गुरुवार, 19 अगस्त 2010

राम मंदिर पर मुसलमानों की रहस्यमयी चुप्पी


अनिल सौमित्र
रामजन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद पर फैसला आने ही वाला है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बहुप्रतीक्षित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुकदमे में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया है। उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा एवं न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल हैं। चूंकि न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा सितंबर के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसलिए माना जा रहा है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में फैसला सितंबर महीने के पूर्व कभी भी आ सकता है। लेकिन इस मसले पर आम मुसलमान और मुस्लिम संगठनों की चुप्पी रहस्यमय दिखती है। क्या यह तूफान के पहले की शांति है! उर्दू मीडिया ने पहले से ही कहना शुरु कर दिया है कि न्यायालय का निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में आ सकता है। इस मामले में मुस्लिम संगठनों के दोनों हाथों में लड्डू दिखता है। अगर निर्णय उनके पक्ष में आया तो वे नष्ट हो चुके जर्जर बाबरी मस्जिद ढांचे के स्थान पर भव्य मस्जिद की मांग सरकार के सामने रखेंगे। अगर हाईकोर्ट का निर्णय सुन्नी वक्फ बोर्ड के खिलाफ और हिन्दू पक्षकारों के पक्ष में हुआ तो क्या होगा? न्यायालय के निर्णय के संदर्भ में सबसे अहम बात तो यह है कि जिन संगठनों या व्यक्तियों की ओर से न्यायालय में पक्ष रखा जा रहा है क्या उन्हें अपने कौम का समर्थन और सहमति प्राप्त है? संभव है न्यायालय के निर्णय के बाद हिन्दुओं या मुसलमानों का कोई संगठन यह कह दे कि हमें निर्णय मंजूर नहीं, क्योंकि यह हमारे श्रद्धा-आस्था या अक़ीदत का मामला है। ये अलग बात है कि मुस्लिम संगठनों ने इसे अपनी इज्जत का मामला बना रखा है।
उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ वर्ष 1996 से इस विवाद की सुनवाई कर रही थी। मुकदमे में चार पक्षकार हैं। हिंदुओं की ओर से तीन पक्षकार हैं जिसमें एक प्रमुख पक्षकार विवादित परिसर में विराजमान रामलला स्वयं हैं। दूसरे श्री गोपाल सिंह विशारद और तीसरा निर्मोही अखाड़ा हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड पक्षकार है। गोपाल सिंह विशारद ने रामलला के एक भक्त के रूप में निर्बाध दर्शन-पूजन की अनुमति के लिए जनवरी,1950 ईस्वी में अपना मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में दायर किया था। वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़े ने अपना मुकदमा जिला अदालत में दायर कर अदालत से मांग की थी कि सरकारी रिसीवर हटाकर जन्मभूमि मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था का अधिकार अखाड़े को सौंपा जाय। दिसंबर, 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड अदालत में गया। बोर्ड ने अदालत से मांग की कि विवादित ढांचे को मस्जिद घोषित किया जाए, वहां से रामलला की मूर्ति और अन्य पूजा सामग्री हटाई जाएं तथा परिसर का कब्जा सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंपा जाए। जुलाई, 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री देवकीनंदन अग्रवाल ने एक भक्त के रूप में खुद को रामलला का अभिन्न मित्र घोषित करते हुए न्यायालय के समक्ष रामलला की ओर से वाद दाखिल किया। 40 साल तक मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में लंबित पड़ा रहा। शीघ्र सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय के आदेश से सभी मुकदमे सामुहिक सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को सौंपे गए। गौरतलब है कि राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से वर्ष 1993 में एक प्रश्न पूछा गया था कि क्या विवादित स्थल पर 1528 ईस्वी के पहले कभी कोई हिंदू मंदिर था अथवा नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उच्च न्यायालय ने विवादित परिसर की राडार तरंगों से फोटोग्राफी और पुरातात्विक खुदाई भी करवाई। जजों के सेवानिवृत्त होते रहने के कारण उच्च न्यायालय की विशेष पीठ का लगभग 13 बार पुनर्गठन हो चुका है। अंतिम पुनर्गठन 11 जनवरी, 2010 को हुआ।
इसी बीच 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा हिन्दुओं ने जमींदोज कर दिया। अक्तूबर, 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने विवाद के मामले में अंतिम निर्णय की सारी जिम्मेदारी उच्च न्यायालय के हवाले कर दी। तब से उच्च न्यायालय इस मामले की निरंतर सुनवाई कर रहा है। उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए विशेष अदालत का गठन कर संपूर्ण मामला दो हिंदू और एक मुस्लिम जज की पूर्ण पीठ के हवाले कर दिया। शायद इसके पीछे यह सोच रही हो कि मुसलमानों के साथ कोई अन्याय न हो जाये। इसीलिए एक मुसलमान जज भी पीठ में रखा गया।
हालांकि न्यायालय में सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाडा आमने-सामने है, लेकिन अदालत के बाहर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और विश्व हिन्दू परिषद् है। इनके अलावा भी हिन्दुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन हैं। आम हिन्दुओं को डर सता रहा है कि अदालत का फैसला खिलाफ आने पर आम मुसलमान किसकी सुनेगा, किसकी नहीं सुनेगा? मुस्लिम जनता हमेशा अपने कट्टर नेतृत्व का कहा ही मानती आई है। देश विभाजन के समय से लेकर शाहबानों, तस्लीमा, घुसपैठ, आतंकवाद समेत ऐसे अनेक मामले हैं जिन पर उदार मुस्लिम नेतृत्व को मुंह की खानी पड़ी है। आम मुसलमान कट्टर और रूढ़िवादी नेतृत्व की ही सुनता आया है। बंगलादेशी घुसपैठियों का मामला हो या आतंकी और आतंकी संगठनों को पनाह देने का मामला, आम मुसलमानों का सहयोग हमेशा इन्हें ही मिलता आया है। आज भले ही बाबरी एक्शन कमेटी के संयोजक और अदालत में मुसलमानों की तरफ से पैरवी कर रहे जफरयाब जिलानी और बाबरी एक्शन कमेटी के संस्थापक रह चुके जावेद हबीब न्यायालय का फैसला मानने और किसी आंदोलन के इरादे को नकार रहे हों, लेकिन क्या पता कल ‘हिन्दुओ के खिलाफ डायरेक्ट एक्शन’’ का फतवा या आह्वान आ जाये। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की हालत भले ही खराब हो चुकी हो, लेकिन इतनी भी खराब नहीं कि देश का मुसलमान उनकी बातों की अनदेखी कर दे। मुसलमानों के लिए देश के भीतर और बाहर संघर्ष करने वालों की कमी नहीं है। कांग्रेस समेत देश की सभी राजनैतिक पार्टियां, सरकारें, न्यायालय, मीडिया और अ-हिन्दू भारतीय सब मुसलमानों के प्रति जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हैं। मुसलमान अपनी मर्जी से न्यायालय का और न्यायाधीश का चयन कर सकता है। उसके लिए गुजरात का मामला दिल्ली में और मध्यप्रदेश का मामला मुम्बई में ले जाया जा सकता है। जो काम हिन्दुओं के लिए पूरा संघ परिवार नहीं कर सकता वह अकेले जफरयाब जिलानी कर सकते हैं, बखूबी कर रहे हैं। अगर मामला मुसलमानों से जुड़ा हो तो न्यायालय की सुनता कौन है? शाहबानों और अफजल का उदाहरण सबके सामने है। एक में कांग्रेस ने कानून बना कर सर्वोच्च न्यायालय को आइना दिखाया तो दूसरे में सजा का क्रियान्वयन ही रोक दिया। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर-फारुख अब्दुल्ला ने खुलेआम कहा कि अफजल को फांसी देने से कश्मीर के हालात बिगड़ सकते हैं।
पुराने अनुभव तो यही बताते हैं कि आम मुसलमान अपने कट्टरपंथी नेतृत्व के साथ पहले न्यायालय पर दबाव बनायेंगे, फैसला अनुकूल आया तो ठीक वर्ना कह देंगे- फैसला कूड़ेदान के लायक है। केन्द्र सरकार समेत अनेक आयोग उस कचरे को सुरक्षित करने के लिए कूड़ेदान की तलाश में लग जायेंगे। न्यायालय का फैसला न मानने के लिए ‘वोट की राजनीति’ का दबाव तो मुसलमानों के लिए हमेशा से उपलब्ध है ही। देश के प्रधानमंत्री भी ‘देश के संसाधनों’ पर मुसलमानों का पहला हक देकर उनके वोट पर अपना पहला और आखिरी हक अख्तियार करना चाहते हैं। उन्हें अपराध या आतंक के लिए आरोपी मत बनाइये, क्योंकि वे मुसलमान हैं। उन्हें न्यायालय में अपराधी या आतंकी सिद्ध करने का प्रयास मत कीजिये क्योंकि वे ‘‘बेचारे मुसलमान’‘ हैं। सजा सुनाये जाने के बाद भी उसे लागू मत कीजिये क्योंकि उससे अल्पसंख्यकों में तनाव पैदा होने, मानवाधिकार को चोट पहुंचने का खतरा है। अब हिन्दू बेचारा क्या करे। कब तक वह तथाकथित सेक्यूलर संविधान और न्याय व्यवस्था पर भरोसा करे। शायद इसीलिए विहिप ‘जनता के न्यायालय’ में जाने को विवश हुई हो। विहिप या संघ परिवार का प्रयास देश की जनता-जर्नादन को जागृत करने का है। ताकि इससे देश की राजनैतिक व्यवस्था पर कोई प्रभाव पड़े। संभव है ‘‘बहुसंख्यक दबाव की राजनीति’’ का कुछ असर हो जाये और राम मंदिर विवाद का समाधान जनता के सदन ‘संसद’ में हो जाये।
सच बात तो यह है कि न तो हिन्दुओं को चिढ़ाने या अनावश्यक जिद्द करने से मामला सुलझने वाला है और न ही मुसलमानों के तुष्टीकरण से। विभिन्न राजनैतिक दल अगर ईमानदार प्रयास करें तो अयोध्या विवाद का राजनैतिक हल निकल सकता है। इस मामले में मुसलमानों के उदार नेतृत्व को आगे आना ही होगा। पहल उन्हें ही करनी है। समस्या निराकरण नुख्सा उन्ही के पास है। अमन पसंद और विकास की चाहत रखने वाले राजनैतिक दल आगे आएं तो समस्या का निराकरण और भ्री आसान हो जायेगा। सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कर कांग्रेस और उनके नेताओं न एक नजीर पेश की है। अयोध्या समझदारी का दूसरा उदाहरण हो सकता है। कांग्रेस पहल करे, भाजपा और अन्य दल मदद करें- राम मंदिर की भव्यता का प्रश्न संसद से हल करें। यह शांति और भाइचारे का तकाजा भी है।
(लेखक पत्रकार और मीडिया एक्टिवीस्ट हैं)

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

तनाव के मूल कारण को पहचानें : डॉ. नागेन्द्र

तनाव के मूल कारण को पहचानें : डॉ. नागेन्द्र


भोपाल। 29 जंलाई। बढ़ते तनाव के उचित प्रबंधन के लिए हमें कारणों को समझना होगा। इसमें योग की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। यह विचार डॉ. एच.आर. नागेन्द्र ने ‘विज्ञान की बात सबके साथ’ अभियान के तहत आयोजित एक कार्यक्रम में व्यक्त किए। स्पंदन एवं पुलिस कल्याण केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में डॉ0 नागेन्द्र ने तनाव पबंधन एवं योग विषय पर चर्चा की। डॉ. नागेन्द्र हिन्दू यूनिवर्सिटी आॅफ अमेरिका के अध्यक्ष और स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान बैंगालूरू के कुलपति हैं।
स्पंदन एवं पुलिस कल्याण केन्द्र द्वारा आयोजित इस परिचर्चा में बोलते हुए डॉ. नागेन्द्र ने बताया कि तनाव के फलस्वरूप अनेक मनोकायिक रोग जैसे - डायविटीज, ब्लडप्रेशर, डिप्रेशन आदि होते हैं जिन्हे केवल दवाओं के द्वारा ठीक करना कारगर सिद्ध नहीं होता। इसके लिए हमें योग आधारित जीवन शैली को अपनाना होगा। विदेशों में योग के बारे में हो रहे अनुसंधानों का उल्लेख करते हुए डॉ. नागेन्द्र ने कहा कि अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस बात को माना जाने लगा है कि तनाव के बेहतर प्रबंधन के लिए योग अत्यन्त उपयोगी है। डॉ. नागेन्द्र ने परिचर्चा में योग के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब भी दिया।
कार्यक्रम का आयोजन टी.टी. नगर स्टेडियम के ध्यानचंद हॉल में हुआ। कार्यक्रम में पुलिस कल्याण केन्द्र की संरक्षिका श्रीमती रीता राउत, भोपाल आईजी श्री शैलेन्द्र श्रीवास्तव, आईजी इंटेलिजेंस श्रीमती अनुराधा शंकर, खेल एवं युवा कल्याण विभाग के संचालक श्री संजय चैधरी, डीआईजी राजेश गुप्ता, भोज वि.वि. के कुलपति एस.एस. सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता जी.के. छिब्बर के अलावा बड़ी संख्या में पुलिस अधिकारी और अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन श्रीमती आरती राव ने किया। स्पंदन संस्था के सचिव अनिल सौमित्र ने आभार प्रकट किया।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

हिन्दू आतंक पर एक और आलेख

Hindu terrorism doesn’t exist, but do we want one?
By - Rajeev Srinivasan

If you tell a lie big enough and keep repeating it, people will eventually come to believe it. The lie can be maintained only for such time as the state can shield the people from the political, economic and/or military consequences of the lie.

It thus becomes vitally important for the state to use all of its powers to repress dissent, for the truth is the mortal enemy of the lie, and thus by extension, the truth is the greatest enemy of the state.

Joseph Goebbels pithily described propaganda thus. And by this measure, there appears to be a conspiracy in India to propagate a certain set of views, and in Noam Chomsky's words, to "manufacture consent". Like the military-industrial complex in the US, there is a media-state nexus in India, whereby the mass media unquestioningly regurgitates the state's perspective.

A recent example is the fuss about a new Indian 'laptop' for $35. It is virtually impossible to get a large portable display for less than $50, and with the electronics and packaging, even if the software is free, there is no way the bill of materials can be less than $100. Yet the media swallows this story whole.

This is far from the most egregious example. Bafflingly, the media repeats the government's anodyne, statements that inflation will subside "in the next six months". This is ludicrous and has no rationale, yet mandarins mouth it regularly. But it is never challenged by the media; meanwhile, food inflation continues.

But the cravenness of the media is most evident when it comes to that pet project of the state, known as 'secularism'. The actual meaning of the term, which emerged in the context of the interference of the Catholic Church in the affairs of the state in medieval Europe, is that the state is fully indifferent to religion.

However, in India, so-called 'secularism' means precisely the opposite — the state looks upon every individual primarily based on his religion. For instance, the PM made the statement in December, 2006, that Muslims should have first rights to the resources of the country. This violates the Constitution, but it has become part of the accepted ethos through repetition.

The most blatant example of this propaganda is the current feeding frenzy about 'Hindu terror'. The fact is that there is practically no history of Hindu terror. Religious terrorism has traditionally been the monopoly of the Abrahamic traditions, including Communism. Monotheists by definition divide the world into 'us' and 'them', and demonise the Other, probably a necessary condition for terror.

Communist terrorists regularly massacre people in central India, West Bengal and Kerala. There was Jewish terrorism — the Stern gang in Palestine, which had as a member Yitzhak Shamir, later prime minister of Israel, comes to mind. There are many historical examples of Christian religious terrorism, going back to the liquidation of the Albigensians and other heretics around 345 CE, the horrors of the Spanish Inquisition (and especially the version in Goa), all the way to assassinations by radical anti-abortionists in the US.

The National Liberation Movement of Tripura is an explicitly Christian terrorist group, forcibly converting people. The National Socialist Council of Nagaland has unleashed terrorism in its pursuit of "Nagalim for Christ". The assassination of Swami Lakshmananda in Orissa, when his major 'sin' was that he was defending tribals against the depredations of Christian missionaries, is another example.

But clearly Islamic terrorism is the biggest example of religion-based terrorism today. Suicide bombings, the fatwas on Salman Rushdie and others, 9/11 and 26/11, the periodic bombings in many parts of India, college professor TJ Joseph's hand getting sliced off as retaliation for alleged blasphemy, all these are instances of Islamic religious terrorism. The terrorists themselves take pains to point out that their acts have religious sanction.

Compared to all this, there is no evidence whatsoever that there is Hindu terrorism. The so-called Malegaon blast case and other alleged instances of Hindu terrorism languish because of lack of evidence, although, those accused such, as Sadhvi Pragya, are also rotting away in jail. If there are incidents of Hindu violence, these are almost inevitably reactions to terrorism imposed on them.

The moral equivalence drawn between the Abrahmics' inherent tendency to violence and the non-existent Hindu or Indic terrorism is abhorrent. There is the Panchatantra story about the man with the goat and the three rogues. The rogues convince the gullible man, via the ruse of repeatedly telling him that he is carrying a dog, to abandon the goat, which of course was their original intent. The rogues in the media and the state are, through repeated assertion, convincing people of the 'fact' of Hindu terrorism. Do we want to make it a self-fulfilling prophesy?

मीडिया में आतंकवाद से सम्बन्धित यह आलेख दैनिक जागरण मे प्रकाशित हुआ है

हिन्दू आतंकवादी प्रमाणित करने का षड़यंत्र

-रमेश पतंगे
‘आज तक’ समाचार चैनल का आक्रोश अधिकांश दर्शकों ने देखा ही है। लोकतंत्र में प्रचार माध्यम यह एक चैथा स्तंभ होता है। यह स्तंभ सत्य का अन्वेषण करने वाला, किसी भी कीमत पर न बिकने वाला, निस्पृह एवं निरपेक्ष होना चाहिए। हमारे देश में लोकतंत्र के सभी स्तंभों की दशा दयनीय ही है। चैथा स्तंभ भी उसका अपवाद नहीं है। पैसा लेकर समाचार देना यह एक सामान्य सी बात हो गई है। मुंबई में एकाध नेता को अपना आलेख छपवाना हो तो प्रमुख समाचार पत्र दस लाख से शुरू होते हैं। किस खबर को देना और किसे नहीं इसके लिए भी सौदेबाजी चलती है। किसको सिर पर बिठाना और किसका मान मर्दन करना इसके लिए भी सौदेबाजी चलती है। इसलिए चैथे स्तंभ पर हमला याने लोकतंत्र पर हमला यह भाषा का प्रयोग ठीक नहीं, ‘आज तक’ के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। हिंसक घटना अनुचित है, उसका समर्थन किया ही नहीं जा सकता, कारण हिंसा, हिंसा को ही जन्म देती है यह एक शाश्वत सत्य है। इसलिए इस संदर्भ में यह घटना खराब है। परंतु ‘आज तक’ उसी लायक है और सत्य के नाम पर जो झूठ उसने दिखाया है उसने चैथे स्तंभ की प्रामाणिकता को रसातल पर पहुंचा दिया है।
टीवी टुडे के एंकर ‘सेफरन टेररिजम’ पर एक स्टोरी दे रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मा. श्री इन्द्रेश जी को दिखाते हुए बार-बार यह बताया जा रहा था कि वे अजमेर एवं मक्का मस्जिद के बम विस्फोट में प्रमुख आरोपी हैं। यह सुनकर वाकई सुनने वालों के खून में उबाल आ रहा था। एंकर यानी तोता। वह वही बोलता या दिखाता है जो उसका मालिक उसे कहता है। कारण वह सिर्फ नौकरी कर रहा होता है अपने पेट के लिए। इसलिए एक क्षण उस पर दया भी आती है। पेट के लिए मनुष्य का कितना अधः पतन हो सकता है यह हम टीवी पर देख सकते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दहशतगर्दी जारी है, यह टीवी टुडे चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था। और इसके लिए जो प्रमाण दिए वह स्तरहीन हास्यास्पद थे। पत्रकारिता के सामान्य मूल्यों के खिलाफ थे। कल श्रीमती सोनिया गांधी पर एक फिल्म तैयार की जा सकती है। इटली से भारत पर कब्जे के लिए वे क्या-क्या षड़यंत्र कर रही हैं। क्वात्रोची ने कितना पैसा दिया, कब दिया? कांग्रेेस के खास लोगों को कैसे खरीदा गया? दलितों का कैसे ईसाईकरण किया गया। पैसा लेकर एक एंकर यह फिल्म दिखाए तो उसकी क्या विश्वसनीयता रहेगी? समझदार आदमी कहेगा कि ऐसी फिल्म बनाने वाले को हंटर से पीटना चाहिए। टीवी टुडे इसी लायक है।
टीवी टुडे स्वयं होकर यह साहस नहीं कर सकता। उसे बुलवाने वाला कोई और हैै। हिन्दू आतंकवाद शब्द का पहला प्रयोग श्री शरद पवार ने 2009 के आम चुनाव में पहली बार किया था। मालेगांव बम विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा का नाम घसीटा गया। प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है पर इससे पहले ही उन्हें हिन्दू आतंकवादी प्रमाणित करने का षड़यंत्र जारी है। पवार का दल भले ही राष्ट्रवादी कांग्रेस के नाम से हो पर मूल रूप से वे कांग्रेसी ही है। कांग्रेसवाद क्या है यह हमें समझना चाहिए।
कांग्रेस ने देश विभाजन का जघन्य अपराध किया। देश के साथ विश्वासघात किया। कांग्रेस तो एक दो आम चुनाव के बाद स्वतः ही साफ हो जाती। पर इससे पहले ही नाथूराम गोडसे ने कांग्रेस को एक महाअस्त्र दे दिया। महात्मा गांधी की प्रतिमा मुस्लिमों के हितचिंतक के रूप में थी। गोडसे ने विभाजन के लिए प्रमुख दोषी जिéा के स्थल पर महात्मा गांधी की हत्या की। कांग्रेस ने इस दुर्भाग्यपूर्ण हत्या का राजनीतिक लाभ लेते हुए गांधी हत्या का आरोप संघ के ऊपर मढ़ दिया। साथ ही मुस्लिमों के मन में संघ के प्रति विद्वेष एवं कांग्रेस के प्रति सहानुभूति के बीज बो दिए। मुस्लिमों का रक्षण कांग्रेस ही कर सकती है ऐसा प्रचार किया। मुस्लिमों का वोट बैंक तैयार कर राज करने की नीति ही कांग्रेसवाद कहलाता है।
पं. नेहरू ने इसी नीति के तहत धारा 370 का प्रयोग शुरू किया। कश्मीर को स्वतंत्र दर्जा दिया गया। कश्मीर के लिए अलग ध्वज, अलग कानून एवं कश्मीर घाटी में हिन्दुओं की हत्या पर मौन, मुस्लिमों के लिए उदार आर्थिक पैकेज शुरू किए गए। इंदिरा गांधी ने इससे अलग कुछ नहीं किया। राजीव गांधी ने शाहबानों प्रकरण के लिए संविधान में ही संशोधन कर दिया। इसके बाद मुस्लिमों के तुष्टिकरण के और प्रयास शुरू किए। बात यहीं तक नहीं रूकी है। अब एक और चिंताजनक तथ्य यह है कि अब मुस्लिम आतंकियों का तुष्टिकरण प्रारंभ हो गया है। आतंकवाद पर पाकिस्तान से बातचीत जारी है। इसी तरह गौ हत्या बंद होनी चाहिए इस मांग को कांग्रेस महत्व नहीं देती है यही कांग्रेसवाद है।
सत्ता अगर चाहिए तो मुस्लिम वोट मिलने ही चाहिए। और मुस्लिम वोट पाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कठघरे मे खड़ा करना ही होगा। गांधी हत्या का विषय कई चुनावों तक चला। अब वो पीढ़ी गई। गांधीवाद भी आज अप्रासंगिक है। गांधीजी का उपयोग अब सिर्फ कर्मकांड के लिए है। कांग्रेस के नेता यह कर्मकांड पूर्ण करके स्वयं को गांधीवादी कहते हैं। गांधी जी का एक उपयोग और है वह है राष्ट्रवादियों के खिलाफ उनका प्रयोग करना।
इसके लिए हिन्दुओं को गाली देना आवश्यक है। उन्हें हिंसक बताना पड़ता है, मुस्लिम विरोधी बताना पड़ता है। शरद पवार ने इसीलिए वर्ष 2009 में मुस्लिम वोटों के लिए हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया और मुस्लिम वोट प्राप्त कर चुनावों में सफलता प्राप्त की।
टीवी टुडे ने 16 जुलाई को जो बचकानापन किया, वह दिखने में जितना बचकाना है उतना है नहीं। कांग्रेस की व्यूह रचना का एक भाग है। इसके लिए लोकतंत्र के चैथे खम्बे के साथ करोड़ों का सौदा भी हुआ होगा इसकी पूरी-पूरी संभावना है। अभी बिहार में चुनाव है। फिर उत्तर प्रदेश में बंगाल में और फिर पूरे देश में है। एक बात पर कोई विषय परिणाम नहीं देता है। चावल धीरे-धीरे पकते हैं। वोटों का चावल भी धीरे-धीरे ही पकेगा। हिन्दू वोटों की कांग्रेस को चिन्ता नहीं है। कांग्रेस को जातिगत वोटों की चिंता है। शरद पवार मराठा हिन्दू हैं पर हिन्दुओं के नेता नहीं हैं। वे भी ऐसा ही मानते हैं। इसलिए वे मराठा समाज और मुस्लिम वोट की चिंता करते हैं और सत्ता प्राप्त करते हैं। सत्ता का यह सरल सूत्र है।
इस सूत्र को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आज समग्र दृष्टिकोण के साथ सम्पूर्ण देश में लागू करने का आव्हान कर रहा है। संघ सत्ता की राजनीति नहीं करता। परंतु संघ के विचार से मत प्रभावित होते हैं। संघ जातिगत राजनीति को मान्यता नहीं देता। संघ पंथ भेद भी नहीं मानता। कारण धर्म एक ही है वह है सनातन धर्म। शेष सभी उपासना मार्ग हैं। प्रत्येक अपनी इच्छा के अनुरूप उपासना पद्धति का पालन करें।
यह संघ की मान्यता है। यह मान्यता जातिगत एवं पंथ आधारित वोटों की राजनीति के विरुद्ध आव्हान खड़ी करती है। संघ की आलोचना कौन करता है? संघ की आलोचना सर्वश्री दिग्विजय सिंह, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह, रामविलास पासवान, आदि नेता करते हैं जो स्वयं जातिगत या पंथ आधारित राजनीति करते हैं। धर्म पंथ आधारित राजनीति के स्थान पर हम इसे मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति भी कह सकते हैं। देशभर में ऐसे सत्ता केन्द्र संघ के विरुद्ध स्थान-स्थान पर खड़े हैं। सत्ता की सहायता से वे सीबीआई, एटीएस का दुरुपयोग कर संघ को बदनाम भी करते हैं।
संघ के सामने आव्हान की यह परिस्थिति इन दुष्ट प्रवृत्तियों ने निर्मित की है। थोड़ा विचार करें तो यह परिस्थिति आज ही निर्मित हुई है ऐसा नहीं है। संघ के खिलाफ संघर्ष उसकी स्थापना काल से ही है। संघ का स्वयंसेवक संघर्ष से घबराता भी नहीं है। कारण उसे मालूम है कि यह संघर्ष अधर्म के विरुद्ध धर्म का है। रावण प्रवृत्ति साधन संपन्न हैं। रावण रथी है तो राम विरथी है। पर राम तो धर्म के लिए संघर्ष कर रहे थे इसलिए उनकी विजय हुई।
गहराई में इस संघर्ष का विचार करें तो यह संघर्ष संघ विरुद्ध दुष्ट प्रवृत्ति का न होकर हिन्दू समाज में एवं हिन्दू समाज की दुष्ट प्रवृत्ति के बीच है। संघ के खिलाफ हमला मुल्ला मौलवी या फादर नहीं करते यह हमला अपने समाज के लोग ही करते हैं। आने वाले समय में सज्जन शक्ति को खड़ा होना ही पड़ेगा। इसे संगठित करना ही पड़ेगा। यह संघर्ष सभी मोर्चों पर है। प्रचार माध्यम भी एक ऐसा ही मोर्चा है तो दूसरा मोर्चा राजकीय है। एक मोर्चा सड़क पर है तो दूसरा न्यायालय है। एक मोर्चा बौद्धिक क्षेत्र का है तो दूसरा मोर्चा बाहुबल के स्तर पर भी है। सभी मोर्चों पर संघर्ष अटल है। ऐसे समय में संघ का एक गीत याद आता है। संकट की बेला है शत्रुओं ने घेरा है। हम अजेय राष्ट्र शक्ति संगठित करें। नगर, ग्राम डगर, डगर संघमंत्र दें।
अनुवाद अतुल तारे

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में उच्च न्यायालय ने किया फैसला सुरक्षित

लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बहुप्रतीक्षित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुकदमे में सुनवाई पूरी कर फैसला सुऱक्षित कर लिया है। उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के न्यायाधीश क्रमशः न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा एवं न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल हैं। चूंकि न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा सितंबर के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसलिए माना जा रहा है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में फैसला सितंबर महीने के पूर्व कभी भी आ सकता है।
अदालत ने संबंधित पक्षों के वकीलों को पहले ही निर्देशित कर दिया था कि वह हर हालत में आज ही अपनी बात पूरी कर लें। इसलिए अदालत ने लीक से हटकर सोमवार को सायं 7 बजे तक अपनी सुनवाई जारी ऱखी।
इसी के साथ अदालत ने सभी पक्षों को अपनी मौखिक जिरह लिखित रूप में प्रस्तुत करने के लिए अंतिम तारीख 30 जुलाई निर्धारित की है।
उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ वर्ष 1996 से इस विवाद की मौलिक सुनवाई कर रही थी। मुकदमे में चार पक्षकार हैं। हिंदुओं की ओर से तीन पक्षकार हैं जिसमें एक प्रमुख पक्षकार विवादित परिसर में विराजमान रामलला स्वयं हैं। शेष श्री गोपाल सिंह विशारद और निर्मोही अखाड़ा हैं, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड पक्षकार है।
उल्लेखनीय है कि गोपाल सिंह विशारद ने रामलला के एक भक्त के रूप में निर्बाध दर्शन-पूजन की अनुमति के लिए जनवरी, 1950 ईस्वी में अपना मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में दायर किया था। वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़े ने अपना मुकदमा जिला अदालत में दायर कर अदालत से मांग की थी कि सरकारी रिसीवर हटाकर जन्मभूमि मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था का अधिकार अखाड़े को सौंपा जाय। दिसंबर, 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड अदालत में गया। बोर्ड ने अदालत से मांग की कि विवादित ढांचे को मस्जिद घोषित किया जाए, वहां से रामलला की मूर्ति और अन्य पूजा सामग्री हटाई जाएं तथा परिसर का कब्जा सुन्नी वक्फ बोर्ड को सौंपा जाए।
जुलाई, 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीश श्री देवकीनंदन अग्रवाल ने एक भक्त के रूप में खुद को रामलला का अभिन्न मित्र घोषित करते हुए न्यायालय के समक्ष रामलला की ओर से वाद दाखिल किया। इस प्रकार रामजन्मभूमि के मुकदमे में रामलला स्वयं ही वादी बन गए। श्री अग्रवाल ने अपने वाद में कहा कि मेरे लिए तो जन्मभूमि स्थान ही देवता स्वरूप है। साथ ही कहा कि रामलला के विग्रह पर किसी का कब्जा नहीं हो सकता।
40 साल तक मुकदमा फैजाबाद जिला अदालत में लंबित पड़ा रहा। शीघ्र सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय के आदेश से सभी मुकदमे सामुहिक सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को सौंपे गए।
इसी बीच 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा कारसेवकों की उग्र भीड़ ने जमींदोज कर दिया। अक्तूबर 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने विवाद के मामले अंतिम निर्णय की सारी जिम्मेदारी ही उच्च न्यायालय के हवाले कर दी। तब से उच्च न्यायालय इस मामले की निरंतर सुनवाई कर रहा है। उच्च न्यायालय ने मामले की अबाध सुनवाई के लिए विशेष अदालत का गठन कर संपूर्ण मामला दो हिंदू और एक मुस्लिम जज की पूर्ण पीठ के हवाले कर दिया। उच्च न्यायालय ने मुकदमे से जुड़े सभी पक्षों के गवाहों के बयान सुने।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से वर्ष 1993 में एक प्रश्न पूछा गया था कि क्या विवादित स्थल पर 1528 ईस्वी के पहले कभी कोई हिंदू मंदिर था अथवा नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उच्च न्यायालय ने विवादित परिसर की राडार तरंगों से फोटोग्राफी और पुरातात्विक खुदाई भी करवाई।
जजों के सेवानिवृत्त होते रहने के कारण उच्च न्यायालय की विशेष पीठ का लगभग 13 बार पुनर्गठन हुआ। अंतिम पुनर्गठन 11 जनवरी, 2010 को हुआ।

शनिवार, 24 जुलाई 2010

लोकतंत्र की खातिर मीडिया भी अपनी जिम्मेदारी समझे

आजकल मीडिया में आतंकवाद, खासकर ‘हिन्दू आतंक’ चर्चा में है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि ‘हिन्दू आतंक’ मीडिया के कारण ही चर्चा में है। कई बार किसी खास मुद्दे और विषय पर चर्चा करते समय उस मुद्दे पर कम और उसके माध्यम पर अधिक चर्चा होने लगती है। कुछ ऐसा ही हुआ जब पिछले हफ्ते आजतक के सहयोगी चैनल ‘हेडलाइन्स टुडे’ ने स्टिंग आॅपरेशन दिखाने का दावा किया। बाद में इस चैनल के खिलाफ कुछ हजार लोगों ने प्रदर्शन किया। इन प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि इस चैनल ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर, कुछ लोगों की आपसी चर्चा या मीटिंग और उस चर्चा में कही गई बातों का हवाला देकर ‘हिन्दू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंक’ का सिद्धांत गढ़ने की कोशिश की। प्रदर्शन करने वाले इस बात से सख्त नाराज थे कि चैनल के इस ‘दोषारोपण कार्यक्रम’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके पदाधिकारियों के नाम का उल्लेख कर उन्हें आरोपित करने का प्रयास किया गया। कुछ प्रदर्शनकारी उस चैनल के कृत्य से इतने उद्वेलित और आवेशित थे कि उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अवहेलना कर दी। उन्होंने वहां के कुछ गमले, कुछ फर्नीचर और कांच के कुछ दरवाजों को तोड़ डाला। लेकिन हजारों की भीड़ ने जो कुछ किया उसका चयनित अंश ही मीडिया चैनलों ने दिखाया। जिस चैनल के खिलाफ प्रदर्शन हुआ उस चैनल ने भी प्रदर्शनकारियों को हिंसक, अलोकतांत्रिक और फासिस्ट तो बताया, लेकिन यह नहीं बताया कि इसमें कितनी जनहानि हुई, कितने लोग हिंसा के शिकार हुए और कितने करोड़ का नुकसान हुआ? अगर प्रदर्शन हिंसक ही था तो आजतक या हेडलाइंस चैनल हजारों की हिंसक भीड के आक्रमण से़ बर्बाद हो गया होगा। ऐसा कुछ अब तक पता नहीं चला है।
खैर चैनल के स्टिंग आॅपरेशन और उसके बाद हुए घटनाक्रम से कई बातें चर्चा योग्य बन गई। आखिर ये माध्यम क्या चाहते हैं? इनका उद्देश्य क्या है? वे मीडिया के ‘सूचना, शिक्षा और मनारंजन’ की उपादेयता को खतरे में क्यों डाल रहे हैं? दर्शक अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहा है कि उस स्टिंग आॅपरेशन से उसे किसी प्रकार की सूचना मिली, वह शिक्षित हो रहा है या उसका मनोरंजन हो रहा है! क्या उस स्टिंग आॅपरेशन से भगवा आतंक या हिन्दू आतंक का सिद्धांत स्थापित होता है या इस सिद्धांत को स्थापित करने के लिए यह स्टिंग आॅपरेशन किया गया? अव्वल तो वह स्टिंग आॅपरेशन था भी कि नहीं यह भी दर्शकों की समझ में नहीं आ रहा। अपने आॅपरेशन के बारे में बताते हुए स्वयं आॅपरेशनकर्ता ने खुलासा किया कि ‘हिन्दू आतंक’ को स्थापित करने वाला टेप बैठक में उपस्थित एक कथित हिन्दू आतंकी सरगना दयानंद पांडे की लैपटॉप के कैमरे से रिकॉर्ड किया गया था। टेप देखकर लगता है कि दयानंद ने चुपके से चोरी-चोरी उस चर्चा को रिकॉर्ड कर लिया था। तो सवाल लाजिमी है कि ये दयानंद किसके इशारे पर, किसके लिए काम कर रहा था? उसने चोरी का माल किसे उपलब्ध कराया! क्या हेडलाइंस टुडे ने दयानंद को उस स्टिंग आॅपरेशन के लिए पहले से ही तय कर लिया था या दयानंद ने बाद में उस चोरी के टेप को बेच दिया? या कि गिरफ्तारी के बाद दयानंद के लैपटॉप से अश्लील विडियो के साथ यह टेप भी जांच एजेंसियों को मिला और उसे हेडलाइंस ने जुगाड़ लिया और उसे ही अपना स्टिंग आॅपरेशन बता दिया! क्या यह सब दर्शकों के लिए इतना ही जरूरी था? पूर्व केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद ने टीआरपी और सरकारी विज्ञापन के बारे में इन दृश्य चैनलों की जद्दोजहद के बारे में जो कुछ बताया उससे तो यही लगता है कि ये स्टिंग आॅपरेशन मीडिया की जरूरत नहीं बल्कि मजबूरी है। ऐसे कार्यक्रमों से चैनल की टीआरपी बढ़ती है, वह चर्चा में आता है और उसके लिए विज्ञापन वसूली आसान हो जाता है।
मीडिया संस्थान को भी पैसा और पूंजी चाहिए। यह माध्यमों के अस्तित्व की पहली जरूरत है। यह पैसा और पूंजी भी इतनी बड़ी हो कि प्रतिस्पद्र्धा और सूचना-साम्राज्यवाद में उसे टिकाए रख सके। दर्शक और टीआरपी लिए आक्रामक, सनसनीखेज, आकर्षक, मनमोहक और उत्तेजक कार्यक्रम भी चाहिए। भले ही यह सब ‘सूचना, शिक्षा और मनोरंजन’ की कीमत पर ही क्यों न हो। समाचारों और कार्यक्रमों में एक खास नजरिया न हो तो दर्शक, श्रोता या पाठक आकर्षित नहीं होता। दर्शक बटोरने के चक्कर में दृश्य माध्यमों ने अपना उद्देश्य तो खो ही दिया अब वे दर्शकों का भरोसा भी खोने लगे हैं। आज कोई भी समाचार चैनल यह दावा नहीं कर सकता कि उसका कार्यक्रम दर्शकों को ‘सूचना, शिक्षा या मनोरंजन’ दे रहा है। समाचारों से मनोरंजन, हास्य कार्यक्रमों में सूचना और संगीत कार्यक्रमों से शिक्षा ढूंढने की नौबत आ गई है। चैनल बदलते जाओ-‘सूचना, शिक्षा या मनोरंजन’ ढूंढते रह जाओगे।
दृश्य माध्यमों के भारतीय दर्शक दुनिया के मुकाबले नये जरूर हैं, लेकिन इनके भीतर भी ‘दृश्य-साक्षरता’ और ‘दृश्य-शिक्षा’ विकसित हो चुकी है। दर्शकों का स्वतंत्र चिंतन कम भले ही हुआ हो, लेकिन उन्होंने अब भी स्वतंत्र रूप से सोचना और विचार करना बंद नहीं किया है। चाहे आजतक हो या हेडलाइंस टुडे या आइबीएन, स्टार न्यूज या कोई और भी चैनल, वह दर्शकों को अपने एकाधिकार-जाल में कैद नहीं कर सकता। अब दर्शक भी किसी एक चैनल या सिर्फ एक माध्यम को अंतिम सत्य मानने के लिए तैयार नहीं है। अब वह घटनाओं को, दृश्यों और उसकी व्याख्या को माध्यमों के परिपेक्ष्य के अलावा राजनैतिक परिपेक्ष्य में समझने की कोशिश करने लगा है। दर्शक अब यह समझने लगा है कि टीवी चैनल या दृश्य माध्यमों का परिपेक्ष्य मैनिपुलेशन और अद्र्धसत्य पर आधारित होता है। वह राजनीतिक हितों की पूर्ति करता है।
गौर करें तो मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसी मैनीपुलेशन और टीआरपी-विज्ञापन के खेल में लगा है। वह सूचना, शिक्षा और मनोरंजन को ताक पर रखकर वर्गीय, क्षेत्रीय, जातीय और सांप्रदायिक मुद्दों पद सनसनी और उत्तेजना पैदा करने की लगातार कोशिश में है।
मीडिया से संबंधित अनेक अध्ययनों में यह बात स्वीकार की गई है कि माध्यमों में हिंसा की बार-बार पुस्तुति अंततः हिंसक घटनाओं को मदद पहंुचाती है। हिंसा अगर माध्यमो में व्यापक रूप में अभिव्यक्ति पाती है तो इससे शांति या जागरुकता कम, हिंसा और दहशत को ही बल मिलता है। आम लोगों में आतंकवाद या हिंसा से लड़ने का भाव कम होने लगता है या खत्म हो जाता है। इस प्रकार का मीडिया कवरेज संक्रामक रोग की तरह है। तो हेडलाइंस टुडे या इसके जैसे अन्य चैनल आखिर क्या चाहते हैं? इन माध्यमों की मंशा क्या है? क्या देश हिन्दू आतंक के समर्थन या विरोध में उठ खड़ा हो, या कि हिन्दू आतंक के खिलाफ इस्लामी आतंक और अधिक आक्रामक हो जाये? क्या माध्यमों के स्टिंग आॅपरेशन से जांच एजेंसियों, न्यायालय या अन्य संगठनों को कोई लाभ हुआ है या हो रहा है? क्या ये माध्यम, ये चैनल हिन्दू आतंक के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में राजनैतिक माहौल बना रहे हैं? क्या संघ या हिन्दू संगठनों को डराने, सबक सिंखाने या उन्हें हतोत्साहित करने के लिए स्टिंग आॅपरेशन और उसके बाद के कार्यक्रम को अंजाम दिया गया था?
संभव है स्टिंग आॅपरेशन करने और कार्यक्रम निर्माण के पूर्व ही पूरी तैयारी कर ली गई हो। शायद हेडलाइंस टुडे और आजतक समूह को स्टिंग आॅपरेशन के बाद प्रदर्शन और प्रदर्शन के उग्र हो जाने का अंदेशा भी हो। फिर प्रदर्शन के बाद प्रदर्शन के तरीके, प्रदर्शनकारी और एक विशेष संगठन पर पूरा कार्यक्रम फोकस कर दिया गया। सवाल यह भी है कि स्टिंग आॅपरेशन सुनियोजित था या मीडिया ने जो किया वह सुनियोजित था? आखिर इन दोनों ‘सुनियोजित’ घटनाओं को देखने से देश की जनता का क्या और कितना भला हुआ? मीडिया सिर्फ पैसे, पूंजी और टीआरपी-विज्ञापन के लिए ही नहीं सामाजिक दायित्व के निर्वहन के लिए भी है। लोकतंत्र में आरएसएस या कोई भी राजनीतिक-सामाजिक संगठन देश के प्रति जिम्मेदार और जवाबदेह है, मीडिया भी तो अपनी जिम्मेदारी समझे।
अनिल सौमित्र
(लेखक पत्रकार और मीडिया एक्टिीविस्ट हैं)
जयकृष्ण गौड़
दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी आरोप लगाए हैं। स्वयं हिंदू होते हुए भी कांग्रेस और अन्य कथित सेक्यूलर नेताओं ने हिंदू आतंकवाद शब्द का प्रयोग प्रारंभ किया है। आतंकवादियों का संगठित गिरोह होता है,वे हिंसा में विश्वास करते हैं,लेकिन जिन्होंने हिंदुत्व की अवधारणा का अध्ययन किया है,उसमें आतंकवाद या हिंसा का कोई स्थान नहीं है। सर्वोच्य न्यायालय ने भी अपने निर्णय में कहा था कि हिंदूत्व एक जीवन पद्धति है। हिंदू आतंकवाद शब्द का प्रयोग राजनैमिक दृष्टि से किया जाता है। जेहादी आतंकवाद के समक्ष इस शब्द को प्रयोग कर मुस्लिम मतों को प्रभावित करने की नीतिगत राजनीति है। जो हिंदू आतंकवाद का भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में करीब नब्बे प्रतिशत हिंदू,भारत में की सनातन पहचान हिंदूराष्ट्र के नाते है। यहां कि संस्कृति,परंपरा ओर जीवन मूल्य हिंदूत्व की अवधारणा के अनुकूल हैं। जो लोग हिंदू आतंकवाद का भ्रम फैलाकर अपनी राजनैतिक रोटी सेंकना चाहते हैं,वे यह भूल जाते हैं कि वे पूरी राष्ट्रीय कौम को बदनाम कर रहे है। वे भारत की आत्मा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इस प्रकार के शब्द प्रयो से न केवल हिंदू को बदनाम करने की साजिश है,बल्कि इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय समाज की छवि खराब होगी।
हिंदू संगठनों को आतंकवादी कार्रवाई में लिप्त होने के आरोप में दिग्विजय सिंह ने लगाए हैं,इसमें उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम लिया है। कुछ लोग मांलेगांव,अजमेर,हैदाबाद के विस्फोटों में के सिलसिले में पकडाएं हैं,उनका सरोकार संघ से है,इस आरोप का खंडन संघ का केंद्रीय नेतृत्व कर चुका है।जो कुछ लोग पकड़ाएं है उनका संबंध संघ से नहीं है। संघ की कार्यपद्धति की थोड़ी जानकारी दिग्विजय सिंह को भी होगी। उनके परिवार का भी संघ से सरोकार रहा है। संघ की कार्य दिशा एक खुली किताब है।
हिंदूओं को संस्कारित करने और संगठित करने की दृष्टि से डॉ. हेडगेवार ने सन् 1925 में संघ की स्थापना की। संघ शाखाओं पर देश भक्ति की घुट्टी पिलाई जाती है। देश और समाज के लिए पूरा जीवन समर्पित करने की प्रेरणा दी जाती है। तेरा वैभव अमर रहे मां,हम दिन चार रहें या न रहें’ इस प्रकार के गीत स्वयंसेवक गाते हैं। प्रचार-प्रसार से दूर रहकर संघ अपनी साधना में लगा हुआ है। संघ को भी राजनीति में घसीटने का पाप दिग्विजय सिंह जैसे नेता कर रहे हैं। शुचिता,देशभक्ति,और राष्ट्र के प्रति जीवन का समर्पण,संघ की कार्यपद्धति में ही दिखाई देगा।
संघ पर जितने भी आरोप लगे,वे न्यायालय द्वारा निराधार सिद्व हुए। तत्कालीन नेहरू सरकार ने संघ पर गांधी जी की हत्या का झूठा आरोप लगाय। संघ के खिलाफ चलाए जा रहे निंदा अभियान का अंत नहीं हुआ। करीब दो दशक बाद इंदिरा सरकार ने 1966 में महात्मा गांधी की हत्या की जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित किया। इस आयोग के अध्यक्ष थे सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जे एल कपूर। वर्ष 1969 में आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित हुई उसमें कहा गया कि आरोपियों का संघ का सदस्य होना साबित नहीं होता है और न ही हत्या में संगठन का हाथ होना पाया गया है। आयोग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दिल्ली में भी ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है कि एक संगठन के रूप मे संघ महात्मा गांधी या कांग्रेस के अन्य नेताओं के खिलाफ गतिविधियों में लिप्त था। हम सच्चाई के बाद भी कथित सेक्यूलर और विशेषकर कम्यूनिष्ट संघ को बदनाम करने की कोशिश करते रहे हैं। दंगों के आरोप में संघ को बदनाम करने करने की सजिश चलती रही है। एक भी दंगे में संघ पर लगाए आरोप सिद्व नहीं हो सके हैं। संघ के द्वारा तो मुस्लिम वतनपरस्ती की चेतना जागृत करने का अभियान चलाया जा रहा.

शनिवार, 17 जुलाई 2010

हिन्दू सहिष्णुता की ऐसी परीक्षा भी जायज नहीं


यह सच हो सकता है कि इतिहास के किसी कालखंड में हिन्दू पिटे हों, यह भी संभव है कि कुछ वर्षों तक, दशकों तक वे लगातार मार खाते, मरते-कटते और लांछित होते रहे होंं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हिन्दुओं और हिन्दू संगठनों को उनकी सहिष्णुता के नाम जब चाहे, जो चाहे और जबतक चाहे लतियाते-गलियाते रहे। एक हद तक यह सही है कि हिन्दू संगठन जातियों, वर्ग और मत-संप्रदायों में बंटा है। उसमें मुसलमानों और इसाइयों की तरह एका और संगठन का अभाव है। लेकिन गालियां, लांछन और आरोपों को सुनना, सहना और सहते रहना उसकी नियति तो नहीं। सब्र की भी इन्तहां होती है। हिन्दुओं के पिटने, लांछित होने और गालियां सुनने की परंपरा-सी हो गई है। जो चाहे, जब चाहे हिन्दुओं को अपना शिकार बना ले और उसे सब्र, सहिष्णुता और अहिंसा का पाठ पढा दे, धैर्य रखने की नसीहत दे जाए!
हेडलाइन्स टुडे ने 15 जुलाई को संघ, हिन्दू संगठनों और हिन्दुओं को आरोपित करने वाला स्टिंग आॅपरेशन दिखाया है। कुछ लोगों ने इसके खिलाफ हेडलाइन्स टुडे के मुख्य समाचार चैनल आजतक के कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया। इन प्रदर्शनकारियों में से कुछ ने तोड़-फोड़ कर दी। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तोड़-फोड़ की घटना को अनुचित बताते हुए यह कहा है कि संघ के कार्यकर्ता वहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए गए थे। प्रदर्शन के बाद अगर कोई तोड़-फोड की घटना हुई है तो ऐसा नहीं होना चाहिए। इससे संघ का कोई लेना-देना नहीं है। हांलांकि हेडलाइन्स टुडे और आजतक चैनल लगातार प्रदर्शन की बजाए और तोड़-फोड़ के ही फुटेज दिखाता रहा। उसके संवाददाता और न्यूज एंकर गला फाड़-फाड़कर प्रदर्शनकारियों, संघ और हिन्दू संगठनों की निदा कर और करा रहे थे। ढूंढ-ढूंढकर हिन्दू विरोधी, संघ विरोधी नेता और संगठन लाए गए। संघ को प्रतिबंधित करने की मांग की जा रही है। लालू, रामविलास, वृंदा करात से लेकर दिग्विजय सिंह, राजीव शुक्ल जैसे सबके सब नेताओं को लोकतंत्र की याद आ गई। आपातकाल में कांग्रेसी और सरकारी आतंक झेल चुका मीडिया अगर अपने और जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में कांग्रेस के नेताओं से बयान लेता है तो यह हास्यास्पद ही है।
हिन्दू आतंकवाद’‘ के जुमले की शुरुआत मालेगांव विस्फोट की अचनाक शुरु हुई तफसिश से हुई। गौरतलब है कि 29 सितंबर, 2008 को रमजान के महीने में मालेगांव में हुए बम धमाके में 6 लोग मारे गए थे और 20 जख्मी हुए थे। महाराष्ट्र आतंक निरोधक दस्ते ने इस कांड के आरोपियों के संबंध दक्षिपंथी संगठन अभिनव भारत से होने की बात कही थी। जब हिन्दुओं को फंसाने का सिलसिला शुरू हुआ तो पहले कहा गया कि साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर इस विसफोट की मास्टर मांइड है, फिर कहा गया कर्नल पुरोहित मास्टर मांइड है,ं फिर दयानन्द पांडे को मास्टर माइंड बताया गया। तब स ेअब तक इस विस्फोट के न जाने कितने मास्टर माइंड बताये गए। रामजी कालसांगरा से लेकर संदीप डांगे और सुनील जोशी तक मास्टर माइंड बने। अब इतने समय बाद इस विस्फोट के मास्टर माइंड स्वामी आसीमानन्द बताये जा रहे हैंं। मास्टर माइंड के नामों में कुछ और नाम जुड़ गए - देवेन्द्र गुप्ता, लोकेश शर्मा और चन्द्रशेखर। ये दोनों संघ से जुडे हैं। इनसे सीबीआई और एटीएस ने पूछताछ की और संघ के दो और वरिष्ठ प्रचारकों का नाम उछाला गया। उत्तरप्रदेश से संबंधित संघ के वरिष्ठ प्रचारक अशोक बेरी और अशोक वाष्णेय से भी पूछताछ की गई। लेकिन पूछताछ और जांच में सहयोग को भी ऐसे लिखा गया जैसे ये लोग भी आतंकी गतिविधियों में शामिल हैं। एक बम विस्फोट और इतने मास्टर माइंड! धन्य है हिन्दू समाज।
जांच में अभिनव भारत और राष्ट्र चेतना मंच को आरोपित करते-करते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक आ पहुंचे। कभी आरोपियों को आइएसआई का एजेंट बताया गया तो कभी संघ के प्रचारक और वरिष्ठ कार्यकर्ता इन्द्रेश कुमार का संबंध आईएसआई से जोड़ा गया। बीच में एक और शगूफा छोडा - आरोपी दयानंद पांडे और कर्नल पुरोहित आरएसएस के प्रमुख मोहनराव भागवत को मारना चाहते थे। यह बात जब किसी को हजम नहीं हुई तो मीडिया और जांच एजेंसियों के सहारे हिन्दू आतंकवाद का नारा बुलंद किया गया। जब जांच चल रही है, एजेंसियां और न्यायालय अपना काम कर रहे हैं फिर ये मीडिया ट्रायल कैसी! वह भी खबरे बिना सिर और पैर की जो सूत्रों के हवाले से दी जा रही है। न तथ्य का पता है और न ही स्रोत का, लेकिन हिन्दू आतंकवाद और भगवा आतंक का हौआ सिरचढ़ कर बोल रहा है। हद तो तब हो गई जब मुम्बई में हुए आतंकी हमले में संघ और इज्ररायल की खुफिया एजेंसी मोसाद का हाथ बताया गया। इस आतंकी वारदात में मुम्बई एटीएस चीफ हेमंत करकरे आतंकियों के हाथों मारे गए, को लेकिन कुछ लोगों ने इसमें भी संघ को नामजद करने की कोशिश की। कुल मिलाकर एक काल्पनिक कहानी खड़ी करने का एक गंभीर षडयन्त्र।
याद कीजिए जब माओवादियों से संबंध और उन्हें सहयोग देने के आरोप में छत्तीसगढ़ पुलिस ने विनायक सेन को गिरफ्तार किया था, तब क्या हुआ था। देश और दुनिया के सैकड़ों बुद्धिजीवी सड़कों पर आ गए थे। दुनिया से सैकड़ों ई-मेल संदेश विनायक सेन के समर्थन में आए। सरकार और न्यायालय पद इस कदर दबाव बनाया गया कि अंततः विनायक सेन को जेल से रिहा करना पड़ा। लेकिन साध्वी प्रज्ञा के मामाले में क्या हुआ! हाल ही में मारे गए माओवादियों के दूसरे नंबर के कॉमरेड आजाद के सिर पर 12 लाख का इनाम और मालेगांव में आरोपित संदीप डांगे और रामजी कालसंागरा के सिर पर भी 10-10 लाख का इनाम। किसे खुश करना चाहती है महाराष्ट्र की एटीएस! आजाद पर कितने और कौन-कौन से मामले थे, ये संदीप और रामजी पर कितने और कौन-कौन से मामले हैं? इसरत जहां के मामले में कितनी हाय-तौबा, सबसे बड़े सक्यूलर पत्रकार पुण्यप्रसून को गलत रिर्पोर्टिंग के लिए माफी मांगनी पड़ी। लेकिन साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी और उसे थर्ड डिग्री यातना देने पर कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं। क्या महिलावादी, क्या मानवाधिकार वादी सब चुप्प! क्या यह चुप्पी खतरनाक और दोगली नहीं है!
अब जबकि पब्लिक कांग्रेस का षडयंत्र जानने लगी है तो हिन्दू आतंकवाद के कुछ और तथाकथित सबूत पेश किए जा रहे हैंं। कोई आरपी सिंह, बीएल शर्मा प्रेम और दयानंद पांडे को एक मीटिंग के दौरान मुसलमानों को सबक सिखाने की बात करते दिखाया-सुनाया सुनाया गया। ऐसे सैकड़ों टेप मिल जायेंगे जहां बैठकों में इस तरह के सुझाव आते हैं, उसे भी दिखाइए टीवी पर। क्या कोई भी गंभीर संगठन कोई कोई गोपनीय योजना बनाते हुए उसकी विडियो रिकॉर्डिंग करवाता है! तो क्या दयानंद पांडे, समीर कुलकर्णी, कर्नल प्रसाद पुरोहित या ऐसे ही गिरफ्तार किए गए लोगों में से कुछ लोग किसी बड़े सरकारी षड्यंत्र के हिस्सेदार हैं! हेडलाइंस टुडे के ही स्टिंग आॅपरेशन के बारे में बताया गया कि वह विडियो टेप दयानंद पांडे के लैपटॉप से लिया गया है। संभव है दयानंद पांडे ने अपने लैपटॉप के कैमरे से बिना किसी को बताये किसी गुप्त योजना के तहत बैठक को रिकॉर्ड किया हो। तो ये पांडे या समीर कुलकर्णी जिसके बारे में न तो एटीएस चर्चा कर रही है और न ही सीबीआई वह किसी देशी-विदेशी खुफिया एजेंसी के लिए काम कर रहा हो। बीएल शर्मा प्रेम ने भी क्या गलत कह दिया! साधु के ही नही हर एक हिन्दू और हर एक राष्ट्रभक्त के दिल में अपने शोंषण और तिरस्कार के खिलाफ ज्वाला धधक रही है। आतंकवाद, मतान्तरण, सांप्रदायिक आरक्षण, घुसपैठ और कई क्षेत्रों से हिन्दुओं का पलायन नहीं रूका तो ये धधक रही ज्वाला तेज ही होगी।
साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत लगभग 27 हिन्दुओं को म पर गिरफ्तार कर यातनायें दी रही है। लेकिन अफजल को फांसी की सजा देने के बाद भी कार्यवाई नही की जा रही। बटला हाउस में हुए इनकाउंटर जिसमें पुलिए के एक अफसर हेमंत शर्मा की आतंकियों ने हत्या कर दी, दसकी जांच की मांग कांगेस के ही नेता कर रहे हैंं। इस्लामिक आतंक ओर घुसपैठ जैस मसले पर नरमी और हिन्दुओं पर गर्मी जायज नही। इस्लामी आतंकवाद के सामने हिन्दू आतंकवाद का शिगूफा दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कुछ कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे आरएसएस को भी लपेटने के चक्कर में हैं, जिसकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते। कांग्रेस षड्यंत्र का सच बनाने की कवायद में है। इसमें हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स के प्रचार सिद्धांत का सहारा लिया जा रहा है। एक काल्पनिक बात को कई बार, बार-बार और कई तरीके से बोलने से वह सच जैसे लगने लगता है। मीडिया भी सच, वास्तविकता और छवि निर्माण के इस खेल में जाने-अंजाने कांग्रेस के षडयंत्र का शिकार है।
संभव है टीआरपी और विज्ञापन का लोभ मीडिया की मजबूरी हो। इसी कारण वह कांग्रेस के षड्यंत्र में भागीदार हो गई हो। लेकिन एक चैनल या एक अखबार की गलती या मजबूरी का नुकसान पूरी मीडिया बिरादरी को हो सकता है। कांग्रेस की ही तरह मीडिया की विश्वसनीयता दांव पद लग गई तो क्या होगा!
हिन्दू लगातार मुस्लिम आक्रमणकारियों के निशाने पर रहे हैं. याद कीजिए इतिहास के पन्ने जब तैमूर ने एक ही दिन में एक लाख हिन्दुओं का कत्लआम कर दिया था. इसी तरह पुर्तगाली मिशनरियों ने गोआ के बहुत सारे ब्राह्मणों को सलीब पर टांग दिया था. तब से हिन्दुओं पर धार्मिक आधार पर जो हमला शुरू हुआ वह आज तक जारी है. देश की जाजादी के वक्त कश्मीर में कितने हिन्दू थे, आज कितने बचे हैं? हिन्दुओं ने कश्मीर क्यों छोड़ दिया? किन लोगों ने उन्हें कश्मीर छोड़ने पर मजबूर किया? हिन्दू पवित्र तीर्थ अमरनाथ और वैष्णव देवी की यात्रा के लिए सरकार को जजिया कर देने को बाध्य है, जबकि इसी देश में मुसलमानों को हज के नाम पर करोड़ों अनुदान और सब्सिडी दी जाती है। कंधमाल में एक वृद्ध संन्यासी की हत्या कर दी जाती है, लेकिन इसपर भारतीय मीडिया कुछ बोलने की बजाए ईसाई उत्पीड़न की खबरे देता है। गुजरात के गोधरा में हुई हिन्दुओं के नरसंहार को भूल मीडिया ने नरेन्द्र मोदी को हत्यारा सिद्ध करने में अपनी सारी शक्ति लगा दी।
हिन्दू हमेशा से सहिष्णु और आध्यात्मिक रहा है। हिन्दुओं के बीच काम करने वाले संगठन भी इसी विचार और सिद्धांत से प्रेरित हैं। लेकिन वर्षोंं से दबाये और सताये गए हि जा सकता हिन्दू अब दमन, अपमान और दोयम दर्जे के व्यवहार से क्षुब्ध है। हिन्दुओं ओर हिन्दू संगठनों में अकुलाहट स्वाभाविक है। संभव है इस समाज और इन संगठनों में ऐसा वर्ग ऐसा पैदा हो जाये जो हमलावरों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर व्यापक हिन्दू समाज ने अपने स्तर पर आतंकी घटनाओं और हमलों के जवाब देने शुरू कर दिये तो क्या होगा? आज दुनिया में करीब एक अरब हिन्दू हैं, यानी हर छठा इंसान हिन्दू धर्म को माननेवाला है। फिर भी सबसे शांत और संयत समाज अगर आपको कहीं दिखाई देता है तो वह हिन्दू समाज ही है. ऐसे हिन्दू समाज को आतंकवादी ठहराकर कांग्रेस क्या हासिल करना चाहती हैं? क्या हिन्दुओं और हिन्दू संगठनों की ही सहिष्णुता और धैर्य की परीक्षा जायज है? स्पन्दन फीचर्स.
अनिल सौमित्र
(लेखक पत्रकार और मीडिया एक्टीविस्ट हैं)

हेडलाइंस टुडे के खिलाफ संघ का प्रदर्शन


विडियोकॉन टॉवर से आँखों देखी

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने शुक्रवार को टीवी टुडे समूह से जुडे़ न्यूज चैनल आज तक एवं हेडलाइंस टुडे और एक अंग्रेजी समाचार पत्र मेल टुडे के खिलाफ जमकर प्रदर्शन और नारेबाजी की। संघ कार्यकर्ताओं ने आज तक और हेडलाइंस टुडे को हिंदू विरोधी चैनल बताते हुए चैनलों के खिलाफ अपने रोष का लोकतांत्रिक ढंग से प्रदर्शन किया।

विडियोकॉन टॉवर के प्रवेश द्वार में घुसते समय हुई धक्का-मुक्की और पुलिस के साथ झड़प की घटना को छोड़कर प्रदर्शन शांतिपूर्ण और अहिंसक रहा। किसी भी कार्यकर्ता के हाथ में न तो डण्डे थे और न ही लाठियां। निहत्थे सैंकड़ों कार्यकर्ताओं ने टीवी टुडे समूह के समाचार चैनलों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिल्ली के प्रांत संघचालक श्री रमेश प्रकाश, सह प्रांत संघचालक श्री श्यामसुंदर अग्रवाल के नेतृत्व में करीब एक हजार कार्यकर्ताओं के जुलूस ने सायंकाल विडियोकॉन टावर स्थित हेडलाइंस टुडे के कार्यालय के भूतल स्थित मुख्यद्वार के बाहर एकत्रित होकर नारेबाजी शुरू की। कार्यकर्ताओं ने अपने हाथों में तख्तियां ले रखीं थीं जिन पर चैनल विरोधी नारे लिखे हुए थे।

‘हेडलाइंस टुडे हाय-हाय’, वंदे मातरम, भारत माता की जय, आर.एस.एस का अपमान- नहीं सहेगा हिंदुस्तान आदि नारे लगाते हुए कार्यकर्ता विडियोकॉन टावर के मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर सायंकाल करीब 5 बजे के आस-पास एकत्रित होना शुरू हुए थे। प्राप्त जानकारी के अनुसार, संघ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की सूचना पहले से ही स्थानीय पुलिस प्रशासन और हेडलाइंस टुडे के संपादकीय विभाग को दे रखी थी।

मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर अभी प्रदर्शन चल ही रहा था कि तकरीबन 5.30 बजे सायंकाल लगभग हजार की संख्या में लोग जुलूस की शक्ल में विडियोकॉन टावर की ओर बढ़े। इस जुलूस में शामिल लोगों में कुछ लोग बहुत आक्रोशित थे। उनका कहना था कि हेडलाइंस टुडे राष्ट्र समर्पित संगठन आर.एस.एस के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहा है। उसके वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को आतंकवाद से जोड़ना पूरी तरह से निराधार है।

भीड़ में शामिल कुछ लोग हेडलाइंस टुडे के संपादक से मिलकर शिकायत दर्ज कराने की मांग करने लगे। वहां उपस्थित आर.एस.एस के वरिष्ठ लोगों ने कहा कि हमारा प्रदर्शन शांतिपूर्ण है, हमें यहां केवल धरना देना है। लेकिन भीड़ में शामिल लगभग 40-50 लोगों का समूह वरिष्ठ लोगों की अनदेखी करता हुआ मुख्य द्वार के भीतर घुसने का प्रयास करने लगा।

चूंकि विडियोकॉन टॉवर लगभग तेरह मंजिला ऊंची इमारत है। इस इमारत में न केवल आज तक, हेडलाइंस टुडे, मेल टुडे, दिल्ली आज तक का कार्यालय है वरन् आईडीबीआई, आईसीआईसीआई जैसे प्रतिष्ठित बैंक समेत दर्जनों अन्य अर्ध सरकारी, गैर सरकारी दफ्तर भी इस तेरह मंजिला भवन में स्थित हैं। आज तक और हेडलाइंस टुडे का दफ्तर भवन की चौथी मंजिल, पांचवी, छठी, बारहवीं और तेरहवीं मंजिल पर स्थित हैं।

भीड़ में शामिल लोगों की बातचीत और हाव-भाव से स्पष्ट दिख रहा था कि उन्हें इस बात की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी कि आज तक अथवा हेडलाइंस टुडे का कार्यालय टॉवर के किस तल (फ्लोर) पर है। दूसरे विडियोकॉन टॉवर के प्रबंधन ने एहतियातन ऊपर जाने वाली सभी लिफ्ट को पहले ही बंद कर दिया था। यही कारण है कि मुख्य प्रवेश द्वार के अंदर घुसने के बाद उन्हें यह भी नहीं समझ आया कि वे क्या करें।

ऊपर जाने के लिए लिफ्ट की सुविधा बंद होने के कारण आवेशित कार्यकर्ताओं का दल वापस लौटने को बाध्य हो गया। लौटते समय भूतल पर स्थित स्वागत टेबल, टी स्टॉल और आईडीबीआई बैंक आदि दफ्तरों से जुड़े सूचना पट आदि धक्का-मुक्की में बिखर गए। एक उग्र व्यक्ति ने टी स्टॉल पर रखे गए झाडू या कहें वाइपर को हवा में उछाला। लेकिन तत्काल संघ के कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं जिसमें मुकेश कुमार, सह प्रांत कार्यवाह प्रमुख थे, ने उस व्यक्ति को डांटकर बाहर निकाल दिया। एक-आध मिनट के अंदर ही सभी लोगों को संघ के वरिष्ठों ने समझा-बुझाकर मुख्य द्वार से बाहर निकाल दिया। इस मध्य उपस्थित पुलिस को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। जाहिर है कि संघ के बड़े-बुजुर्गों की उपस्थिति ने मामले को ज्यादा बिगड़ने नहीं दिया।

भगदड़ और बेतरतीबी का यह समूचा माज़रा कुछ मिनटों में ही निपट गया। लेकिन हेडलाइंस टुडे के खिलाफ गुस्से का इज़हार मुख्य द्वार के बाहर ज़ारी रहा। सैंकड़ों लोग धरने पर बैठ गए जिन्हें प्रांत संघचालक श्री रमेश प्रकाश ने संबोधित किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि हमें किसी प्रकार से हिंसक या अराजक प्रदर्शन नहीं करना है। हमारा प्रतीकात्मक विरोध हेडलाइंस टुडे के खिलाफ आज सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है लेकिन यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ किन्हीं पूर्वाग्रहों और राजनीतिक षडयंत्र के अन्तर्गत इसी प्रकार से दुष्प्रचार अभियान चलता रहा तो संघ के कार्यकर्ता लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध प्रदर्शन आगे भी जारी रखेंगे और आवश्यकता पड़ी तो ऐसे हिन्दू विरोधी समाचार चैनलों के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा भी दर्ज कराया जाएगा। धरने को प्रांत प्रचार प्रमुख रविंद्र बंसल, प्रांत कार्यवाह विजय कुमार, सह कार्यवाह मुकेश कुमार ने भी संबोधित किया।

बाद में कार्यकर्ताओं ने समूचे विडियोकॉन टॉवर को मानव श्रृंखला बनाकर घेरने की कोशिश भी की लेकिन भारी पुलिस बल आ जाने के कारण वे ऐसा नहीं कर सके। फिर भी विडियोकॉन टॉवर के अगल-बगल दोनों तरफ कार्यकर्ता नारेबाजी करते रहे। इस बीच एसीपी पुष्पेंद्र कुमार के द्वारा कुछ कार्यकर्तोओं को अपशब्द बोले जाने से कार्यकर्ता पुनः उग्र हो गए। दोनों ओर से भीषण गरमा-गरमी शुरू हो गई। पुलिस ने नारेबाजी कर रहे अनेक कार्यकर्ताओं को जबरन खींचकर अपने कब्जे में ले लिया और लाठियां पटकनी शुरू कर दी। इस लाठी-पटक में अनेक कार्यकर्ताओं की पुलिस ने बेरहमी से पिटाई की और चार कार्यकर्ताओं को पकड़कर विडियोकॉन टॉवर के अंदर अपनी गिरफ्त में ले लिया।

इस संवाददाता ने अपने कानों से एसीपी पुष्पेंद्र कुमार को यह कहते सुना- “सालों को बीच से काटो।…जितने मिलें…उठाकर बंद करो…।” कुछ पुलिस कांस्टेबल यह कहते हुए आने-जाने वालों की धरपकड़ करने लगे “…अरे बंद करो सालों को…मुकदमा भी तो लिखड़ां है… क्या लिखोगे…किसकी गिरफ्तारी दिखाओगे।”

इतना सुनना था कि अपने गंतव्य की ओर वापस लौट रहे कार्यकर्ता आग-बबूला हो गए। फिर से विडियोकॉन की घेरेबंदी शुरू हो गई। यह सारा प्रकरण शाम को उस समय तक चलता रहा जब तक कि कार्यकर्ताओं को यह विश्वास नहीं हो गया कि पुलिस की गिरफ्त में उनके बीच का कोई व्यक्ति नहीं है। समाचार लिखे जाने तक संघ के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के पहाड़गंज थाने पहुंचने की सूचना मिली है। फिलहाल टीवी टुडे या हेडलाइंस टुडे की ओर पुलिस में किसी के खिलाफ कोई एफ.आई.आर. दर्ज कराने की सूचना नहीं है। हां, मीडिया चैनलों पर जरूर आज तक, दिल्ली आज तक और हेडलाइंस टुडे समेत अनेक समाचार माध्यमों ने आरएसएस के विरुद्ध वाक्-युद्ध छेड़ दिया है।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

क्वीन्स बेटन (महारानी का डण्डा) वापस हो का नारा लगाते ही पुलिस ने लाठी बरसाया


वाराणसी, 12 जुलाई। जागृति वाहनी की ओर से क्वीन्स बेटन का विरोध करते हुए गोदौलिया चैराहे पर कार्यकर्ताओं ने क्वीन्स बेटेन वापस हो का नारा लगाते हुए हाथ में तख्ती लेकर काले झण्डे दिखायें। चैराहे पर ही उन लोगों ने बड़ी संख्या में पत्रक बांटे। काले झण्डे देखकर पुलिस ने लाठी बरसाया।
पत्रक में लिखा है कि सारे देश में इस समय महा महोत्सव की तैयारी चल रही है। महंगाई से त्रस्त जनता की आवाज को नजरअंदाज कर सारे संसाधन जहां झोक दिये गये हैं उसका नाम है राष्ट्रकुल खेल। इन्हीं खेलों के सिलसिले में महारानी का डंडा शहर-शहर घूम रहा है और समूचा प्रशासनिक अमला उसके स्वागत में लगा है।
1781 में बनारस के राजा चेत सिंह ने वारेन हेस्टिंग की शर्तों को मानने से इंकार कर दिया, तो इसी शहर की जनता ने हेस्टिंग को सड़को पर खदेड़ दिया। सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, राजगुरू चन्द्रशेखर आजाद समेत असंख्य ऐसे नौजवान रहे जिन्होंने ब्रितानी हुकूमत से लड़ते हुए अपना बलिदान दिया। बड़े दुःख की बात है कि आजादी के 62 साल बाद आज हम उसी लन्दन की महारानी के डंडे के स्वागत में अपना सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर हैं। जिस चन्द्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों के हाथ आने के बजाय प्राणोत्सर्ग किया उन्हीं के नाम पर बने आजाद स्टेडियम में रानी के डण्डे का स्वागत समारोह हुआ निश्चित रूप से यह उन शहीदों का अपमान है जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया था।
सोचिये! क्या आज हम मानसिक रूप से अंग्रेजों के गुलाम नहीं हैं? क्या हुकूमत साम्राज्यवादी प्रतीकों को ढोने में गौरवान्वित महसूस नहीं करती है? याद करिये महारानी एलिजाबेथ की दिल्ली यात्रा, जब सर्वश्रेष्ठ समझे जाने वाले पब्लिक स्कूल की छात्राओं ने महारानी की पालकी ढोयी थी। आज भी हम बच्चों को रानी लक्ष्मीबाई बेगम, हजरत महल, भगत सिंह की बजाय साम्राज्यवाद की पालकी ढोने वाले कहार बना रहे हैं।
देश को अगर साम्राज्यवादी लूट से बचाना है तो हमें समझना होगा कि हमारे जैसे देशों से लूटी गयी धन संपदा की बदौलत ही तीन सौ साल से ब्रिटेन ऐश कर रहा है। यह लूट आज भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप में जारी है। हमें इस लूट को राकने के लिए आगे आना होगा। साम्राज्यवादी प्रतीकों को ध्वस्त करना होगा। मानसिक गुलामी से मुक्ती पानी होगी।
अन्त में इस पत्रक में लिखा है कि आइये काशी की धरती से रानी के डंडे का विरोध कर साम्राज्यवादी लूट और दास मानसिकता के खिलाफ विरोध दर्ज करें। (विसंके)

श्री कुप्. सी. सुदर्शन द्वारा रामशंकर अगिन्होत्री को शोक श्रद्धांजलि


आषाढ़ कृष्ण 12 ईस्वी सं. कलियुग - 5112 09-07-2010
कल जब रायपुर से श्री राजेन्द्र दुबे ने समाचार दिया कि मेरे अति आत्मीय, परम मित्र परामर्शदाता व मार्गदर्शक श्री रामशंकर जी अग्निहोत्री परमात्मचरणों में लीन हो गये तो ऐसा लगा कि अभिन्नता में आधा भाग अलग हो गया है। सन् 1942 से 1946 तक, जब मैं मध्यप्रदेश के नर्मदा तटवर्ती जिला केन्द्र मण्डला में 6वीं से 10वीं तक की पढ़ाई कर रहा था, तब रामशंकर जी प्रचारक होकर मण्डल आए थे। तब हम दोनों की उम्र में केवल एक वर्ष का ही अन्तर होने के कारण हम दोनों सही अर्थो में अभिन्न शरीर और संघ मन बन गये थे। उस समय मा. श्री एकनाथ जी रानडे महाकौशल प्रान्त के प्रचारक थे। संघ के अखिल भारतीय अधिकारियों में सर्वप्रथम हम लोगों का परिचय मा. बाबा साहेब आप्टे से हुआ। संघ केवल लाठी-काठी सिखाने वाला अखाड़ा नहीं अपितु हिन्दु समाज को संगठित करने का लक्ष्य लेकर चलने वाला कार्य है। यह बात सर्वप्रथम उन्हीं से सुनी थी। सन् 1947 में महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए जब जबलपुर आया और तत्कालीन राबर्टसन कॉलेज में भर्ती हुआ तो माननीय रामशंकर जी भी वहां पढ़ने आये थे। तभी 30 जनवरी को प्रातः स्मरणीय महात्मा गांधी की हत्या हो गयी और राजनैतिक विद्वेषवश संघ को भी इसमें सम्मिलित मानकर प्रतिबंधित कर दिया गया। प.पू. श्री गुरूजी के आदेश से उसको हटवाने के लिए सत्याग्रह किया गया तो मैं भी तीन माह जैल में रहा और रामशंकर जी भुमिगत रह कर कार्य करते रहे। सन् 54 में मेरे प्रचारक निकलने के पश्चात् रामशंकर जी मेरे प्रांत प्रचारक बने और उनके नेतृत्व में मैं रायगढ़ जिला प्रचारक, सागरनगर प्रचारक तथा विन्ध्य विभाग प्रचारक का दायित्व सम्हालते हुए उनसे सब प्रकार का मार्गदर्शन करता रहा। श्री रामशंकर जी बाद में युग धर्म, राष्ट्र धर्म, आदि दैनिक व मासिक में भी काम करते रहे व हिन्दुस्तान समाचार और विश्व संवाद केन्द्र का भी काम अत्यन्त कुशलता से सम्हाला।
रामजन्म भूमि आन्दोलन के समय तो अयोध्या का विश्व संवाद केन्द्र ही उस अभूतपूर्व आन्दोलन के अद्यतन समाचार जानने का केन्द्र बिन्दु बना रहा यही नहीं विश्व संवाद केन्द्र समाचार सेवा का वही उद्गम भी था। गत वर्ष ही जब रायपुर गया था तब उनसे भेंट हुई थी और खूब देर तक हम अपने भूत काल में विचार करते रहे। रायपुर में वे अमरकंटक के बाबा नागराज द्वारा आविष्कृत जीवन विद्या का प्रचार करने के लिए रायपुर आ गये थे और दीनदयाल मानव अध्ययन केन्द्र का अध्यक्ष पद सम्हाल रहे थे।
ऐसे मेरे प्रायः संपूर्ण जीवन के साथी मा. रामशंकर जी तो इहलोक का अपना कर्तव्य निभा कर चले गये। मुझको भी देर सवेर उसी पथ का राही बनना है अतः उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

बुधवार, 7 जुलाई 2010

स्वयंसेवक, कार्यकर्ता, प्रचारक और पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री नहीं रहे


भोपाल।
चित्र मे सबसे दाहिनी ओर्
आरएसएस के प्रचारक और वरिष्ठ पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री का आज सुबह निधन हो गया। वे पिछले कुछ दिनों से बीमार थे। 29 जून को हृदयाघात के बाद उनका इलाज चल रहा था। रायपुर के एस्कोर्ट अस्पताल में इलाज के बाद उनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा था, लेकिन 7 जुलाई की सुबह उनकी सांसें थम गई। पिछले कुछ समय से वे रायपुर में ही रह रहे थे। छत्तीसगढ़ सरकार के कुशाभाउ ठाकरे विश्वविद्यालय ने उन्हें मानव अध्ययन शोधपीठ के निदेशक और अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी थी। इसी दायित्व के निवर्हन के लिए वे रायपुर में थे।
आज जबकि उनका शरीर हमारे बीच नहीं है, उनके कर्तृत्व अनायास ही याद आते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवर्तमान सरसंघचालक कुप्. सी. सुदर्शन ने उनके बारे में कहा था - मैं संघ में जो कुछ भी हूं उसमें अग्निहोत्री जी की बड़ी भूमिका है। सुदर्शन जी के प्रचारक बनने में रामशंकर अग्निहोत्री की भूमिका उल्लेखनीय है। लेकिन पिछले साल जब मध्यप्रदेश की सरकार ने श्री अग्निहोत्री को प्रतिष्ठित माणिकचंद्र वाजपेयी सम्मान से अलंकृत किया और उस मौके पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान, संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की मौजूदगी में श्री सुदर्शन जी ने स्वीकार किया कि वे ‘‘श्री अग्निहोत्री के ही बनाए स्वयंसेवक हैं और उनके एक वाक्य ‘‘संघ तुमसे सब करवा लेगा’’ ने मुझे प्रचारक निकलने की प्रेरणा दी।’’
मध्यप्रदेश के सिवनी-मालवा क्षेत्र के होशंगाबाद जिले में 14 अप्रैल, 1926 को उनका जन्म हुआ। श्री अग्निहोत्री ने 1950 में सागर विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद सन् 1952 में नागपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त किया। वे संघ के स्वयंसेवक, कार्यकर्ता, प्रचारक तो रहे ही, संघ के इन्हीं संस्कारों को लेकर उन्होंने राष्ट्रवादी पत्रकारिता भी की। संघ में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए लंबे समय तक महाकौशल प्रांत के प्रांत प्रचारक भी रहे। श्री अग्निहोत्री 1944 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मंडला जिला प्रचारक बने। 1949 में उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की महाकौशल इकाई का संगठन मंत्री नियुक्त किया गया। वे 1951 में विन्ध्य प्रदेश जनसंघ के संगठनमंत्री भी रहे।
लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में रामशंकर अग्निहोत्री ने कई मील के पत्थर स्थापित किए। ध्येय निष्ठा के कर्मपथ बढ़ते हुए वे स्वयं राष्ट्रवादी पत्रकारिता के इतिहास में मील के पत्थर बन गए। उन्होंने पत्रकारिता के मूल्यों के साथ कभी समझौता नहीं किया। आजादी के तुरंत बाद पत्रकारिता में जब विदेशी विचारधारा से अनुप्राणित पत्रकारों का दबदबा था वैसे चुनौतीपूर्ण दौर में उन्होंने अपने राष्ट्रवादी तेवर से कई मुद्दों पर बेबाक टिप्पणी की। आपातकाल और रामजन्मभूमि आंदोलन से जुडी खबरों को वैश्विक क्षितिज पर प्रसारित करने में उनका अमूल्य योगदान है।
उन्होंने पांचजन्य के मध्यभारत संस्करण के साथ-साथ मासिक ‘राष्ट्रधर्म’, प्रसंग लेख सेवा ‘युगवार्ता’ और हिन्दुस्थान समाचार के संपादक का दायित्व संभाला। 1951-52 में दैनिक युगधर्म, नागपुर के सह संपादक और 1953-54 में सांध्य देनिक आकाशवाणी (दिल्ली) के संपादक बने। इस बीच उन्होनें कश्मीर सत्याग्रह में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
श्री अग्निहोत्री 1954-55 में पांचजन्य (मध्य भारत संस्करण) के संपादक रहे। वे 1956 से 1964 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महाकौशल प्रांत प्रचारक रहे। वे 1964 से 1968 तक मासिक राष्ट्रधर्म, लखनऊ के संपादक रहे। वे 1969 में युगवार्ता, फीचर्स सर्विस, नई दिल्ली के संपादक थे। वर्ष 1970 से 1975 तक वे हिन्दुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी के ब्यूरो प्रमुख रहे। इसके बाद 1971 से वे पश्चिमी क्षेत्र युध्द संवाददाता रहे।
श्री अग्निहोत्री 1975 से 1977 तक आपातकाल के दौरान एकीकृत समाचार न्यूज एजेंसी के समाचार उप संपादक रहे। वर्ष 1978 से 1980 तक उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार ( महाराष्ट्र-गुजरात ) मुंबई के क्षेत्रीय व्यवस्थापक के रूप में सेवा की। वे 1981 से 1983 तक नेपाल में विशेष संवाददाता रहे। इसके बाद वे हिन्दुस्थान समाचार, नई दिल्ली के प्रधान संपादक रहे। श्री अग्निहोत्री 1986 से 1989 तक पांचजन्य साप्ताहिक, दिल्ली के प्रबंध संपादक और भारत प्रकाशन, नई दिल्ली के महाप्रबंधक रहे भी रहे। वे 1989 से 1990 तक श्रीराम कार सेवा समिति, सूचना केन्द्र, नई दिल्ली के निदेशक तथा 1992 में अयोध्या स्थित श्री रामजन्म भूमि मीडिया सेंटर के निर्देशक थे। उन्होंने 1991 से 1998 तक मीडिया फोरम फीचर्स लखनऊ का प्रकाशन और संपादन किया। वे 1999 से 2002 तक भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय मीडिया प्रकोष्ठ, नई दिल्ली में रहे। इस दौरान उन्होंने 2002 से 2004 तक मीडिया वाच का संपादन और प्रकाशन किया।
रामशंकर अग्निहोत्री को संघ ने कार्यकर्ता निर्माण की भट्टी में ऐसा तपाया कि वे संघ की योजना से विविध प्रकार के कार्यों में लगे और उसे सफलता के साथ पूरा किया। वे संघ के स्वयंसेवक तो थे ही, एक कार्यकर्ता, प्रचारक और पत्रकार के रूप में भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह किया। एक तरफ तो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रबंधक, महापंबंधक, व्यवस्थापक आदि के रूप में काम किया वहीं वे संवाददाता, ब्यूरोचीफ, उप-संपादक, संपादक और प्रधान संपादक के रूप में भी अपने कर्तव्य का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। बहुआयामी व्यक्तित्व वाले रामशंकर अग्निहोत्री भारत प्रकाशन और विश्व संवाद केन्द्र से संबंद्ध रहे। जीवन के अंतिम कालखंड में उन्होंने राजनीति की भी सेवा की। उन्होंने कोई पद तो नहीं लिया लेकिन अपने पत्रकारिता अनुभव के साथ भारतीय जनता पार्टी को भरपूर सहयोग दिया। वे भाजपा के दिल्ली और भोपाल कार्यालय को अपनी वैचारिक मदद देते रहे।
ढलती उम्र और गिरता स्वास्थ्य भी उन्हें निक्रिष्य नही बना पाया। निरन्तर कर्म के प्रति उनकी निष्ठा ने उन्हें अंतिम समय तक विचार और कर्तव्य से जोडे रखा। भोपाल में रहते हुए भी उन्होंने हिंदुस्तान समाचार बहुभाषी संवाद समिति का अध्यक्ष पद संभाला। कल तक वे मानव अध्ययन शोधपीठ के अध्यक्ष थे।
सम्मान और उपलब्धियों के लिए वे कभी लालायित नहीं हुए। लेकिन कई देशों की यात्राएं और अनेक पुरस्कार व सम्मान उनके खाते में हैं। तंजानिया, कोरिया, युगांडा, इथोपिया, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और यूनाइटेड किंगडम समेत कई देशों की यात्रा कर चुके हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने गत वर्ष प्रदेश के सर्वोच्च पत्रकारिता सम्मान ‘‘माणिचंद्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार-2008’’ से उन्हें विभूषित किया। श्री अग्निहोत्री को उनके श्रेष्ठ कार्य के लिए अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इनमें इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा डा. नगेन्द्र पुरस्कार, राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास द्वारा स्व. बापूराव लेले स्मृत्ति पत्रकारिता पुरस्कार तथा माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल द्वारा लाला बलदेव सिंह सम्मान प्रमुख हैं।
साहित्य सृजन के क्षेत्र में भी श्री अग्निहोत्री उल्लेखनीय परिचय दिया हैं। उनका काव्य संग्रह ‘‘सत्यम एकमेव’’ प्रकाशित है। रामशंकर अग्निहोत्री की कई पुस्तकें काफी चर्चित हुई। कश्मीर के मोर्चे पर, राष्ट्र-जीवन की दिशा, बाजी प्रभु देशपांडे, सुरक्षा के मोर्चे पर, अविस्मरणीय बाबा साहेब आप्टे, कम्युनिस्ट विश्वासघात की कहानी, डॉ. हेडगेवारःएक चमत्कार और नया मसीहा जैसी अनेक पुस्तकें उनके न होने के बाद भी उनके विचार और उद्देश्यों को आगे बढ़ायेंगी।

रविवार, 4 जुलाई 2010

The 11th International Conference on Public Communication of Science & Technology (PCST-2010)

11th PCST-2010, New Delhi, India, December 06-10, 2010


The 11th International Conference on

Public Communication of Science & Technology (PCST-2010)

Science Communication Without Frontiers



NASC Complex, Todapur, DPS Road , Pusa, New Delhi-110012, India

December 06-10, 2010



being organized by

International Network on Public Communication of Science & Technology (PCST-Network)National Council for Science & Technology Communication (NCSTC/ DST)

Madhya Pradesh Council of Science & Technology (MPCOST)

International Centre for Science Communication (ICSC)

Indian Science Communication Society (ISCOS)

Indian Science Writers’ Association (ISWA)



Last Date for Submission of Proposals (500 Words) : August 31, 2010

Last Date for Application for Travel Fellowship : August 31, 2010

Intimation of acceptance of Abstracts/ Proposals : September 30, 2010

Last Date for Early Bird Registration : September 30, 2010

Last Date for Submission of Full Paper : October 31, 2010

Last Date for Registration : October 31, 2010



More details at Conference Website


With thanks and regards,



Dr. Manoj K. Patairiya

Vice Chair & Convener (PCST-2010)

Director (Scientist ‘F’)

National Council for Science & Technology Communication

Technology Bhavan, New Mehrauli Road , New Delhi – 110016, India

Phone : +91-11-26537976

Fax : +91-11-26590238, 26866675

Email : mkp@...; manojpatairiya@...; editor@ijsc@...

Website : www.dst.gov.in

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

30-31 अगस्त को भोपाल में होगा अंतरराष्ट्रीय साहित्य समागम


अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के सहयोग से मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा साहित्यिक संवाद का आयेाजन किया जा रहा है। 30-31 अगस्त को आयोजित होने वाले इस संवाद समागम में दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि भाग लेंगे। इस समागम में भारत के अलावा श्रीलंका, नेपाल, मॉरीशस, बंगलादेश, पाकिस्तान, यूएई और सिंगापुर से अनेक साहित्यकार शिरकत करेंगे। इस आयोजन में साहित्यकारों के अलावा चिंतक, विचारक, दार्शनिक और लेखक भी भागीदार होंगे। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी इस तरह का पहला आयोजन कर रही है।
साहित्य अकादमी के निदेशक प्रो. शुक्ला के अनुसार आज ऐसे साहित्य का सृजन कम हो रहा है जो भारतीय आत्मा को प्रतिबिम्बित करता हो, बजाए इसके साहित्य सृजन में भारतीय चरित्रों की असंगत व्याख्या की जा रही है। साहित्य भाषा के अनुशासन की अवहेलना आम बात हो गई है। साहित्य में इस प्रवृत्ति को रोका जाना, ऐसे साहित्य और साहित्यकारों के बारे में न सिर्फ पाठकों-लेखकों को बल्कि आम लोगों को भी सचेत किया जाना आवश्यक है। बकौल प्रो. शुक्ला इसके लिए सकारात्मक सोच भारतीय दृष्टि रखने वाले लेखकों, विचारकों और समीक्षकों को आगे आना होगा, इस साहित्यिक विमर्श और संवाद के जरिए अकादमी इसी दिशा में प्रयास कर रहा है।
गौरतलब है कि इस अंतरराष्ट्रीय संवाद में वर्तमान साहित्य और सनातन तथ्य, वर्तमान साहित्य और उसका भविष्य, भविष्य का साहित्य, साहित्य का भाषा अनुशासन और साहित्य में बाजारवाद जैसे विषय पर चर्चा की जायेगी।

मंगलवार, 29 जून 2010

अयोध्या के साथ अब घुसपैठ भी मुद्दा बनेगा


घुसपैठियों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई
देश में तीन करोड़ से अधिक घुसपैठिए
घुसपैठ और सामान्य आवाजाही में फर्क है। दुनियाभर में अपनी आवश्यकताओं के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर आबादी की आवाजाही सामान्य बात है। लेकिन घुसपैठ सुनियोजित और रणनीतिक है। अर्थात भारत में घुसपैठ आवश्यकता या परिस्थितियों के कारण नहीं बल्कि किसी खास मकसद का हिस्सा है। इनका आगमन, बसाहट और निवास सब रणनीतिक होता है।
घुसपैठ भारत की भू-सांस्कृतिक और भू-राजनैतिक पहचान और अस्तित्व के लिए चुनौती और खतरा दोनों है। भारत में हर रोज छह हजार घुसपैठिए आ रहे हैं। अभी तक तीन करेाड़ बंगलादेशी घुसपैठ कर चुके हैं। वे बकायदा अपनी भारतीय पहचान स्थापित कर रहे हैं। इस जनगणना के बाद करोड़ों बंगलादेशियों को भारतीय पहचान मिल जायेगी। ये घुसपैठिए न सिर्फ भारतीय मुसलमानों के हक और संसाधनों की बंदरबांट कर रहे हैं, बल्कि भारत में मुसलमान की छवि को भी चोट पहुचा रहे हैंं। घुसपैठ वाले इलाकों में अपराध और अन्य सामाजिक बुराइयों का विस्तार होता है, आरोप मुसलमानों पर लगता है। ये घुसपैठिए भारतीय मुसलमानों के साथ घुल-मिलकर रहते हैंं ताकि उनकी मुस्लिम पहचान बनी रहे। विदेशी और बंगलादेशी पहचान को छुपाने के लिए घुसपैठ को मुस्लिम पहचान दिया जा रहा है। अल्पसंख्यक (मुस्लिम) मतों की यह सिथति है कि देश के एक बड़े क्षेत्र में मुस्लिम समर्थन के बिना कोई दल बहुमत में आ नहीं सकता। इसीलिए अल्पसंख्यक मतों के लिए बड़े पैमाने पर सौदेबाजी की नौबत आ गई है। मुसलमानों के मत के लिए देश में प्रतिस्पद्र्धा का माहौल बन गया है। असम में 1@3 विधायक घुसपैठियों के मतदान से ही बनेंगे ऐसी स्थिति बन गई है। यही स्थिति बंगाल और बिहार की होने वाली है।
घुसपैठ के कारण भारत के विभिन्न प्रदेशों का जनसांख्यिकी संतुलन बिगड़ रहा है। असम, बंगाल और बिहार सहित देश के अनेक प्रदेश मुस्लिम प्रभाव में आ गए हैं। असम की आधी विधानसभा सीट मुस्लिम प्रभावित हो चुकी है। विधानसभा में मुस्लिम और घुसपैठिए जनप्रतिनिधियों का प्रभाव बढ़ गया है। अब वे वहां के कानून को बनाने और उसे प्रभावित करने में लगे हैं। बंगाल और बिहार के कई जिले मुस्लिम बहुल होने की स्थिति में हैं।
भारत में घुसपैठ की समस्या मजहब से भी जुड़ा है। भारत का मजहब मानवतावादी है। जबकि अन्य मजहब इसके विपरीत। देशी और विदेशी मजहबों में बहुत फर्क हैं। हिन्दुत्व अपने साथ अन्य सभी मतों को भी स्थान देता है। उसके प्रति सद्भाव रखता है। जहां-जहां सद्विचार है उसे ग्रहण करने और स्वयं को स्वीकार्य बनाने का प्रयत्न करता है, किन्तु दुनिया के अन्य मजहबों में यह बात नहीं है। दुनिया के दो बड़े संप्रदाय इस्लाम और ईसाइयत कट्टर और आक्रामक हैं। वे अपने भगवान को भगवान और अन्य को शैतान मानते हैं। इतना ही नही, ंवे यह भी मानते हैं कि शैतान के अस्तित्व को समाप्त करना हैं। इस्लाम और ईसाइयत के अनुयायी अपने भगवान और अपने रास्ते को ही सही मानते हैं, उसे ही मानने और उसी पर चलने को सबको बाध्य करते हैं। उनकी मान्यता है कि मेरे अलावा बाकि सब गलत है। जो गलत है वे उसे अपने रास्ते पर लाना दैवी कर्तव्य मानते हैंं। अर्थात दुनिया के अन्य सभी मत के लोगों को ये गलत मानते हैं, और इन्हें सही रास्ते पर लाने की कोशिश करते हैं। दुनिया के लोग उनके रास्ते पर स्वेच्छा से आ गए तो ठीक नही ंतो ज्यादती या बल प्रयोग से। इसीलिए सिर्फ हिन्दुओं का मतान्तरण होता है। इस्लाम या ईसाइयत के मानने वालों का नहीं। वे तो मतान्तरण करने वाले हैं।
भारत घुसपैठ और मतान्तरण का शिकार है। इसके द्वारा विदेशी ताकतें भारत को कमजोर और खंडित करना चाहती हैं। दुनिया में विविध देशों का सामाजिक मनोविज्ञान अलग-अलग विकसित होता है। भारत का भी सामाजिक मनोविज्ञान अलग प्रकार से वर्षों में विकसित हुआ है। भारत का मनोविज्ञान हिन्दुत्व से जुड़ा है। हिन्दुत्व ही इसकी पहचान और हिन्दू ही इसके अस्तित्व का कारण है। जिस दिन हिन्दू अल्पसंख्यक और हिन्दुत्व कमजोर होगा, भारत की पहचान और उसके अस्तित्व दªोनों को खतरा पैदा हो जायेगा। विदेशी ताकतें भारत के पहचान और अस्तित्व को चुनौती देना चाहती हैं। इसीलिए उन्होंने हिन्दुत्व को खतरे में डालने का कुचक्र रचा है। भारत में पहचान का संघर्ष शुरू हो चुका है। यहां जिंदा रहने की अहमियत पहचान से जुड़ गई है। यही पहचान भारतीयों के लिए राष्ट्रीयत्व है। भारत में हिन्दुत्व और राष्ट्रीयत्व पर्यायवाची है। घुसपैठ और मतान्तरण हिन्दुत्व और राष्ट्रीयत्व दोनों के लिए खतरा है। विदेशी स्वार्थों के कारण भारत की क्षेत्रीय, जातीय, सांप्रदायिक और भाषाई विविधता संघर्ष का कारण बन गई है। विदेशी ताकतें भारत की इस विशेषता का दुरुपयोग कर भारतीय समाज में मतभेद, वैमनस्य और संघर्ष पैदा कर रही हैं। भारतीय राजसत्ता इस मामले में लापरवाह है। भारत सरकार ने घुसपैठ और मतान्तरण के मामले मे शुतुर्मुग का रवैया अख्तियार कर रखा है। सत्ताधारी और उसकी सहयोगी पार्टियां अल्पसंख्यकवाद की राह पर है। विपक्षी दल भाजपा और उसके सहयोगी दल असमंजस और अस्पष्टता के शिकार हैं। भाजपा भी अल्पसंख्यकवाद के मुद्दे पर अपने सहयोगी दलों के दबाव में है। ‘‘गठबंधन-धर्म’’ के नाम पर भाजपा ने भी घुसपैठ, मतान्तरण, हिन्दुत्व, अल्पसंख्यकवाद, आतंकवाद, माओवाद और आंतरिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अस्पष्ट रवैया अपना रखा है। इस मामले में मीडिया का रवैया भी अ-भारतीय है।
भारतीय राजनीति इस मामले में विश्वासघात की शिकार है। सामाजिक तौर पर घुसपैठ का कोई समाधान नहीं दिख रहा है। व्यक्ति, परिवार, समाज और सरकार के स्तर पर बौद्धिक, रचनात्मक और आंदोलनात्मक प्रयासों का कोई प्रभावी परिणाम नहीं निकल सका है। असम का उदाहरण सबसे सटीक है। असम गण परिषद् ने घुसपैठ के मुद्दे पर दो बार असम की जनता का विश्वास अर्जित किया, लेकिन दोनों ही बार उसने जनता से धोखाधड़ी की। आज असम घुसपैठियों के कुचक्र में फंसा है। हर बार जनजागरण और आंदोलन होता है, लेकिन संसद और सरकार द्वारा देश के साथ हर बार विश्वासघात किया जाता है।
गत दिनों भोपाल में भारत रक्षा मंच के बैनर तले घुसपैठ की समस्या पर विस्तार से चर्चा हुई। चर्चा से समाधान के तरीके और रास्तों की पड़ताल की गई। 27 जून को देशभर से आए सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने अनेक सुझाव दिए। घुसपैठ की रोकथाम के लिए देश की सीमा सील कर सेना तैनात करने, घुसपैठियों की खोज के लिए बड़े पैमाने पर देशभर में, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष खोजी अभियान चलाने, घुसपैठ प्रभावित राज्यों व क्षेत्रों में क्षेत्रीय भाषा के जानकार विशेष बल की तैनाती करने, बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहचान के लिए एक स्वतंत्र और सक्षम एजेंसी का गठन करने, चिन्हित घुसपैठियों पर मकोका और पोटा के तहत कार्यवाई करने, शीघ्र कानूनी कार्यवाई के लिए त्वरित न्यायालय का गठन करने, घुसपैठिये की पहचान करने वालों को पुरस्कृत करने, जिला स्तर पर घुसपैठियों की सूची जारी करने, इन्हें किसी भी प्रकार की सुविधा मुहैया कराने वाले अधिकारियों पर मुकदमा दायर कर उन्हें दंडित करने का सुझाव आया।
भारत रक्षा मंच ने राज्य सरकारों के समक्ष भी घुसपैठियों के बारे में अपनी मांगे रखी। मंच ने दो वर्षों के भीतर घुसपैठियों की पहचान करने, इस विषय पर सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक करने, जिलों में इसके लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति करने, सरकार को मदद करने वाले नागरिकों को पुरस्कृत करने, अवैध मजार, मस्जिद, मदरसों और कत्लखानों को रोकने के लिए कारगर उपाए करने, मुकदमों की सुनवाई के लिए त्वरित न्यायालय गठित करने और लापरवाह अधिकारियों को दंडित करने की मांग की। भारत रक्षा मंच ने देश के राजनैतिक दलों से अल्पसंख्यक वोट की राजनीति छोड़ घुसपैठ पर कारगर कदम उठाने की अपील की। मंच ने घुसपैठियों की मदद करने वाले राष्ट्रद्रोही नेताओं और दलों पर भी कार्यवाई की मांग भी की।
भारत रक्षा मंच के इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संरक्षक, संघ के पूर्व प्रचारक और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव गोविन्दाचार्य ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वे उद्घाटन और समापन दोनों सत्रों में बोले। भारत रक्षा मंच के संरक्षक सूर्यकांत केलकर भी हाल तक संघ के प्रचारक रहे। अब वे भी संघ के पूर्व प्रचारक हो गए हैं। प्रचारक रहते हुए केलकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, सहकार भारती और संघ के अन्य कई संगठनों से जुडे रहे। अब वे संघ से अलग होकर घुसपैठ के मुद्दे पर काम करेंगे। गौरतलब है कि संघ पहले से ही प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर घुसपैठ और मतान्तरण जैसे मुद्दे पर कार्यरत है। केलकर के सामने संघ का कार्य चुनौती की तरह होगा या सहयोगी! संघ अपने पूर्व प्रचारकों की हरकतों से पंहले भी अपना हाथ जला चुका है। संघ दूध का जला है, छांछ भी फूंक-फूंककर पीना चाहेगा। मुद्दा चाहे कितना ही जरूरी क्यों न हो, संघ अपनी छवि और पहचान दांव पर नही लगाना चाहेगा। संघ दीर्घजीवी संगठन है। संघ की कार्यपद्धति, रीति-नीति अलग है। संघ कांग्रेस और वामदलों के ही नहीं विदेशी ताकतों के भी निशाने पर है। गांधी हत्या से लेकर आपातकाल, अयोध्या प्रकरण और हिन्दू आतंकवाद के मुद्दे पर संघ को फंसाने और कमजोर करने की कोशिश पहले भी हो चुकी है और अब भी जारी है। संघ की नीति है - सांप मरे या नहीं, लाठी नहीं तोड़नी है, लेकिन कुछ लोग संाप मारना चाहते हैं, भले ही लाठी भी टूट जाये। संघ के कुछ पूर्व प्रचारक भी यही नीति चाहते हैं।
ऐसे वक्त में जबकि व्यक्तियों, समूहों और संगठनों की विश्वसनीयता दांव पर है, भारत रक्षा मंच का प्रयास भी चुनौतीपूर्ण है। घुसपैठ के मुद्दे पर भारत रक्षा मंच का प्रयास संघ की नीति से कितना इतर होगा यह तो वक्त ही बतायेगा, लेकिन इतना तय है कि घुसपैठ जेसे मुद्दे पर सिर्फ जनजागरण करके सरकार को इसके खिलाफ कार्यवाई के लिए बाध्य किया जाना संभव नहीं लगता। संभव है यह आंदोलन हिंसक हो जाये। अगर सरकार की मंशा इस आंदोलन के खिलाफ होगी तो सरकार इस आंदोलन को मदद करने की बजाये इसे खत्म करने का ही प्रयास करेगी। आतंकवाद के खिलाफ आंदोलन ‘हिन्दू आतंकवाद’ के सहारे कमजोर करने का भरसक प्रयास हुआ है। भारत रक्षा मंच के साथ भी सांप्रदायिकता का मुल्लमा चस्पा किया जायेगा। उसे मुस्लिम विरोधी, हिन्दूवादी, अंधराष्ट्रवादी और संकीर्ण करार दिया जा सकता है। जो भी हो संघ से जुड़े किन्तु अब संघ से इतर कुछ लोग घुसपैठ पर आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। इसे मुकाम तक पहुचाने की जिद्द लिए। ंअभी तो यही कहा जा सकता है - देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।

सोमवार, 28 जून 2010

Maoist Nexus with Evangelical Christian Groups

Offstumped blog

What was widely suspected in the murder of a Swami Lakshmananda in Kandhamal is turning out to be an established template borrowed from the Phillippines.

It is a bizarre convergence of interests between supposed men of faith and atheist Terrorists.
CathNewsIndia a Evangelical news network carried this story on a Gujarat based Jesuit Organization complaining about illegal detenion of Tribals in Gujarat.

“It appears that to demand one’s legal rights and to be a terrorist is the same thing in Gujarat,” Father Xavier Manjooran, a member of the Adivasi Mahasabha (federation of tribal organizations) of Gujarat, told UCA News April 5.

The so called Adivasi Mahasabha referenced here is no innocent organization.

The Maoist Information Bulletin, of the CPI-Maoist, in its December 2009 edition (accessible via bannedthought.net, access to this maybe restricted in India) carried a letter against the planned offensive by the Government of India.

The letter dated October 2009 appears on Page 30 and it lists Organizations from 10 states, Gujarat Adivasi Mahasabha being one of them.

Following this letter on the same page is also an undated letter of support for the Maoist Terrorists from an organization in the Phillipines called the Cordillera People’s Alliance.

The evangelical nexus becomes even more clearer when one digs further.

The trail on Cordillera People’s Alliance leads us to this story from the Episcopal Life on the Episcopal Church in Phillippines demanding the release of certain “health” workers most of who are associated with the Episcopal Church.

Of them is one founding member of the Cordillera People’s Alliance.

In September 2008, Episcopalian James Balao was abducted at gunpoint months after he complained to family and friends that he was under constant surveillance. Balao is a founding member of the Cordillera People’s Alliance, a federation of grassroots organizations dedicated to the promotion and protection of indigenous peoples’ rights. Balao remains missing.

Further digging on Cordillera Alliance reveals an active role played by the Cordillera Alliance in Maoist Terrorism affected areas going as far back as 2004 (more details can be found on bannedthought.net on Mumbai Resistance 2004 or MR-2004).

More on active collaboration between CPI-Maoist and Phillippines based groups can be found in other Maoist literature on bannedthought.net.

Amongst these is a document titled “CPI-Maoist – The Urban Perspective” authored by a Govindan Kutty.

The document is 53 pages long and describes the Urban Strategy and Focus of the Maoist Terrorists. The document is not dated but it references POTA and the 2001 census which gives us an idea of when it was authored.
the legal democratic organizations serve as important means to the Party’s attempts at the political mobilization of the urban masses. This is because repression normally prevents the open revolutionary mass organizations from functioning. The legal democratic movement is thus the arena where the masses can participate in thousands and lakhs and gain political experience.

It thus has a very important role in the revolution, complementary to the armed struggle in the countryside.

Revolutionaries in other countries, particularly the Philippines, have participated within and utilized the legal democratic movement very effectively.

In India too there is excellent scope to participate within, build, promote and develop legal democratic organizations and movement to advance the interests of revolution.
The collaboration between Maoists and Evangelical Christian outfits must be understood within this broad goal of engaging above the ground outfits that pursue advocacy on behalf of below the ground terrorists.

It is also interesting to note that the Evangelicals who bat for Maoist Terrorists do so under inoccuous secular sounding banners like the “Adivasi Mahasabha” or the “Cordillera Peoples Alliance”.

A brilliant exposition of how the Radical Communist outfits have infiltrated Church based groups in the Phillippines can be found here.

The radicalization of elements in the Catholic Church beginning in the late 1960s provided another avenue for the expansion of CPP front operations. Recognizing how the church’s unparalleled credibility and extensive infrastructure could benefit the revolution, the communists made the Catholic Church a primary target.

The party established a front, Christians for National Liberation, in 1972 with the express purpose of penetrating the church. In 1986 an activist claimed that Christians for National Liberation had a clandestine membership of over 3,000 clergy and layworkers.

Radical clergy and church activists, many adopting liberation theology (see Glossary), supported the insurgency in a variety of ways. Some church activities even provided facilities and financial and logistical support to the guerrillas.

Other church activists joined the NPA, and several well-known priests led guerrilla bands. As a result, the armed forces became deeply distrustful of the church’s role, especially in remote rural areas where the NPA was most active.

There, some of the Church’s Basic Christian Communities–support groups for poor peasants–fell under communist control

This same story also brings to light the so called nexus with “civil society” groups in Phillippines.

Another prominent target of CPP front operations was the workers’ movement (see Employment and Labor Relations , ch. 3). The communists’ flagship labor front was the Kilusang Mayo Uno (May First Movement–KMU). An umbrella organization formed in 1980, the KMU claimed 19 affiliated labor federations, hundreds of unions, and 650,000 workers in 1989. Although it denied its ties to the CPP, the movement had an openly political and revolutionary agenda

Norma Binas who is a leader of the Kilusang Mayo Uno incidentally was the main Keynote speaker at Mumbai Resistance- MR-2004 that saw above ground Maoist sympathisers including the Filipino Cordillera Alliance collaborate in India.

The CPP is of particular importance to us due to this report that members of CPP who escape from Phillippines are in India training Maoists.

The Communist Party of the Philippines (CPP) is not only thriving, it is exporting its cadres to train Maoist insurgents in India, according to reports reaching the Department of Foreign Affairs (DFA).

A DFA senior official, who asked not to be named saying he did not want to preempt an official reaction from the agency, said the Philippine government was expecting an official request from New Delhi for help in tracking down the CPP members in India.

Indian media reports over the weekend said two suspected Naxalites recently arrested in the western Indian state of Gujarat had confessed to their police interrogators that CPP members had been training them in guerrilla warfare.

This is the first time that the CPP—Southeast Asia’s longest-lived communist insurgent group—has been reported to have engaged in such training activities overseas.

The CPP was founded in 1968 by English teacher Jose Maria Sison, who is now 71 and lives in exile in the Netherlands.

Military officials say that the CPP has become irrelevant since the fall of the Berlin Wall in 1989 that led to the collapse of the Soviet Union. The officials say that the CPP’s armed wing, the New People’s Army (NPA), is nothing more than a bandit group engaged in blackmail and extortion.

The daily Indian Express described as “startling” the revelation that international Maoist groups were involved in arms training.

One such training took place in the forests of the southwestern state of Kerala, according to the suspects.

Police based in Gujarat’s Surat district who conducted the arrests said that the Naxalites were operating among landless tribal farmers in the neighboring Dang district.

The DFA official said it was possible that the CPP members who went to India came from Europe, saying most Filipinos who go to India are businessmen.

It is clear from connecting the dots above that there is a deliberate modus operandi at work in Maoist affected Tribal areas to replicate the Filipino model of targeting Church organisations for their credibility and the cover they provide.

All Evangelical activity in Tribal areas must be immediately put under the scanner to determine what kind of overt and covert support is being provided by them to Maoist Terrorists including alleged Military Training by filipino groups.

शनिवार, 26 जून 2010

बिहार गौरव की हवा निकाली नीतीश ने

बिहार में ऐसा लग रहा है कि भाजपा-जद (यू) गठबंधन अब कुछ ही दिनों का मेहमान है। भाजपा और जद (यू) के नेता एक-दूसरे को कहने लगे हैं - अतिथि तुम कब जाओगे! 12 और 13 जून को भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अवसर पर आयोजित स्वाभिमान रैली को नीतीश पचा नहीं पाए। नरेन्द्र मोदी के विज्ञापन को नीतीश ने जरूरत से ज्यादा ही तूल दे दिया। विज्ञापन का विरोध तो एक बार जायज भी था, लेकिन बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए गुजरात द्वारा दी गई राहत राशि को लौटाकर और भाजपा नेताओं को दिया गया भोज वापस लेकर नीतिीश ने अच्छा नहीं किया। सहायता देने वालों के साथ इस तरह का सलूक बिहारी संस्कृति नहीं। संभव है नीतीश कुमार की यह मंशा रही हो कि वे नरेन्द्र मोदी को उनका पैसा वापस कर एक बार बिहार के स्वाभिमान को जागृत कर देंगे और इसका एकमुश्त लाभ उन्हें आने वाले विधानसभा चुनाव में मिल जायेगा। लेकिन राजनैतिक समीक्षकों के मुताबिक नीतीश का दांव उल्टा पड़ गया।
नीतीश के व्यवहार की आलोचना अब देशभर में हो रही है। पहले तो बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत और मदद की गुहार प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही की थी। चूंकि बिहार में जनता दल यू और भाजपा गठबंधन की एनडीए सरकार है, इसलिए भाजपा शासित राज्यों ने नीतीश की गुहार पर विशेषरूप से गौर फरमाया। गुजरात की सरकार ने पहल करते हुए बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए एक विशेष राहत रेल और पांच करोड़ रूपये की मदद मुहैया कराई। लेकिन एक छोटे से विज्ञापन प्रकरण को जिस तरीके से तिल का ताड़ बनाया उससे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश की देशभर में किरकिरी ही हो रही है। राजद के लालू यादव और कांग्रेस ने भी नीतीश के इस रवैये की निंदा है। अगर नरेन्द्र मोदी इतने ही बुरे हैं तो नीतीश कुमार पांच साल से भाजपा का गठबंधन क्यों चला रहे हैं। क्या मोदी विहीन भाजपा के साथ नीतीश कुमार का गठबंधन है? या मोदी युक्त भाजपा और जनता दल यू का गठबंधन है? जिस राहत राशि को नीतीश कुमार ने वापस किया है वह न तो नरेन्द्र मोदी का व्यक्तिगत था, और न ही मोदी द्वारा नीतीश कुमार को व्यक्तिगत तौर पर दिया गया था। विशेष राहत रेल और पांच करोड़ रूपया समूचे गुजरात की जनता द्वारा गुजरात सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी के मार्फत बिहार की जनता को बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार के माध्यम से दिया गया था। तब बिहार की जनता ने गुजरात की सहायता को स्वीकार किया था। कायदे से तो बिहार को गुजरात का एहसानमंद होना चाहिए और गुजरात को शुक्रिया करना चाहिए। लेकिन नीतीश कुमार ने मुसलमान मतदाताओं को नाराज न करने की कवायद में नरेन्द्र मोदी, गुजरात की जनता और भाजपा को नाराज करने का खतरा मोल ले लिया। आज नीतीश कुमार के मुस्लिम मोह के कारण भाजपा और जदयू का वर्षों पुराना गठबंधन एनडीए टूट की कगार पर है।
गौरतलब है कि अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ही नरेन्द्र मोदी भाजपा के विकासपुरुष हैं। यह सच है कि वाजपेयी जहां पार्टी के परे भी विकासपुरुष के रूप में स्वीकार्य हुए, वहीं नरेन्द्र मोदी गुजरात में ही सिमट कर रह गए। मीडिया और विपक्ष ने नरेन्द्र मोदी की छवि अल्पसंख्यक और मुस्लिम विरोधी की बना दी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेन्द्र मोदी का यही बिगाड़ा हुआ चेहरा उपयोगी लगता है। नीतीश ने मोदी के बहाने न सिर्फ अल्पसंख्यकों का रहनुमा होने का संदेश दिया है, बल्कि वे गुजराती या मोदी सहयोग को वापस कर बिहारीपन को उजागर करना चाहते हैं। वे बताना चाहते हैं कि प्रादेशिक, क्षेत्रीय या जातीय पहचान सिर्फ महाराष्ट्र या गुजरात का नहीं, बल्कि बिहार का भी हो सकता है। मराठी और गुजराती गौरव के बरक्श वे बिहारी गौरव व स्वाभिमान को स्थापित करने की कवायद कर रहे हैं। नीतीश की यह कवायद उनके राजनैतिक अहंकार की तरह प्रदर्शित हुआ है।
चाहे बाल ठाकरे की शिवसेना हो या राज ठाकरे की एमएनएस, दोनों ने मराठी एकता और क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर बिहारियों के साथ घोर दुव्र्यवहार और अपमान किया है। मुम्बई में रहने वाले बिहारी आज भी अपमान और जलालत की जिन्दगी जी रहे हैं। वे एक अनजाने भय से आज भी भयभीत हैं। यह सच है कि मराठियों द्वारा मुम्बई में बिहारियों के साथ दुव्र्यवहार किया गया, लेकिन इस तरह का कोई अपमानजनक व्यवहार गुजरातियों ने नहीं किया। यह भी सच है कि नीतीश कुमार ने बिहारियों के साथ हुए दुव्र्यवहार का पुरजोर विरोध करने की बजाए नरमी ही बरती थी। अपमान करने वालों के साथ नरमी और मदद करने वालों के साथ बेरूखी करके नीतीश ने ओछी और अवसरवादी राजनीति का ही परिचय दिया है। बिहार की जनता इसे शायद ही स्वीकार करे।
अंग्रेजों के खिलाफ गांधी को और कांग्रेस के खिलाफ जयप्रकाश स्वीकार कर बिहार ने एक नजीर पेश की है। बिहार का इतिहास इस बात का गवाह है कि वह देश के विभिन्न हिस्सों से नेतृत्व, मुद्दों, और आंदोलनों न सिर्फ स्वीकार करता रहा है, बल्कि उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा भी लेता रहा है। जाति, संप्रदाय और क्षेत्रीयता से उपर उठकर बिहार ने राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद का समर्थन किया है। भाजपा-जदयू के गठबंधन को स्वीकार करना और शरद यादव और जार्ज फर्नांडिस जैसे बाहरी किन्तु राष्ट्रीय नेतृत्व की स्वीकार्यता इसी का परिचायक है।
राजनैतिक विश्लेषकों के मुताबिक बिहार में एनडीए या भाजपा-जदयू गठबंधन टूट के कगार पर है। यह महज आशंका नहीं, बल्कि घटनाओं और नेताओं के रवैये के आधार पर किया जा रहा विश्लेषण हैं। एनडीए संयोजक शरद यादव भले ही बीच-बचाव कर रहे हों, वे गठबंधन बनाए रखना चाहते हों, लेकिन बिहार में नीतीश का दखल शरद से ज्यादा और सबसे ज्यादा हैं। घटनाक्रम बता रहे हैं कि नीतीश उड़ीसा के नवीन पटनायक की राह पर हैं। लेकिन न तो बिहार उड़ीसा है और न ही नीतीश, नवीन पटनायक। लेकिन यह भी सच है कि नीतीश की जिद्द के आगे शरद यादव की कुछ नहीं चलेगी, जैसे जार्ज फर्नांडीस की नहीं चली।
हालांकि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व एनडीए संयोजक शरद यादव के साथ है। लेकिन भाजपा का प्रदेश नेतृत्व नीतीश को उनकी ही भाषा में जवाब देने का उतारू है। जाहिर है गठबंधन का एक धर्म होता है। गठबंधन टिकाउ हो इसके लिए सभी घटकों को गठबंधन-धर्म का पालन करना लाजिमी होता है। किसी भी एक घटक द्वारा धर्म के उल्लंघन से गठबंधन को खतरा हो सकता है। नीतीश कुमार ने गुजरात की राहत राशि वापस कर, भाजपा नेताओं नरेन्द्र मोदी और वरुण गांधी का विरोध कर और आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए प्रचारकों, मुद्दों और रणनीति पर एकतरफा फैसला देकर भी गठबंधन धर्म के साथ न्याय नहीं किया है। नीतीश कुमार का यह रवैया किसी को समझ में नहीं आ रहा है। कुछ समझ में आने वाला तथ्य है तो यही कि नीतीश यह सब मुसलमान वोटों के लिए कर रहे हैं। लेकिन राजनीति के जानकार यह भी समझने की कोशिश में हैं कि क्या नरेन्द्र मोदी का विरोध या मोदी परहेज से मुसलमान वोट की गारंटी है! वह भी ऐसे समय में जब राजद के लालू यादव, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और लोजपा के रामविलास पासवान जैसे मुस्लिमपरस्त नेता अल्पसंख्यक वाटों के लिए किसी भी हद तक जाने और कोंई भी हथकंडा अपनाने के लिए तैयार हैं। भले ही इसके लिए घोषित आतंकियों का समर्थन क्यों न करना पड़े। बिहार में लोभ-लालच और भय से मुस्लिम मतों की बंदरबांट तय है। फिर नीतीश भाजपा समर्थन, बिहारी स्वाभिमान-संस्कृति और एनडीए गठबंधन को क्यों और किसके लिए दांव पर लगा रहे हैं? क्या जनता दल (यू) ने किसी और दल या नेता से गठबंधन की अघोषित कोशिश शुरु कर दी है? नीतीश कुमार मुस्लिम मतों के लिए जरूरत से ज्यादा चिंतित हैं? या कि उन्हें उनकी सरकार द्वारा अल्पसंख्यक कल्याण के लिए किए गए कार्यों पद भरोसा नहीं, उन्हें मुसलमानों से विश्वासघात का डर सता रहा है? यह सब सवाल हैं जो बिहार समेत देश की जनता के दिल-दिमाग और जुबां पर आ रहे हैं। नीतीश को इन सवालों का जबाव देना है, भाजपा को इन सवालों के लिए तैयार रहना है। भाजपा के लिए झारखंड का गठबंधन एक मिसाल है। अस्वाभाविक, दबाव और अविश्वास पर आधारित गठबंधन बन भले ही जाए लेकिन वह चल नहीं सकता। गठबंधन तोड़ने का समाजवादी इतिहास रहा है। भाजपा को भी तय करना है विचार और स्वाभिमान की कीमत पर गठबंधन चलाना है या बिहार की जनता, भाजपा के विचार और स्वाभिमान के लिए कोई रास्ता अख्तियार करना है।

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

मीडिया में माओ कलमबंदी और हथियारबंदी का ताना-बाना

आउटलुक पत्रिका के ताजे अंक में अरुंधती रॉय का लंबा आलेख प्रकाशित हुआ है। कछ ही दिनों पूर्व पश्चिम बंगाल में उन्होंने एक साक्षात्कार भी दिया। लगे हाथों एक टीवी चैनल ने भी उनका साक्षात्कार प्रसारित किया। जाहिर है अरुंधती का लिखा-कहा काफी पढ़ा और सुना जाता है। वर्तमान मीडिया में क्या लिखा गया, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है किसके द्वारा लिखा गया। अरुंधती के पाठक और दर्शक-श्रोताओं का एक बड़ा वर्ग भी है। जाहिर है सबका अपना नजरिया होगा। अरुंधती का लिखा - ‘भूमकालः कॉमरेडों के साथ-साथ’ पढ़ने वाले एक मित्र ने कहा - इस आलेख में जबर्दस्त माओवादी अपील है, जैसे शोभा-डे के लिखे में सेक्स अपील होती है। पाठक ने स्मरण दिलाया- हजार चैरासी की मां’ फिल्म में भी ऐसा ही माओवादी अपील था। पाठक ने बताया अरुंधती को पढ़कर माओवादी बन जाने का मन करता है। विकास, आदिवासी और जंगल की बात करने का मन करता है। माओवादियों-नक्सलियों की तरह हत्या, लूट, डाका, वसूली, बलात्कार और अत्याचार करने का जी करता है। ऐसी प्रेरणा तो पहले कभी नहीं मिली, पहले राष्ट्रवादियों से लेकर समाजवादियों तक को पढ़ा।
अरुंधती के पास कौन-सा स्वप्न है! क्या उनका स्वप्न आदिवासियों या आम लोगों का दुःस्वप्न है? विकास के नाम पर विनाश और हिंसा को जायज ठहराने वाले ये भी तो बतायें कि आखिर माओवादी किसका विकास कर रहे हैं? भले ही माओवादी-नक्सली विकास की आड़ लेकर विनाश का तांडव कर रहे हैं, लेकिन उनके समर्थक सरकारी कार्यवाई की निंदा यह कह कर कर रहे हैं कि माओवाद-नक्सलवाद पिछड़ेपन, विषमता और गरीबी के पैदा हुआ है। बिहार, बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ से लेकर मध्यप्रदेश, महाराष्ट और आंध््राप्रदेश तक माओवादियों के मार्फत किसका विकास हुआ है, किसका विकास रुका है? ये विनाश का कॉरीडोर किसके लिए बन रहा है यह भी देखा और पूछा जाना चाहिए। दंतेवाड़ा में इंद्रावती नदी के पार माओवादियों के नियंत्रित इलाके में सन्नाटा पसरा है। जिन बच्चों को स्कूल में किताब-कॉपियों और कलम-पेंसिल के साथ होना चाहिए था, वे माओवादियों के शिविरों में गोली-बारुद और इंसास-एके 47-56 का प्रशिक्षण लेकर विनाशक दस्ते बन रहे हैंं। स्कूलों में भय के कारण पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों ही नदारद हैं।
निश्चित तौर पर खनिज और वन संसाधनों से भरपूर वन-प्रांतर में संघर्षरत पुलिस बल और माओवादी-नक्सली हर लिहाज से परस्पर भिन्न और असमान हैं। एक तरफ माओवादियों की पैशाचिक वृत्ति, मानवाधिकारों से बेपरवाह, देशी लूट और विदेशी अनुदान से संकलित असलहे, मीडिया का दृश्य-अद्श्य तंत्र, भय पैदा करने के हरसंभव हथकंडों से लैस तथा छल-बल से अर्जित निर्दोष-निरीह आदिवासियों का समर्थन प्राप्त, अत्यन्त सुसंगठित व दुर्दांत प्रेरणा से भरा हुआ माओवादी लडाकू छापामार बल। वहीं दूसरी ओर निर्दोंषों पर बल प्रयोग न करने की नैतिक जिम्मेदारी लिए, संसाधनों और सुविधाओं की कमी झेल रहे, राजनैतिक नेतृत्व की उहापोह से ग्रस्त, नौकरशाही के जंजाल से ग्रस्त, मानवाधिकार संगठनों के दुराग्रहों से लांछित, राज्य और केन्द्र की नीति-अनीति का शिकार, वन-प्रांतरों की भौगोलिक, सामाजिक-सांस्कृतिक व आर्थिक ढांचे से अंजान या बेहद कम जानकार सरकार के अद्र्ध-सैनिक बल। बेहतर जिंदगी की लालसा दोनों को है। एक परिवार की देश-समाज की बेहतरी चाहता है दूसरा माओवादियों का जत्था है जो किसकी बेहतरी और सुरक्षा के लिए मार-काट मचा रहा है उसे खुद नहीं मालूम। बस हत्या अभियान में मारे गए शवों और लूटे गए हथियारों की गिनती ही उन्हें करनी है। माक्र्स, लेनिन और माओ को कौन जानता है उन सुदूर वनवासी क्षेत्रों में, जानते हैं तो बस उनके नाम से चलाए जाने वाले भय को। जो वनवासी योद्धा अंग्रेजों से दो-दो हाथ कर रहा था, उसकी तुलना इन माओवादियों से नहीं की जा सकती जिनका स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व में कोई विश्वास नहीं।
माओवादी लेखक और बुद्धिजीवी माओवादी-नक्सलियों को आदिवासियों और शोषितों का प्रतिनिधि बताते थकते नहीं। लेकिन कोई उनसे यह क्यों नहीं पूछता कि चारू मजूमदार और कानू सान्याल से लेकर गणपति, कोटेश्वर राव, पापाराव, रामन्ना, हिदमा, तेलगू दीपक और कोबाद गांधी जैसे कथित क्रांतिकारियों की पृष्ठभूमि पर गौर करने से उनका आदिवासी-किसान विरोधी व्यक्तित्व की झलक मिलती है। ये माओवादी भले ही शोषितों की लड़ाई की बात करते हों लेकिन इनके भीतर भी जातीय श्रेष्ठता का दुराग्रह भरा हुआ है। माओवादी नेता कोटेश्वर राव के नजदीकी गुरुचरण किस्कू ने एक साक्षात्कार में कहा था कि बंगाल में किशनजी की अगुआई में जारी आंदोलन आदिवासी समर्थक नहीं, आदिवासी विरोधी है।
हत्या पसंद उन क्रूर और निर्मम माओवादियों द्वारा चुनावों को पाखंड और संसद को सुअड़बाड़ा कह देने से काम नहीं चल जाता। अरुंधती को उसके आगे भी पूछना चाहिए। आखिर उनका बूचड़खाने कोई विकल्प तो नहीं हो सकता। रॉय यह भी तो बताएं कि वे भारतीय राजतंत्र का समर्थन करती हैं कि माओवादियों की तरह खुल्लम-खुल्ला तख्ता पलट का इरादा रखती हैं। अपने इस इरादे पर उन्हें राजतंत्र के इरादे की परवाह है भी या नहीं! पश्चिम बंगाल के नक्सलवादी अब माओवादी क्यों हो गए? आखिर वहां से नक्सलवादी क्यों चले गए थे, क्या नक्सलवादियों का स्वप्न पश्चिम बंगाल में पूरा हो गया था। ये कैसा स्वप्न है जो बार-बार दःस्वप्न में बदल जाता है। बंगाल की माक्र्सवादी-कम्युनिस्ट सरकार तो नक्सलियों के स्वप्न साकार करने के लिए ही बनी थी। फिर 20-30 वर्षों के माक्र्सवादी राज में उनके स्वप्वास्वप्न क्यों हो गए? अभागे नक्सली, माओवादी बनने पर क्यों मजबूर हुए। बंगाल में असफल नक्सली छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार के सफल माओवादी कैसे हो सकते हैं?
बकौल अरुंधती मान लिया जाए कि भारतीय संसद द्वारा 1950 में लागू किया गया संविधान जन-जातियों और वनवासियों के लिए दुःख भरा है। संविधान ने उपनिवेशवादी नीति का अनुमोदन किया और राज्य को जन-जातियों की आवास-भूमि का संरक्षक बना दिया। रातों-रात उसने जन-जातीय आबादी को अपनी ही भूमि का अतिक्रमण करने वालों में तब्दील कर दिया। मतदान के अधिकार के बदले में संविधान ने उनसे आजीविका और सम्मान के अधिकर छीन लिए। संसद द्वारा अपनाए गए संविधान से जन-जातीय समाज ही नहीं अन्य बहुत लोगों को दुःख हो सकता है तो क्या लाखों-करोड़ों लोग माओवादियों की तरह हथियार उठा लें और लाखों-करोड़ों अपना शत्रु बना लें? निश्चित तौर पद बड़े बांधों से विस्थापन होता है। सबसे अधिक प्रभावित वनवासी-आदिवासी ही होते हैं। लेकिन सिर्फ बांधों की उंचाई का विरोध निषेधात्मक काम है, अरुंधती या मेधा पाटकर विकल्प भी तो बतांए-कुछ करके भी दिखाएं। सरकार के कल्याणकारी बातों से सिर्फ चिंता करने से नहीं होगा। सरकार और आमलोगों को भी तब चिंता सताने लगती है जब अरुंधती वन-प्रांतर में माओवादियों से मिलने जाती हैं। आदिवासियों का विकास अगर उद्योगपति-पंजीपति समर्थक गृहमंत्री पी. चिदंबरम नहीं कर सकते जैसे माओवादी समर्थक अरुंधती नहीं कर सकती। एजेंट होने का आरोप दोनों पर लग सकता है। एक पूंजीपतियों का, दूसरा माओवादियों का। वर्षों से कब्जे की जद्दोजहद गरीब और संसाधन विपन्न क्षेत्रों में नहीं हो रही है, बल्कि गरीब और संसाधन सम्पन्न क्षेत्रों में हो रही है। माओवादी वहीं हैं जहां खनिज संसाधनों की मलाई है। वे वहीं अपना पैर पसार रहे हैं जहां कंपनियां उत्खनन को बेताब हैं। क्योंकि उगाही और वसूली के लिए यही उर्वर क्षेत्र है। उड़ीसा के कालाहांडी में भी गरीबी है। वहां सरकार नहीं पहुची, तो क्यों नहीं माओवादी वहां भूखमरी समस्या खत्म कर देते। इन सर्वहारा लड़कों के वे सभी वर्ग-मित्र हैं जो इन्हें अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए असलहा, पूंजी और साधन उपलब्ध कराते हैंं। बाकी सब वर्ग शत्रु। उनके नियम में लिखा है - शत्रु को नष्ट कर ही दिया जाना चाहिए, उसके हथियार छीन लेने चाहिए और उसे अशक्त कर दिया जाना चाहिए...’’ तो इस संघर्ष में सिर्फ वहीं बचेंगे जो वर्ग मित्र बन सकेंगे, बाकी सब मिटा दिए जायेंगे।
अरुंधती को कॉमरेड कमला की बार-बार याद आती है। वे कई बार उसके बारे में सोचती हैं। वह सत्रह की है। कमर में देशी कट्टा बांधे रहती है। उस 17 वर्षीय कॉमरेड की मुस्कान पर वे फिदा हैं। होना भी चाहिए। लेकिन वह अगर पुलिस के हत्थे चढ़ गई तो वे उसे मार देंगे। हो सकता है कि वे पहले उसके साथ बलात्कार करें। अरुंधती को लगता है कि इस पर कोई सवाल नहीं पूछे जायेंगे। क्योंकि वह आंतरिक सुरक्षा को खतरा है। ऐसा तो सब प्रकार की असुरक्षा के प्रति कोई भी करेगा। क्या आंतरिक, क्या बाह्य असुरक्षा। केांई पुलिस की सिपाही सत्रह वर्षीय कमला होगी तो माओवादी क्या करेंगे? क्या वे उसे दुर्गारूपिणी मान उसकी पूजा करेंगे? बाद में वे ससम्मान उसे पुलिस मुख्यालय या उसके मां-बाप के पास पहुचा देंगे? अरुंधती उन माओवादी कॉमरेडों से पूछ लेती तो देश को पता चल जाता। अगर वो पुलिस की सिपाही कमला 17 वर्षीया आदिवासी भी होती तो हत्थे चढ़ने पर माओवादी निश्चित ही पहले बलात्कार करते और उसे उसके परिवार वालों के सामने जिंदा दफन कर देते। आदिवासी क्षेत्रों की कितनी ही कमलाएं माओवादियों के हत्थे चढ़कर बलात्कार और जिंदा दफन की शिकार हो चुकी हैं। डर के मारे आंकड़े भी संकलित नहीं होते। पुलिसिया हिंसा या आतंक के खिलाफ तो मानवाधिकार भी है और लेखक-बुद्धिजीवी भी, लेकिन माओवादी हिंसा और आतंक के खिलाफ कौन बोलेगा?
चाहे हथियारबंद माओवादी हों या कलमबंद माओवादी, देश की अनेक समस्याओं का वास्ता देकर हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता। माओवाद समर्थकों के दोगले चरित्र को समाज और सरकार को समझना ही होगा। आखिर किस बिना पर हथियारबंद माओवादी तख्ता पलट की योजना बना रहे हैंं। क्या ये कलमबंद समर्थक उनके इशारे पर चल रहे हैं? देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा कर सत्ता को बंदूक की नली से प्राप्त करने की रणनीति का एक हिस्सा तो नहीं, ये कलमबंद माओवादी? आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि बीच का कोई रास्ता नहीं दिखता। न तो सरकार के लिए और ना ही आम लोगों के लिए। फिर ये माओवादी बुद्धिजीवी विकास की कमी, मानवाधिकार, आदिवासी उत्पीड़न की बात लिख-कहकर देश आमलोगों को गुमराह क्यों कर रहे हैं? आप अगर माओवादी हिंसा का खुलेआम विरोध नहीं करेंगे, उन्हें ग्लैमराइज करेंगे, उसके पक्ष में माहौल बनायेंगे, सरकार की नीतियों का विरोध करेंगे बिना कोई वैकल्पिक नीति बताये तो आप भी माओवादियों के संरक्षक, उनके समर्थक और उनके मददगार के रूप में क्यों न चिन्हित किए जाएं? आपके साथ भी माओवादी-नक्सलियों जैसा बर्ताव क्यों न किया जाए? जिस दिन दंतेवाड़ा में पुलिस बल और माओवादियों के बीच मुठभेड़ हो रही थी उसी दिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ बुद्धिजीवी माओवाद विरोधी अभियान का विरोध कर रहे थे। बाद में खबर आई कि देश की राजधानी नई दिल्ली में केन्द्र सरकार के नाक के नीचे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ क्रांतिकारी छात्रों ने माओवादियों द्वारा देश के पुलिस जवानों की हत्या पद जश्न मनाया। कुछ छात्रों द्वारा विरोध करने पर झड़प की नौबत आ गई। क्या लोकतंत्र और स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का यही मतलब है? क्या देश की जनता और सरकार विश्वविद्यालय को करोड़ों की सब्सिडी इस लिए देती है कि वहां से पढ़कर छात्र देश विरोधी कार्य करें। ऐसे छात्र, छात्र संगठनों और विश्वविद्यालय पर सरकार ने क्या कार्यवाई की, सरकार की क्या नीति है? देश का कानून माओवाद-नक्सलवाद समर्थकों और देश के सुरक्षा बल के विरोधियों के बारे में क्या कहता है, देश को जानने का हक है। क्या ये मीडिया के माओवादी है जो आतंक को, हिंसा को और भय को ग्लैमराइज कर रहे हैं और इसे स्वप्न में देखने लायक बना कर परोस रहे हैं। ये कलमबंद माओवादी जो हथियारबंद होने, राज्य के खिलाफ आंतंक और हिंसा का तांडव करने और समाज को क्षत-विक्षत कर देने की प्रेरणा दे रहे हैं इनके बारे में राज्य और समाज क्या सोचता है? यह कलमबंदी और हथियारबंदी माओ का कैसा ताना-बाना है।
(लेखक पत्रकार और मीडिया एक्टिवीस्ट हैं)