बुधवार, 29 अक्टूबर 2008
आतंकवाद नहीं, सिर्फ मुद्दे से निजात की कोशिश
साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी पर कई सवाल। क्या सचमुच हिंदुओं के सब्र का प्याला भर चुका। क्या रिटायर्ड फौजी भी आतंकवाद के तुष्टिकरण की नीति से खफा। पर इन दो सवालों से पहले एक मूल सवाल। सवाल पुलिस एफआईआर की विश्वसनीयता का। अदालत में आधे केस ठहरते ही नहीं। इमरजेंसी में इसी पुलिस ने कितने मनघढ़ंत केस बनाए। संघ के अधिकारियों पर भैंस चोरी तक के केस बने। बर्तन चोरी तक के केस बनाए गए। अपने पास ऐसे एक-आध नहीं। दर्जनों केसों के सबूत मौजूद। पुलिस आकाओं के इशारे पर काम करने में माहिर। सो पहला अंदेशा राजनीतिक दखल का। आखिर राजनीतिक दखल से ही अफजल की फांसी अब तक नहीं हुई। अगर यह केस राजनीतिक दखल से नहीं बना। तब भी एक तकनीकी सवाल बाकी। क्या मोटर साईकिल का चेसी नंबर ही प्रज्ञा को आतंकी साबित कर देगा? अगर ऐसा संभव। तो दिल्ली के जामा मस्जिद के पीछे जितनी चाहे चेसियां खरीद लो। मोटर साईकिलों की या कारों की भी। अपन को नहीं लगता। कोर्ट में इतना सबूत ही काफी होगा। दिल्ली के करोलबाग में सेकिंडहैंड मोटर साईकिलों का बाजार। हर रोज दर्जनों मोटर साईकिलों की खरीद-फरोख्त। आधे सिर्फ स्टांप पेपर पर बिक जाते हैं। रजिस्ट्री तक नहीं होती। रजिस्ट्री के मामले में कानून में ही सुराख। बेचने वाले की कोई जिम्मेदारी नहीं। रजिस्ट्री करवाना खरीदने वाले की जिम्मेदारी। अपन दो कारें बेच चुके। किसी की रजिस्ट्री करवाने नहीं गए। पर इससे गंभीर किस्सा स्कूटर का। अपन जब चंडीगढ़ में हुआ करते थे। तो अपन ने बजाज का चेतक स्कूटर खरीदा। दिल्ली में जब अपन ने कार ले ली। तो स्कूटर कई महीने गैराज में धूल फांकता रहा। इनकम टेक्स में अपने एक मित्र हुआ करते थे बीबी सिंह। उनने अपने दामाद को देने के लिए अपन से स्कूटर मांगा। तो अपन ने फौरन हां कर दी। खरीद-फरोख्त की बात ही नहीं थी। पर कुछ महीने बाद उनने लिफाफे में रखकर कुछ पैसे थमा दिए। पैसे स्कूटर की कीमत से ज्यादा थे। सो बातचीत की गुंजाइश नहीं बची। बीबी सिंह अब इस दुनिया में नहीं। उनके दामाद का अपन को अता-पता नहीं। कबाड़ में बिका हुआ स्कूटर किसी दिन अपन को आतंकी न बना दे। दुनियादारी में ऐसे सेकड़ों-हजारों किस्से मिलेंगे। कानूनदानों की नजर में प्रज्ञा का मोटर साईकिल सबूत नहीं। तो क्या पुलिस के पास कुछ और भी सबूत। अपन ने आईबी के एक अफसर से पूछा। तो वह बोला- ‘फिलहाल नहीं।’ अब सवाल पुलिस की एफआईआर का। कहीं आतंकवाद का मुद्दा खत्म करने की रणनीति तो नहीं? आतंकवाद की गंभीरता कम करने की साजिश तो नहीं? आखिर बीजेपी वाले कहने लगे थे- ‘हर मुसलमान आतंकी नहीं। पर पकड़ा गया हर आतंकी मुसलमान।’ इस आरोप की हवा निकालने की साजिश तो नहीं? कांग्रेस और यूपीए आतंकवाद का तुष्टिकरण करते पकड़े जा चुके। आतंकवाद के तुष्टिकरण से निजात पाने की कोशिश तो नहीं? सरकार जरा इस पर गंभीरता से सोच ले। हिंदुओं और मुसलमानों में खाई बढ़ा देगी यह साजिश। पर अगर यह सब नहीं। तो क्या सचमुच हिंदुओं के सब्र का प्याला भर चुका। क्या आतंकवादियों के हाथों जान गंवाने वाले फौजियों का शासन से भरोसा उठ चुका? अगर सचमुच प्रज्ञा ने बदला लेने की ठानी? अगर सचमुच रिटायर्ड फौजियों ने प्रज्ञा का साथ दिया? जैसा कि पुलिस की थ्योरी ने कहा। तो सचमुच देश की जनता का हुकमरानों से मोह भंग हो चुका। मोह भंग हो चुका- कि मौजूदा शासक आतंकवाद से निजात दिला सकते हैं। दीपावली पर सरकार को भी रोशनी मिले। तो मुद्दे से नहीं, आतंकवाद से निपटने की कोशिश शुरू हो।
Categories: आतंकवाद, इंडिया गेट से संजय उवाच
गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008
विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज गई
भोपाल। चुनाव आयोग ने बहुप्रतीक्षित विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी है। आयोग के दिशा-निदेर्शों के मुताबिक मध्यप्रदेश सहित पांच राज्यों में नवम्बर माह की अलग-अलग तारीखों में चुनाव कराए जायेंगे। मध्यप्रदेश में मतदान की तारीख 25 नवम्बर है। अन्य चार राज्यों - छत्तीसगढ़ में दो चरणों में - 14 और 20 नवम्बर को, दिल्ली और मिजोरम में 29 नवम्बर और राजस्थान में 4 दिसंबर को मतदान होगा। आयोग ने सभी राज्यों की मतगणना 8 दिसंबर को कराने का निर्णय लिया है। इसी दिन इन राज्यों में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो जायेगा।
मध्यप्रदेश में 12 विधानसभाओं का गठन हो चुका है। दिसंबर में 13 वीं विधानसभा का गठन होगा। मध्यप्रदेश के गठन के बाद से भाजपा को तीन बार सरकार बनाने का मौका मिला। लेकिन भाजपा की दो सरकारें, कांग्रेस की बदनीयत का शिकार हो गईं । पहली बार भाजपा को पांच साल सरकार चलाने का अवसर मिला है। लेकिन भाजपा ने पूर्व की ही भांति इस बार भी तीन मुख्यमंत्री दिए। उल्लेखनीय है कि इसके पूर्व भी जब संविद सरकार बनी थी तो कैलाश जोशी, वीरेन्द्र सखलेचा और सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने थे। बाद में जब 1990 में भाजपा की सरकार बनी तो पुनः सुन्दरलाल पटवा ही मुख्यमंत्री बने लेकिन केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने दो साल में ही पटवा सरकार को बर्खास्त कर दिया। वर्ष 2003 में जब भाजपा को पुनः दो तिहाई बहुमत मिला तो उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं, उसके बाद बाबूलाल गौर और फिर शिवराज सिंह चैहान। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश के 42 वर्षीय लोकतांत्रिक सफर में 32 वर्ष तक कांग्रेस का राज रहा है, भाजपा सिर्फ 10 वर्षों तक ही सत्ता में रह पायी। मुख्यमंत्री बदलने में भी कांग्रेस भाजपा से आगे ही रही है। 32 वर्षों के शासन में कांग्रेस ने 21 मुख्यमंत्री दिए।
भाजपा, वर्तमान चुनाव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में ही लड़ रही है। मुख्यमंत्री की लोकप्रियता, आम जनता के नेता की छवि और सरकार की उपलब्धियों के बूते भाजपा फिर से सरकार बनाने को तैयार है। भाजपा की चुनावी तैयारी भी काफी पहले ही शुरू हो गई थी। अब जबकि चुनावी रणभेरी बज चुकी है सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया अंतिम चरण में है, प्रचार की सामग्री तैयार हो चुकी है और चुनावी वायदों और घोषणाओं को आकर्षक और लोकलुभावन बनाने की तैयारी भी लगभग पूरी हो चुकी है।
मध्यप्रदेश का राजनैतिक परिद्श्य पूर्व की अपेक्षा अधिक रोचक प्रतीत हो रहा है। इस विधानसभा चुनाव में पहली बार भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियां पूरी ताकत के साथ मैदान में हैं। उनकी कोशिश है कि मध्यप्रदेश की 13 वीं विधानसभा को त्रिशुंकू बना दिया जाए। बसपा, सपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी भी पूरी दमखम के साथ चुनाव मैदान में है। उमा भारती की पूरी कोशिश है कि भाजपा का अधिक से अधिक नुकसान कर अपने लिए कुछेक सीटें निकाल ली जाएं। उनकी मंशा है कि चुनाव के बाद ऐसी स्थिति बन जाये कि सरकार बनाने के कांग्रेस और भाजपा दोनों अन्य दलों का समर्थन लेने को मजबूर हो जाएं।
मध्यप्रदेश में राजनैतिक स्थिति ऐसी है कि अभी कोई भी अनुमान लगाना जल्दीबाजी होगी। सभी पार्टियों, खासकर भाजपा और कांग्रेस के द्वारा उम्मीदवारों की घोषणा के बाद ही कोई अनुमान सार्थक होगा। हाल की स्थितियों को देखकर यही लगता है कि सभी पार्टियों के नेताओं में टिकटों को लेकर ऐसी भागमभाग मची है कि हरेक नेता स्वयं को सर्वोत्तम उम्मीदवार बताने में लगा है। एक पार्टी छोड़कर दूसरे का दामन थामने का सिलसिला शुरू हो गया है। राजनैतिक लहरें हिचकोलें ले रही हैं, इसके थमने के बाद ही चुनावी आकलन किया जा सकेगा। फिलहाल हवा का रूख भाजपा के पक्ष में है। चुनावी तैयारी के लिहाज से भाजपा अन्य दलों से आगे है। भाजपा ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के हांथों में चुनाव प्रचार की पतवार थमा दी है। पार्टी के नेता अपने सरकार की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। कार्यकर्ता कुंभ और जन आशीर्वाद रैली में शिवराज सिंह चैहान ने अपनी उपलब्धियों का बखान किया। पार्टी के कार्यकर्ता इसे ही आगे बढ़ा रहे हैं। भाजपा, केन्द्र की यूपीए सरकार की नाकामियों, मंहगाई और आतंकवाद को भी मुद्दा बनायेगी।
कांग्रेस की तैयारियों को भी कमतर नहीं आंका जा सकता। कांग्रेेस भी आक्रामक प्रचार के मूड में है। कांग्रेस, भाजपा सरकार की नाकामियां और मंत्रियों के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने की वह पुरजोर कोशिश कर रही है। यूपीए सरकार की उपलब्धियां इस चुनाव में प्रचार का मुद्दा होंगी। सपा, बसपा और अन्य पार्टियां भी कामोबेश भाजपा सरकार की असफलता और सरकार के भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनायेंगी। पूर्व भाजपा नेत्री उमा भारती ने सरकार के खिलाफ 51 आरोपों को कच्चा चिट्ठा जरूर जारी किया है। उमा भारती, सरकारी योजनाओं की विफलता और मुख्यमंत्री की घोषणाओं के आधार पर भाजपा को घेरने की तैयारी कर रही हैं। उल्लेखनीय है कि उमा भारती भाजपा के ही मुद्दों, मतों और नेताओं के बीच सेंध लगाने की कोशिश में हैं। भाजपा को कमजोर करना उनका प्राथमिक लक्ष्य है। बिजली, पानी और सड़क इस बार भी चुनावी मुद्दा है।
हालांकि अन्य पार्टियां, मध्यप्रदेश में दो दलीय राजनैतिक परंपरा को चुनौती देने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन इन पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के कारण तीसरी शक्ति के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है। भाजश और गोगपा में विभान हो गया है। सपा में नेताओं का विवाद चल ही रहा है। प्रदेश के छोटे दल संसाधनों की कमी से भी जूझ रहे हैं। लेकिन एक तरफ कांग्रेस को बसपा से नुकसान होने का अंदेशा है, वहीं भाजपा को भाजश से। भाजपा ने समझदारी से टिकटों का बंटवारा किया और असंतोष और विद्रोह पर काबू रखा तो चुनाव में अच्छा परिणाम दे सकती है। कांग्रेस, नेतृृत्व के संकट से जूझ रही रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचैरी को अभी भी पूरे प्रदेश का नेता नहीं माना जा रहा है। कांग्रेस के सूबेदारों ने अपने-अपने सूबे बांट लिए हैं। इस रणनीति में कांग्रेस आलाकमना सोनिया गांधी की भी सहमति है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, वर्तमान केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित सुरेश पचैरी, अजय सिंह, जमुना देवी और सुभाष यादव ने अपने-अपने सूबों में तैयारी शुरू कर दी है।
तमाम सर्वे, राजनैतिक विश्लेषकों की राय और राजनैतिक कयासों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भाजपा ने 2003 के विधानसभा चुनाव में 173 सीटों पर कब्जा जमाया था, लेकिन इस बार वह इससे पीछे आयेगी। कांग्रेस अपने सबसे खराब प्रदर्शन 38 सीटों से उबरेगी। बसपा, सपा और गोगपा अपनी पुरानी स्थिति को बचाए रखने में सफल होगी। भाजपा से अलग होकर भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन करने वाली उमा भारती भी अपनी राजनैतिक जमीन बनाने में सफल होंगी।
बुधवार, 15 अक्टूबर 2008
बांग्लादेशी घुसपैठिए - भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ

राष्ट्र की अपनी ही समस्याएँ कम नहीं हैं। सुरसा के मुँह की तरह आम आदमी को डंसती महंगाई, देश की कानून-व्यवस्था को धता बताते हुए स्थान-स्थान पर आतंकी विस्फोट, क्षेत्रवाद की राजनीति के चलते पूर्वोत्तर प्रान्तों व महाराष्ट्र में देश के नागरिकों के साथ किया जा रहा दुर्व्यवहार, कृषि क्षेत्रों में कम उपज व अकाल के कारण आत्महत्या हेतु विवश किसान सहित अनेक ऐसी समस्याएँ हैं, जिनसे राष्ट्र जूझ रहा है। इन समस्याओं के चलते राष्ट्र की समृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, ऐसे में विदेशी घुसपैठियों की देश में उपस्थिति देश की अर्थव्यवस्था एवं कानून-व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालने में पीछे नहीं है।
कहना गलत न होगा कि संकीर्ण स्वार्थों के चलते राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की अवधारणा को तिल-तिल खंडित करने का कुचक्र जारी है, यदि ऐसा न होता तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को सरलता से देश में आश्रय नहीं मिल पाता। आज स्थिति यह है कि देश के कुछ शहरों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की अलग बस्तियाँ हैं।
कुछेक घुसपैठियों को नागरिकता प्रदान करके खुलकर खेलने का अवसर प्रदान कर दिया गया है। धरपकड़ जैसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप देश के विभिन्न भागों में बांग्लादेशी घुसपैठिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बनते जा रहे हैं। उन्हें देश से निकालने के लिए कारगर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। यही स्थिति अन्य घुसपैठियों की भी है। देश की मिली-जुली संस्कृति का लाभ उठाकर घुसपैठिए भारतीय जनमानस में इतने अधिक घुल-मिल गए हैं कि उनकी पहचान करना भी टेढ़ी खीर हो गया है।
देश निर्धारित सीमाओं में बसे नागरिकों को सुख-सुविधाएँ देने हेतु बाध्य हैं। नीतियाँ भी राष्ट्र के नागरिकों के सर्वांगीण विकास को दृष्टिगत करते हुए बनाई जाती हैं किन्तु निर्धारित एवं वास्तविक नागरिकों से इतर विदेशी घुसपैठिए यदि भारतीय जनमानस में घुसपैठ करेंगे तो अतिरिक्त जनसंख्या का दबाव क्या भारतीय अर्थव्यवस्था को पंगु नहीं करेगा? भारतीय कानून-व्यवस्था को चुनौती देते घुसपैठियों की स्थिति से यह प्रशन स्वयं स्फुटित है। निसंदेह यदि बांग्लादेशी घुसपैठियों सहित अन्य विदेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें देश से नहीं खदेड़ा गया तो राष्ट्र को अपनी अस्मिता की पहचान बनाने के लिए जूझना पड़ सकता है, क्योंकि जो इस देश के नागरिक नहीं हैं, उन्हें राष्ट्रीय अस्मिता एवं गौरव से भला क्यों कर कोई सरोकार होगा?
सोमवार, 6 अक्टूबर 2008
मिशनरी-वामपंथी मोर्चेबंदी
जो समझते हैं कि मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनवाने के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी को आज हमारे कम्युनिस्ट अपनी 'भूल' मानते हैं, वे स्वयं भूल पर हैं। भारतीय कम्युनिस्टों का हिन्दू-विरोध यथावत है। चूंकि आज 'मुसलमानों के आत्मनिर्णय का अधिकार' जैसे नारे सीधे-सीधे दुहराना हानिकारक हो सकता है, इसलिए कामरेड तनिक मौन हैं। किंतु जैसे ही किसी गैर-हिन्दू समुदाय की उग्रता बढ़ती है-चाहे वह नागालैंड हो या कश्मीर-उनके प्रति कम्युनिस्टों की सहानुभूति तुरंत बढ़ने लगती है। अत: प्रत्येक किस्म के कम्युनिस्ट मूलत: हिन्दू विरोधी हैं। केवल उसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग रंग में होती है। पीपुल्स वार ग्रुप के आंध्र नेता रामकृष्ण ने कहा ही है कि 'हिन्दू धर्म को खत्म कर देने से ही हरेक समस्या सुलझेगी।' अन्य कम्युनिस्टों को भी इस बयान से कोई आपत्ति नहीं है। अभी-अभी सी.पी.आई.(माओवादी) ने अपने गुरिल्ला दस्ते का आह्वान किया है कि वह कश्मीर को 'स्वतंत्र देश' बनाने के संघर्ष में भाग ले। भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में चल रहे प्रत्येक अलगाववादी आंदोलन का हर गुट के माओवादी पहले से ही समर्थन करते रहे हैं। अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थिति भी बहुत भिन्न नहीं। माकपा के प्रमुख अर्थशास्त्री और मंत्री रह चुके अशोक मित्र कह ही चुके हैं, 'लेट गो आफ्फ कश्मीर'-यानी, कश्मीर को जाने दो। इसलिए जो समझते हैं कि मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनवाने के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी को आज हमारे कम्युनिस्ट अपनी 'भूल' मानते हैं, वे स्वयं भूल पर हैं। भारतीय कम्युनिस्टों का हिन्दू-विरोध यथावत है। चूंकि आज 'मुसलमानों के आत्मनिर्णय का अधिकार' जैसे नारे सीधे-सीधे दुहराना हानिकारक हो सकता है, इसलिए कामरेड तनिक मौन हैं। किंतु जैसे ही किसी गैर-हिन्दू समुदाय की उग्रता बढ़ती है-चाहे वह नागालैंड हो या कश्मीर-उनके प्रति कम्युनिस्टों की सहानुभूति तुरंत बढ़ने लगती है। अत: प्रत्येक किस्म के कम्युनिस्ट मूलत: हिन्दू विरोधी हैं। केवल उसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग रंग में होती है। पीपुल्स वार ग्रुप के आंध्र नेता रामकृष्ण ने कहा ही है कि 'हिन्दू धर्म को खत्म कर देने से ही हरेक समस्या सुलझेगी।' अन्य कम्युनिस्टों को भी इस बयान से कोई आपत्ति नहीं है। इसलिए कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या में माओवादियों की भागीदारी न भी हो, यह तथ्य तो सामने आया ही है कि जिन ईसाई मिशनरी गिरोहों ने यह कार्य किया, उनमें पुराने माओवादी भी हैं। पर ध्यान देने की बात यह है कि भारतीय वामपंथियों ने इस पर कोई चिंता नहीं प्रकट की, जबकि उसके बाद मिशनरियों के विरुध्द हुई हिंसा पर तीखी प्रतिक्रिया की। यह ठीक गोधरा कांड के बाद हुई हिंसा पर बयानबाजी का दुहराव है। तब भी साबरमती एक्सप्रेस में 59 हिन्दुओं को जिंदा जलाने वाली मूल घटना गुम कर दी गई, और केवल उसकी प्रतिक्रिया में हुई हिंसा की ही चर्चा की जाती रही। ये उसी हिन्दू विरोधी मनोवृत्ति की अभिव्यक्तियां हैं जो यहां वामपंथ की मूल पहचान हैं। पिछले दस वर्षों में कई वामपंथी अंतरराष्ट्रीय ईसाई मिशनरी संगठनों के एजेंट बन चुके हैं। सोवियत विघटन के बाद से वे भौतिक-वैचारिक रूप से अनाथ हो गए थे। इस रिक्तता को उन्होंने साधन-सत्ता संपन्न मिशनरियों से भर लिया है। इसीलिए वंचितों के संबंध में अब वामपंथियों की बातें मिशनरी प्रवक्ताओं से मिलने लगी हैं। वे वंचितों, वनवासियों का संगठित व अवैध मतांतरण कराने का उग्र बचाव करते हैं। अब वे वंचितों के 'मानव अधिकार' और 'मुक्ति' की ठीक वही शब्दावली दुहराते हैं जो आज सभी मिशनरी संगठनों का प्रिय कार्यक्रम है। वामपंथियों और अंतरराष्ट्रीय मिशनरियों की चिंताओं का यह सहमेल कदापि संयोग नहीं। मीडिया में भी मिशनरी-मार्क्सवादी दबाव इतना संयुक्त हो चुका है कि विदेशी धन से वंचितों के शिकार पर कभी विचार नहीं होने दिया जाता। विदित है कि इंडोनेशिया में सुनामी हो, गुजरात का भूकंप या इराक में तबाही, जब भी विपदाएं आती हैं तो दुनिया भर के मिशनरियों के मुंह से लार टपकने लगती है, कि अब उन्हें 'आत्माओं की फसल' काटने का अवसर मिलेगा। इसके बावजूद हमारे मीडिया में राहत के लिए मिशनरियों की वाहवाही की जाती है, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, वनवासी कल्याण आश्रम जैसे हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों की नि:स्वार्थ सेवाओं का उल्लेख कभी नहीं होता। हिन्दू संस्थाओं के संदर्भ में यह दोहरापन क्यों? यदि मिशनरी 'सेवा' करके हिन्दुओं को ईसाई बनाने का प्रयास करते हैं, तो ठीक। किंतु जब हिन्दुत्वनिष्ठ संगठन घर-वापसी कार्यक्रम चलाकर उन्हें पुन: हिन्दू धारा में वापस लाते हैं, तो गलत। यह कैसा मानदंड है? फिर, क्या कारण है कि जो मार्क्सवादी हर बात में 'मूल समस्या' की रट लगाते थे, वे मिशनरी हरकतों से होने वाली अशांति पर कभी मूल समस्या का प्रश्न नहीं उठाते? केवल इसलिए कि ग्राहम स्टींस की हत्या हो या स्वामी लक्ष्मणानंद की, उत्तर-पूर्व का अलगाववाद हो या जगह-जगह भड़काऊ हिन्दू-विरोधी साहित्य का वितरण-हर कहीं मूल समस्या मिशनरी मतांतरण कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम विश्व में ईसाई विस्तारवाद की सर्वविदित, पुरानी साम्राज्यवादी परियोजना का ही अंग है। चूंकि कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद पराजित हो चुका है, इसलिए हमारे कम्युनिस्टों ने अपनी बची-खुची शक्ति ईसाई एवं इस्लामी साम्राज्यवाद को मदद पहुंचाने में लगा दी है। कम से कम इससे उन्हें अपने शत्रु - हिन्दुत्व - को कमजोर करने का सुख तो मिलता है। इसीलिए भारतीय वामपंथ हर उस झूठ-सच पर कर्कश शोर मचाता है जिससे हिन्दू बदनाम हो सकें। न उन्हें तथ्यों से मतलब है, न ही देश-हित से। विदेशी ताकतें उनकी इस प्रवृत्ति को पहचानकर अपने हित में जमकर इस्तेमाल करती है। मिशनरी एजेंसियों की यहां बढ़ती ढिठाई के पीछे यह ताकत भी है। इसीलिए वे चीन या अरब देशों में इतने ढीठ या आक्रामक नहीं हो पाते, क्योंकि वहां इन्हें भारतीय वामपंथियों जैसे स्थानीय सहयोगी उपलब्ध नहीं हैं। चीन सरकार विदेशी ईसाई मिशनरियों को चीन की धरती पर काम करने देना अपने राष्ट्रीय हितों के विरुध्द मानती है। किंतु हमारे देश में चीन-भक्त वामपंथियों का भी ईसाई मिशनरियों के पक्ष में खड़े दिखना उनकी हिन्दू विरोधी प्रतिज्ञा का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है। जब चार वर्ष पहले अंग्रेजी साप्ताहिक 'तहलका' ने अमरीका प्रशासन द्वारा भारत में बड़े पैमाने पर मतांतरण कराने की योजना को समर्थन देने की विस्तृत रिपोर्ट छापी तो इस पर कोई तहलका नहीं मचा। क्योंकि देश-विदेश से चल रही हिन्दू विरोधी कार्रवाइयों पर हमारे वामपंथी बौध्दिकों में एक मौन सहमति है। इसके लिए उन्हें पुरस्कार भी मिल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में प्रफुल्ल बिदवई, अचिन विनायक, तीस्ता सीतलवाड़, एडमिरल रामदास आदि प्रमुख वामपंथी, सेकुलरों को अंतरराष्ट्रीय मिशनरी संस्थाओं (जैसे पैक्स क्रिस्टी का 'पैक्स क्रिस्टी इंटरनेशनल पीस प्राइज', इंटरनेशनल काउंसिल आफ इवांजेलिकल चर्चेज का 'ग्राहम स्टींस इंटरनेशनल अवार्ड फार रिलीजियस हार्मोनी' आदि) द्वारा बार-बार पुरस्कृत किया गया। यदि इन सेकुलरों के तमाम बयानों, क्रियाकलापों पर ध्यान दें तो कारण तुरंत समझ में आ जाएगा। उन्हें भारत-विरोध, विशेषकर हिन्दू-विरोधी कार्रवाइयों के लिए प्रोत्साहित किया गया।
बुधवार, 10 सितंबर 2008
क्या इस देश में हिंदु होना गुनाह है???
अमरनाथ श्राइन बोर्ड को वनभूमि के अस्थायी आवंटन के मुद्दे पर हिंदु समुदाय को एक पखवात्रडे में कम से कम तीन बार प्रत्यक्ष रूप से ठेस पहुंचाई गई। अपनी सहिष्णुता और अति उदारता के कारण विशेष पहचान रखने वाला बहुसंख्यक समुदाय आज यदि उग्र प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा था तो यह तय मानें कि उसके लिए पानी सिर से गुजरने जैसी स्थिति बन गई थी । अमरनाथ श्राइन बोर्ड को अस्थायी रूप से 40 हेक्टेयर वन भूमि का आवंटन वापस लेने के बाद पिछले दिनों जम्मू तप रहा था । जम्मू कश्मीर सरकार के फैसले के विरोध में आयोजित भारत बंद को लेकर लोगों का ऑकलन और प्रतिक्रियाएं कुछ हों किन्तु इससे बहुसंख्यक समाज की भावनाएं अवश्य सामने आई ।श्री अमरनाथ करोत्रडों हिंदुओं के लिए श्रध्दा का एक प्रमुख केंद्र है। प्राकृतिक रूप से वहां निर्मित होने वाले हिम लिंग के दर्शन करने हर साल लाखों श्रध्दालु जाते हैं। श्रध्दालुओं की सुविधाओं के लिए वन भूमि के मात्र 40 हेक्टेयर के टुकत्रडे आवंटन के विरूध्द कश्मीर घाटी विशेष कर श्रीनगर में चार पांच दिनों तक चले उपद्रव हुए। इस दौरान भारत-विरोधी और पाक समर्थक नारे गूंजे। उस पर मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीडीपी तथा माकपा की जम्मू कश्मीर इकाई ने भूमि आवंटन के खिलाफ रूख अपनाकर बहुसंख्यक समुदाय को भारी ठेस पहुंचाई है। रही-सही कसर जम्मू-कश्मीर की कांग्रेसी सरकार ले पूरी कर दी। अमरनाथ श्राइन बोर्ड से वन भूमि वापस ले ली गई। राज्य सरकार के इस फैसले को पृथकतावादियों और साम्प्रदायिक तत्वों के आगे घुटना टेक देने जैसा माना गया है।समूचा घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि बहुसंख्यक समुदाय का कम से कम तीन बार अपमान हुआ है। उसकी भावनाओं का ध्यान नही रखा गया। ऐसी स्थिति में यदि देश के एक प्रमुख राजनीतिक दल द्वारा आयोजित बंद को समर्थन मिला है, तब आश्चर्य कैसा ? मध्यप्रदेश के कुछ नगरों में बंद के दौरान उपद्रव, हिंसा और तोत्रडफोत्रड की घटनाएं हुई हैं। निश्चित रूप से इन बातों का समर्थन नहीं दिया जा सकता। फिर भी यह सत्य स्वीकार करना होगा कि कश्मीर घाटी में जो देखने को मिला वह शर्मनाक था, जो हुआ उस पर असहमति व्यक्त की जा सकती है। जम्मू-कश्मीर में बिल्कुल ही भिन्न नजारा था । अमरनाथ श्राइन बोर्ड से अस्थायी भूमि आवंटन वापस लेने पर जम्मू जल रहा था । कश्मीर में मूर्ख पृथकता वादी अपनी जीत का जश्न मना रहे थे । देश के अन्य भागों में रहने वाले मुसलमान कश्मीरी मुसलमानों की हरकत और उनकी सोच पर हैरान थे।अब यह सवाल हर जुबान पर है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड के साथ हुए व्यवहार के बाद भविष्य में अब किसी भी धर्म , पंथ और सम्प्रदाय के लोग किस मुंह से किसी सरकारी जमीन के टुकत्रडे को रियायती दर पर आवंटित करने की मांग कर सकेगे ? इस घटनाक्रम में पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री तथा पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती का असल चेहरा पूरी तरह सामने आ गया। भूमि आवंटन के मुद्दे पर गुलाम नबी आजाद सरकार से समर्थन वापस लेकर सईद और महबूबा ने अपनी साम्प्रदायिक तथा पृथकतावादी सोच खुद ही उजागर कर दी। इससे पूर्व अनेक अवसरों पर ऐसे स्पष्ट संकेत मिल चुके है कि बाप-बेटी भारत की बजाय पाकिस्तान के हितों की चिन्ता अधिक करते हैं। बहरहाल, भारत बंद को राजनीति से ऊपर देखना चाहिए। यह क्यों नहीं मानें की यह बंद पृथकतावादियों और देशद्रोहियों के प्रति लोगों में बत्रढ रही नाराजगी का प्रमाण रहा।
शनिवार, 30 अगस्त 2008
संदीप भटट
एक हालिया खबर के मुताबिक न्यूजीलैंड और जापान के वैज्ञानिकों ने आॅसू मुक्त प्याज बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है। बायोटेक्नोलाॅजी के इस्तेमाल से प्याज के उस जीन को स्विच आॅफ कर दिया गया है जो आॅसू पैदा करने वाले एंजाइम का निर्माण करता है। न्यूजीलैंड स्थित क्राप एंड फूड रिसर्च संस्थान के शोधकर्ताओं ने इस खोज के बाद इस तरह के प्याज की खोज शुरु हुई। इसमें दस जीनों का पता लगा जिससे प्याज काटने पर आॅखों में आॅसू आते हैं। वैज्ञानिकों का दावा कि इससे प्याज का स्वाद बढेगा और यह स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर होगा। न्यूजीर्लैंड और भारत के किसान निस्संदेह प्याज की इस किस्म की खासी पैदावार लेंगे और मुनाफा बटोरेंगे। क्या भारत के किसानों के लिए भी ऐसी कोई दवा बन सकेगी जिससे खेती के कारण भारतीय किसान आत्महत्या जैसे कदम न उठाएं। मौजूदा हालात देखकर तो ऐसा कतई नहीं लगता। भारत का आम किसान आज भी परम्परागत तौर तरीके अपनाकर कृषि करता है। दुनिया के अग्रणी सब्जी उत्पादको में भारत भी शामिल है। लगभग 6.76 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल पर देश में सिर्फ सब्जी का उत्पादन होता है। भारत में आज भी सब्जियों का लगभग 29 प्रतिशत आलू अत्पादन है। भारत में सब्जियों के उत्पादन को बढ़ाने के उद्देष्य से वर्ष 2007 में राष्ट्रीय बागवानीर मिशन केी शुरुआत की गई। इसके तहत 2012 तक सभी प्रकार की सब्जियाॅ के दुगने उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। मिशन के अंतर्गत देश के किसानों को बागवानी , सब्जी उत्पादन आदि का प्रशिक्षण देने है, इन्हें पेशे के बतौर अपनाने हेतु प्रोत्साहन देने की बात पर जोर दिया जा रहा है।
बहरहाल भारत जैसे देश में यह अभी बहुत देर की कौड.ी है। देश में किसान आत्महत्याओं का मामला थमता नजर नहीं आता । गैर सरकारी आॅकड़ों की मानें तो पिछले कुछ सालों में एक लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। लगातार सूखे अतिवृष्टि, बाढ़, ओलावृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाआंे ने किसानों की कमर तोड़ दी है। सूदखोरांे की उॅची ब्याज दरें न चुका पाने के कारण सरकारी योजनाओं की लालफीताशाही और भ्रष्ट तंत्र से जीवट किसान भी हार मान लेता है। जो कुछ भी फसल होती हैं जमाखोरांे और बिचोलियांे को औने पैने दामों में बेचना भी उनकी मजबूरी होती है। फसल कम हो या ज्यादा किसान हमेशा से बाजार से फायदा नही ले पाता है। सरकारी नीतियाॅ इतनी लचर है कि किसान मंडियों या सहकारी समितियों से बचना चाहते हैं नतीजतन इसका फायदा दलाल उठाते है। कुछ माह पहले प्याज की कीमतें आसमान छू रही थी पर किसानों का मुनाफा जमाखोरों ने बटोरा। कई गैर सरकारी संगठन भी इन प्रयासों हेतु अपनी दुकानें चला रहे हैं। कृषि की विकास दर में लंबे समय से कोई बढ़ोतरी नजर नहीं आती। सरकार की नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन के बिना कुछ नही हो सकता। ऐसा तब है जब सेज जैसी योजनाएं अभी अपने शुरुआती चरण में हैं। जिस दिन खेती की जमीनों में सेज उगेंगे किसान कहीं गुम हो जाएगा।
शुक्रवार, 29 अगस्त 2008
आदर्श ग्राम के सपने को साकार करेगा भाऊ साहब भुस्कुटे न्यास
(बनखेड़ी से अनिल सौमित्र)
गांव के पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी अच्छी व्यवस्था मिले, वे शहर के साथ प्रतिस्पद्र्धा के लिए सक्षम बनें, उनकी योग्यता व क्षमता का समुचित उपयोग हो, इसी उद्देश्य से भाऊ साहब भुस्कुटे स्मृति लोक न्यास, गोविन्द नगर, (बनखेड़ी, म. प्र.) में सर्वांगीण ग्राम योजना का प्रकल्प संचालित कर रहा है। गोविन्द नगर म.प्र. की राजधानी भोपाल से लगभग 200 कि. मी. की दूरी पर है। भाऊ साहब भुस्कुटे का नाम तो ख्यात नहीं हुआ किन्तु उनका काम अवश्य ख्याति को प्राप्त हुआ। आज उन्हीं की प्रेरणा से उनके ही सपनों को साकार करने में कुछ तपस्वी लगे हैं। न्यास के सचिव श्री यावलकर जी कहते हैं - हम समाज की चेतना और ऊर्जा को जागृत कर आदर्श समाज की स्थापना करेंगे। इसी निमित्त से यह न्यास शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्वावलंबन और ग्रामीण विकास के अन्य कार्यों में लगा है। श्री यावलकर की आँखें निर्दोष किन्तु सपनों से भरी हैं। उनकी आँखों मं श्री भाऊ साहब के ही सपने हैं। एक समग्र रूप से विकसित और आदर्श गांव का सपना !1991 में स्थापित यह न्यास अपने स्थापना काल से ही ग्राम विकास की कल्पना को आकार दे रहा है। हाल ही में न्यास ने ग्रामीण क्षेत्रांे में जड़ी-बूटियों, औषधीय पौधों के उत्पादन विस्तार एवं उपयोगिता द्वारा महिला तथा बच्चों की स्वास्थ्य रक्षा के लिए एक बहुआयामी प्रकल्प की शुरूआत की है। इसके अंतर्गत प्रारम्भ में बनखेड़ी विकास खण्ड के सभी गांवों से चुने हुए प्रतिनिधियों को जड़ी बूटियों के बारे में जानकारी दी जायेगी और उन्हें महिलायें तथा बच्चों के स्वास्थ्य रक्षण व सवंर्द्धन का प्रशिक्षण दिया जायेगा।
गुरुवार, 14 अगस्त 2008
शनिवार, 9 अगस्त 2008
गौरव
जीजस' मरने के बाद भी ज़िंदा हो सकते हैं....'बाइबल' के हिसाब से हड़प्पा-मोहनजोदाड़ो झूठ हो सकते हैं ... 'मोहम्मद साहिब' से फ़रिश्ते मिलने आ सकते हैं ...पर राम और कृष्ण पृथ्वी पर आएँ हो ये कैसे संभव है....?हम अपनी ही नींव खोदने में आनंदित होते हैं... असल में ये भारतीयों की महान बनाने की कोशिश है...क्योकि हमने बचपन में पढ़ रखा था ,"स्वयं में बुराई खोजने वाला व्यक्ति महान होता है."समुद्र में डूबी हुई द्वारीका नगरी के अवशेष मिलते हैं जो 4-5 हज़ार साल पुरानी बताई जाती है तो हम कहते हैं...'हाँ ॥"शायद" ये कृष्ण की नगरी ही हो'..अब यहाँ भी "शायद"... हमें पता लगता है आज से 4000 साल पहले यमुना वहीं से बहती थि..जिसका वर्णन महाभारत में है... या सरस्वती नदी जिसका वर्णन बस पुराणों में है... पुरातत्त्व विभाग(ASI) उसको भी मानता है तब भी हम "शायद" कहते हैं...आइए गड़बड़ी कहाँ से शुरू हुई उस तक हम जाएँ....हमारे प्राचीन ग्रंथ जो बस 5000 साल पुराने माने गये...एस क्यों..? हमने अपने ग्रंथों को लिख कर कम रखा.... पीढ़ी दर पीढ़ी कंठस्थ कर ग्रंथों को जीवित रखा गया ...असल में हमने इतिहास लिखना बहुत बाद में सीखा.... और एक घटना पे लिखा गया तो अलग अलग लोगों ने अपनी समझ अनुसार.....एक बात वाल्मीकि जी ने अपने हिस्साब से लिखी तो अगस्त मुनि ने अपने.... बहुत बाद आए तुलसीदास जी ने अपने... या रामदास जी ने अपने। हिसाब से कहा॥ अब अलग अलग कहा तो हो गये मतभेद...मैने पहले भी कहा हमारे शास्त्र कव्यात्मक हैं.. और काव्य में सीधे बात कहने का प्रावधान नही है...बात का सार लिया जाता है.....अगर रावण को संपूर्ण संसार का स्वामी कहना हो...तो दशों दिशाओं से जोड़ के..'दशानन' कह दिया गया...और काव्य को प्रभावशाली बनाने के लिए सच और झूठ का मिश्रण करते है जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दे....राम से संबंधित साहित्य में एसा ही हुआ॥ और आज हम सच को झूठ॥या कोई कोई झूठ को सच मानने पर आमादा हैं.... हाँ बहुत सी बातें(जैसे अस्त्र शास्त्र का वर्णन) काल्पनिक लगता है...उन पर विश्वास करना मुश्किल है...पर मुग़ल तोप लेकर भारत आए तो हमने ये भी तो विश्वास नही किया की भला एसा भी हो सकता है की कोई नली आग उगले..हम अपनी बात साबित नही कर पाते है भले ही ASI को खोदाइयों में अवशेष मिलते रहें...जैसे ये बोला जाए की जीजस ने कश्मीर की घाटियों में अपना शरीर छोड़ा था... क्रिसचन समुदाय को बुरा लगेगा... स्वाभाविक है.. आस्था पर प्रश्न है...पर हिंदुओं की आस्था??उस पर सवाल खड़ा क्यों करते है...? ऐसे सवाल उठा कर हिंदू मान्यताओं,भावनाओं से खिलवाड़ करना है...राम सेतु सच है या या काल्पनिक.... हम तो कहते है....कि राम-सेतु निर्माण में समुद्र ने भी सहायता की थी... अब अगर वो समुद्र द्वारा निर्मित निकले तब भी...ऱाम के अस्तित्व पर प्रश्न नही उठता ...!नरेंद्र कोहली जी ने एक लेख में कहा था "भारत में सबसे जयदा शोषण हिंदुओं का हुआ है."ग़लत तो नही है...राम सेतु का हज़ारों करोड़ों का प्रॉजेक्ट अब रुक जाए तो करोड़ों रुपया डूब जाएगा..और ना रुके तो क्या डूबेगा?हम?? न हम तो छिछले पानी में तैर रहे हैं॥-गौरव
शुक्रवार, 1 अगस्त 2008
1857 क्रांति की 151 वी
वर्षगांठ
मध्यप्रदेश के जन-जन तक पहुंचा ‘‘रोटी और कमल’’
अनिल सौमित्र
भोपाल। इतिहास के तथ्यों और संदेशों को याद करना आसान नहीं होता। यह तब और भी कठिन हो जाता है जब घटनाओं और प्रतीकों को अलग चश्मे से देखे जाने का अंदेशा हो। सबको यह पता नहीं है कि 1857 की क्रांति का प्रतीक रोटी और कमल था। हालांकि अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए यह पहला आगाज नहीं था लेकिन, पहली सुनियोजित और संगठित क्रांति जरूर थी। यह ऐसी क्रांति थी जिसमें राजा-महाराजा, सैनिक और नागरिक, नागरिक और ग्रामीण तथा वनवासी बन्धुओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया था। इस वर्ष 1857 की क्रांति के 150 वर्ष पूरे हुए। देशभर में क्रांति की स्वर्ण जयंती मनाई गई। इसी सिलसिले में मध्यप्रदेश ने अनूठा प्रयोग किया। क्रांति की याद को जन-जन तक पुहंचाने के लिए मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग ने गांव-गांव और नगर-नगर में क्रांति यात्राएं आयोजित करने की योजना बनाई हैं और इस योजना को मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् ने अमलीजामा पहनाया।
चूंकि ‘कमल’ भारतीय जनता पाटी का निशान है। मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है। यह संयोग ही था कि भाजपा शासनकाल में ही 1857 के 150 वर्ष पूरे हुए। जाहिर है भाजपा सरकार को ही 150 वीं वर्षगांठ मनाने का अवसर मिला। यह अवसर भाजपा के लिए वरदान तो था, लेकिन विरोध का कारण भी था। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि क्रांति यात्रा के बहाने ‘कमल’ का संदेश देकर भाजपा चुनाव प्रचार कर रही है, क्रांति शताव्दी वर्ष का दुरूपयोग कर रही है। कांग्रेस आरोप लगाती रही और भाजपा सरकार ने मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् के माध्यम से संपूर्ण प्रदेश में क्रांति यात्रा का सफल आयोजन करती रही। भाजपा पहले से ही राम और रोटी की बात करती रही है। लेकिन ‘‘कमल और रोटी’’ की चर्चा और संदेश, एक नई पहल थी। जन अभियान परिषद् के कार्यपालक निदेशक राजेश गुप्ता बताते हैं - मध्यप्रदेश के 21235 पंचायतों तक क्रांति यात्रा पहुंची। दरअसल ये यात्राएं विकेन्द्रित और छोटे-छोटे समूहों में थी। उद्देश्य यही था कि क्रांति के संदेशों को अधिक से अधिक लोगों तक रोचक तरीके से पहंुचाया जाए। जन अभियान परिषद् ने अपने 9 संभाग, 48 जिले और 330 ब्लाॅक इकाईयों के माध्यम से इन यात्राओं को सफल और प्रभावी बनाया। उल्लेखनीय है कि बाबा मौर्य ने अपनी प्रस्तुति ‘‘भारतमाता की आरती’’ से 22 जिलों में लोगों को आंदोलित किया। परिषद् के अधिकारी श्री गुप्ता कहते हैं - मध्यप्रदेश में क्रांति यात्रा का मुख्य आकर्षण ‘विकेन्द्रित स्तर पर पंचायत से पंचायत तक यात्रा, नुक्कड़ नाटक और भारतमाता की आरती (एक शाम, शहीदों के नाम) कार्यक्रम ही था। गौरतलब है कि इस क्रांति यात्रा का संदेश मध्यप्रदेश के सभी जिलों में पहुंचाया गया। जन अभियान परिषद् की जानकारी के अनुसार इसमें 34 लाख से अधिक यात्रियों ने हिस्सेदारी की। इंदौर संभाग के रिपोर्ट के मुताबिक अकेले इसी संभाग में लगभग 2 लाख महिला, पुरूष और बच्चे सहभागी बने। इसके अलावा लाखों लोग यात्रा के संदेशों से रू-ब-रू हुए। जन अभियान परिषद् ने सैंकड़ों स्वयंसेवी संस्थाओं, नाटक मंडलियों और समूहों के माध्यम से क्रांति के संदेशों को प्रभावी बनाने की कोशिश की। यात्रियों को आम जनता से सहयोग, सम्मान और समर्थन तो मिला ही। वे इतिहास के ‘स्मरण यात्री’ के तौर पर देखे गए। आम लोग इस बात से रोमांचित थे कि जिस घटना के वे साक्षी नहीं थे, सिर्फ पढ़ा या सुना भर था, वह आज उनके सामने आंखो देखी घटना के समान सिद्ध हो रहा है। इन यात्राओं ने नागरिकों को जागरूक तो किया ही, उन्हें संवेदनशील भी बनाया। वे आक्रांताओं और अंग्रेजों के दमन और अनगिनत अत्याचार की याद को ताजा किया। लेकिन जिस तरह कुछ लोग विदेशियों की चाल तब नहीं समझे थे और अपने ही लोगों के खिलाफ अंग्रेजो का साथ दिया था, ठीक उसी तरह कुछ लोगों ने जाने-अंजाने इस यात्रा और यात्रियों का भी विरोध किया। बहरहाल विरोध और समर्थन के बावजूद यात्रा को सफल और प्रभावी बनाने के लिए पर्दे के पीछे अनिल माधव दवे थे। श्री दवे मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद् के उपाध्यक्ष हैं। वे भाजपा के भी उपाध्यक्ष हैं। शासन ने 1857 मुक्ति संग्राम के डेढ़ सौ वर्ष समारोह समिति की कमान श्री दवे को ही सौंपी थी। कांग्रेसियों द्वारा 1857 क्रांति यात्रा के विरोध के दो ही प्रमुख कारण थे। एक तो यात्रा में प्रतीक के तौर पर कमल का प्रयोग और दूसरे श्री अनिल माधव दवे । इस यात्रा के दौरान यात्रा दल के लोगों ने एक तरफ तो क्रांति के प्रतीक रोटी और कमल को एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचाया, वहीं वे स्थानीय स्तर पर तब के क्रांतिकारियों की तहकीकात भी कर रहे थे। इस दरम्यान कई अनाम क्रांतिकारियों की जानकारी भी मिली। वे, स्थानीय लोगों को पडोसी गांव, तहसील और जिले के क्रांतिकारियों और घटनाओं की याद भी ताजा कर रहे थे। गांव वालों ने तब के गद्दारों की भी खबर ली। गांव वालों ने कहा आज भी हैं देश में गद्दार, इसीलिए एक और क्रांति की दरकार है। वे आज के गद्दारों को सबक सिखा कर, 1857 की कसर पूरी करना चाहते हैं। हालांकि मुस्लिम समुदाय ने अधिकांश स्थानों पर यात्रा का स्वागत किया और उत्साहपूर्वक इसमें अपनी भागीदारी दर्ज करायी, लेकिन कई स्थानों पर इस समुदाय के लोगों ने यात्रा का विरोध भी किया। मुसलमानों के विरोध के कारण यात्रा को सांप्रदायिक नजरिए से देखे जाने का भय भी था। इसीलिए क्रांति-यात्रा की सलामती के लिए प्रशासन और यात्री दल को काफी मशक्कत करनी पड़ी। थोड़ी देर के लिए ही सही, लेकिन गांववासी और वनवासी राष्ट्रवाद और देशभक्ति के संदेशों से अनुप्रणित हुए। उन्होंने वंदेमातरम् और भारतमाता की जय के उद्घोष किए। यात्रा के दौरान संपूर्ण मध्यप्रदेश में साहित्य का वितरण किया गया। क्रांति समारेह समिति के प्रदेश संयोजक अनिल माधव दवे द्वारा संकलित पुस्तिका ‘‘रोटी और कमल की कहानी’’ लाखों की संख्या में ग्रामीणों के बीच बांटी गई। हालांकि राजनैतिक विरोधी इस क्रांति समारोह को चुनावी नजरिए से देख रहे हैं। इसे देशभक्ति और राष्ट्रवादी दृष्टि से भी देखे जाने की जरूरत है। चुनावी नफा-नुकसान तो बाद की बात है, फिलहाल मध्यप्रदेश के नगरीय, ग्रामीण और वनवासी अंचलों में देशभक्ति और क्रांति का जज़्बा देखने को मिल रहा है।

मुरिया दरबार का करमा नृत्य है सलवा जुडूम
जयराम दास
सलवा जुड़ुम ना कोई ब्राण्ड है और न ही गांधी को ब्राण्ड एम्बेसडर जैसे शब्दों से दूषित करने की जरूरत. ये दोनों शब्द बिल्कुल बाजार की उपज है.
तीसरी दुनिया के प्रखर चिंतक ´पॉलो फ्रेरे` के अनुसार ´शोषक और शोषित दोनों का अमानुषीकरण मानवीय विडंबना है। इस दो तरफा अमानवीकरण से इंसानी नियति को बचाने की क्षमता एवं जिम्मेदारी शोषक के पास न होकर शोषित की है। पहले तो शासकों ने शोषक बनकर छत्तीसगढ खासकर बस्तर को हर तरह की मानवीय सुविधाओं से दूर रखा और उसके बाद उस शोषण से मुक्ति का सपना दिखाने कुछ लोग सुदूर बंगाल से आये और बेचने लगे आदिमजनों के सपनों को। दशकों बाद उत्पीडित की भूमिका में रहे आदिवासी जनों ने अपनी आंखें खोली अपनो को उन सपनों के सौदागरों के रक्तिम चंगुल से छूट सकने क्षमता को पहचाना, अमानवीकरण से अपनी नियति को बचाने की जिम्मेदारियों को समझा और तब एक ऐतिहासिक आंदोलन शुरू हुआ, जिसका नाम पडा ´सलवा जुडूम`।
´सलवा जुडूम` ना कोई ब्रांड हैं, और न ही गांधी को´ब्रांड एम्बेसडर` जैसे शब्दों से दूषित करने की जरूरत। ये दोनों शब्द बिल्कुल बाजार की उपज हैं और बाजार जैसी चीजों से आदिमजनों का न ज्यादा संबंध है और ना ही उन्हें इसकी जरूरत। रही बात गांधी की, तो यह तय है कि जहां भी अव्यवस्थाओं के खिलाफ असहयोग की शुरुआत होगी, जहां भी अपनी भूमि को उत्पीडकों के चंगुल से मुक्ति हेतु कोई प्रयास शुरू होगा तो उसके शाश्वत प्रतीक होंगे महात्मा गांधी। लडाई चाहे अफ्रिकी ´नस्लवाद`के खिलाफ हो या बस्तरिया ´नक्सलवाद` के। अपनी लाठी लेकर 139 वर्ष का वह महामानव बिल्कुल सीना ठोककर खडा होगा राक्षसों के समक्ष प्रतीकों के रूप में, नैतिक बल के रूप में। पीढ़िया आयेंगी चली जायेगी, गांधी की उम्र भी बढती जायेगी लेकिन, उसकी वही तेजिस्वता, वही आध्यात्मिक आभा, वही आत्मिक बल और अन्याय के विरूद्ध खडे होने की वही जिजीविषा दिखेगा आज और हजार साल के बाद भी।
यदि गांधी की वह प्रेरणादायी ताकत नहीं हो तो एक बारगी तो आत्मा कांप जाती है, रोंगटे खडे हो जाते हैं यह सोचकर कि हमारा पाला कितने खतरनाक लोगों से पडा है। अस्तित्व की कितनी विकट लडाई लड रहे हैं ये आदिम जन। क्या नहीं है नक्सलियों के पास? ढेर सारा देशी-विदेशी पैसा, अत्याधुनिक हथियार, सैकडों लोगों को क्षणभर में मांस के लोथडे में तब्दील कर देने वाले भूमिगत बम, मिसगाइडेड मिसाइल की तरह ढेरों प्रतिभाशाली एवं उर्जावान लोग, वेतनभोगी मीडियाकर्मी, चीन के चेयरमैन की शागिर्दी, भारत की सरकार के बैसाखी बने लोगों का सहयोग, अमानवधिकारियों का संरक्षण और जंगली लडाई के जानकार उसकी खुंखार गुरिल्ला सेना। एक´सत्य`और इमानदारी के सिवाय सबकुछ तो है नक्सलियों के पास। और यही पर गांधी प्रतीक बन जाते हैं इन बस्तरिया वीरों के। इसी कारण मोहनदास राजदूत बन जाते हैं सलवा जुडूम के। आखिर उस युवा बैरिस्टर के पास भी सत्य की ताकत के अलावा था क्या? लेकिन दक्षिण आफ्रिका में उसी ताकत के बदौलत गांधी ने ट्रेन के बाहर फेकने वाले फिरंगियों को उसकेसमूचे साम्राज्य के उसके सारे उपनिवेश के बाहर फेककर ही दम लिया था।
जहां तक सवाल गांधी के अहिंसा की है, तो आज यदि गांधी होते तो शायद फिर अपनी इसी बात को दोहराते कि ´हिंसा और कायरता में से अगर हमें एक चुनना पडे तो हम हिंसा चुनना पसंद करेंगे, आखिर वह सत्य का पुजारी इस असत्य को कभी नहीं दुहराता कि उसे आजादी बिना खडग बिन ढाल, मिल गयी थी। निश्चय ही वह नमन करते उन क्रांतिकारियों का भी जिन्होंने वनवासियों की तरह ही पशुता पर उतर गये अंग्रेजों की चूले हिलाकर रख दी थी। एक जगह तो नेहरू ने भी गांधी जी की अहिंसा को अपने आत्मकथा में एक रणनीति कहा है, जब काफी हिंसा के कारण जब महात्मा ने अपने आंदोलन को विराम दिया था। एक दोहा है ´गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट, भीतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट` यानि गुरु को कुम्हार की तरह होनी चाहिए जो भीतर से तो सहारा दे मगर बाहर चोट भी मारने की कुबत रखे। शायद किसी के पाप का घडा फोडने में भी इसी नीति की जरूरत होती है।
गांधी जी ने कभी यह दावा नहीं किया कि उन्होंने कोई नया विचार देश को दिया है। 28 मार्च 1936 के हरिजन के अंक में उन्होंने लिखा था। ´नये सिद्धांतों को जन्म देने का दावा में नहीं करता, मैंने तो केवल अपने ढंग पर सनातन सत्यों को जीवन और समस्याओं पर लागू करने का प्रयास किया है।` यानि अपने समग्र जीवन में गांधी अपने उसी सनातन सत्य के साथ प्रयोग करते रहे जो पूर्ववर्ती विचारकों शास्त्रों पुरानों ने उन्हें दिया था। अन्य कई चीजों के अलावा अहिंसा भी उनमें से एक था, लेकिन वे कोई लकीर के फकीर नहीं थे। समयानुकूल विचारों में लचीलापन लाना भी उनके सिद्धांतों में शामिल था। ऐंजिल की पुस्तक के आधार पर उन्होंने कहा था कि कोई एक गाल पर थापड मारे तो दूसरा गाल उसके आगे कर दो। लेकिन जब दूसरे पर भी थप्पड मार दे तो तीसरा गाल कहां से लायेंगे आप? उस समय भले ही तीसरे गाल का प्रयोग करने की जरूरत नहीं पडी हो, कुछ तो तात्कालीन वैश्विक परिस्थितियां, गांधी का तेज और क्रांतिकारियों का बलिदान अंग्रेजों को वापसी के लिए मजबूर होना पडा।
लेकिन आज तो ये नक्सली हमसे हमारा तीसरा गाल भी मांग रहे हैं। राम राज्य की स्थापना को ही अपना ध्येय मानने वाले गांधी के रामकथा में ही इस तीसरे गाल की गुत्थी सुलझी नजर आती है। जब तीन दिन तक विनय करने के बाद भी राह नहीं देने पर राम समुद्र को सोखने को यह कहते हुए उद्यत हुए थे कि´भय बिनु होई ना प्रीति` कभी आपने पढा है कि गांधी ने कभी आलोचना की हो भगवान राम के इस कदम की। जब इसी दण्डकारण्य (बस्तर) में राक्षसों द्वारा संहार किये गये वनवासियों के हिìयों का पर्वत देख भगवान राम, राक्षसों के खात्मे का संकल्प लेते हैं, क्या आपने कहीं सुना कि अपने किसी आलेख या भाषण में गांधी जी ने उस प्रसंग की आलोचना की हो? राक्षसों के संहार की कथा ´रामायण` पढते-पढते ही तो बकौल गांधी, गांधी जी सत्य हो गये थे। इस रावण को समाप्त करने वाले भगवान राम ही तो अंत समय में भी उनके जिह्वा पर विराजमान रहे। गीता पर सर्वश्रेष्ठ टीका लिखने वाले, और उसमें वर्णित उपदेशों को अपने जीवन में अंगीकार करने वाले उस कर्मयोगी को कभी आपने ये कहते पढा कि अर्जुन को युद्ध के लिए ´उकसाने` वाले कृष्ण गलत थे।
गांधी के प्रयोगों पर किसी तरह के विवेचना की पात्रता न रखते हुए भी विद्वतजनों से यह आग्रह करना उचित होगा कि वे सभी गांधी को उनके आस्था, विश्वास एवं कर्म के साथ समग्रता में समझने की कोशिश करें। बिना किसी पूर्वाग्रह के गांधीवाद पर विमर्श करते समय लंका और कुरुक्षेत्र के नायकों पर, गांधी की असीम आस्था पर भी विचार करना होगा। उपरोक्त का कहीं भी आशय यह नहीं है लेखक किसी नतीजे पर कूद कर पहुंच गया है, या किसी भी तरह के अनावश्यक हिंसा का समर्थन कर रहा है। गांधी के बारे में कोई भी प्रशंसा या आलोचना तो निश्चय ही सूर्य पर थुकने या उसे दीया दिखाने के सदृश होगा। लेखक का आशय सिर्फ इतना है कि´छीनता हो जब तुम्हारा स्वत्व तो,आंख से आंसू नहीं शोला निकलनी चाहिए।
गुरुवार, 31 जुलाई 2008
मानवाधिकार बचाने की कमाई
उमाशंकर मिश्र
दंतेवाडा़ के सलवा जुडूम कैंप को देखने के बाद मैंने रायपुर की ओर कूच कर दिया। मैं जानना चाहता था कि भारी-भरकम बजट और विदेशी सहयोगियों के सहारे चलनेवाले
मानवाधिकार आंदोलनों का जमीनी जुड़ाव क्या है और ऐसा करने के पीछे उनके अपने तर्क क्या हैं? मन में यह सवाल था कि सुरक्षाकर्मी यदि लोगों के मानवाधिकार का हनन कर रहे हैं तो नक्सली क्या कर रहे हैं? रायपुर में रहकर कई तरह की बातें मानवाधिकारवादियों के बारे में सुनने को मिल रही थी। जिनमें से एक था कि मानवाधिकारवादी सलवा जुडूम का विरोध करके नक्सलवाद को जस्टीफाई कर रहे हैं। दूसरी ओर महेंद्र कर्मा तथा डीजीपी विश्वरंजन से जब मुलाकात हुई तो उन्होंने इस तरह की कवायदों को सलवा जुडूम के खिलाफ एक दुष्प्रचार करार दिया। डीजीपी ने तो यहां तक कहा कि दुष्प्रचार करने वालों को यह तय करना होगा कि आप किसके साथ हैं, प्रजातांत्रिक व्यवस्था के साथ या फिर नक्सलवाद के साथ, यदि आप नक्सलवाद के साथ हैं तो आपको इस देश के संविधान के मुताबिक यहां की सुरक्षा एजेंसियों से कोई नहीं बचा पाएगा। इस तरह उहापोह को लेकर मैंने किसी मानवाधिकार कार्यकर्ता से मिलकर जिज्ञासा शांत करने का निर्णय लिया। रायपुर पहुंचकर मैंने मानवाधिकार कार्यकर्ता सुभाष महापात्र को फोन लगाया तो किसी महिला ने फोन उठाया और कहा कि आप आ जाइये, सुभाष जी अभी घर पर ही मिलेंगे। सवेरे ही मैं ऑटो पकड़ कर सुभाष महापात्र के महावीर नगर स्थित घर की तरफ निकल पड़ा। रास्ते में मैं डीजीपी विश्वरंजन की वह बात बार बार मस्तिष्क में झंझावात उत्पन्न कर रही थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि `नक्सली इस देश का संविधान ही नहीं चाहते हैं।´ फिर नक्सलवादियों के आदर्श माने जाने वाले `माओ´ की बात भी याद आती है कि `सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है।´ मन में सवाल उठ रहा था कि क्या नक्सलवाद वास्तव में इस देश के संविधान, प्रजातंत्र के लिए ख़तरा है?
यही सब सोचते सोचते मैं महावीर नगर के नाके पर पहुंच गया, मुझे वहां से एमआईजी-22 सहयोग अपार्टमेंट जाना था। पूछने पर पता चला कि सहयोग अपार्टमेंट अभी करीब डेढ़ दो किलोमीटर की दूरी पर है। रिक्शे में बैठकर मैं सहयोग अपार्टमेंट की तरफ चल पड़ा। सहयोग अपार्टमेंट पहुंचकर रिक्शा छोड़कर पैदल ही एमआईजी-22 को खोजना शुरु कर दिया। कई गलियों में ढूंढा, लेकिन जब नहीं मिला तो मैने एक लड़के से पूछा। उस लड़के ने कहा कि `भाई साहब यहां कई लोग आते हैं जो एमआईजी-22 के बारे में पूछते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि यह पता ही गलत है।´ उसकी बात सुनकर एक बार तो मैं चकरा गया और संदिग्धता तनिक और बढ़ गई। लेकिन मैं उस गली से बाहर निकल कर आया और नुक्कड़ के एक जनरल स्टोर के मालिक से पता पूछा तो उसने इशारा करते हुए बताया कि उस गली के कोने पर एमआईजी-21 है और एमआईजी-22 भी वहीं होना चाहिए। इतना बताकर उस व्यक्ति के मुंह से सहज ही निकल पड़ा कि वहां तो विदेशी (अंग्रेज) रहते हैं। उसकी बात सुनकर मुझे विश्वास सा हो गया कि हो न हो, वही मेरा गंतव्य स्थान है, क्योंकि अपने देशवासियों के मानवाधिकार की वकालत हम खुद तो कर ही नहीं सकते न, इसके लिए हमें विदेशियों की शरण में जाना ही पड़ता है। वहां जाकर देखा तो एक बड़े से मकान के बाहर बड़ा सा लोहे का गेट लगा हुआ था। गेट पर एक आदिवासी पुरुष लुंगी लपेटे खड़ा था और लुंगी के दूसरे सिरे को घुमाकर उसने कंधे पर रखकर अपने एक हाथ को ढका हुआ था। ध्यान से देखने पर पता चला कि उसका वह हाथ जिसको ढका गया था, इंजर्ड होने के कारण सूजा हुआ था। उस घायल आदिवासी को देखकर यह तो निश्चित हो गया था कि यही मानवाधिकार कार्यकर्ता का घर होना चाहिए।
मैंने उस आदमी को बुलाकर दरवाजा खोलने के लिए इशारा किया। पहले तो आदिवासियों की सहज प्रवृत्तिवश वह सकुचाता हुआ सिर झुकाकर दूसरी तरफ चला गया, लेकिन मैंने जब दुबारा बुलाया तो उसने आकर दरवाजा खोल दिया। अंदर घुसते ही दाहिने हाथ पर दरवाजे के बाहर छोटी सी तख्ती लगी हुई थी, जिस पर लिखा था `एफएफएफडीए´ (फोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डाक्युमेंटेशन एण्ड एडवोकेसी)। यह सुभाष महापात्र द्वारा चलाए जा रहे मानवाधिकार संगठन का नाम है। दरवाजा खोलते ही सामने एक रॉकस्टार की तरह बाल बढ़ाए हुए गोरा विदेशी कम्प्यूटर स्क्रीन पर नजर गड़ाए हुए बैठा हुआ था। मैने उससे सुभाष महापात्र के बारे में पूछा तो इशारा करते हुए उसने अंदर जाने को कहा। उसके भावविहीन चेहरे को देखकर लग रहा था मानो वह भारत में हो रहे इस तथाकथित मानवाधिकार को लेकर बेहद चिंतित हो। अंदर जाने के लिए जैसे ही मैं बढ़ा तो वहीं पर संभवत: दो अन्य विदेशी मानवाधिकारवादी कम्पयूटर पर नजरे गड़ाए ऐसे तल्लीन बैठे थे, मानो वे निरंतर कुछ ट्रैक करने में जुटे हुए थे। उनमें एक महिला थी, जिसने कानों में हैडफोन भी लगाया था। थोड़ा और आगे बढ़ने पर सामने ही कुछ और लोग खड़े दिखाई दिये, जिनमें कई लोग विशुद्ध जनजातीय वेशभूषा में थे, जिन्हें देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि वे आदिवासी हैं।
जनअदालत लगाकर नक्सली आदिवासियों को प्रताड़ित करते हैं, बाप को भरी सभा में बेटे से मरवाया जाता है, भरी सभा में लोगों को मार दिया जाता है, आखिर यह भी तो मानवाधिकार हनन के दायरे में आना चाहिए, फिर इस पर कभी चर्चा क्यों नहीं होती? इस बात पर सुभाष सहमती जताते हुए कहते हैं कि नक्सली भी गलत कर रहे हैं। दूसरे ही क्षण वे कहते हैं कि सरकार और नक्सली दोनों ही पक्ष गलत कर रहे हैं। एसपीओ को लेकर विरोध क्यों है, जबकि उसकी भर्ती तो पुलिस एक्ट के तहत की जाती है और वह सरकार के पे-रोल पर काम कर रहा है? जवाब मिलता है कि नाबालिग बच्चों को हथियार थमाया जा रहा है,जबकि संयुक्त राष्ट कन्वेंशन के मुताबिक 14 साल के उम्र वाले को बच्चा माना गया है। मैने पूछा कि हमारे यहां तो 18 साल वाले को ही बालिग माना जाता है, हमें अपने देश का कानून मानना चाहिए या कहीं और का? जवाब में वे कहते हैं कि अपने देश का ही कानून मानना चाहिए, लेकिन जो व्यवस्था गलत है, उसे बदल देना चाहिए।अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब तक आप किसी चीज से अनभिज्ञ हैं तब तक आप समान्य व्यक्ति की तरह बेपरवाह होकर जीवन जी रहे होते हैं, लेकिन जब आप चीजों को समझने लगते हैं तो आप संतोष का अनुभव होता है अथवा निराशा में डूब कर व्यक्ति मानसिक तौर पर अशांत होने लगता है। कुछ ऐसा ही मुझे उन देशी विदेशी मानवाधिकारवादियों और उनके बीच मुंह लटकाये खड़े करीब दर्जन भर आदिवासियों को देखकर महसूस हो रहा था। लेकिन मैंने सहज होने की कोशिश करते हुए पूछा, क्या बात है? सुभाष जी, आप काफी टेन्श दिखाई पड़ रहे हैं। वे बोले हां, अब देखिये न इन लोगों को कोई रात को तीन बजे यहां छोड़कर चला गया और बताया भी नहीं कि ये लोग कौन हैं। सुभाष ने बताया कि उन आदिवासियों में से दो को पुलिस की गोली भी लगी है। यह सुनते ही मेरे मन में सवाल उठा कि क्या ये आम आदिवासी ही हैं, जिन्हें गोली लगी है? संभवत: नक्सली भी हो सकते हैं, क्योंकि दंतेवाड़ा में जिन सुरक्षा बलों पर बाजार में नक्सलियों ने हमला किया था, वे भी तो आम आदिवासियों की ही वेशभूषा में थे. हालांकि यह मेरी तत्कालीन मन:स्थिति की उपज हो सकती है, इसे निर्णायक नहीं माना जाना चाहिए।
उनके पूछने पर मैने बताया कि सलवा जुडूम को लेकर मुझे बात करनी है। इतना सुनकर सुभाष महापात्र थोड़ा अचकचाए फिर उन्होंने कहा कि `सलवा जुडूम तो 2005 से पहले ही शुरु हो गया था। पुलिस इसके लिए काफी पहले से ही रिहर्सल कर रही थी और 2003 में बीजेपी सरकार के आने पर ही इसकी शुरुआत हो गई थी। बकौल सुभाष सलवा जुडूम को नेता लोग चला रहे हैं। मैंने पूछा कि आखिर नेता इस आंदोलन को क्यों चला रहे है? जबकि सरकार और यहां तक कि विपक्ष के नेता महेन्द्र कर्मा भी यह कहते हैं कि यह लोगों का स्व-स्फूर्त आंदोलन है। जवाब में वे कहते हैं कि ऐसा सरकार जंगल में कंपनियों के सम्राज्य को खड़ा करने के लिए कर रही है। लोगों को गांवों से निकालकर लाया जा रहा है, जिससे कंपनियों का रास्ता साफ हो सके। लेकिन साथ ही इस ओर भी ध्यान देना होगा कि आदिवासियों के वनक्षेत्र में बसे गांव छोड़ देने से नक्सलियों की ढाल खत्म हो जाएगी। यह भी नक्सलियों के लिए चिंता का एक विषय है। मैनें अगला सवाल पूछते हुए कहा कि महेन्द्र कर्मा, जो इस आंदोलन के नेता है वे तो बाद में इस अभियान से जुड़े थे, जबकि आप कह रहे हैं कि यह नेताओं द्वारा शुरु किया गया है? इस पर वे कहते हैं कि अगर कर्मा बाद में सलवा जुडूम से जुड़े थे तो वे नेता कैसे बन गए। मैनें पूछ लिया कि नक्सलियों का संघर्ष किससे है और किस वर्ग के हित की लड़ाई वे लड़ रहे हैं? सुभाष थोड़ा तिलमिला जाते हैं और कहते हैं कि इसका जवाब देना मेरा काम नहीं है, मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूं, यह सवाल आप नक्सलियों से जाकर पूछिये।
सुभाष कहते हैं कि जनता ने वोट के रूप में अपनी शक्तियां सरकार को दे दी हैं और सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता की रक्षा करे। मैनें कहा कि सरकार ने सुरक्षा के लिए ही तो सलवा जुडूम कैंपों में सुरक्षा बल तैनात किये हैं। जवाब में वे कहते हैं कि आखिर कैम्प में क्यों आदिवासियों को रखा जा रहा है? क्यों नहीं उन्हें उनके गांव में रहने दिया जाता? मैंने कहा कि यदि सलवा जुडूम शिविरों से सुरक्षा हटा ली जाए तो क्या नक्सली गांव वापस जाने पर उन आदिवासियों को जिन्दा छोड़ेंगे? तब क्या आदिवासियों का मानवाधिकार हनन नहीं होगा? वे कहते हैं कि इस बात की क्या गारंटी है कि शिविरों में रहने पर पुलिसवाले इन लोगों को नहीं मारेंगे, उनका मानवाधिकार हनन नहीं करेंगे? वे कहते हैं कि सरकार और प्रशासन ने इस तरह की परिस्थितियों को पैदा किया हैं। आप आदिवासियों को सुरक्षा नहीं दे पाए, विकास नहीं किया जिसका आक्रोश नक्सलवाद के रूप में उभर कर आता है। वे कहते हैं कि व्यवस्था में भ्रष्टाचार है, इसलिए नक्सली टावर गिरा देते हैं। आप इसकी भी सुरक्षा नहीं कर पाते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या बिजली का टावर गिराने से बस्तर के करीब 20 लाख लोगों का मानवाधिकार हनन नहीं हुआ? इसका जवाब वे गोलमोल कर जाते हैं और कहते हैं कि इसकी परिस्थितियां सरकार ने ही पैदा की हैं।
जब उनसे सवाल किया कि सर्वहारा की वकालत करने वाले नक्सली आखिर उनकी आजीविका के एकमात्र साधन हाट बाजार को क्यों जला देते हैं, उनके गांवों को क्यों जला देते हैं, आंगनबाड़ियों और बाल आश्रमों को क्यों धवस्त कर देते हैं, क्या यह मानवाधिकार हनन नहीं है? सुभाष सीधे तौर पर इसके लिए सलवा जुडूम के नेता महेन्द्र कर्मा पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि `गांवों को तो ये नेता लोग जलवा रहे हैं, जिससे आदिवासियों को वहां से बाहर लाया जा सके।´ मैंने पूछा कि दूर दराज के गांवों में बसे करीब 60 हजार आदिवासी किसी नेता के कहने पर क्या इकट्ठा किये जा सकते हैं, जबकि उन्हें यह मालूम हो कि ऐसा करने पर वे नक्सलियों की बंदूक के निशाने पर आ जाएंगे? इस प्रश्न का वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं और कहते हैं कि लोगों को जर्बदस्ती कैंपों में लाया जा रहा है। लेकिन जब यह पूछा जाता है कि पुलिसकर्मी भी तो इस लड़ाई में मर रहा है, क्या उसका और उसके परिवार का कोई मानवाधिकार नहीं है? जवाब मिलता है `नहीं, पुलिस का कोई मानवाधिकार नहीं होता, वह तो ड्यूटी पर होता है, मानवाधिकार तो आम नागरिकों का होता है।" क्या हमें सुभाष महापात्र की बात मान लेनी चाहिए?
सुभाष सवाल उठाते हैं कि आपने सलवा जुडूम क्यों शुरु किया? कंधार का उदाहरण देते हुए वे "सेफ पैसेज" की भी बात करते हैं। पुलिस व्यवस्था पर आरोप लगाते हुए वे कहते हैं कि पुलिस भ्रष्ट है, यही कारण था कि नक्सलियों से लड़ने के लिए आए केपीएस गिल भी वापस लौट गए? लेकिन जब उनसे पूछा गया कि केपीएस गिल ने जिस तरह की कार्यवाही पंजाब में की थी, क्या वैसा ही बस्तर में भी हो सकता है? जवाब में सुभाष कहते हैं कि पुलिस को चाहिए की नक्सलियों को गिरफतार करे और कोर्ट में ट्रायल करवाए। अंत में सुभाष कहते हैं कि हो सकता है आप मेरी बातों का संदर्भ बदलकर प्रस्तुत कर दें, क्योंकि अक्सर ऐसा किया जाता है और हम भी ऐसा ही करते हैं। वे कहते हैं कि अगर आप ऐसा करते हैं तो मुझे खण्डन करना पड़ेगा। उस पल मुझे अपने पास टेपरिकार्डर न होने की कमी बेहद खली थी, क्योंकि उनकी इस बात से ऐसा लगा कि संभवत: वे मेरे लिखे को भी गलत ठहरा दें। ख़ैर जो भी हो, इस उठापटक का दुष्परिणाम आखिरकार आम आदिवासियों को ही भुगतना पड़ रहा है।
रविवार, 27 जुलाई 2008
वंचितों की वाणी और निःशक्तों का सहारा है दिग्दर्शिका
गुरुवार, 24 जुलाई 2008
पढ़ने लायक किताबें
पढ़ने लायक किताबें
- दलित मुद्दों पर डा। रामगोपाल सिंह की पुस्तक - विकल्प की तलाश
- चर्चित और विवादास्पद लेखों का संकलन श्री प्रभात झा की पुस्तक -जन गण मन
- हिन्दू संस्कारों का सरल उल्लेख करती श्री अनिल माधव दवे की पुस्तक - सृजन से विसर्जन तक
भोपाल। मध्यप्रदेश के रसूखदार और दबंग कुलपति डाॅ. कमलाकर सिंह के खिलाफ जांच शुरू हो गई है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कुछ दिन पहले ही जिस भोज मुक्त विश्वविद्यालय के भवन का लोकार्पण किया था, यह जांच उसी भवन से संबंधित है। भवन निर्माण में आर्थिक अनियमितताओं को लेकर कई शिकायतें हैं। जांच के घेरे में स्वयं विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. कमलाकर सिंह हैं। राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने कुलपति के अलावा विवि के इंजीनियर, दो फर्म व एक ठेकेदार के खिलाफ प्रारंभिक जांच के लिए शिकायत दर्ज की है। गौरतलब है कि भोज विश्वविद्यालय के भवन निर्माण में लगभग 25 करोड़ खर्च हुआ है। शासन के विभिन्न विभागों से भवन निर्माण की अनुमति न लेने और निर्माण कार्य में भारी अनियमितता बरतने के आरोप विश्वविद्यालय के मुखिया डाॅ. कमलाकर सिंह पर लग रहे हैं। जबलपुर के अधिवक्ता कमलेश द्विवेदी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि ठेका देने सहित अनेक कार्य गैर जिम्मेदाराना तरीके से किया गया है। भवन निर्माण के लिए जिस एजेंसी का चयन किया गया उसे अपात्र कहा जा रहा है। यह भी आरोप लगा है कि इस एजेंसी के चयन में गलत ढ़ंग से प्रक्रिया अपनाई गई। अपनी शिकायत में अधिवक्ता कमलेश द्विवेदी ने विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. कमलाकर सिंह सहित, इंजीनियर पंकज राय, केन्द्र सरकार के उद्यम नेशनल विल्डिंग कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन लिमिटेड दिल्ली (एनबीसीसी), ठेकेदार प्रकाश वाधवानी भोपाल, कार्नर प्वांट बड़ौदा तथा विश्वविद्यालय के संबंधित अधिकारियों के विरूद्ध मामला दजे करने की मांग की थी। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) को दस्तावेज उपलब्ध कराने में आना-कानी की जा रही है, लेकिन छात्र संगठनों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की अगुवाई में अनियमिततओं के खिलाफ लामबंदी कर रखी है। भोज मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. कमलाकर सिंह, कुलाधिपति डाॅ. बलराम जाखड़ की गले की हड्डी बन गए हैं। कमलाकर सिंह जब से कुलपति बने हैं, कोई न कोई विवाद उनके पीछे लगा ही है। इसके पूर्व वे बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल में कुलसचिव और यूजीसी के क्षेत्रीय कार्यालय में सदस्य सचिव रह चुके हैं। तब भी विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। डाॅ. कमलाकर सिंह के विरोधी, उनका नाम प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केन्द्र की यूपीए सरकार में मानव संसाधन मंत्री तथा कांग्रेस के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह के कृपापात्र के रूप में लेते हैं। कमलाकर सिंह इसे गर्व के साथ लोगों को बताते हैं। लेकिन, यही मंुहबोलपन राज्यपाल बलराम जाखड़ और अर्जुन सिंह के गले की हड्डी बना हुआ। मध्यप्रदेश शासन के मुखिया शिवराज सिंह चैहान भी इस मुद्दे पर पशोपेश में हैं। हालांकि, कुलपति मामले में राज्य शासन से अधिक राज्यपाल की भूमिका है। लेकिन प्रदेश शासन के मुखिया के नाते लंबी चुप्पी उनके लिए भी घातक हो सकती है। गौरतलब है कि कुलपति के भ्रष्टाचार के खिलाफ एबीवीपी ने मुहिम चलाई हुई है। एबीवीपी के क्षेत्रीय संगठन मंत्री विष्णुदत्त शर्मा लंबे समय से डाॅ. कमलाकर सिंह की कारगुजारियों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। राष्ट्रपति के भोपाल आगमन के दौरान उन्होंने एक दिवसीय महाउपवास और धरने का आयोजन किया। विद्यार्थी परिषद् के एक प्रतिनिधि मंडल ने राष्ट्रपति को ज्ञापन भी सौंपा। इस छात्र संगठन ने एक तरफ तो महामहिम का भोपाल में स्वागत किया, वहीं दूसरी ओर शिक्षा क्षेत्र मे भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर मैदान और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन भी। परिषद् के वरिष्ठ नेता विष्णुदत्त शर्मा ने यह कहते हुए डाॅ. कमलाकर सिंह के राष्ट्रपति के साथ मंचासीन होने का विरोध किया कि क्या ऐसा व्यक्ति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के साथ मंचासीन होगा जिसने फजी तरीके से पीएचडी की डिग्री प्राप्त की है। श्री शर्मा ने कहा, कमलाकर सिंह ने एक नहीं कई डिग्रियां गलत तरीके से अर्जित की हैं। वे उन्हीं गलत उपधियों के आधार पर कुलपति जैसे पद पर बैठे हैं। वे आज भी अनियमितताओं से बाज नहीं आ रहे हैं। भोज विश्वविद्यालय के नवनिर्मित भवन का करोड़ों का निर्माण बिना निविदा के किया गया है। भवन-निर्माण का नक्शा भी स्वीकृत नहीं कराया गया है। विद्यार्थी परिषद् ने कुलाधिपति और प्रदेश के मुख्यमंत्री को भी कटघरे में खड़ा किया। राष्ट्रपति के भोपाल प्रवास के दौरान आम जनता के लिए जारी एक पर्चे में परिषद् ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री से कई तीखे सवाल किए। उनसे पूछा गया कि राष्ट्रपति को कमलाकर सिंह पर लगे आरेापों की जानकारी पूर्व में ही क्यों नहीं दी गई ? मध्यप्रदेश में शिक्षा से जुड़े कई लोगों पर छोटे आरोप लगने के बावजूद उन पर कार्यवाई कर दी गई, लेकिन दोषी पाए जाने के बावजूद कमलाकर सिंह पर अभी तक कार्यवाई क्यों नहंीं की गई ? मध्यप्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सदस्य और पदाधिकारी रह चुके हैं। लेकिन, संगठन ने उन्हें भी बख्शा। मुख्यमंत्री से एबीवीपी ने पूछा है कि उनकी कथनी और करनी में अंतर क्यों है ? जिस व्यक्ति (डाॅ. कमलाकर सिंह) का विरोध संसद सदस्य रहते हुए किया, आज अधिकार मिलने पर वे उसके खिलाफ कार्यवाई क्यों नहीं कर रहे हैं ? कुलाधिपति और मुख्यमंत्री दोनों से परिषद् ने भ्रष्ट, उपाधि प्राप्त करने में नकल के आरोपी और अनैतिक व्यक्ति को संरक्षण न देने की मांग की है। वैसे तो परिषद् ने राष्ट्रपति को दिए ज्ञापन में मध्यप्रदेश की पूरी उच्च शिक्षा में ही भ्रष्टाचार और अनियमितता का कच्चा चिट्ठा रखा है, लेकिन कमलाकर सिंह और भोज विश्वविद्यालय का मामला अधिक संगीन है। वैसे तो कमलाकर सिंह भाजपा सरकार और संगठन में भी अपनी पहुंच का दावा करते हैं। संभव है उनके कुछ शुभचिंतक हों भी। लेकिन चुनाव के ऐन मौके पर कांग्रेस या भाजपा से कोई नेता उनकी तरफदारी करेगा यह तो मुश्किल ही है। उल्टे भजपा इसे भी एक मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। अब जबकि ईओडब्ल्यू की जांच शुरू हो गई है तो यह मामला और भी तूल पकड़ेगा। चर्चा सिर्फ कुलपति ही नहीं, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और राष्ट्रपति तक की होगी।
‘मेरा देश, मेरा जीवन’
एक स्वयंसेवक की आत्मकथा ‘मेरा देश, मेरा जीवन’ का भोपाल में लोकार्पण
भोपाल । आज आडवाणी पूर्व उप-प्रधानमंत्री कम, एक स्वयंसेवक अधिक दिख रहे थे। पूरे कार्यक्रम के दौरान वे भावुक भी हुए और भाव-विह्वल भी। संघ और संतों के सानिध्य में वे उत्साह और उर्जा से भरपूर दिख रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने अपने कठिन दौर का उल्लेख तो किया ही, अपने अनुभवों के आधार पर भविष्य का ताना-बाना भी प्रस्तुत कर दिया। मौका था उनकी किताब ‘माई कंट्री, माई लाईफ’’ के हिन्दी संस्करण ‘‘मेरा देश, मेरा जीवन’’ के लोकार्पण का। पूर्व उप प्रधानमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा का लोकार्पण श्री श्री रविशंकर और स्वामी रामदेव की उपस्थिति में हुआ। मूलतः अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘‘ माई कंट्री माई लाईफ’’ का हिन्दी संस्करण ‘‘मेरा देश, मेरा जीवन’’ के इस लोकार्पण कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी सहित पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान और वरिष्ठ पत्रकार तथा माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र उपस्थित थे। देश और दुनियाभर में विख्यात श्री श्री रविशंकर ने, आडवाणी जी आत्मकथा ‘मेरा देश, मेरा जीवन’ का लोकार्पण किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि यह मेरापन अगर देश के साथ जुड़ जाए तो सबका ही कल्याण हो। हमने न तो जीवन का अध्ययन किया है और नही देश के प्रति कोई अपनापन बचा है। आज आदर्श को अपराध माना जाने लगा है। उन्होंने कहा कि स्वार्थी की कोई आत्मकथा नहीं हो सकती। जो समाज और देश से जुड़ा है, उसी की आत्मकथा हो सकती है। जीवन और देश के लिए शांति और क्रांति दोनों को आवश्यक बताते हुए श्री श्री ने कहा कि अमरनाथ यात्रा के संदर्भ में जम्मू-कश्मीर में जो हो रहा है, वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। धार्मिक मामलों में किसी भी बात का निर्धारण करने का हक धार्मिक गुरूओं को है, कोई अन्य इसमें हस्तक्षेप न करें। जीवन में चारित्रिक श्रेष्ठता और आर्थिक शुचिता केउदाहरण हैं आडवाणीजी: सुरेश सोनीकार्यक्रम में अपना वक्तव्य देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी ने कहा कि इस लगभग हजार प्ृाष्ठों की पुस्तक का शीर्षक ही, इसका सूत्र है। लेखक पंक्तियों और वाक्यों के माध्यम से लिखता है, लेकिन वाक्यों और पंक्तियों के बीच भी बहुत कुछ छुपा होता है। इस पुस्तक के शीर्षक ‘मेरा देश, मेरा जीवन’ के बीच में ‘‘ही’’ शब्द छुपा हुआ है। वस्तुतः लेखन अपनी आत्मकथा के माध्यम से कहना चाहता है कि ‘मेरा देश ही मेरा जीवन है’। आडवाणी जी कोई इतिहासकार नहीं हैं, लेकिन लेखक जरूर हैं। ऐसा लेखक जो तटस्थ भाव से इतिहास के घटना प्रवाह को देख रहा है। ऐसा लेखक है जो प्रवाह का निर्माता भी है। यह इस पुस्तक का वैशिष्ट है। इस पुस्तक में भारत के अतीत वर्तमान और भविष्य का वर्णन है। जो बीता हुआ कल है वह सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है और आने वाले कल को प्रभावित करता है। इसी में उसकी सार्थकता है। इसलिए इस पुस्तक में बीता हुआ कल, आज और आने वाला कल भी है। यह पुस्तक आडवाणी जी के जन्म से आज तक का वृतांत है। अपने जीवन में संघ की भूमिका का भी उन्होंने बखूबी उल्लेख किया है। देश के प्रति एक असीम आत्मीयता, निःस्वार्थता, जीवन में शुचिता और जीवन मूल्यों के प्रति आग्रह जो तब संघ से मिला वो सब कुछ आज तक जीवन का अक्षुण्ण भाग बना हुआ है। आडवाणी जी ने अपनी पुस्तक में सच्ची और छद्म पंथनिपेक्षता का उल्लेख किया है। आज सच्ची और छद्म पंथनिरपेक्षता के बीच संघर्ष जारी है। पुस्तक में आडवाणी जी ने सामाजिक, राजनीतिक एवं अन्य क्षेत्रों में के शुचिता की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने अपने स्वयं के जीवन में भी सार्वजनिक और निजी जीवन में अन्तर नहीं रखा है। चारित्रिक श्रेष्ठता और आर्थिक शुचिता का उन्होंने उदाहरण प्रस्तुत किया है। वे संकुचित मन और अशिष्ट व्यवहार, आडवाणी जी के लिए दुःखदायी है। श्री सोनी ने कहा कि अगर ‘जीवन एक किताब है तो कृपया उसे पढ़िए।100 प्रतिशत मतदान अनिवार्य हो: बाबा रामदेवप्रख्यात योगगुरू स्वामी रामदेव जी ने अपने उद्बोधन में छुआछूत की अवधारणा पर प्रहार करते हुए कहा कि मैं छुआछूत को नहीं मानता। हम सभी संतों ने आध्यात्मिक क्षेत्र से जातिवाद को खत्म कर दिया है। फिर आडवाणी जी राजनीतिक क्षेत्र में काम करते हैं, इसलिए उन्हें अछूत क्या माना जाए। स्वामी रामदेव बाबा ने कहा कि मैं 80 वर्षीय आडवाणी जी में 18 वर्षीय युवा का जोश देखता हूं। उम्र से नहीं, विचारों में बुढ़ापा आ जाने से आदमी बूढ़ा होता है। राजनीति में रूचि लेने के आरोपों को निराधार बताते हुए रामदेव बाबा ने कहा कि सत्ता के सिंहासन से बड़ा दिल का सिंहासन है, देश के लोगों ने वह आसन मुझे पहले ही दे दिया है। अपने सपनों के भारत के बारे में बताते हुए बाबा रामदेव जी ने कहा कि मैंने स्वस्थ्य, समृद्ध और संस्कारवान भारत का सपना देखा है। इसी से गौरवशाली, समृद्धशाली और वैभवशाली भारत बनेगा। देश के राजनीतिज्ञों में पारदर्शिता, दूरदर्शिता, विनयशीलता और पराक्रमशीलता होनी चाहिए। आडवाणी जी इन सब गुणों से सम्पन्न हैं। आज सभी बातों को आडवाणी जी से जोड़कर देखा जा रहा है, इसी से यह लगता है कि उनमें कुछ खास बात तो है। आडवाणी जी जैसे व्यक्तित्व को तैयार करने के लिए देश को बहुत कुछ दांव पर लगाना पड़ता है। इस इस परिपक्व व्यक्तित्व से देश को कुछ लाभ तो उठाना ही चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश में देशभक्त, राष्ट्रवादी अच्छे और सच्चे लोगों का सम्मान और देशद्रोही लोगों का चाराहों पर अपमान होना चाहिए। आज दुनिया, भारत की ओर देख रही है। लेकिन भारत में आज वैचारिक विभ्रम की स्थिति है। धार्मिक यात्राओं को सांप्रदायिक रंग देना उचित नहीं है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। चीन जैसा कम्युनिस्ट देश भी तीर्थ यात्रियों के लिए आश्रम बनाने की सुविधा दे रहा है, लेकिन अपने ही देश में कैसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। पीडीपी को राष्ट्रद्रोही पार्टी करार देते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी देशभक्त के बुलावे का वे सहर्ष स्वीकार करेंगे, लेकिन पीडीपी जैसे राष्ट्रद्रोही के बुलावे को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। राजनीति, अर्थ, शिक्षा और अन्य सभी क्षेत्रों में स्वदेशी को अपनाने का आग्रह करते हुए बाबा रामदेव ने कहा कि हमें स्वदेशी का स्वाभिमान होना चाहिए। उन्होंने 100 प्रतिशत अनिवार्य मतदान का विशेष आग्रह किया। उन्होंने कहा कि अगर देश में राजनीतिक शुचिता लाना है तो इसे लागू करना ही होगा। वर्तमान और आने वाली सरकारों को इस दिशा में प्रयास करना चाहिए। ‘‘मेरा देश, मेरा जीवन’’ समसामयिक इतिहास का प्रमाणिक दस्तावेज है: शिवराज सिंह चैहानमध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने कहा कि आडवाणी जी के लिए भारत एक ऐश नहीं, उनका जीवन है। सरलता और सहजता, उन्हें महामानव बनाती है। यह पुस्तक समसामयिक इतिहास है, प्रमाणिक दस्तावेज है। यह सिर्फ स्मृति ग्रंथ नहीं, प्रकाश स्तंभ है। इसमें विकास और सुशासन की दृष्टि भी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत का उदय यानी सबका उदय है। आने वाला भारत सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का भारत होगा। सच्ची और छद्म पंथ-निरपेक्षता में संघर्ष चल रहा है - सुषमा स्वराजराज्यसभा सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने पुस्तक और आडवाणी जी के व्यक्तित्व दोनों पर टिप्पणी की। पुस्तक के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी अनुवाद में भी मूलभाव और भाषा का सौंदर्य बरकरार है। यह आत्मकथा नहीं आजादी के बाद भारत के उतार-चढ़ाव का आंखों देखा हाल है। इसमें भारत के सरोकार हैं और समस्याओं का समाधान भी। उन्होंने कहा कि आडवाणी जी ने भारतीय राजनीतिक शब्दकोष को अनेक शब्द दिए हैं। उन्हें भारतीय सामाजिक और राजनीतिक जीवन के अविराम पथिक की संज्ञा दी जा सकती है। विनम्रता उनका आभूषण है। आडवाणीजी राजनीतिक भविष्यवेत्ता भी हैं। श्रीमती स्वराज ने कहा कि हज सब्सिडी के रूप में प्रतिवर्ष करोड़ों रू. देने वाला देश 40 बीघे जमीन की दरकार क्यों नहीं कर सकता। आज सच्ची और छद्म पंथनिरपेक्षता में संघर्ष हो रहा है। इस संघर्ष के परिणाम पर ही भारत का भविष्य निर्भर करेगा। आडवाणीजी ने जोखिम भरा काम किया है - अच्युतानंद मिश्र पुस्तक लोकार्पण के अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह पुस्तक आडवाणीजी का देखा हुआ, सुना हुआ और भोगा हुआ यथार्थ है। आत्मकथा का लेखन जोखिम भरा होता है, लेकिन उन्होंने यह जोखिम उठाया। बेबाकी और सफाई से तथ्यों का उल्लेख किया है। अनुभूतियों और अनुभवों को पाठकों के साथ साझा किया है। अटलबिहारी वाजपेयी ने पार्टी के कानपुर अधिवेशन में आडवाणीजी को जनसंघ का दूसरा दीनदयाल उपाध्याय कहा था। उन्होंने अपने कर्तृत्व से इसे सिद्ध किया है। कहा कि ‘मेरा देश, मेरा जीवन’, आडवाणीजी की आत्मकथा जरूर है, लेकिन इसमें आडवाणीजी कहीं नहीं हैं। अमरनाथ श्राइन बोर्ड का मामला पूरे कार्यक्रम में छाया रहासभी वक्ताओं ने सरकार के कदम की आलोचना कीलोकार्पण कार्यक्रम में उपस्थित सभी वक्ताओं ने अपने-अपने अंदाज में अमरनाथ श्राइन बोर्ड का मामला उठाया। जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा श्राइन बोर्ड को दी गई 40 हेक्टेयर वन भूमि को वापस लेने का विरोध सभी ने किया। बाबा रामदेव, इस मुद्दे पर सबसे अधिक आक्रामक थे। उन्होंने सरकार के कदम को दुर्भाग्यपूर्ण ठहराया और पीडीपी को देशद्रोही की संज्ञा दी। आर्ट आॅफ लिविग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर ने कहा कि अमरनाथ यात्रा पर हंगामा होना दयनीय है। यह रवैया गलत है। किसी को अधिकार नहीं है कि वह यात्रा की अवधि निर्धारित करे। यह साधु-संतों और धार्मिक नेताओं का काम है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह सुरेश सोनी ने कहा कि अमरनाथ की घटना पर प्रधानमंत्री सहित कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है। यह भविष्य पर प्रश्नचिन्ह है।
मेरा जीवन जो कुछ भी है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वजह से है: आडवाणीपुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने अपने व्यक्तिव और जीवन की श्रेष्ठता का श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दिया। उन्होंने कहा कि मेरा जीवन जो कुछ भी है वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कारण है। उन्होंने कहा कि मेरी पुस्तक जो भी पढ़ेगा, वेा जानेगा कि मेरा जीवन जो कुछ भी है वह संघ की वजह से है। इसीलिए अंग्रेजी की पुस्तक के विमोचन के अवसर पर दिल्ली में संघ के सरकार्यवाह मोहनराव भागवत उपस्थित थे, और आज यहां सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी उपस्थित हैं। उन्होंने प्रख्यात पुस्तक ‘ए टेल आॅफ टू सिटीज’ का उल्लेख करते हुए ‘ए टेल आॅफ टू टेम्पल्स’, (सोमनाथ और अयोध्या का मंदिर) ‘ए टेल आॅफ टू इमरजेंसी’, ‘ए टेल आॅफ टू फैमिली’’ (संघ के रूप में वैचारिक परिवार और निजी परिवार) तथा ‘ए टेल आॅफ टू संत’’ (श्री श्री रविशंकर और बाबा स्वामी रामदेव ) की चर्चा भी की। भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री आडवाणी ने कहा कि जब उनकी प्रशंसा होती है तो वे भावुक हो उठते हैं, आंखे नम हो जाती हैं। कार्यक्रम के अंत में जब उनकी बेटी प्रतिभा आडवाणी आभार प्रकट कर रही थीं, उस दौरान उन्होंने अंग्रेजी की एक कविता ‘‘फुट प्रिंट’’ की पंक्तियों का उल्लेख किया। तभी श्री आडवाणी की आंखों में आंसू आ गए। सुश्री प्रतिभा आडवाणी ने बताया कि जब हवाला प्रकरण का भूचाल आया तब उन्होनें यह कविता अपने को पिता को भेंट की थी। कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। अंत में सुश्री प्रतिभा आडवाणी ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। इस कार्यक्रम में संत-महात्माओें के अलावा भाजपा के अनेक वरिष्ठ नेता पूर्व मुख्यमंत्री संुदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, सांसद प्यारेलाल खंडेलवाल, रघुनंदन शर्मा, प्रभात झा, सुमित्रा महाजन, सिद्धू आदि उपस्थित थे। मध्यप्रदेश शासन के अधिकांश मंत्री और विधायकों के अलावा विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, रमन सिंह, वीएस यदुरप्पा आदि उपस्थित थे।