बंगलादेश से आने वाले मुसलमान षड्यन्त्रकारी घुसपैठिये हैं। आरएसएस के मुखिया के तौर पर वे हमेशा तुष्टीकरण के खिलाफ रहे, लेकिन मुसलमानों के भारतीयकरण के पक्षधर। उनकी ही प्रेरणा से राष्ट्रीय मुस्लिम मंच का गठन हुआ। प्रख्यात स्तंभकार मुज्जफ़्फर हुसैन हों या बुजुर्ग नेता आरिफ बेग, सुदर्शन जी के साथ इस्लाम के विषय पर घंटों चर्चा करते थे। वे मुसलमानों को न सिर्फ उदार बल्कि शिक्षित, सहिष्णु और राष्ट्रवादी बनाने के लिये भी फिक्रमंद थे। यही कारण है कि मुसलमानों के बीच एक बडा वर्ग तैयार हुआ है जो राममंदिर आंदोलन का समर्थन, गोरक्षा के लिए केन्द्रीय कानून बनाने का आग्रह, रामसेतु विध्वंस का विरोध, अमरनाथ यात्रा में हिन्दुओं के अधिकारों का समर्थन और आतंकवादियों को फांसी देने की मांग करता है। मुसलमानों में ऐसा नेतृत्व उभर रहा है, जो हर बात के लिए पाकिस्तान या अरब देशों की ओर नहीं देखता। इस लिहाज से मुसलमानों के मामले में सुदर्शन जी को प्रगतिशील कहा जा सकता है।
स्व. श्री सुदर्शन देश की बौद्धिक दशा को लेकर भी काफी चिंतित थे। बौद्धिक क्षेत्र पर
मार्क्स-मेकाले के घुसपैठ और प्रभावों का उन्होंने हमेशा विरोध किया। भारत के कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को वे यूरंडपंथी और मार्क्स-मेकाले के मानसपुत्र कहा करते थे। देश का बुद्धिजीवी वर्ग, जो कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता के कारण वैचारिक संभ्रम में डूब रहा था, उसकी सोच एवं प्रतिभा को राष्ट्रवाद के प्रवाह की ओर मोड़ने हेतु ‘प्रज्ञा-प्रवाह’ नामक वैचारिक संगठन भी आज देश के बुद्धिजीवियों में लोकप्रिय हो रहा है। इसकी नींव में श्री सुदर्शन जी ही थे। संघ-कार्य तथा वैश्विक हिन्दू एकता के प्रयासों की दृष्टि से उन्होंने ब्रिटेन, हालैंड, केन्या, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, हांगकांग, अमेरिका, कनाडा, त्रिनिडाड, टुबैगो, गुयाना आदि देशों का प्रवास भी किया।
संघ कार्य में सरसंघचालक की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। चौथे सरसंघचालक श्री रज्जू भैया को जब लगा कि स्वास्थ्य खराबी के कारण वे अधिक सक्रिय नहीं रह सकते, तो उन्होंने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से परामर्श कर 10 मार्च, 2000 को अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में श्री सुदर्शन जी को यह जिम्मेदारी सौंप दी। नौ वर्ष बाद सुदर्शन जी ने भी इसी परम्परा को निभाते हुए 21 मार्च, 2009 को सरकार्यवाह श्री मोहन भागवत को छठे सरसंघचालक का कार्यभार सौंप दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्.सी. सुदर्शन मूलतः तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर बसे कुप्पहल्ली (मैसूर) ग्राम के निवासी थे। कन्नड़ परम्परा में सबसे पहले गांव, फिर पिता और फिर अपना नाम बोलते हैं। उनके पिता श्री सीतारामैया वन-विभाग की नौकरी के कारण अधिकांश समय मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ) में ही रहे और वहीं रायपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) में 18 जून, 1931 को श्री सुदर्शन जी का जन्म हुआ। तीन भाई और एक बहिन वाले परिवार में सुदर्शन जी सबसे बड़े थे। रायपुर, दमोह, मंडला तथा चन्द्रपुर में प्रारम्भिक शिक्षा पाकर उन्होंने जबलपुर (सागर विश्वविद्यालय) से 1954 में दूरसंचार विषय में बी.ई की उपाधि ली तथा तब से ही संघ-प्रचारक के नाते राष्ट्रहित में जीवन समर्पित कर दिया। सर्वप्रथम उन्हें रायगढ़ भेजा गया। प्रारम्भिक जिला, विभाग प्रचारक आदि की जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभाने के बाद 1964 में वे मध्यभारत के प्रान्त-प्रचारक बने।
सुदर्शन जी अनुशासन के मामले में कभी समझौता नहीं करते थे। संघ कार्य में उन्होंने निष्ठा और प्रामाणिकता की ही तरह गुणवत्ता को भी महत्व दिया। वे अंतिम समय तक सक्रिय रहे। निष्क्रियता उन्हें सुहाती नहीं थी। अपने जीवन में उन्होंने प्रशिक्षण और अभ्यास को सिद्धांत के साथ गुंथ दिया था। शाखा हो या प्रशिक्षण वर्ग, वे घंटों शारीरिक और मानसिक श्रम करते देखे गये। संघ के वे इकलौते ऎसे ज़्येष्ठ कार्यकर्ता रहे हैं जिन्होंने शारीरिक और बौद्धिक दोनों कार्यों के प्रमुख का दायित्व वहन किया। वे बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न थे। उन्हें संघ-क्षेत्र में जो भी दायित्व दिया गया, उसमें नवीन सोच के आधार पर उन्होंने नये-नये प्रयोग किये। 1969 से 1971 तक उन पर अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख का दायित्व था। इस दौरान ही खड्ग, शूल, छुरिका आदि प्राचीन शस्त्रों के स्थान पर नियुद्ध, आसन, तथा खेल को संघ शिक्षा वर्गों के शारीरिक पाठ्यक्रम में स्थान मिला। आपातकाल के अपने 19 माह के बन्दीवास में उन्होंने योगचाप (लेजम) पर नये प्रयोग किये तथा उसके स्वरूप को भी बदला। 1977 में उनका केन्द्र कोलकाता बनाया गया तथा शारीरिक प्रमुख के साथ-साथ वे पूर्वात्तर भारत के क्षेत्र प्रचारक भी रहे। 1979 में वे अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख बने। शाखा पर बौद्धिक विभाग की ओर से होने वाले दैनिक कार्यक्रम (गीत, सुभाषित, अमृतवचन) साप्ताहिक कार्यक्रम (चर्चा, कहानी, प्रार्थना अभ्यास), मासिक कार्यक्रम (बौद्धिक वर्ग, समाचार समीक्षा, जिज्ञासा समाधान, गीत, सुभाषित, एकात्मता स्तोत्र आदि की व्याख्या) तथा शाखा के अतिरिक्त समय से होने वाली मासिक श्रेणी बैठकों को सुव्यवस्थित स्वरूप 1979 से 1990 के कालखंड में ही मिला। शाखा पर होनेवाले ‘प्रातःस्मरण’ के स्थान पर नये ‘एकात्मता स्तोत्र’ एवं ‘एकात्मता मन्त्र’ को भी उन्होंने प्रचलित कराया। 1990 में उन्हें सह सरकार्यवाह की जिम्मेदारी दी गयी।
वैसे जिस विचार और संगठन परंपरा से वे जीवनपर्यंत आबद्ध रहे उसमें वयक्तित्वों की तुलना कठिन है। वहां लगभग एक जैसे गुण-स्वभाव वाले लोग होते हैं। लेकिन सुदर्शन जी इस मामले में विशेष थे कि वे पहले दक्षिण भारतीय और दूसरे गैर महाराष्ट्रीयन सरसंघचालक हुए। कन्नड और अंग्रेजी से ज्यादा वे हिन्दी पर अधिकार रखते थे। पूर्वांचल में कार्य करते हुए उन्होंने वहां की समस्याओं का गहन अध्ययन किया। अध्ययन करते हुए उन्होंने बंगला और असमिया भाषा पर भी अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया। इसके अलावा भी वे कई भाषाओं का ज्ञान रखते थे। हिन्दी के प्रति उनके विशेष आग्रह के कारण ही मध्यप्रदेश में हिन्दी विश्वविद्यालय की कोपलें फूंटी। आज वे नहीं हैं, लेकिन हिन्दी में विज्ञान और तकनीक, चिकित्सा और अभियांत्रिकी जैसे विषयों की साधना करने वालों का स्वप्न साकार होने लगा है।
बढती उम्र ने उन्हें कई समस्याएं दी। वे स्मृतिलोप के शिकार होने लगे थे। उन्होंने अपनी नहीं, अपनों की परवाह की। देह और मन कमजोर होता रहा, लेकिन वे देश-समाज की समस्याओं से जूझते रहे। उनके निकटस्थ लोगों को पता है, वे ज्योतिष के भी जानकार थे। ज़्योतिष के कई विद्वानों के साथ उनकी लंबी चर्चाएं भी हुआ करती थी। शायद वे इस जीवन के अंत और अगले जीवन के प्रारब्ध से परिचित थे। यह भी एक संयोग है कि 15 सितम्बर, 2012 को अपने जन्म-स्थान रायपुर में ही उनका देहांत हुआ। श्री सुदर्शन जी ने एक हिन्दू के रूप में जन्म लिया। एक स्वयंसेवक के रूप में देश-समाज और मानवता की सेवा की। पुनर्जन्म में हिन्दुओं का अकाट्य विश्वास है। अपने धर्म के प्रति निष्ठा, हिन्दुत्व के प्रति अटूट श्रद्धा, मानवता की सेवा का व्रत और संघ की प्रतीज्ञा उन्हें बार-बार हमारे बीच लायेगा। संभव है सुदर्शन जी ने जैसे अपने पुराने शरीर का त्याग किया है, शायद वैसे ही सर्वथा नूतन शरीर में प्रवेश कर लिया हो! इस दृष्टि से उनके जाने और आने का विषाद और हर्ष दोनों ही होना स्वाभाविक है।
(लेखक मीडिया एक्टीविस्ट और चरैवेति पत्रिका के संपादक हैं।)
कांग्रेस, कोयला और कालिख
कांग्रेस के नेता भले ही कुछ भी कहें, उनके प्रवक्ता मीडिया में कुछ भी बोलें, वे चाहे कितनी ही सफाई क्यों न दें- एक बात तो पक्की है- कांग्रेस बदनाम हो गई है। कांग्रेस का नाम लेते ही, उसका नाम सुनते ही कोयला, कालिख, करप्सन, कलई, कलि, कालिमा, कलंक, कंटक, कुटिल, कपट, कपटी, कलह, कठोर, कलियुग, कलुष-कलुषा, कुख्यात, ़कलंदरी, कशमकश, कसाई, कसैला, कसूरवार, कारागाह, कायर आदि और ऐसे ही कई समानार्थी शब्दों की छवि बनती है। एक ऐसी पार्टी या संगठन जिसकी स्थापना जरूर एक अंग्रेज ने की थी, लेकिन अनेक वर्षों तक वह देशभक्तों और राष्ट्रवादियों के सेवा का माध्यम बनी। अंग्रेजों के जाने के बाद गांधीजी ने कांग्रेस को भंग करने का सुझाव दिया था। कुछ स्वार्थी नेताओं ने उनकी एक न सुनी। देशभक्त नेताओं की पुण्याई और सद्कर्मों का फल नेहरू जैसे कुछ स्वार्थी नेता खाना चाहते थे। इसलिए आजादी के बाद भी कांग्रेस का लाभ उठाया जाता रहा। तब न सही, लेकिन आज जो कांगे्रस को गांधी की राय न मानने का श्राप लग चुका है। वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष अपने नाम के आगे ‘गांधी’ जरूर लगाती हैं, लेकिन उनमें गांधी के व्यक्तित्व का अंशमात्र भी नहीं है। वे रंचमात्र भी गांधी के विचारों की उत्तराधिकारी नहीं हैं।
कांग्रेस जहां सरकार में वहां वह अंग्रेजों की सोच और नीति का अनुशरण कर रही है। जहां वह विपक्ष में है वह जनता और जनमानस से कोसों दूर है। गांधीजी का पूरा जीवन विदेशियों और विदेशपरस्ती से लड़ते हुए बीता। लेकिन सोनिया माइनो गांधी का संपूर्ण जीवन ही विदेशपरस्त है। कमोबेश यही कांग्रेस के नेताओं का भी है। जो नेता विदेशपरस्त या भ्रष्ट नहीं हैं वे दरकिनार कर दिए गए हैं, वे हाशिए पर हैं। कांग्रेस देश और देशवासियों की हालत से बेपरवाह है। उसे सिर्फ अपने और अपनों की परवाह है। कांग्रेस के अपने वे हैं जो या तो उनके सगे हैं, या देशी-विदेशी रिश्तेदार। कांग्रेस ने जैसे देशी लोगों को विदेशी नेतृत्व के भरोसे छोड़ दिया है, वैसे ही भारत के देशी बाजार को विदेशी कंपनियों और पूंजीपतियों के हाथों में सौंप दिया है। खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश हो या पेट्रो-उत्पादों (तेल) की कीमतें बढ़ाने का मामला कांग्रेस ने विपक्ष की एक न सुनी, अपने सहयोगी दलों को छोड़ देना मुनासिब समझा, देश की जनता को भले ही गुमराह करना पड़े, लेकिन वह अमेरिकापरस्ती नहीं छोड़ सकती। कांग्रेस को देश की जनता से बस सत्ता चाहिए। कैसे भी, किसी भी कीमत पर। एक बार सत्ता मिल जाये, जनता जाये भाड़ में। देश आर्थिक संकटों से घिरा हुआ है, किन्तु केन्द्र सरकार की फिजूलर्खी का आलम यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रियों ने 678 करोड़ उड़ा दिए। यह व्यय पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 12 गुना अधिक है।
कांग्रेस के नेताओं को कोयले की कालिख, करप्सन की कलई और मंहगाई देने के कलंक की कोई परवाह नहीं। उसके नेता कलंदर हैं। उन्हें न तो कुख्यात होने का भय है और न ही कसूरवार होने का मलाल। जनता को मंहगाई से मार डालने पर उन्हें कोई कसाई कहे तो कहे। समस्याओं से मुंह चुराने पर विरोधी उन्हें कायर कहें तो कहें। वे अपनी कुटिलता नहीं छोड़ सकते।
कांग्रेसी बेशर्म भी हो गए हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुशील श्ंिादे ने इसका उदाहरण दे दिया। केन्द्र सरकार के तीसरे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने सोच-समझकर बेतुका बयान दिया। उन्होंने कहा कि कोयले से हाथ काले हो जायें तो पानी से धोने पर फिर साफ हो जोते हैं। जनता जिस तरह बोफोर्स घोटाले को भूल गई, कोयला घोटाले को भी भूल जायेगी। जनता भूले, न भूले कांग्रेस जरूर भूल जाती है। जनता तो घोटाले नहीं, छठी का दूध भी याद दिला देती है। कांग्रेस को भी याद होना चाहिए, जनता ने 1984 में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें दी थी। लेकिन उसके बाद उसी जनता ने उसका ऐसा हश्र किया कि उसे आज तक पूर्ण बहुमत से मोहताज कर दिया। आवाम को यह भी याद नहीं है कि बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस की सरकार ने लोक-लुभावन और लोक-कल्याणकारी कौन-से कदम उठाये। काफी समय से ऐसा ही हो रहा है कि जनता आह! आह! कर रही है, ये कराहने की आवाजें हैं। काश! कि कांग्रेस के लिए जनता वाह!वाह करती।
कांग्रेस का यही हाल मध्यप्रदेश में भी है। दिग्विजय सिंह ने अपने कार्यकाल में प्रदेश का ऐसा बंटाधार किया कि जनता ने उनके समेत कांग्रेस को प्रदेश से बेदखल कर दिया। यहां कांग्रेस कलह की शिकार है। मुद्दाविहीन है। कांग्रेस को विपक्ष में बैठे 10 वर्ष होने का आया। वह खामोश है। उसे सत्ता तो दिख रही है, लेकिन जनता के लिए संघर्ष का इरादा नहीं। गुटों और आंतरिक कुटिलता की शिकार कांग्रेस भाजपा की सरकार और संगठन की सक्रियता के आगे भीगी बिल्ली हो गई है। उसके पास न तो अपने कार्यकर्ताओं के सवालों का जवाब है और न ही केन्द्र सरकार के निर्णयों से हो रही जनता की तकलीफों का उपाए। कांग्रेस सत्ता और विपक्ष दोनों रूपों में पिट रही है। कांग्रसी नेताओं का खलनायकों का इतिहास पीछा नहीं छोड़ रहा है। वे राजे-रजवाड़ों और सामंत प्रवृति से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। आमजन की आवाजों से कोसों दूर अपने ही कोलाहल में डूबे कांग्रेसी सत्ता के लिए मारी-मारी तो कर सकते हैं, लेकिन वे जनता का विश्वास नहीं जीत सकते। कांग्रेस जनता का विश्वास हार चुकी है। कांग्रेस के नेता आत्मविश्वास खो चुके हैं। जनता उनसे और वे जनता से दूरी बना चुकी है। यह खाई बड़ी है और बढ़ती ही जा रही है। कांग्रेस के लिए इस खाई को पाटना दूर की कौड़ी है।
कांग्रेस का आलाकमान तो कोयले की कालिख से कलंकित है। उसका प्रदेश नेतृत्व अपने रसूख और जायदाद को बचाने की जुगत में फ्रिकमंद है। प्रदेश की भाजपा सरकार के साथ कांग्रेस की धींगामुश्ती इसी फ्रि़क्र के कारण है। जनता के लिए अपनी फ्रिक्र को कांग्रेस बहुत पहले दफन कर चुकी है। इसी महीने खंडवा में हुई कार्यसमिति में भाजपा अध्यक्ष ने तीसरी बार सरकार बनाने के लिए तैयारी करने का आह्वान किया है। हरियाणा के सूरजकुंड में हुई भाजपा की राष्ट्रीय परिषद् भी निर्णायक सिद्ध हुई है। भाजपा ने केन्द्र में एनडीए के विस्तार का संकल्प लिया है और प्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाने का नारा दिया है। भाजपा का नेतृत्व, नारा और कार्यकर्ता एक है। इस मामले में कांग्रेस अनेक है। भाजपा सक्रिय है, कांग्रेस निष्क्रिय। भाजपा कार्यकर्ता आत्मविश्वास से लबरेज, लेकिन कांग्रेस के कार्यकर्ता सशंकित और नेतृत्व की गुटबाजी के कारण कशमकश में। प्रदेश की जनता देश में परिवर्तन और और मध्यप्रदेश में निरन्तर होने की बाटजोह रही है।
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