मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

सैन्य अधिकारियों के चयन में धांधली पर उठते सवाल

भारतीय सेना , देश की गौरव का प्रतीक। आज भी जब देश के राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही को लेकर आम आदमी के मन में संशय घर कर चुका है। भारतीय सेना की गौरवमयी परंपराओं के प्रति उसी आम आदमी के मन में एक प्रतिष्ठा है। यही भारतीय सेना एक तरफ अधिकारियों की कमी का सामना कर रही है तो दूसरी तरफ सिविल पेशेवरों को सेना से जोड़ने के लिए जो योजनाएं बनी उसमें बहाली के दौरान सेना के उच्चाधिकारी जम कर मनमानी कर रहे हैं। लोकस्वामी/ न्यूज़लिक्स को मिले दस्तावेजों के मुताबिक टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स से लेकर मिलिट्री नर्सिंग सर्विस , युनिवर्सिटी इंट्री स्कीम और आर्म्ड मेडिकल कार्प्स के जरिए कमिशंड रैंक के प्रोफेश्नल्स को लेने के लिए बनाई गई योजनाओं में पेशेवरों को मेडिकल चेकअप में फीट और अनफीट करके न केवल नियमों को अपनी सुविधा के मुताबिक तोड़ा मरोड़ा जा रहा है बल्कि हमारे सूत्र यहां तक दावा कर रहे हैं कि इस तरह मनमाने तरीके से काम करने के पीछे सेना के उच्चाधिकारियों का काकस है जो इन योजनाओं के जरिए अपने रिश्तेदारों को कमिशनिंग दिलाते हैं जो कई मामलों में सच भी है। 

कई मामलों में एक बार नहीं कई बार रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाया जाता है, उसकी सिफारिश को भी चुनौती दी जाती है, बदला जाता है और अभ्यर्थियों को ज्वाइनिंग दी जाती है। कई मामलों में मेडिकल जांच में फीट अभ्यर्थी को मेडिकल तौर पर चुस्त दुरस्त बताए जाने के बाद ज्वाइनिंग के वक्त दुबारा मेडिकल बोर्ड बनाकर अनफिट घोषित कराकर ज्वाइन करने से रोक दिया जाता है। न्यूजलिक्स / लोकस्वामी को मिले दस्तावेजों में से एक मामले में तो नियमों की धज्जियां उडाते हुए टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स -115 के एक अभ्यर्थी सचिन कश्यप को जिसे मेडिकल बोर्ड में अनफिट करार दिया जाता है, अपील मेडिकल बोर्ड में भी इस फैसले को बरकरार रखा जाता है। फिर ये अभ्यर्थी रिव्यु मेडिकल बोर्ड में जाता है। मजे की बात ये कि रिव्यू मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का इंतजार किये बना ही टेलिफोन पर ही अभ्यर्थी के फीट होने की जानकारी ली जाती है, और उन्हें ज्वाइन करा लिया जाता है। हालांकि बाद में रिव्यू मेडिकल बोर्ड उसे अनफीट करार देता है। हद तो तब होती है जब कानूनी पचड़े में फंसने से बचने की सलाह देते हुए सेना के उच्च अधिकारी उस अभ्यर्थी के उपर एक बार फिर रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की उदारता दिखाते हैं और अंतत उसे ज्वाइनिंग दे देते हैं। पूरे मामले में अंतिम दफे जो मेडिकल रिव्यू बोर्ड बैठता है उसमें अध्यक्ष सहित दो सदस्य से पहले आएमबी से लिए जाते हैं, लेकिन एक सदस्य को बदल दिया जाता है और अंतत सचिन कश्यप टेक्निक्ल ग्रेजुएट कोर्स के लिए अंतिम तौर पर चयनित कर लिए जाते हैं। 


अब दूसरा मामला देखिए साहिल बेनीवाल का जो भारतीय सेना के ऐसे ही एक योजना युनिवर्सिटी इंट्री स्कीम के जरिए भारतीय सेना में अधिकारी बनने के लिए लिखित और मौखिक परीक्षा पास करके मेडिकल जांच परीक्षा तक पहुँचते हैं। साहिल बेनिवाल का परीक्षा क्रमांक 625829, UES ENTRY Candidate है। मेडिकल परीक्षा में बेनिवाल को हार्निया की वजह से मेडिकल तौर पर अनफिट करार दिया जाता है। बेनिवाल सेना से रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की मांग करता है जिसे सेना के स्वास्थ्य महानिदेशक द्वारा यह कह कर अस्वीकार कर दिया जाता है कि डीजीएएफएमएस के अनुमोदन के बाद रिव्यू मेडिकल बोर्ड का जो परीक्षण है वो अंतिम है जिसके बाद फिर किसी रिव्यू मेडिकल बोर्ड की गुंजाइश नहीं रह जाती है। पत्रांक 76054/comp/DGMS-5A। हालांकि बाद में न केवल इस मामले में बल्कि पेशेवरों को भारतीय सेना में शामिल किए जाने को लेकर आयोजित किए जाने कई और योजनाओँ में सफल अभ्यर्थियों के मामले में भी नहीं माना जाता है। बेनिवाल के ही मामले में पुराने पत्र में बताए गए नियम को मनमाने तरीके से बदलते हुए फीट करार देकर नियुक्ति दे दी जाती है। पत्रांक 76064/DGMS-5A । न्यूजलिक्स / लोकस्वामी को मिली जानकारी के मुताबिक बेनिवाल के मामले में उसकी नियुक्ति के पीछे ब्रिगेडियर रैंक के उनके रिश्तेदारों का दबाव भी काम कर रहा था।

न्यूज़लिक्स / लोकस्वामी को मिले दस्तावेजों में से तीसरा मामला और भी मजेदार है जिसमें  टेक्निक्ल इंट्री स्कीम के एक अभ्यर्थी पंकज मेहरा जो की स्वास्थ्य परीक्षण में अनफीट करार दिये गये। बाद में रिव्यू मेडिकल बोर्ड बिठाने की दरख्वास्त को डीजीएएफएमएस की तरफ से ठुकरा दी जाती है ( पत्रांक 76064/DGMS - 5A )। लेकिन फिर आनन फानन में रिव्यू मेडिकल बोर्ड स्वीकार कर उन्हें मेडिकली फीट घोषित कर नियुक्ति के योग्य बना दिया जाता है। 


दरअसल इन सारे मामले में नियुक्ति को लेकर बनाए गए सेना के ही नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाई गई। सेना भवन के हमारे सूत्र बताते हैं कि भर्ती के लिए पहुंचे अभ्यर्थी के मेडिकल जांच में एक बार अनफिट होने के बाद अभ्यर्थी स्पेशल मेडिकल बोर्ड यानि एसएमबी में सात दिन के अंदर अंदर अपील कर सकता है। वहां भी अनफिट होने के बाद अभ्यर्थी अपील मेडिकल बोर्ड यानि एएमबी में अपील करता है। 42 दिन के भीतर एएमबी के सामने पहुंचना होता है। इसके बाद अंतिम विकल्प के तौर पर अभ्यर्थी के पास आरएमबी रिव्यू मेडिकल बोर्ड का विकल्प होता है जो पूरी तरह से प्राधिकरण के विवेक पर निर्भर करता है। लेकिन आरएमबी के पास अपील पर जाने के लिए एक दिन के अंदर दरख्वास्त देनी होती है। रेग्युलेशन फार मेडिकल सर्विस आफ द आर्म्ड फोर्सेज यानि आरएमएसएएफ के पारा 482 के मुताबिक रिव्यू मेडिकल बोर्ड यानि आरएमबी का फैसला अंतिम होता है और उसको किसी भी कीमत पर नहीं बदला जा सकता है।
जबकि इन सभी मामले में इन नियमों का पालन किया गया हो , ऐसा शायद ही लगता है। ऐसे में सेना में नियुक्ति के मामलों के जानकार दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील ओ पी सक्सेना कहते हैं कि इन सभी मामलों में न केवल सेना की नियुक्ति संबंधी नियमों को तोड़ा मरोड़ा गया और मनमाने तरीके से उसका उपयोग किया गया बल्कि भारतीय संविधान की अनुच्छेद 14 के जरिए हर व्यक्ति को मिले समता के अधिकार का भी ये सरासर उल्लंघन है। जाहिर है गोपनीयता कानून का हवाला देते हुए ये मामले सेना की फाइलों में ही दम तोड़ जाते हैं , लेकिन क्या ये भारतीय सेना की गौरवमयी परंपरा पर एक दाग की तरह नहीं है। सक्सेना आगे कहते हैं कि ऐसे मामले में जहाँ मेडिकल बोर्ड और अपील मेडिकल बोर्ड और रिव्यू मेडिकल बोर्ड के बीच विरोधाभास की स्थिति बनती है तो उन मामलों को सिविल मेडिकल बोर्ड में जांच के लिए भेजा जाना चाहिए ताकि चयन में किसी भी तरह की पूर्वाग्रह से बचा जा सके। 

ज़ाहिर है सेना की नियुक्ति के दौरान स्वास्थ्य परीक्षण के नाम पर धांधली के आरोप अपने आप में गंभीर मामला है। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इन मामलों को कही न कहीं सेना को और सरकार को गंभीरता से लेने की जरूरत है ताकि किसी भी अभ्यर्थी के साथ इस तरह मनमाने तरीके से व्यवहार न किया जा सके। साथ ही एक ऐसी प्रक्रिया विकसित की जा सके जो पूरी तरह से पारदर्शी हो।
( पाक्षिक पत्रिका लोकस्वामी से साभार)

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

सुदर्शन जी का होना, जाना और बार-बार आना अनिल सौमित्र
81 वर्ष की उम्र में भी बच्चों के बीच बाल-सुलभ व्यवहार। सुबह और सायं काल दोनों वक्त शाखा जाने का स्वयं का आग्रह। किसी भी बीमारी के लिये आयुर्वेद, योग और भारतीय पद्धति से इलाज का आग्रह। दवाई कम परहेज ज्यादा। देश-समाज की उन्नति के लिये देशज और परंपरागत उपायों का आग्रह। यह सब कुछ अपने अंतिम क्षणों तक करते रहे सुदर्शन जी। सुदर्शन जी का आयुर्वेद पर बहुत विश्वास था। लगभग 20 वर्ष पूर्व हृदयरोग से पीडि़त होने पर चिकित्सकों ने उन्हें बाइपास सर्जरी ही एकमात्र उपाय बताया; किंतु उन्होंने अपने उपर आयुर्वेद का ही प्रयोग किया। सुदर्शन जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में स्वयंसेवक से सरसंघचालक बने। इस दौरान उनके निर्दोष, सरल और सहज किंतु स्पष्ट और बेबाक विचारों के कारण कई बार विवाद भी हुआ। श्रीमती सोनिया माइनों पर उनकी टिप्पणी हो या गांधी हत्या के बारे में उनके विचार, अपने तथ्यपरक विचारों को उन्होंने कभी छुपाया नहीं। वे मतभेद और प्रेम कभी छुपाते नहीं थे। एनडीए सरकार की नीतियों और कार्यपद्धति पर उनकी प्रतिक्रियाओं से खासा विवाद भी हुआ था। वे राजनीति की कुटिलता और प्रपंच को बखूबी समझते थे, लेकिन अपने व्यक्तित्व की सरलता के कारण वे कुटिलताओं और प्रपंचों से हमेशा हारते रहे। कई दफे विवादित भी हुए। शायद यही कारण था कि बाद के दिनों में अपना अधिक समय ग्राम विकास, हिन्दी के विकास और विस्तार, तकनीकों के स्थानीकरण और उसे लोकोपयोगी बनाने के रचनात्मक काम में लग गये थे। अगर कोई उनसे मिलने जाता तो पहले तो वे उससे परंपरागत तकनीक और देशभर में हो रहे सैकडों प्रयोगों के बारे में घंटों बताते। फिर अपने पास संग्रहित दसियों माडल बताते। ग्राम विकास, कृषि, गौ-पालन और उर्जा आदि के देशज और परंपरागत अनुभवों और जानकारियों के बारे में बात करके कोई भी उन्हें अपना प्रशंसक बना सकता था। खालिस्तान समस्या हो या घुसपैठ विरोधी आन्दोलन, उन्होंने संगठन के माध्यम से देश को ठोस सुझाव और सही निदान दिये। संघ के कार्यकर्ताओं को उस दिशा में सक्रिय कर आन्दोलन को गलत दिशा में जाने से रोका। पंजाब के बारे में उनकी यह सोच थी कि प्रत्येक केशधारी हिन्दू हैं तथा प्रत्येक हिन्दू दसों गुरुओं व उनकी पवित्र वाणी के प्रति आस्था रखने के कारण सिख है। इस सोच के कारण खालिस्तान आंदोलन की चरम अवस्था में भी पंजाब में गृहयुद्ध से बचा रहा। खालिस्तान आन्दोलन के दिनों में ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ नामक संगठन की नींव उन्हीं की प्रेरणा से रखी गयी, जो आज विश्व भर के सिखों का एक सशक्त मंच बन चुका है। इसी प्रकार उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बंगलादेश से आने वाले मुसलमान षड्यन्त्रकारी घुसपैठिये हैं। आरएसएस के मुखिया के तौर पर वे हमेशा तुष्टीकरण के खिलाफ रहे, लेकिन मुसलमानों के भारतीयकरण के पक्षधर। उनकी ही प्रेरणा से राष्ट्रीय मुस्लिम मंच का गठन हुआ। प्रख्यात स्तंभकार मुज्जफ़्फर हुसैन हों या बुजुर्ग नेता आरिफ बेग, सुदर्शन जी के साथ इस्लाम के विषय पर घंटों चर्चा करते थे। वे मुसलमानों को न सिर्फ उदार बल्कि शिक्षित, सहिष्णु और राष्ट्रवादी बनाने के लिये भी फिक्रमंद थे। यही कारण है कि मुसलमानों के बीच एक बडा वर्ग तैयार हुआ है जो राममंदिर आंदोलन का समर्थन, गोरक्षा के लिए केन्द्रीय कानून बनाने का आग्रह, रामसेतु विध्वंस का विरोध, अमरनाथ यात्रा में हिन्दुओं के अधिकारों का समर्थन और आतंकवादियों को फांसी देने की मांग करता है। मुसलमानों में ऐसा नेतृत्व उभर रहा है, जो हर बात के लिए पाकिस्तान या अरब देशों की ओर नहीं देखता। इस लिहाज से मुसलमानों के मामले में सुदर्शन जी को प्रगतिशील कहा जा सकता है। स्व. श्री सुदर्शन देश की बौद्धिक दशा को लेकर भी काफी चिंतित थे। बौद्धिक क्षेत्र पर मार्क्स-मेकाले के घुसपैठ और प्रभावों का उन्होंने हमेशा विरोध किया। भारत के कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को वे यूरंडपंथी और मार्क्स-मेकाले के मानसपुत्र कहा करते थे। देश का बुद्धिजीवी वर्ग, जो कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता के कारण वैचारिक संभ्रम में डूब रहा था, उसकी सोच एवं प्रतिभा को राष्ट्रवाद के प्रवाह की ओर मोड़ने हेतु ‘प्रज्ञा-प्रवाह’ नामक वैचारिक संगठन भी आज देश के बुद्धिजीवियों में लोकप्रिय हो रहा है। इसकी नींव में श्री सुदर्शन जी ही थे। संघ-कार्य तथा वैश्विक हिन्दू एकता के प्रयासों की दृष्टि से उन्होंने ब्रिटेन, हालैंड, केन्या, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, हांगकांग, अमेरिका, कनाडा, त्रिनिडाड, टुबैगो, गुयाना आदि देशों का प्रवास भी किया। संघ कार्य में सरसंघचालक की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। चौथे सरसंघचालक श्री रज्जू भैया को जब लगा कि स्वास्थ्य खराबी के कारण वे अधिक सक्रिय नहीं रह सकते, तो उन्होंने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से परामर्श कर 10 मार्च, 2000 को अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में श्री सुदर्शन जी को यह जिम्मेदारी सौंप दी। नौ वर्ष बाद सुदर्शन जी ने भी इसी परम्परा को निभाते हुए 21 मार्च, 2009 को सरकार्यवाह श्री मोहन भागवत को छठे सरसंघचालक का कार्यभार सौंप दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्.सी. सुदर्शन मूलतः तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर बसे कुप्पहल्ली (मैसूर) ग्राम के निवासी थे। कन्नड़ परम्परा में सबसे पहले गांव, फिर पिता और फिर अपना नाम बोलते हैं। उनके पिता श्री सीतारामैया वन-विभाग की नौकरी के कारण अधिकांश समय मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ) में ही रहे और वहीं रायपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) में 18 जून, 1931 को श्री सुदर्शन जी का जन्म हुआ। तीन भाई और एक बहिन वाले परिवार में सुदर्शन जी सबसे बड़े थे। रायपुर, दमोह, मंडला तथा चन्द्रपुर में प्रारम्भिक शिक्षा पाकर उन्होंने जबलपुर (सागर विश्वविद्यालय) से 1954 में दूरसंचार विषय में बी.ई की उपाधि ली तथा तब से ही संघ-प्रचारक के नाते राष्ट्रहित में जीवन समर्पित कर दिया। सर्वप्रथम उन्हें रायगढ़ भेजा गया। प्रारम्भिक जिला, विभाग प्रचारक आदि की जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभाने के बाद 1964 में वे मध्यभारत के प्रान्त-प्रचारक बने। सुदर्शन जी अनुशासन के मामले में कभी समझौता नहीं करते थे। संघ कार्य में उन्होंने निष्ठा और प्रामाणिकता की ही तरह गुणवत्ता को भी महत्व दिया। वे अंतिम समय तक सक्रिय रहे। निष्क्रियता उन्हें सुहाती नहीं थी। अपने जीवन में उन्होंने प्रशिक्षण और अभ्यास को सिद्धांत के साथ गुंथ दिया था। शाखा हो या प्रशिक्षण वर्ग, वे घंटों शारीरिक और मानसिक श्रम करते देखे गये। संघ के वे इकलौते ऎसे ज़्येष्ठ कार्यकर्ता रहे हैं जिन्होंने शारीरिक और बौद्धिक दोनों कार्यों के प्रमुख का दायित्व वहन किया। वे बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न थे। उन्हें संघ-क्षेत्र में जो भी दायित्व दिया गया, उसमें नवीन सोच के आधार पर उन्होंने नये-नये प्रयोग किये। 1969 से 1971 तक उन पर अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख का दायित्व था। इस दौरान ही खड्ग, शूल, छुरिका आदि प्राचीन शस्त्रों के स्थान पर नियुद्ध, आसन, तथा खेल को संघ शिक्षा वर्गों के शारीरिक पाठ्यक्रम में स्थान मिला। आपातकाल के अपने 19 माह के बन्दीवास में उन्होंने योगचाप (लेजम) पर नये प्रयोग किये तथा उसके स्वरूप को भी बदला। 1977 में उनका केन्द्र कोलकाता बनाया गया तथा शारीरिक प्रमुख के साथ-साथ वे पूर्वात्तर भारत के क्षेत्र प्रचारक भी रहे। 1979 में वे अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख बने। शाखा पर बौद्धिक विभाग की ओर से होने वाले दैनिक कार्यक्रम (गीत, सुभाषित, अमृतवचन) साप्ताहिक कार्यक्रम (चर्चा, कहानी, प्रार्थना अभ्यास), मासिक कार्यक्रम (बौद्धिक वर्ग, समाचार समीक्षा, जिज्ञासा समाधान, गीत, सुभाषित, एकात्मता स्तोत्र आदि की व्याख्या) तथा शाखा के अतिरिक्त समय से होने वाली मासिक श्रेणी बैठकों को सुव्यवस्थित स्वरूप 1979 से 1990 के कालखंड में ही मिला। शाखा पर होनेवाले ‘प्रातःस्मरण’ के स्थान पर नये ‘एकात्मता स्तोत्र’ एवं ‘एकात्मता मन्त्र’ को भी उन्होंने प्रचलित कराया। 1990 में उन्हें सह सरकार्यवाह की जिम्मेदारी दी गयी। वैसे जिस विचार और संगठन परंपरा से वे जीवनपर्यंत आबद्ध रहे उसमें वयक्तित्वों की तुलना कठिन है। वहां लगभग एक जैसे गुण-स्वभाव वाले लोग होते हैं। लेकिन सुदर्शन जी इस मामले में विशेष थे कि वे पहले दक्षिण भारतीय और दूसरे गैर महाराष्ट्रीयन सरसंघचालक हुए। कन्नड और अंग्रेजी से ज्यादा वे हिन्दी पर अधिकार रखते थे। पूर्वांचल में कार्य करते हुए उन्होंने वहां की समस्याओं का गहन अध्ययन किया। अध्ययन करते हुए उन्होंने बंगला और असमिया भाषा पर भी अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया। इसके अलावा भी वे कई भाषाओं का ज्ञान रखते थे। हिन्दी के प्रति उनके विशेष आग्रह के कारण ही मध्यप्रदेश में हिन्दी विश्वविद्यालय की कोपलें फूंटी। आज वे नहीं हैं, लेकिन हिन्दी में विज्ञान और तकनीक, चिकित्सा और अभियांत्रिकी जैसे विषयों की साधना करने वालों का स्वप्न साकार होने लगा है। बढती उम्र ने उन्हें कई समस्याएं दी। वे स्मृतिलोप के शिकार होने लगे थे। उन्होंने अपनी नहीं, अपनों की परवाह की। देह और मन कमजोर होता रहा, लेकिन वे देश-समाज की समस्याओं से जूझते रहे। उनके निकटस्थ लोगों को पता है, वे ज्योतिष के भी जानकार थे। ज़्योतिष के कई विद्वानों के साथ उनकी लंबी चर्चाएं भी हुआ करती थी। शायद वे इस जीवन के अंत और अगले जीवन के प्रारब्ध से परिचित थे। यह भी एक संयोग है कि 15 सितम्बर, 2012 को अपने जन्म-स्थान रायपुर में ही उनका देहांत हुआ। श्री सुदर्शन जी ने एक हिन्दू के रूप में जन्म लिया। एक स्वयंसेवक के रूप में देश-समाज और मानवता की सेवा की। पुनर्जन्म में हिन्दुओं का अकाट्य विश्वास है। अपने धर्म के प्रति निष्ठा, हिन्दुत्व के प्रति अटूट श्रद्धा, मानवता की सेवा का व्रत और संघ की प्रतीज्ञा उन्हें बार-बार हमारे बीच लायेगा। संभव है सुदर्शन जी ने जैसे अपने पुराने शरीर का त्याग किया है, शायद वैसे ही सर्वथा नूतन शरीर में प्रवेश कर लिया हो! इस दृष्टि से उनके जाने और आने का विषाद और हर्ष दोनों ही होना स्वाभाविक है। (लेखक मीडिया एक्टीविस्ट और चरैवेति पत्रिका के संपादक हैं।)
कांग्रेस, कोयला और कालिख
कांग्रेस के नेता भले ही कुछ भी कहें, उनके प्रवक्ता मीडिया में कुछ भी बोलें, वे चाहे कितनी ही सफाई क्यों न दें- एक बात तो पक्की है- कांग्रेस बदनाम हो गई है। कांग्रेस का नाम लेते ही, उसका नाम सुनते ही कोयला, कालिख, करप्सन, कलई, कलि, कालिमा, कलंक, कंटक, कुटिल, कपट, कपटी, कलह, कठोर, कलियुग, कलुष-कलुषा, कुख्यात, ़कलंदरी, कशमकश, कसाई, कसैला, कसूरवार, कारागाह, कायर आदि और ऐसे ही कई समानार्थी शब्दों की छवि बनती है। एक ऐसी पार्टी या संगठन जिसकी स्थापना जरूर एक अंग्रेज ने की थी, लेकिन अनेक वर्षों तक वह देशभक्तों और राष्ट्रवादियों के सेवा का माध्यम बनी। अंग्रेजों के जाने के बाद गांधीजी ने कांग्रेस को भंग करने का सुझाव दिया था। कुछ स्वार्थी नेताओं ने उनकी एक न सुनी। देशभक्त नेताओं की पुण्याई और सद्कर्मों का फल नेहरू जैसे कुछ स्वार्थी नेता खाना चाहते थे। इसलिए आजादी के बाद भी कांग्रेस का लाभ उठाया जाता रहा। तब न सही, लेकिन आज जो कांगे्रस को गांधी की राय न मानने का श्राप लग चुका है। वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष अपने नाम के आगे ‘गांधी’ जरूर लगाती हैं, लेकिन उनमें गांधी के व्यक्तित्व का अंशमात्र भी नहीं है। वे रंचमात्र भी गांधी के विचारों की उत्तराधिकारी नहीं हैं। कांग्रेस जहां सरकार में वहां वह अंग्रेजों की सोच और नीति का अनुशरण कर रही है। जहां वह विपक्ष में है वह जनता और जनमानस से कोसों दूर है। गांधीजी का पूरा जीवन विदेशियों और विदेशपरस्ती से लड़ते हुए बीता। लेकिन सोनिया माइनो गांधी का संपूर्ण जीवन ही विदेशपरस्त है। कमोबेश यही कांग्रेस के नेताओं का भी है। जो नेता विदेशपरस्त या भ्रष्ट नहीं हैं वे दरकिनार कर दिए गए हैं, वे हाशिए पर हैं। कांग्रेस देश और देशवासियों की हालत से बेपरवाह है। उसे सिर्फ अपने और अपनों की परवाह है। कांग्रेस के अपने वे हैं जो या तो उनके सगे हैं, या देशी-विदेशी रिश्तेदार। कांग्रेस ने जैसे देशी लोगों को विदेशी नेतृत्व के भरोसे छोड़ दिया है, वैसे ही भारत के देशी बाजार को विदेशी कंपनियों और पूंजीपतियों के हाथों में सौंप दिया है। खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश हो या पेट्रो-उत्पादों (तेल) की कीमतें बढ़ाने का मामला कांग्रेस ने विपक्ष की एक न सुनी, अपने सहयोगी दलों को छोड़ देना मुनासिब समझा, देश की जनता को भले ही गुमराह करना पड़े, लेकिन वह अमेरिकापरस्ती नहीं छोड़ सकती। कांग्रेस को देश की जनता से बस सत्ता चाहिए। कैसे भी, किसी भी कीमत पर। एक बार सत्ता मिल जाये, जनता जाये भाड़ में। देश आर्थिक संकटों से घिरा हुआ है, किन्तु केन्द्र सरकार की फिजूलर्खी का आलम यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रियों ने 678 करोड़ उड़ा दिए। यह व्यय पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 12 गुना अधिक है। कांग्रेस के नेताओं को कोयले की कालिख, करप्सन की कलई और मंहगाई देने के कलंक की कोई परवाह नहीं। उसके नेता कलंदर हैं। उन्हें न तो कुख्यात होने का भय है और न ही कसूरवार होने का मलाल। जनता को मंहगाई से मार डालने पर उन्हें कोई कसाई कहे तो कहे। समस्याओं से मुंह चुराने पर विरोधी उन्हें कायर कहें तो कहें। वे अपनी कुटिलता नहीं छोड़ सकते। कांग्रेसी बेशर्म भी हो गए हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुशील श्ंिादे ने इसका उदाहरण दे दिया। केन्द्र सरकार के तीसरे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने सोच-समझकर बेतुका बयान दिया। उन्होंने कहा कि कोयले से हाथ काले हो जायें तो पानी से धोने पर फिर साफ हो जोते हैं। जनता जिस तरह बोफोर्स घोटाले को भूल गई, कोयला घोटाले को भी भूल जायेगी। जनता भूले, न भूले कांग्रेस जरूर भूल जाती है। जनता तो घोटाले नहीं, छठी का दूध भी याद दिला देती है। कांग्रेस को भी याद होना चाहिए, जनता ने 1984 में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें दी थी। लेकिन उसके बाद उसी जनता ने उसका ऐसा हश्र किया कि उसे आज तक पूर्ण बहुमत से मोहताज कर दिया। आवाम को यह भी याद नहीं है कि बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस की सरकार ने लोक-लुभावन और लोक-कल्याणकारी कौन-से कदम उठाये। काफी समय से ऐसा ही हो रहा है कि जनता आह! आह! कर रही है, ये कराहने की आवाजें हैं। काश! कि कांग्रेस के लिए जनता वाह!वाह करती। कांग्रेस का यही हाल मध्यप्रदेश में भी है। दिग्विजय सिंह ने अपने कार्यकाल में प्रदेश का ऐसा बंटाधार किया कि जनता ने उनके समेत कांग्रेस को प्रदेश से बेदखल कर दिया। यहां कांग्रेस कलह की शिकार है। मुद्दाविहीन है। कांग्रेस को विपक्ष में बैठे 10 वर्ष होने का आया। वह खामोश है। उसे सत्ता तो दिख रही है, लेकिन जनता के लिए संघर्ष का इरादा नहीं। गुटों और आंतरिक कुटिलता की शिकार कांग्रेस भाजपा की सरकार और संगठन की सक्रियता के आगे भीगी बिल्ली हो गई है। उसके पास न तो अपने कार्यकर्ताओं के सवालों का जवाब है और न ही केन्द्र सरकार के निर्णयों से हो रही जनता की तकलीफों का उपाए। कांग्रेस सत्ता और विपक्ष दोनों रूपों में पिट रही है। कांग्रसी नेताओं का खलनायकों का इतिहास पीछा नहीं छोड़ रहा है। वे राजे-रजवाड़ों और सामंत प्रवृति से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। आमजन की आवाजों से कोसों दूर अपने ही कोलाहल में डूबे कांग्रेसी सत्ता के लिए मारी-मारी तो कर सकते हैं, लेकिन वे जनता का विश्वास नहीं जीत सकते। कांग्रेस जनता का विश्वास हार चुकी है। कांग्रेस के नेता आत्मविश्वास खो चुके हैं। जनता उनसे और वे जनता से दूरी बना चुकी है। यह खाई बड़ी है और बढ़ती ही जा रही है। कांग्रेस के लिए इस खाई को पाटना दूर की कौड़ी है। कांग्रेस का आलाकमान तो कोयले की कालिख से कलंकित है। उसका प्रदेश नेतृत्व अपने रसूख और जायदाद को बचाने की जुगत में फ्रिकमंद है। प्रदेश की भाजपा सरकार के साथ कांग्रेस की धींगामुश्ती इसी फ्रि़क्र के कारण है। जनता के लिए अपनी फ्रिक्र को कांग्रेस बहुत पहले दफन कर चुकी है। इसी महीने खंडवा में हुई कार्यसमिति में भाजपा अध्यक्ष ने तीसरी बार सरकार बनाने के लिए तैयारी करने का आह्वान किया है। हरियाणा के सूरजकुंड में हुई भाजपा की राष्ट्रीय परिषद् भी निर्णायक सिद्ध हुई है। भाजपा ने केन्द्र में एनडीए के विस्तार का संकल्प लिया है और प्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाने का नारा दिया है। भाजपा का नेतृत्व, नारा और कार्यकर्ता एक है। इस मामले में कांग्रेस अनेक है। भाजपा सक्रिय है, कांग्रेस निष्क्रिय। भाजपा कार्यकर्ता आत्मविश्वास से लबरेज, लेकिन कांग्रेस के कार्यकर्ता सशंकित और नेतृत्व की गुटबाजी के कारण कशमकश में। प्रदेश की जनता देश में परिवर्तन और और मध्यप्रदेश में निरन्तर होने की बाटजोह रही है।

मंगलवार, 10 मई 2011

मध्यप्रदेश में बस्तर बनाने की कवायद


मध्यप्रदेश में माओवादी आतंक के बारे में अब सनसनीखेज खुलासे हो रहे हैं। प्रदेश की राजधानी भोपाल में न सिर्फ नक्सली पर्चे और साहित्य बरामद हुए हैं, बल्कि हथियारों का कारखाना भी पकड़ा जा चुका है। मध्यप्रदेश का एक बड़ा भू-भाग छत्तीसगढ़ की सीमा से लगा हुआ है। नक्सली पहले भी बड़े वारदातों को अंजाम देने से पहले मध्यप्रदेश को अपने पनाहगाह के रुप में इस्तेमाल करते रहे हैं। मध्यप्रदेश अब तक नक्सलियों के लिए पनाहगाह और शरणस्थली के रूप में ही इस्तेमाल हो रहा था, लेकिन इस मामले में अब नया बदलाव हुआ है।

छत्तीसगढ़ और बिहार-झारखंड के नक्सली अब मध्यप्रदेश को ‘आॅपरेशनल एरिया’ के रूप में देख रहे हैं। पिछले दिनों बालाघाट में नक्सलियों ने इसका इसका आगाज भी कर दिया है। नक्सलियों ने ‘नक्सल विरोधी अभियान’ में लगे पुलिस के जवानों पर घात लगाकर हमला कर दिया और इसमें में पुलिस का जवान शहीद भी हो गया था।

अभी छत्तीसगढ़ ओर बिहार-झारखंड के हथियारबंद नक्सलियों ने सीधी-सिंगरौली क्षेत्र में अपनी आमद दे दी है। केन्द्र और राज्य की खुफिया एजेंसियों ने इस बाबत राज्य सरकार को सचेत भी कर दिया है। लेकिन मध्यप्रदेश सरकार की नक्सल विरोधी नीति या योजना के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में अपनी चिंता व्यक्त करते रहे हैं, लेकिन उनकी ये चिंता राज्य सरकारों को चिंतित नहीं करती। हां राज्य की सरकार को नक्सल विरोधी अभियान के लिए विशेष पैकेज की दरकार जरुर रहती है।

मध्यप्रदेश पुलिस ने माओवादी चुनौतियों से निपटने के लिए नये थानों का प्रस्ताव देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। बालाघाट, मंडला, डिंडोरी, शहडोल और अनूपपुर तो पहले से ही नक्सल प्रभावित रहा है। अब नक्सलियों ने सतना-रीवा और सीधी-सिंगरौली की ओर अपना रूख किया है। पिछले दिनों सीधी-सिंगरौली क्षेत्र में भी नक्सलियों के ‘मिलिट्री दलम’ के हथियारबंद दस्ते देखे गए हैं। वहां की पुलिस पहले से ही बदइंतजामी का शिकार है। नक्सलियों की दस्तक ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है। अब वे आम जनता की सुरक्षा की बजाए अपनी सुरक्षा के लिए अधिक चिंतित हो गए हैं। पुलिस प्रशासन और नागरिक प्रशासन में विश्वास और तालमेल की कमी हैं। सरकार की विेकास योजनाएं अभी भी नक्सली विस्तार को रोक पाने में सफल नहीं हो पायी है। नक्सलियों के स्थानीय दलम से प्रशासन की संाठ-गांठ की चर्चाएं भी होने लगी है। पुलिस और खुफिया विभाग के आला अधिकारी और विशेषज्ञ इस बात की थाह ले रहे हैं कि क्या कारण है कि नक्सलियों के निशाने पर पुलिस और अद्र्धसैनिक बल ही होते हैं। नागरिक प्रशासन के लोग नक्सली खतरे की जद से बाहर कैसे हैं। खुफिया एजेंसियो ने पिछले दिनों बालाघाट के एक आला अधिकारी को संदेह के घेरे में लिया। इस अधिकारी पर नक्सलियों को लेवी देने का संदेह है। इन स्थितियों में पुलिस का मनोबल कमजोर हो रहा है। प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चैहान नये मंत्रालय, नये जिले और नये तहसील बनाने की घोषणा तो कर रहे हैं, लकिन नये थानों का गठन और पुलिस आधुनिकीकरण की प्रक्रिया काग़जों में ही दौड़ लगा रही है। वाम आतंक के संदर्भ में क्या सरकार ‘‘सहिष्णुता और धैर्य की चाबी’’ का इस्तेमाल कर रही है?

राज्य सरकार इस इस बात पर तो संतोष कर सकती है कि जितने भी बड़े नक्सली हादसे हुए हैं वे सभी दूसरे राज्यों में। सरकार इस बात पर भी अपनी पीठ थपथपा सकती है कि उसकी पुलिस ने राजधानी भोपाल में माओवादियों के केन्द्रीय तकनीकी समिति के सदस्य समेत 5 हार्डकोर नक्सलियों को गिरफ्तार किया और उनके असलहा कारखाने का भंडाफोड़ किया। लेकिन सरकार अपनी ही पुलिस की चिंताओं को कबतक नजरंदाज कर सकती है। वाम आतंक के जानकारों का मानना है कि माओवादियों ने एक खास रणनीति के तहत मध्यप्रदेश में बडे हादसों को अंजाम नहीं दिया है। वे अपने ‘रेड कॉरिडोर’ के निर्माण और विस्तार में मध्यप्रदेश का उपयोग सुरक्षित क्षेत्र के रूप में करते रहे हैं। इसी दौरान माओवादियों ने मध्यप्रदेश में अपने समर्थकों की एक बड़ी फौज खड़ी कर ली। मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में एनजीओ, मानवाधिकार संगठन और बुद्धिजीवियों की जमात इस माओवादी अभियान का समर्थन करती है और उसे सहयोग देती है।

मध्यप्रदेश सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि केन्द्र सरकार ने जिन राज्यों को गंभीर नक्सल प्रभावित माना है उनमें मध्यप्रदेश भी है। सरकार को यह भी सुध लेनी चाहिए कि अधिक बडे नक्सली हादसे पुराने मध्यप्रदेश और वर्तमान पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में ही हुए हैं। संभव है किसी भी दिन नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदली और किसी बड़े हादसे को अंजाम दिया।

नक्सलियों के सर्वोच्च नेता गणपति ने अपने बयान में भले ही पश्चिम बंगाल के ‘‘लालगढ़’’ और उड़ीसा के ‘‘नारायणपट्टन’’ को माओवादी ‘गुरिल्ला जोन’ बनाने का दावा किया हो लेकिन यह भी गौरतलब है कि माओवादियों ने मध्यप्रदेश के बड़े हिस्से को अपने आॅपरेशन एरिया के लिए चुना है। छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में भले ही माओवादियों का पूरा नियंत्रण न हो और वे केन्द्रीय अद्र्धसैनिक बलों के दबाव में हों, लेकिन यह भी सच है कि बस्तर में छत्तीसगढ़ सरकार का भी कोई नियंत्रण नहीं है। सरकार चाहे कितनी भी कोशिश कर ले वहां विकास कार्यक्रमों को संचालित नहीं कर पा रही है। मनरेगा और अन्य विकास कार्यक्रमों का लाभ आम लोगों से अधिक नक्सलियों को मिल रहा है। यह कहना शायद अतिशयोक्ति नहीं होगा कि माओवादी रणनीतिकार मध्यप्रदेश में भी एक ‘बस्तर’ चाहते है। वे इसी रणनीति के तहत कार्य कर रहे हैं। सीधी-सिंगरौली क्षेत्र में माओवादियों ने खदानों और क्रेशर के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। खदान मालिक या तो माओवादियों से लेन-देन के आधार पर तालमेल कर रहे हैं, या फिर वे भयाक्रांत हैं। कई खदान ठेकेदारों ने अपना कारोबार समेटने का मन बना लिया है। नक्सलियों के इस अभियान को इस क्षेत्र में आम जनता का खासा समर्थन भी मिल रहा है। माओवादियों ने आने वाली स्थितियों के मद्देनज़र अभी से अपनी तैयारी शुरु कर दी है। अद्र्धसैनिक बलों के दबाव के कारण छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ से नक्सलियों के पांव उखड़ने की संभावना है। इस स्थिति को भांपकर माओवादी रणनीतिकारों ने छत्तीसगढ़ से मध्यप्रदेश की ओर ‘‘रणनीतिक निकासी मार्ग’ का विकास शुरु कर दिया है ताकि अबूझमाड़ छोड़ने की आपात स्थिति में वे सुरक्षित निकासी सुनिश्चित कर सकें। इसके लिए उन्होंने पूर्व विदर्भ के वनाच्छादित इलाके भंडारा-गोदिया-बालाघाट की पहचान की है। पेंच नेशनल पार्क - नागपुर और सिवनी भी माओवादियों के ‘‘रणनीतिक निकासी मार्ग’ के लिए मुफीद है। हाल के दिनों में इन इलाकों में माओवादी हचलच तेज हुई है। मतलब साफ है संभल सको तो संभल जाओ - लाल सलाम दस्तक दे चुका है।

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार भले ही अपनी आंखें भींच ले, लेकिन उसके अनदेखा कर देने से मध्यप्रदेश में माओवादी समस्या खत्म नहीं हो जायेंगी। इसके पहले कि आम लोगों की सुरक्षा खतरे की जद में आ जाये और विकास कार्यक्रमों के लिए गुजाईश खत्म हो जाये सरकार को समय रहते एतिहात बरतना होगा। सुरक्षा जरूरतों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने की पहल करनी होगी। पुलिस बल को आधुनिक, सक्षम और सबल करना होगा। पुलिस और नागरिक प्रशासन के बीच परस्पर भरोसा, विश्वास और तालमेल का विकास जरुरी होगा।

उत्तर प्रदेश के कई जिले भी वाम आतंक से पीड़ित हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक ने भी नक्सली गतिविधियों के प्रति चिंता व्यक्त की है। स्पष्ट तौर पर माओवादी देश के उन हिस्सों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं जहां अभी तक उन्हें देखा नहीं गया था, या कम देखा गया। मध्यप्रदेश तो उनकी नजऱ में पहले से ही काफी उर्वर जमीन रही है। कांग्रेस के शासन काल में नक्सलियों को सरकार का सक्रिय समर्थन मिला। भाजपा राज में भी एक अजीब-सी चुप्पी दिखती है। जाहिर-सी बात है संकट के समय अगर कोई आपका विरोध नहीं करे तो संकटग्रस्त के लिए यही काफी होता है। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार नक्सलियों के प्रति ऐसा ही व्यवहार करती हुई दिख रही है।

तेलंगाना क्षेत्र में माओवादी पुनः अपना मजबूत आधार बनाने की फिराक में हैं। पृथक तेलंगाना राज्य की मांग और पोलावरम डैम विरोधी भावना को वे भुनाना चाहते हैं। मध्यप्रदेश के शहडोल और रीवा संभाग के क्षेत्रों में भी वे शासन की खदान विरोधी भावना निजी क्रेशर विरोधी भावना को अपने पक्ष में करना चाहते हैं। इस क्षेत्र में माओवादियों ने आम लोगों को वैध-अवैध क्रेशर उद्योग से मुक्ति दिलाने का वादा किया है। इसके कारण उन्हें किसानों और जनजातीय लोगों का समर्थन प्राप्त हो रहा है। प्रशासन के जनविरोधी रवैये के कारण पहले से ही माओवाद समर्थक माहौल तैयार हैं।

केन्द्र सरकार ने नक्सल प्रभावित राज्यों को और अधिक अद्र्धसैनिक बल उपलब्ध कराया है। लेकिन केन्द्र की यह अपेक्षा भी है कि राज्य सरकारें भी और अधिक सुरक्षा जवानों की भर्ती करें, प्रशिक्षण कार्यक्रम पर पहले की तुलना में अधिक निवेश करें, श्रेष्ठ गुणवत्ता और अधिक संख्या में आधुनिक शस्त्रों का भंडारण करें और जवानों को उपलब्ध कराएं और माओवादियों की की सख्त घेरेबंदी करें। लेकिन केन्द्र की अपेक्षाओं के बारे में मध्यप्रदेश की राज्य सरकार कितनी संजीदा है! मध्यप्रदेश सरकार अपने पड़ोसी राज्यों खासकर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र से कितना और किस प्रकार का ताल-मेल और समन्वय विकसित कर रहा है यह भी एक पहेली जैसा ही है।

सरकार के पास तात्कालिक, अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक तौर पर क्या उपाय या योजना है, इसका किसी को पता नहीं। पुलिस के उच्च अधिकारी फरमाते हैं - योजना हो तब तो किसी को पता हो। सरकार की माओवादी विरोधी नीति, योजना और रणनीति भगवान भरोसे है। राजनैतिक नेतृत्व शायद यह सोचता हो कि जब आग लगेगी तो कुंआ खोद ही लेंगे। आग बुझाने लायक पानी तो मिल ही जायेगा। लेकिन माओवादी आतंक की आग शायद ऐसी नहीं है। उसकी लपटों से प्रदेश पहले से ही झुलसता रहा है। अब तो वक्त है माओवादी विस्तार को रोकने और खत्म करने की पुख्ता रणनीति और कार्ययोजना तैयार करने की। दशकों पुरानी माओवादी समस्या से निपटने के लिए केन्द्र सरकार ने एक समेकित कार्य-योजना तैयार की है जो - सुरक्षा, विकास, प्रशासन और जन धारणा पर आधारित है। क्या ऐसी कोई सोच, कार्य-योजना या समझ राज्य सरकार की है! आखिरकार केन्द्र की तैयारी भी तो राज्य सरकार के भरोसे ही है। केन्द्र सरकार की तैयारियों का परिणाम राज्य सरकार की क्रियान्वयन दक्षता व क्षमता पर ही निर्भर करती है। यह काम राज्य सरकार की सतत निगरानी, सतर्कता और सावधानी से ही संभव है।

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ गुरु-गोविन्द दोनों मैदान में


अनिल सौमित्र
भ्रष्टाचार के खिलाफ गोविन्दाचार्य और गुरुमूर्ति फिर मैदान में हैं । बाबा रामदेव ने गुरु-गोविन्द दोनों को भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम मे अपना संरक्षण दिया है। उनके साथ हैं पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री एम.एन. वेंकटचेलैया और न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा, जनता पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुब्रह्मण्यम स्वामी, आईबी के पूर्व निदेशक अजीत डोबाल, वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक और भीष्म अग्निहोत्री जैसे विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गज । अन्ना हजारे, किरण बेदी, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, राम जेठमलानी, अरविंद केजरीवाल जैसे सामाजिक, कानूनी और प्रशासनिक क्षेत्र के अनुभवी लोग पहले ही हल्ला बोल चुके हैं। लोकसभा के पूर्व महासचिव श्री सुभाष सी कश्यप, पत्रकार श्री एम.डी. नलपत, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. अरुण कुमार एवं पूर्व राजदूत सतीशचन्द्र, पूर्व प्रशासक भूरेलाल और बी. आर. लाल एवं सी. बी. आई के पूर्व निदेशक श्री जोगिन्दर सिंह, अमेरिका के कर सलाहकार श्री डेविड स्पेंसर, रोनाल्ड लोमे, नुरिआ मोलिना ने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम में साथ देने की इच्छा जाहिर की है।
30 जनवरी को नयी दिल्ली के रामलीला मैदान मे शायद पहली बार बिना किसी राजनैतिक पार्टी के सहयोग अथवा आह्वान के बिना भ्रष्टाचार के विरुद्ध ऎसा हल्ला बोल हुआ। इसमे जस्टिस संतोष हेगड़े, जे.एम .लिंगदोह, स्वामी अग्निवेश तथा आर्चबिशप विन्सेंट एम. कोंसेसाओ सहित तमाम संगठनों, विचारों और क्षेत्रों के लोग एक मंच पर आये । जन लोकपाल बिल पर सरकार और समाज आमने-सामने है. सोनिया-मनमोहन लोकपाल बिल पर मनमानी चाहते है । लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने साफ कर दिया है कि जन लोकपाल बिल वही होगा जिसका मसौदा सामाजिक क्षेत्र के लागों ने तैयार किया है । इसी को लेकर वे 5 अप्रैल को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे है. उनके समर्थन मे देशभर के लोग उपवास रखेंगे और भ्रष्टाचार के खिलाफ संकल्प लेंगे.
राजनीतिक विचारक और स्वदेशी चिंतक गोविन्दाचार्य ने भी देश की नब्ज समझ ली है. वर्षो की संचित ताकत को वे इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम मे झोंक देना चाहते है। देश का हाल बेहाल है। आमजन लूट-पिट रहा है. राजनेता, उद्दोगपति और नौकरशाही माला-माल है। राजनीतिक दल चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष – गलबहिया खेल रहे है। विडम्बना यह है कि सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री के कार्यकाल मे सर्वाधिक भ्रष्टाचार है. प्रधानमंत्री अर्थशास्त्र के विद्वान है, लेकिन देश महंगाई से त्रस्त है। आम नागरिकों का धैर्य टूट गया है. गोविन्दाचार्य समझ गये है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ हथौडा आजमाने का वक्त आ गया है। 1 और 2 अप्रैल को दिल्ली के विवेकानन्द इंटरनेशनल फाउंडेशन में दुनिया भर से दर्जनों और देशभर से सैकडों सामाजिक इकट्ठा हुए। लोग आये तो थे सेमीनार में, लेकिन जाते-जाते "भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा" बनाने के संकल्प करते गये। योग गुरु स्वामी रामदेव के संरक्षण में बने इस मोर्चे के संयोजक के. एन. गोविन्दाचार्य एवं सह- संयोजक आईआईएम बेंगुलुरु के प्रो. श्री आर. वैद्यनाथन और श्री भूरे लाल होंगे। श्री एस. गुरुमूर्ति, श्री अजित डोबाल, श्री वेद प्रताप वैदिक और श्री भीष्म अग्निहोत्री इस मोर्चे सदस्य होंगे। यही समिति भ्रष्टाचार के विरोध में बनने वाली सारी योजनाओं और रणनीतियों का खाका तैयार करेगी। जल्द ही राज्यों में भी इस मोर्चे की ईकाइयां गठित कर दी जायेंगी। स्वामी रामदेव जी ने 2 दिन के सेमीनार के अंत में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान करते हुए इस विषय से जुड़े प्रतिबद्ध व्यक्तियों और संघठनो से अपील की कि वे भी अपनी-अपनी विचारधाराओं से ऊपर उठ कर इस जंग में शामिल हो।
गौरतलब है कि विवेकानन्द इंटरनेशनल फाउन्डेशन के तत्वावधान में ‘‘शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही : भारतीय परिपेक्ष्य एवं अन्तरराष्ट्रीय अनुभव’’ विषय पर दो दिवसीय सेमीनार के बहाने यह सब हुआ। दोनों दिन राजनीति, खुफिया, अर्थशास्त्र और सामाजिक क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने भ्रष्टाचार और काले धन की समस्या के स्वरुप, पहलू और परिणाम पर गहन विचार किया।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री एम.एन. वेंकटचेलैया ने कहा कि शासन का उत्तरदायित्व प्रधानमंत्री का होता है । प्रधानमंत्री जैसा चलेंगे वैसा ही देश चलेगा । वर्तमान में सरकारों के पास न तो दृष्टि और न ही ध्येय । दृष्टि और ध्येय से ही जनकल्याण की भावना उत्पन्न होती है । उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार और काले धन का मामला तो संसद कानून बनाकर चुटकियों में हल कर सकती है । जनता पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि काला धन और भ्रष्टाचार देश के सामने एक बड़ा खतरा है। श्री एस. गुरुमूर्ति ने कहा कि भ्रष्टाचार से पैदा हुआ करोड़ों रू. विदेशों में जमा है। यह पैसा हमारे देश में हथियार और नशीले पदार्थों के रूप में आता है । विदेश की बात तो छोड़ें, देश में ही एक नहीं अनेक हसन अली है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी दोनों एक्सपोज होने चाहिये। भ्रष्टाचार को दंडित होने के लिये इसका खुलासा बहुत जरुरी है। रुस की खुफिया एजेंसी केजीबी द्वारा राजीव गान्धी के परिवार को पैसा देना दस्तावेजो में मौजूद है, लेकिन सब चुप है।
गोविंदाचार्य ने कहा कि अभी सब कुछ खत्म नही हुआ है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई में जिद्द और संकल्प चाहिये। देश में राजनीतिक व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठ चुका है। सत्ता पक्ष और विपक्ष का भेद खत्म हो चुका है। सरकार पर सत्ता लिप्सा, हिस्ट्रीशीटरों और धनबल की चादर चढ गई है। भारतीय राज्य, भारतीय लोगों के ही खिलाफ संघर्ष कर रहा है। अपराध और भ्रषटाचार का अन्तरराष्ट्री यकरण हो गया है। ऎसी स्थिति में हमें वाक् विलास से आगे की सोचना चाहिये। जाहिर है वे सेमीनार को आन्दोलन की शक्ल देना चाह्ते थे। वे जो चाहते थे वही हुआ। गोविन्दाचार्य चाह्ते है कि देश की समस्या का उपाय राजनीतिक और गैर-राजनीतिक दोनो मोर्चों पर हो। हालांकि उनके पास समय और संसाधन दोनो बहुत कम है। लेकिन वे अपनी ताकत बखूबी जानते है। इस मुहिम में आरएसएस उनके साथ है। बाबा रामदेव के संरक्षण से उन्हें एक बडी ताकत मिली है। जयप्रकाश आन्दोलन के सिपाही बेशक उनका साथ देंगे। भ्रष्टाचार ऎसा मुद्दा जो विचारधारा, दल और संगठन से परे हो गया है। इस मुहिम में कोई वैचारिक अडचन नहीं है। जयप्रकाश आन्दोलन के बाद एक बार फिर देश व्यवस्था परिवर्तन के लिये तैयार खडा है। सामाजिक आन्दोलनों के नेताओं ने मौके की नजाकत भांप ली है। इकट्ठा होने और देश को इकट्ठा करने की कवायद शुरु हो चुकी है। अन्ना की आवाज को गोविन्द ने हुंकार दी है। जनता पहले से ही कोपाकुल है। उसकी भृकुटि चढी हुई है। लेकिन इस बार सिर्फ सिंहासन खाली करने या भरने की नही, बल्कि व्यवस्था को झंकझोडने की, उसे नई व्यवस्था देने की बात है।
बहरहाल गोविन्दाचार्य के पास खोने को कुछ नही है। वे कई मोर्चों पर कवायद मे जुटे है। वे रचनात्मक, आन्दोलनात्मक और बौद्धिक तीनों ही आयामों पर प्रयोग कर रहे हैं। राजनीतिक तौर पर राष्ट्र्वादी मोर्चा, नये संविधान-सभा के गठन और शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं के जुटान में उन्होंने साहसिक पहल की है। सिर्फ राजनैतिक मोर्चे पर ही अब दो तक दर्जन से अधिक छोटे-छोटे दल साथ आ चुके है। अगर सफल हुए तो इतिहास रच जायेंगे, असफल हुए तो भी रास्ता तो दिखा ही जायेंगे।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

नर्मदा कुम्भ में धर्मांतण पाप से मुक्ति


ईसाइयों की जैसी आशंका या उनका जैसा आरोप था वैसा कुछ भी नहीं हुआ. नर्मदा कुम्भ का भव्य शुभारंभ हो गया. वनवासी हो या मतांतरित ईसाई कोई न तो डरे और न ही रुके. लेकिन कॉंग्रेस और ईसाई मिशनरी जरुर डरे है. ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जॉन दयाल की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कुंभ के आयोजकों पर आरोप लगाते हुए कहा गया कि ईसाई समाज की प्रार्थना सभाओं में बाधा डालने की कोशिश की जा रही है। ईसाई परिवारों में जाकर उन्हें वापस हिंदू बनने के लिए दबाव डाला जा रहा है।

उधर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुरेश पचौरी और कॉंग्रेस के ही महासचिव दिग्विजय सिंह ने बार-बार नर्मदा कुम्भ पर रोक लगाने की मांग की है. ईसाई मिशनरियों के सुर में सुर मिलाते हुए कॉंग्रेस के नेताओं ने नर्मदा सामाजिक कुम्भ को भाजपा का आयोजन बताया. दरअसल कॉंग्रेस के नेताओं में मिशनरियों को पीछे छोड़ देने की होड लगी है. कॉंग्रेस के लिए मध्यप्रदेश में नर्मदा कुम्भ के आयोजन से एक तरफ कुआ तो दूसरी तरफ खाई पैदा हो गयी गई. कॉंग्रेस सांप-छछूंदर की स्थिति में है. कॉंग्रेस के नेता, ईसाईं मिशनरी, सोनिया और वनवासियों को एक साथ खुश करना चाहते है. नेताओं को डर है कि अगर ये खुश नहीं हुए तो नाराज हो जायेंगे. वे ये भी जानते है कि ये तीनो एक साथ खुश भी नहीं हो सकते. असमंजस की स्थिति में कॉंग्रेस के नेताओं ने तय किया कि अभी तो कांग्रेसमाता सोनिया और ईसाई मिशनरी को ही खुश किया जाए. अभी अनुसूचित जनजाति के वोट की दरकार कोंग्रेस को नहीं गई. आने वाला चुनाव उत्तरप्रदेश में है. इसलिए वनवासी समाज के नाराज होने से कॉंग्रेस की राजनीतिक सेहत पर तत्काल कोई असर नहीं पडने वाला. मुसलमानों की ही तरह वनवासी (कॉंग्रेस के आदिवासी) भी कॉंग्रेस के लिए सिर्फ वोटबैंक है. इस कुम्भ से वोट बैंक पर तत्काल कोइ खतरा नहीं.

मध्यप्रदेश के मंडला में आयोजित तीन दिवसीय नर्मदा सामाजिक कुम्भ पर कॉंग्रेस और मिशनरियों का एक ही सुर है. पोप, जॉन दयाल, सोनिया माइनो और सुरेश पचौरी-दिग्विजय एक ही राग अलाप रहे है. कॉंग्रेस के नेताओं ने अपने आम कार्यकर्ताओं के खिलाफ जाकर इस कुम्भ का विरोध किया तो उसका कारण हर हाल में सोनिया और मिशनरियों को प्रसन्न करना है. कॉंग्रेस नेता सुरेश पचौरी ने नर्मदा कुंभ को सनातन धर्म की मान्यताओं के विरूद्व बताते हुये इस पर मध्यप्रदेश धर्म स्वतंत्रता कानून 1968 के अंतर्गत तत्काल रोक लगाने की मांग की है। केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् एवं प्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर को लिखे पत्र में उक्त आशय का आग्रह करते हुये उन्होंने कहा है कि कथित कुंभ में अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने के लिये आपत्तिजनक पर्चों का वितरण किया जा रहा है जो घोर निंदनीय है। दरअसल काग्रेस के नेताओं ने वास्ताविकता से आँखे भींचने की कोशिश की है. मिशनरियों के इशारे पर संघ, भाजपा और कुम्भ आयोजकों पर आरोप लगा कर वे स्वयं ही अपनी किरकिरी करा रहे है. मंडला की स्थानीय ईसाई संस्थाएँ कुम्भ में आयोजकों का सहयोग कर रही है. उन्होंने यहाँ अपने कैम्प और स्टॉल भी लगा रखे है. जहां तक मतांतरित ईसाइयों के घर वापसी का सवाल है तो जब सामान्य हिन्दू नर्मदा में स्नान करके अपने पापों से मुक्त हों जाते है तो फिर नि:संदेह मतांतरित हिन्दू भी अपने पापों से मुक्त हों सकते है. नर्मदा कुम्भ के आयोजक भले ही प्रत्यक्ष तौर पर "घर वापसी" के किसी कार्यक्रम से इंकार कर रहे है, लेकिन नर्मदा स्नान से कितनी बडी घर वापसी हो रही है इसका अंदाजा न तो सोनिया माइनो को है और न ही जॉन दयाल को. नर्मदा कुम्भ के आयोजकों की कोशिश है कि नर्मदा स्नान को पापमुक्ति, शुद्धिकारण और घर वापसी के तंत्र के रुप में स्थापित कर दिया जाए. घर वापसी के लिए नर्मदा स्नान का मन्त्र देने में आयोजक सफल रहे. इंकार करने से भी यह सच झूठ नहीं हों सकता कि 10 से 12 फरवरी तक होने वाले इस तीन दिवसीय आयोजन में लाखों हिन्दू अपने पापों से मुक्त होंगे, वहीं हजारों मतांतरित हिन्दू अपने मतांतरण-पाप से भी मुक्त होंगे. उल्लेखनीय है कि नर्मदा सामाजिक कुंभ हिन्दू समाज एक अनूठा आयोजन है। तीन दिन तक चलने वाले इस कुंभ में 20 लाख से भी अधिक वनवासियों के जुटने की उम्मीद है।

यह सर्वविदित है कि संघ और अन्य हिन्दूवादी संगठन पोप और उनके मतांतरण तंत्र चर्च और मिशनरी की गतिविधियों से काफी चिंतित है. मध्यप्रदेश में गठित नियोगी और रेगे कमिटी ने भी मतान्तरण के खतरे के प्रति आगाह किया था. राज्य सरकार की लापरवाही के कारण चर्च और मिशनरियों ने स्वच्छंद होकर मतान्तरण किया. गाँव-गाँव तक अपना जाल फैलाया. संघ जब चेता तब तक काफी देर हों चुकी थी. अब मतान्तरण और घर वापसी राजनीतिक मुद्दा बन गया है. संघ ने वर्षों पहले (२००२) झाबुआ में "हिन्दू संगम" का आयोजन किया था. बाद में वर्ष 2006 मे गुजरात में शबरी कुम्भ और अब मंडला में नर्मदा सामाजिक कुम्भ. आयोजक सार्वजनिक तौर पर चाहे कुछ भी कहें उनका एजेंडा स्पष्ट है. संघ वनवासियों में पहचान की अस्मिता जागृत करना ही है. यह आयोजन हिन्दू धर्म के प्रति आस्था रखने, राष्ट्रीय एकता का भाव जगाने तथा सामाजिक समरसता का अलख जगाने हेतु किया जा रहा है। संतों के मुताबिक, माँ नर्मदा सामाजिक कुंभ का उद्देश्य आदिवासियों की संस्कृति, उनकी पहचान और जीवन शैली ही नहीं बल्कि उनके आराध्य देव (बूढ़ादेव)के प्रति उनकी आस्था पर होने वाले आघात से उन्हें सुरक्षित करना भी है। संघ और उनसे जुड़े आयोजक भोले- भाले वनवासियों को धर्मातरण के कुचक्र से बचाने की कवायद में है. नर्मदा तट पर जमा हुए करीब दो लाख से भी अधिक जनसमुदाय से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और विश्व हिंदू परिषद नेता प्रवीण तोगड़िया और ऐसे ही कई नेताओं ने मंडला में मतान्तण रोकने का आह्वान किया. मोहन भागवत ने कहा कि जब शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं वनवासियों को मिलेंगी तो उन्हें कोई लालच देकर धर्मातरित नहीं कर सकेगा। स्वामी सत्यमित्रानंद सरस्वती ने ईसाई मत ग्रहण करने वाले वनवासियों को उल्लू की संज्ञा देते हुए कहा कि उन्हें दिन के उजाले में भी कुछ नजर नहीं आता है। ओंकारेश्वर से आए स्वामी हरिहरानंद ने कहा कि दो-ढाई हजार साल पहले उत्पन्न हुए धर्म के कीट-पतंगे हमारे भोले-भाले लोगों को बरगला कर उनका धर्म परिवर्तित कर रहे हैं। सभी वक्ताओं ने अपने-अपने तरीके से कहा कि धर्म बदलने के बाद व्यक्ति अपने पूर्वजों को भूल जाता है, फिर उसकी निष्ठाएं बदल जाती हैं। संघ की चिंता है मतान्तण से राष्ट्रान्तरण होता है. एक हिन्दू का मतान्तरण होने से सिर्फ एक ईसाई या एक मुसलमान नहीं बढता बल्कि देश का एक शत्रु बढ़ता है. संघ अब नर्मदा जल से शत्रू प्रक्षालन करेगा. एक-एक मतांतरित ईसाई और मुसलमान को देशभक्त हिन्दू बनायेगा.

ईसाइयों के वरिष्ठ प्रतिनिधि और ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जॉन दयाल का नर्मदा कुम्भ पर छाती पीटना स्वाभाविक है. वर्षों की मेहनत और करोड़ों-अरबों खर्च कर जो काम किया वह नर्मदा जल से यूं ही धुल जाए ये चर्च और मिशनरियों को कैसे सुहायेगा. लोभ,लालच और छल से किया गया धर्मं परिवर्तन एक झटके में नर्मदा मैया के प्रवाह में बह जाए इसे जॉन दयाल कैसे पचा पायेंगे. क्या जवाब देंगे अपने आका को. वे किसा मुंह से पोप को बताएँगे कि कितना खोखला है उनके इसाईयत का मुल्लमा. जैसे पचौरी को सोनिया के सवालों का डर है, शायद जॉन दयाल भी पोप के सवालों से डरे है. कुम्भ के आयोजकों ने सवाल किया है नर्मदा कुम्भ से कोइ देशभक्त भयातुर नहीं है, ईसाई मिशनरी क्यों डर रहे है. संघ की कोशिश है एक बार वनवासी समाज जागरूक और सचेत हों जाए तो फिर चर्च भी कुछ नहीं कर सकेगा. राजनीतिक दल भी उसे सिर्फ वोटबैंक नहीं मानेंगे. तब चाहे भाजपा, कांग्रेस हों या गोंडवाना पार्टी, चर्च-मिशनरी हों या इस्लामिक ताकतें कोइ भी वनवासियों को बरगला नहीं सकेगा. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि समाज के क्रियाशील हुए बिना धर्मातरण नहीं रुक सकता। कुंभ में हम यह संकल्प लें कि हम हिंदू समाज में व्याप्त छुआछूत को समाप्त करने के लिए काम करेंगे। विद्या दान करेंगे, अन्नदान करेंगे। संघ ने हर चार साल में सामाजिक कुंभ का ताना-बाना बुन दिया है. पहले 2006 गुजरात में शबरी कुंभ और 2011 में मध्यप्रदेश के मंडला में नर्मदा कुम्भ. आयोजकों ने हर पांच साल में इस तरह के सामाजिक कुंभ की योजना पहले ही बना रखी है। संघ नेताओं का कहना है कि असली हिंदुत्व तो वनवासियों ने ही बचा रखा है। धार्मिक कुंभ नासिक, उज्जैन, इलाहबाद और वाराणसी में होता आया है. वनवासियों का यहा सामाजिक कुम्भ भी हर चौथे साल में आयोजित होगा. वनवासी क्षेत्र ज्यादातर दुर्गम इलाको में है इसलिए सामाजिक कुम्भ भी सुदूर दुर्गम क्षेत्रों में ही होगा. संभव है अगला कुम्भ झारखंड या पूर्वोत्तर क्षेत्र में कही आयोजित हो. गौर करने लायक बात है कि संघ जहा अपनी पद्धति से काम कर रहा है, वही कॉंग्रेस और मिशनरी भी अपनी स्टाइल में विरोध कर रहे है. अभी तो संघ का पलडा भारी दिखता है. कॉंग्रेस और मिशनरी ने प्रेस और मीडिया के जरिये ज्ञापन देकर अपना विरोध प्रकट किया है. इन्होंने शबरी कुम्भ के समय भी ऐसा ही किया था. संघ ने देशभर से लाखों वनवासियों को इकट्ठा कर विरोधियों कों उनकी औकात बता दी है. संघ ने नर्मदा जयन्ती पर लाखों वनवासियों और नर्मदा भक्तों के बीच वनवासी पहचान को बचाने और मतांतरण को रोकने का आह्वान किया. भाजपा को संघ और सरकार के प्रयासों का लाभ तो मिलना ही है. वही कोंग्रेस अपनी छाती पीटती रही. कॉंग्रेस के नेता चाहते तो इस कुम्भ में भागीदार होकर वनवासियों की इतनी बड़ी उपस्थिति का लाभ ले सकते थे. लेकिन अपने आलाकमान सोनिया की नाराजगी के डर से वे यह भी नहीं कर सके.

सोमवार, 10 जनवरी 2011

गुजरात में शबरी कुंभ के बाद मध्यप्रदेश में नर्मदा सामाजिक कुंभ


भोपाल से अनिल सौमित्र
भोपाल। वर्ष 2011 मध्यप्रदेश ही नहीं, पूरे देश के लिए ऐतिहासिक होने वाला है। 10 से 12 फरवरी तक मां नर्मदा सामाजिक कुंभ का आयोजन हो रहा है। नर्मदा कुंभ मध्यप्रदेश के वनवासी बहुल मंडला जिले में हो रहा है। ऐसा ही एक कंुभ वर्ष 2006 में गुजरात के डांग जिले में शबरी कुंभ के नाम से आयोजित हुआ था। भारत वर्षों से हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में होने वाले धार्मिक कुभ से अलग यह सामाजिक कंुभ है।
नर्मदा सामाजिक कुंभ के मीडिया समन्वयक विराग पाचपोर ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए बताया कि इस कंुभ के लिए आयोजन समिति का गठन काफी पहले हो चुका है। इस समिति में देश के प्रख्यात धर्माचार्य, सामाजिक संगठन और वनवासी क्षेत्रों में कार्यरत ख्यात लोग शामिल हैं। इस कुभ में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्रप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार और दिल्ली के साथ ही पूर्वोत्तर के राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोगों के आने की संभावना है। श्री पाचपोर ने बताया कि वर्तमान तैयारियों के आधार पर यह अनुमान है कि इस कुंभ में लगभग 20 से 25 लाख लोग शामिल होंगे। कुंभ के आयोजन के लिए केन्द्रीय आयोजन समिति के अलावा ब्लॉक, तालुका और जिला स्तर पर आयोजन समिति का गठन किया गया है।
परंपरागत रूप से आयोजित होने वाले ऐतिहासिक कुंभ-मेलों का उद्देश्य भले ही धार्मिक हो लेकिन गुजरात के शबरी कुंभ और छत्तीसगढ़ के राजिम कुंभ से लेकर मंडला में आयोजित होने वाले नर्मदा कुभ का उद्देश्य विकास के साथ सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना है। वनवासी क्षेत्रों में मतान्तरण रोकना और मतान्तरण से पैदा होने वाले राष्ट्रीय एकता-अखंडता के खतरे को उजागर करना भी इस कुंभ का एक प्रमुख उद्देश्य है। कुंभ के पूर्व और कुंभ के दौरान जनजागरण कार्यक्रमों के द्वारा मंडला की महारानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई सहित मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और जनजातीय संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश किया जायेगा।
मां नर्मदा सामाजिक कुंभ के दौरान रानी दुर्गावती, महाराणा प्रतात, पर्यावरण एवं मां नर्मदा, सिख गुरुपुत्रों की बलिदान गाथा, राष्ट्रीय एकता और विधर्मियों के कुटिल हथकंडे, विश्वमंगल गौ-माता, जल संरक्षण, सामाजिक सुरक्षा और अयोध्या राम मंदिर केन्द्रित 10 से अधिक प्रदर्शनियां भी लगाई जायेगी। चूुकि यह ऐतिहासिक आयोजन मध्यप्रदेश में हो रहा है इसलिए राज्य सरकार ने भी अपनी ओर से तैयारियां कर रही है। सड़कें और पुल-पुलियों के निर्माण और मरम्मत का काम तेजी से हो रहा है। मध्यप्रदेश शासन की ओर से सड़क और बिजली जैसी आधारभूत सुविधाओं के साथ ही सुरक्षा की दृष्टि से भी मदद का आश्वासन दिया गया है।
आयोजकों ने इस सामाजिक कुंभ को समाज के अंतिम व्यक्ति तक ले जाने का निर्णय किया है। इसीलिए तैयारियों से लेकर जन-जागरण और सामग्री संग्रह में भी शहरी और ग्रामीण परिवारों से मदद ली जा रही है। महाराष्ट्र से शक्कर और लाखों की संख्या में लॉकेट बुलाया जा रहा है। इसी प्रकार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के लाखों परिवारों से एक किलो चावल, आधा किलो दाल और एक-एक रूपये का संग्रह किया जा रहा है। उत्तरप्रदेश से आलू तो गुजरात से भाजन सामग्री के साथ बड़ी संख्या में भाजन बनाने और वितरण करने वाले आ रहे हैं।
मां नर्मदा सामाजिक कुंभ के आयोजक एक तरफ इसके सफल आयोजन के प्रति निश्चिन्त हैं, वहीं असामाजिक तत्वों और ईसाइ मिशनरियों के विरोध के प्रति चिंतित भी। शबरी कुंभ के आयोजन में भी इन्हीं तत्वों ने देश-विदेश में काफी विरोध किया था। जबलपुर सहित प्रदेश के अनेक ईसाइ संगठनों ने इस सामाजिक कुंभ के खिलाफ न सिर्फ दुष्प्रचार शुरु कर दिया है बल्कि उन्होेने इसके विरोध की रणनीति भी बना रखी है। आने वाले दिनों में ईसाइयों का दुष्प्रचार और विरोध और अधिक आक्रमक होगा।

माँ नर्मदा सामाजिक कुंभ

हिन्दू समाज में श्रेष्ठतम् दार्षनिक सिðांत होने के बावजूद काल प्रवाह मंे अनेक ऐसी षिथिलताएं और कुरीतियां समाज में प्रवेष करती चली गयीं, जिनमे सर्वाधिक कष्ट कर विड्ढय जाति के आधार पर हिन्दू और हिन्दू के बीच भेद-भाव एवं अस्पृष्यता रहा,जिनसे हमारे षत्रुओं केा हमें परास्त करने और दासत्व में रखने का अवसर प्राप्त हुआ। इसमें मुख्य रुप से तेरह सौ वर्ड्ढ मुगल एवं पांच सौ वर्ड्ढ ईसाइयांें का रहा। इतने वर्ड्ढों तक विदेषी आक्रांताओं की उपस्थिति के बावजूद हिन्दू धर्म की सर्वव्यापकता के कारण हिन्दू धर्म का अस्तित्व एवं राष्ट्र की एकता अक्षुण्ण रही। विष्व का अन्य कोई भी देष 100-150 से ज्यादा वर्ड्ढों के संघर्ड्ढ मंे अपना अस्तित्व कायम नही रख पाया।
हमारे समाज को कुरीतियों से मुक्त करने के लिए जितना कार्य किया जाना चाहिए था, उतना अभी हुआ नहीं है । बौð, जैन, सिक्ख सभी अपने - अपने तत्वज्ञान को कायम रखते हुए हिन्दू धर्म के व्यापक सहायक अंग हैं, अतः हिन्दू समाज को अपने तत्व ज्ञान के अनुरुप अपना आचरण दिखाना है। कुरीतियों और रुढ़ियांे से ग्रस्त इस समाज में बदलाव आना चाहिए। हिन्दू समाज की मूल धारा रहे, जनजातीय व वनवासी बन्धुओं को अलग करने का एक ड्ढड्य××ंत्र चल रहा है। अतः आज स्वयं में परिवर्तन लाये जाने की जरुरत है। हिन्दू ही अपनी संस्कृति से दूर हटेगा तो कौन इस महान संस्कृति का धारक होगा। हम सब भारत माता के पुत्र हैं यह भाव सभी में उत्पन्न करना, यही हम सब का लक्ष्य होना चाहिये। हिन्दू समानता की कल्पना सर्वांगीण समरसता की कल्पना है। सभी में एक ही ईष्वर का अंष है इसलिए न कोई ऊंचा है और न कोई निम्न।
इस माँ नर्मदा सामाजिक कुंभ में देषभर से संत, महात्माआंे एवं प्रबुðजनों के अलावा लगभग बीस लाख लोगों के आने की संभावना है। इसकी सुचारु व्यवस्था के लिये हजारों कार्यकर्ताओं की आवष्यकता होगी जो दस दिनांे तक रहकर कुंभ मंे आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों की व्यवस्था में लगेंगे। विगत 12,13 व 14 नवम्बर को मंडला मंे कुंभ के संचालन हेतु लगभग पांच हजार कार्यकर्ताओं को व्यवस्था संम्बधी प्रषिक्षण दिया गया। इस कुंभ में सहभागिता हेतु बड़ी संख्या में साधु संतों के अपनी षिष्य मंडली सहित आगमन की सहमति प्राप्त हो रही है। समूचे राष्ट्र से सभी जाति बिरादरियों के बंधु इस कुंभ में पधार रहे हैं।
इस आयोजन से सामाजिक समरसता के निर्माण एवं धर्म की दृढ़ता की परिणति राष्ट्र की सुदृढ़ एकता के रुप में होगी। जबलपुर में दिनांक 21/11/2010 रविवार को आयोजित इस पत्रकार वार्ता को मार्गदर्षक द्वय मा.श्री मुकुंदराव जी पणषीकर(अ.भा.धर्मजागरण प्रमुख), स्वामी महामण्डलेष्वर अखिलेष्वरानंद जी सरस्वती, श्री राजेन्द्र जी (सचिव) माँ नर्मदा सामाजिक कुंभ ने सम्बेाधित किया।

10,11,व 12 फरवरी २०११ माँ नर्मदा सामाजिक कुंभ

किसी राष्ट्र की उन्नति व एकता के लिए वहां के निवासियांे में अपनी संस्कृति, मान्यताओं व धर्म के प्रति दृढ़ता व सामाजिक समरसता की महती भूमिका है। किसी राष्ट्र की संस्कृति व धर्म को क्षीण कर दिया जाये तो वह ज्यादा दिन तक सबल नहीं रह सकता। भारत एक धर्म प्रधान राष्ट्र है, प्रारम्भ से ही धर्म रुपी सूत्र ने समूचे राष्ट्र को एकरुप बँाध रखा है। विभिन्न बोली-भाड्ढा, खान-पान,रहन-सहन, स्थानीय लोक व्यवहार की भिन्नताआंे के बावजूद हिन्दू धर्म की सर्वव्यापकता ने एकात्मता के भाव को सर्वोपरि रखा तथा राष्ट्र की एकता को अक्षुण्ण रखा। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है - धर्म भारत का प्राण है।
प्राचीनकाल से ही कुंभ जैसे बड़े-बड़े धार्मिक स्वरुप लिये हुए वृहद् सामाजिक आयोजन देश की अखण्डता व एकात्मता को सुदृढ़ बनाने के माध्यम रहे हैं। इस अवसर पर सामाजिक व्यवस्थाओं, परम्पराओं के पुनर्मूल्यांकन व संषोधन की प्रक्रिया विद्वत मण्डली, ऋड्ढि-मुनियांे की उपस्थिति में चलती रहती थी। इस प्रकार के आयोजनों से वर्ग भेद को मिटाकर समाज में समरसता, उदारता, एकता और संगठन के सूत्र में पिरोने का कार्य सम्पन्न करने मार्ग निर्देषित किये जाते रहे हैं।
आगामी 10,11,व 12 फरवरी 2011 अर्थात् माघ षुक्ल, सप्तमी,अष्टमी व नवमी, विक्रम संवत् 2067 को माँ नर्मदा जयंती के अवसर पर ‘‘माँ नर्मदा सामाजिक कुंभ’’ का आयोजन प्राचीन महिष्मती नगरी (वर्तमान मण्डला ) में किया जा रहा है । इसके पूर्व सन् 2006 में गुजरात के डांग जिले में षबरी कुंभ का आयोजन सफलता पूर्वक सम्पन्न हो चुका है। उस समय सम्पूर्ण भारतवर्ड्ढ से पूज्य संतों के अह्वान पर बड़ी संख्या में आबाल - वृð, नर-नारी सम्मिलित हुये थे। उस समय संतो का यह निर्णय हुआ कि ऐसे सामाजिक कुंभांे का आयोजन पष्चिम से पूर्व की दिषा में बढ़ते हुए हो । उक्त आह्वान की श्रृंखला की कड़ी के रुप में ही इस आयोजन की रचना बनी है।
मंडला मध्यप्रदेष का एक ऐतिहासिक स्थल है जिसका सीधा सम्बंध रानी दुर्गावती की षैार्य गाथाओं से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा गढ़ मण्डला हजारों वर्ड्ढों से वनवासी संस्कृति का पोड्ढक कंेद्र भी रहा है।धार्मिक दृष्टि से भी पुराणकालीन कृष्ण द्वयपायन वेदव्यास ने वेदों का संकलन एवं सरलीकरण तथा प्रख्यात् श्री नर्मदा पुराण की रचना यहीं की थी । ऐसे पावन स्थल पर ‘‘माँ नर्मदा सामाजिक कुंभ’’ का आयोजन होने जा रहा है। हम सब इस वास्तविकता से अवगत हैं कि गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, क्षिप्रा, गोदावरी, कावेरी जैसी पावन नदियों के तट पर ही संपूर्ण विष्व को अपने ज्ञानसे आलोकित करने वाली सनातन संस्कृति ने जन्म लिया है। यहां आयोजित कुंभ के अवसरों पर देष के कोने-कोने से संत और प्रबुðजन एकत्र होकर काल,परिस्थिति का समग्र विष्लेड्ढण कर समाज का मार्गदर्षन करते रहे हेैंें। इस अवसर पर महामण्डलेष्वर स्वामी अखिलेष्वरानंद जी महाराज, मार्गदर्षक मा.मुकुंदराव पणषीकर एवं सचिव श्री राजेन्द्र प्रसाद जी आदि ने इस अवसर पर पत्रकारों से विषेड्ढ चर्चा की।

"नर्मदा संस्कृति: संक्रमण एवं समाधान" पर विमर्श

विश्व संवाद केंद्र, हिंदुस्तान समाचार तथा इंडियन मीडिया सेण्टर भोपाल ने आज उपरोक्त विषय पर एक कार्यशाला आयोजित की, जिसमे मुख्य अतिथि पूर्व मुख्य सचिव श्री कृपा शंकर शर्मा, तथा मुख्यवक्ता विश्वप्रसिद्ध मानवशास्त्री श्री विकास भट्ट थे. श्री विराग पाचपोर कार्यक्रम के अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय एकता समिति के उपाध्यक्ष रमेश शर्मा विशिष्ट अतिथि थे.
नर्मदा लोकगाथाओं और वैज्ञानिक तथ्यों, दोनों से ही विश्व की प्राचीनतम नदी मानी गयी है. यही कारण है की इसके तट पर विश्व की प्राचीनतम सभ्यता विकसित हुई. जब विश्व की अनेक प्राचीन संस्कृतियों ने साम्राज्यवाद और अनेक अन्य आक्रमणों के आगे घुटने टेक दिए और पूर्णतः नाश्ता हो गयीं, विश्व नर्मदा की सभ्यता ने अपना अस्तित्व कायम रखा और स्वयं को हर युग में अभिव्यक्त करती रही. इस महान संस्कृति के संरक्षक नर्मदाक्षेत्र के वनवासी हैं जो युगों से अपनी आस्था का केंद्र अपनी नरबदा मैया, अपने संस्कारों, अपनी परम्पराओं और अपने देशज ज्ञान को मानते रहे हैं. वर्तमान युग में यह समाज की जिम्मेदारी है की वे वनवासी बंधुओं से पुनः सांस्कृतिक और सामाजिक सम्बन्ध प्रगाढ़ कर सदियों पुरानी अपनी संस्कृति, कलाओं और ज्ञान को ग्रहण करें तथा इनके संरक्षण हेतु उनके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हों. इसी विचार से इस विषय को विस्तार से आम लोगों तक पहुंचाने, नए युग में इस संस्कृति पर आसन्न नयी चुनौतियों को पहचानने, तथा उनका समाधानों पर चर्चा हेतु ये कार्यशाला आयोजित की गयी थी.
उदबोधन:
इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्री कृपा शंकर शर्मा ने स्वयं को नर्मदा पुत्र बताते हुए इसके तट पर बसे लोगों का माँ नर्मदा के प्रति उनकी आस्थाओं के बारे मं बताया. उन्होए विश्वास व्यक्त किया की इस कार्यशाला से अनेक उपयोगी विचार निकल कर आयेंगे. मुख्यवक्ता श्री विकास भट्ट ने विस्तार से अमरकंटक से लेकर गुजरात तक नर्मदा तट पर बसे वनवासियों की आस्थाओं और उनसे जुडी परम्पराओं का वर्णन किया. उन्होंने ने इस बात पर भी प्रकाश डाला की किस प्रकार विदेशी आक्रमणकारियों ने वनवासियों को मुख्य से बाटने के हर संभव प्रयास किये, यहाँ तक की उन्हें 'आदिवासी' कह कर उनकी पहचान ही बदलने की कोशिश की. शिक्षाविद श्री संजय द्विवेदी ने नर्मदा तट पर नक्सालियों की समस्या पर प्रकाश डाला तो नर्मदा सहयता के विद्वान नरेन्द्र द्विवेदी ने अनेक नै चुनौतियों का वर्णन किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नागपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री विराग पाचपोर ने धर्मांतरण से उत्पन्न संकट और कम्यूनिस्ट, इस्लामी आतंकवाद, इसाई मिशनरियों तथा नाक्साल्वादियों के गठजोड़ पर गहरी चिंता जताई. बिनायक सेन की रिहाई के प्रयासों को भी उन्होंने देश के विरुद्ध एक षड़यंत्र बताया. कार्यक्रम में आभार प्रदर्शन श्री अनिल सौमित्र ने किया.

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

नर्मदा सामाजिक कुंभ में सहयोग के लिये अपील पत्र

आदरणीय बन्धु/भगिनी,
सादर, नमस्कार।
आपको विदित ही होगा कि 10, 11 और 12 फरवरी, 2011 को मध्यप्रदेश के वनवासी बहुल जिला मंडला में नर्मदा सामाजिक कुंभ का आयोजन हो रहा है। यह आयोजन सभी दृष्टियों से विशाल और व्यापक है। अनुमान के मुताबिक लगभग 20 से 25 लाख लोगो के इस आयोजन में सभी नागरिक-ग्रामीण और गिरिजन की अपनी-अपनी कुछ न कुछ भूमिका होगी। जो उपस्थित होंगे वे भी और जो उपस्थित नहीं हो सकेंगे वे भी इस महायज्ञ में कुछ न कुछ योगदान देंगे।
सब का योगदान अपनी-अपनी क्षमता के आधार पर होगा। जानकारी के अनुसार आयोजन समिति नकद राशि के अलावा विभिन्न प्रकार की आवश्यक सामग्रियों का संकलन कर रही है। कोई नगद राशि देगा तो कोई दाल-चावल, गुड़-शक्कर से लेकर दीया-सलाई और अन्य उपयोग की वस्तुएं।
नर्मदा सामाजिक कुभ के दौरान स्पंदन संस्था भी अपनी उपस्थिति और भागीदारी दर्ज कराना चाहती है। लेकिन अकेले नहीं, आप सबके साथ। आप स्पंदन के माध्यम से भी अपनी भावनाएं, अपना स्नेह और सहयोग इस कुंभ में पहुंचा सकते हैं। निश्चित ही आप पुण्य के भागी बनेंगे। आपका सहयोग कई जरूरतमंदों के लिए मददगार सिद्ध होगा। इसके लिए आप भी स्पंदन मुहिम में शामिल होकर हमारे प्रयासों में हाथ बंटाइए।
कृपया आपके पास नए-पुराने, किसी भी साइज के, किसी भी प्रकार के कपड़े जो बच्चों, किशोरों और बुजुर्गों के उपयोग के लायक हों, हमें उपलब्ध कराइए, ताकि इसे जरूरतमंद वनवासी बन्धुओं के बीच वितरित किया जा सके। इसके आप हमें हमारे ई-मेल या दूरभाष/मोबाईल पर भी संपर्क कर सकते हैं। स्पंदन कार्यकर्ता संकलित वस्त्र आपसे प्राप्त कर लेंगे। आप चाहें तो निम्न पते पर इसे पहुंचा भी सकते हैं -
स्पन्दन, ई-31, 45 बंगले, भोपाल - 462003, मध्यप्रदेश
दूरभाष : 0755-2765472, 2765174, 09425008648
संपर्क हेतु अन्य सूत्र
श्री जी.के. छिब्बर - 09826012960, 2753294 श्रीमती कुंकुम गुप्ता -0755-2760400
श्रीमती दीपशिखा हर्ष – 09425018086 श्री एस.जी. हसन - 9406809422
श्री अंकुर शर्मा – 09926642199 श्री सुनील मीणा - 08109373211

आपके माध्यम से स्पंदन समूह समाज के लिए सहयोगी बनना चाहता है। आप हमारी सहायता करें, बड़ी कृपा होगी। हमारा आग्रह स्वीकार करें हमारी मुहिम में शामिल हों, स्पंदन समूह कृतार्थ होगा। कृपया इस सन्देश को आप अपने मित्रों, परिचितों और सगे-संबंधियों तक भी पहुंचाने मे हम सब की मदद किजिये।
सादर,
भवदीय
अनिल सौमित्र

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

राघोगढ़ का रावण


द्वापर के रावण और कलियुग के दिग्विजय सिंह में आश्चर्यजनक रूप से समानताएं हैं. दोनों ही राजा हैं. दोनों में पांडित्य है. लेकिन जैसे रावण आसुरी शक्ति के शीर्ष पर था वैसे ही दिग्विजय सिंह भी आसुरी मानसिकता के शीर्ष पर हैं. मध्य प्रदेश में रहते हुए उन्होंने अपनी आसुरी बुद्धि से न केवल प्रदेश को रसातल में पहुंचाया बल्कि अपनी ही पार्टी को हाशिये पर फेंककर दिल्ली चले गये. अब दिल्ली में बैठकर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक विषवमन के जरिए अपनी प्रासंगिकता खोज रहे हैं.

राजनीतिक समीक्षक कहते हैं दिग्गी दूसरे दलों में अपने समर्थक पैदा करते हैं और अपनी पार्टी के भीतर अपने विरोधियों को पैदा नहीं होने देते, अगर पैदा हो गए तो उन्हें बढ़ने नहीं देते, अगर इक्का-दुक्का विरोधी बढ़ भी गए तो उनका तत्काल खात्मा करते हैं। मध्यप्रदेश और देश की राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण हैं। दिग्विजय सिंह सामंती स्वभाव के राजेनता माने जाते हैं। मध्यप्रदेश में अपने 10 वर्षों के राज में वे जनता को कुशासन देने के रूप में जाने जाते हैं। अपने जमाने में उन्होंने नारा दिया - चुनाव विकास से नहीं, प्रबंधन से जीते जाते हैं। उन्होंने एक पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा था कि जब लालू बिना बिजली और सड़क के तीसरी बार सत्ता में आ सकते हैं तो मैं क्यों नहीं। हालांकि 2003 में उनका चुनावी प्रबंधन बुरी तरफ फेल हो गया था। अपने राज में उन्होंने प्रदेश में सांप्रदायिकता का हौव्वा खड़ा कर दिया था। एक तरफ वे हिन्दुओं का दमन करते रहे वहीं ईसाइय-मुसलमानों को शह देते रहे। गौरतलब है कि 22 दिसंबर, 1998 को झाबुआ के नवापाड़ा में जब एक नन के साथ बलात्कार हुआ था तब भी दिग्विजय सिंह ने हिन्दुओं और हिन्दू संगठनों पर ही आरोप मढ़ दिए थे। लेकिन बाद में बलात्कार के कई आरोपी मतान्तरित ईसाई ही पाए गए थे। विपक्ष सहित कई पार्टियों की मांग और राज्यपाल द्वारा सीबीआई जांच के लिए पत्र लिखने के बाद भी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पूरे मामले से मुह मोड़ लिया था। वे सिर्फ घटना का राजनैतिक लाभ उठाना चाहते थे। दिग्विजय सिंह ने झाबुआ नन बलात्कार कांड के एक आरोपी को कांग्रेस का टिकट भी दिया था।

अपने मुख्यमंत्री के कार्यकाल में जब उन पर सोम डिस्लरी से घूस लेने का आरोप लगा और वे विपक्ष के आक्रामक तेवरों से घिर गए तो अचानक तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रशंसा करने लगे। वे अचानक ही राजग की शिक्षा नीति के प्रशंसक बन गए। ज्योतिष को विज्ञान मान लिया। लेकिन जब-जब उनको मौका हाथ लगा हिन्दुत्व पर आक्रमण करने से कभी नहीं चूके। महाराष्ट्र एटीएस के मुखिया हेमंत करकरे की आतंकी हत्या को लेकर दिए गए बयान पर दिग्गी बुरी तरह घिर गए हैं। अपनी किरकिरी होते देख कांग्रेस ने भी उनके बयान से पल्ला झाड़ लिया है। लेकिन विपक्ष कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री चिदंबरम से दिग्विजय के बयान पर उनकी प्रतिक्रया पूछ रहा है। कांग्रेस में अलग-थलग पड़े दिग्विजय सिंह को उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद जगदंबिका पाल के बयान से एक और झटका लगेगा। दिग्गी जिस प्रदेश के प्रभारी हैं उसी प्रदेश के कांग्रेसी नेता अब उनके खिलाफ हो गए हैं। जाहिर है दिग्विजय की ओछो राजनीति से कांगेस का धर्मरिपेक्षता का राग भी कमजोर पड़ता दिख रहा है। कांग्रेसी सांसद जगदंबिका पाल ने एक कार्यक्रम में कहा कि दिग्विजय सिंह का बयान गैर जरूरी था। मुम्बई हादसे के बाद गृहमंत्री ने इस मुद्दे पर पाकिस्तान के खिलाफ जिस तरह का माहौल बनाया, उस पर ऐसे बयान से प्रतिकूल असर पड़ेगा। दरअसल अपने बड़बोलेपन से वे कई बार पूरी पार्टी को संकट में डाल चुके हैं। हो सकता है दिग्विजय सिंह का बयान रूवयं को पार्टी में स्थापित करने या अपना कद बढ़ाने के लिए हो। यह भी संभव है कि वे अपने बयानों से पार्टी का भला करना चाहते हों। लेकिन उनके बयानों से हर बार पार्टी को नुकसान ही होता रहा है। ऐसे में पार्टी के भीतर भी वे आलोचना और निन्दा के पात्र बनते हैं। अंततः उनके स्वयं का नुकसान भी होता है। लेकिन दिग्विजय सिंह है कि अपनी करनी से बाज नहीं आते।

मध्यप्रदेश की राजनीति में ‘बुआजी’ के नाम से चर्चित और वर्तमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रही जमुना देवी ने वर्ष 1995 में कांग्रेस के वर्तमान महासचिव और तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बारे में टिप्पणी की थी, ‘‘ मैं आजकल मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के तंदूर में जल रही हूं।’’ इन्हीं बुआजी ने एक बार कहा था - मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने सलाहकार और वामपंथी विचारधारा के समर्थक संगठनों को विशेष महत्व दे रहे हैं, जिससे नक्सली गतिविधियां फल-फूल रही हैं।

जानकारों के मुताबिक राघोगढ़ ने हमेशा ही अंग्रेजों का साथ दिया। राजा अजीत सिंह के दरम्यान राघोगढ़ के ब्रिटिश राज के ही अधीन रहा। 1904 में राघोगढ़ सिंधिया राज के अधीन हो गया। राघोगढ़ के तब के राजा सिंधिया को नजराना दिया करते थे। राघोगढ़ के राजा बहादुर सिंह भारतीय राजाओं में अंग्रेजों के सबसे वफादार थे। इनकी इच्छा थी कि वे प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से लड़ते हुए मारे जायें। अंग्रेजों की इस वफादारी के लिए राघोगढ़ राजघराने को वायसराय का धन्यवाद भी मिला। इतिहास के पन्नों में इस बात का उल्लेख है कि राघोगढ़ सामंत ने अपने क्षेत्र अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों की हर आवाज को दबाया। 1857 के गदर के दौरान भी यह राजघराना भारतीयों की बजाए अंग्रेजों के ही साथ था। दिग्विजय सिंह को यह अवसर मिला था कि वे राघोगढ़ पर लगने वाले आरोपों का जवाब देते, लेकिन उन्होंने न तो अपने 10 वर्षों के अपने शासन में और न ही अब ऐसा कोई प्रयास किया। बजाए इसके वे लगतार ऐसे बयान दे रहे हैं जिससे आतंवादियों और उनके पोषक शक्तियों को ही मदद मिल रही है। मामला चाहे बटला हाउस का हो या आजमगढ़ जाकर आतंकियों के परिजनों से मुलाकात का, हर बार दिग्विजय सिंह पर आतंकियों की मदद करने का आरोप लगा।
मध्यप्रदेश भाजपा ने दिग्विजय सिंह और खूखंार अपराधियों के गठजोर को केन्द्र में रखकर एक पुस्तिका प्रकाशित की थी। ‘एक संदिग्ध मुख्यमंत्री’ नाम से प्रकाशित इस पुस्तिका में मालवा क्षेत्र के खूंखार अपराधी खान बन्धुओं और दिग्विजय के संबंधों को उजागर किया गया था। मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 15 अगस्त, 1995 को स्वतंत्रता दिवस पर भेापाल में बोलते हुए कहा कि ‘‘यहां अल्पसंख्यक असुरक्षा की भावना से पीड़ित होते हैं, और इसीलिए वे हथियारों का जमाव करते हैं।’’ दरअसल दिग्गी अपने उपर लगे आरोपों को ही जायज ठहरा रहे थे। भाजपा ने उन पर संगीन आरोप लगाए थे। गौरतलब है कि 1994-95 में जब गुजरात पुलिस ने मालवा के उज्जैन जिले से पप्पू पठान की गिरफ्तारी की तब विदेशी हथियार कांड का भांडा फूटा। यह भी पता चला कि इसमें रतलाम नगर पालिका निगम का पार्षद भी शामिल है जो दिग्विजय सिंह के पैनल से चुनाव लड़ा था। इस पार्षद का नाम आर.आर खान बताया गया। महिदपुर निवासी पप्पू पठान की जानकारी के आधार पर आर.आर खान के छोटे भाई महमूद खान के पास से कार्बाइन सहित अनेक विदेशी हथियार बरामद हुआ। पकड़े गए आरोपियों का संबंध तस्कर छोटा दाउद और सोहराब पठान से भी पाया गया। पुलिस की तफतीश में यह भी पता चला कि इन सभी आरोपियों को दिग्विजय सरकार के कई मंत्रियों और स्वयं मुख्यमंत्री तथा अल्पसंख्यक आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष इब्राहीम कुरैशी का संरक्षण भी प्राप्त है। मीडिया और विपक्ष ने दिग्विजय सिंह द्वारा मेहमूद खान और उसके बड़े भाई आर.आर खान के बचाव में दिए गए बयान को खूब उछाला था। यह भी आरोप लगा कि इंदौर स्थित खंडवा रोड पर मालवा फार्म हाउस, जहां से देशी-विदेशी हथियारों का जखीरा पकड़ा गया था, तत्कालीन दिग्विजय सरकार के मंत्रीमंडल के कई सदस्यों द्वारा अय्याशी के लिए उपयोग किया जाता था। यह गठजोड़ न सिर्फ अखबारों की सुर्खियों में आया, बल्कि मध्यप्रदेश की विधानसभा में भी गूंजा।

मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भोपाल में पत्रकारों से बात करते हुए कहा- दिग्विजय सिंह सिर्फ दया के पात्र हैं। वर्ष 2003 में वे मध्यप्रदेश से बेदखल कर दिए गए थे। इस बेदखली में संघ को दोषी मानते हैं। बकौल सुश्री भारती दिग्विजय सिंह को लगता है कि मध्यप्रदेश से कांग्रेस और उनको बेदखल करने में संघ की ही भूमिका थी। इसीलिए वे हर बात में संघ का नाम घसीटते हैं। दिग्विजय सिंह ने हमेशा ही संघ को कटघरे में खड़े करने की कोशिश की है। हिन्दू आतंकवाद का नारा उछालने और संघ को आतंकी संगठन सिद्ध करने के लिए उन्होने हर संभव कोशिश की। हालांकि दिग्विजय सिंह का दामन स्वयं ही दागदार है। कुछ दिन पहले ही माकपा-माओवादी के केन्द्रीय समिति सदस्य तुषारकांत भट्टाचार्य ने एक साप्ताहिक पत्रिका को बताया था कि दिग्विजय सिंह ने पिछले साल अगस्त में उनकी पार्टी से संपर्क साधा था। यह कोशिश हैदराबाद के एक कांगेेसी नेता के जरिए की गई थी। भट्टाचार्य के मुताबिक उस वक्त वह वारंगल जेल में था। गौरतलब है कि दिग्विजय सिंह ने गृहमंत्री चिदंबरम की नक्सल विरोधी नीति की आलोचना की थी।
मध्यप्रदेश की राजनीति में ‘बुआजी’ के नाम से चर्चित और वर्तमान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रही जमुना देवी ने वर्ष 1995 में कांग्रेस के वर्तमान महासचिव और तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बारे में टिप्पणी की थी, ‘‘ मैं आजकल मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के तंदूर में जल रही हूं।’’ इन्हीं बुआजी ने एक बार कहा था - मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने सलाहकार और वामपंथी विचारधारा के समर्थक संगठनों को विशेष महत्व दे रहे हैं, जिससे नक्सली गतिविधियां फल-फूल रही हैं।

दिग्विजय सिंह का ताजा बयान यही बयां करता है कि उन्होंने देशभक्ति का कोई सबक नहीं सीखा है, बल्कि इसके उलट वे अंग्रेजो से लेकर आतंकियों और देश विरोधियों के समर्थक के तौर पर उभरे हैं। अब यह सच भी उजागर होन लगा है कि उन्हीं के राज में सिमी, नक्सली गतिविधियां, बांग्लादेशी घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा मिला, बल्कि अरुंधती राय जैसी देश विरोधी बुद्धिजीवियों को भी शह मिला। इतिहास के पन्नों में यह दर्ज है कि दिग्विजय सिंह के पुरखे अंग्रेजों के प्रति वफादार रहे। अब अखबारों में यह दर्ज हो रहा है कि दिग्विजय सिंह ने आर.आर खान से लेकर अजमल कसाब तक की रहनुमाई राजनीति कैसे की। इन सब से कांग्रेस और दिग्विजय की धर्मनिरपेक्ष छवि को कितना बल मिला या उनके वोट बैंक में कितना इजाफा हुआ यह तो नहीं मालूम, लेकिन तब प्रदेश का और अब पूरे देश का नुकसान जरूर हो रहा है।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

खजुराहो में अन्तरराष्ट्रीय विज्ञान संचार सम्मेलन की शुरुआत


भारत में 4 से 11 दिसंबर तक दुनिया के पचास से अधिक देशों विज्ञान संचार विशेषज्ञ इकट्ठा हुए। दुनिया भर के संचार विशेषज्ञों का जुटान विज्ञान एवं प्रौद्योगकिी विभाग की ईकाई राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् ने किया है। आधुनिक समाज में विज्ञान की भूमिका पर आयोजित इस 11 वें ‘‘पब्लिक कम्युनिकेशन आॅफ साईंस एंड टेक्नोलॉजी’ के आयोजन में मध्यप्रदेश विज्ञान एंव प्रौद्योगिकी परिषद् ने भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गौरतलब है कि खजुराहो में 4 और 5 दिसंबर को आयोजित ‘‘प्री कांफ्रेरेंस’’ की मेजबानी मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् ने की। 6 से 10 दिसंबर तक मुख्य सम्मेलन दिल्ली में और समापन 11 दिसंबर को जयपुर में होगा। मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक नगरी खजुराहो न सिर्फ मंदियों और मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इतिहास, धर्म और कला-संस्कृति के संचार के लिए भी जाना जाता है। संचार नगरी खजुराहो विज्ञान संचार के प्रति नई सोच और दृष्टि उत्पन्न करने के लिए आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का साक्षी बना। यहां आयोजित प्री-कांफ्रेंस में विज्ञान भारती के संगठन सचिव जयकुमार, मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् के महानिदेशक प्रो. प्रमोद कुमार वर्मा, योजना आयोज के सलाहकार ए.के. वर्मा, एनसीएसटीसी के निदेशक डॉ. मनोज पटैरिया, समाज विज्ञानी डॉ. जितेन्द्र बजाज, संचार विशेषज्ञ शशिधर कपूर, संदीप भट्ट और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के डॉ. पी. के. मिश्रा मुख्यरूप से उपस्थित थे। इस सम्मेलन में विदेशी संचार विशेषज्ञ भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इन सम्मेलन में आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, फिलीपींस सहित कई देशों के अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों हिस्सा लिया।

उद्घाटन सत्र में बोलते हुए विज्ञान भारती के संगठन सचिव जयकुमार ने कहा कि विज्ञान संचार पर बात करते हुए हमें यह भी विचार करना चाहिए कि वैदिक साहित्य कैसे आया यह कैसे विकसित हुआ। वर्षों तक लिखने-पढ़ने की पद्धति विकसित न होने के बावजूद हमारे देश में ज्ञान-विज्ञान का संचार होता आया है। भारतीय समाज साहित्य, विज्ञान और ज्ञान का संचार श्रुति संचार के द्वारा वर्षों तक करता रहा है। पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण भी एक विशिष्ट भारतीय पद्धति से होता रहा। जब दुनिया अज्ञान के अंधेरे में थी तब भी भारत ने सभी क्षेत्रों में ज्ञान-विज्ञान का संचार किया।
जयकुमार ने कहा कि वैज्ञानिक का मतलब सिर्फ टाई-कार्ट नहीं है। यहां के किसान और वनवासी वास्तविक वैज्ञानिक हैं। भारत का वनवासी कैंसर का उपचार कर रहा है। अशिक्षित और निरक्षर लोगों ने भी अनेक क्षेत्रों में उत्तम संचार किया है और आज भी कर रहे हैं। भारतीय समाज ने टीवी, विडियो और एलसीडी जैसे उपकरण और तकनीक न होने के बाद भी यह सब किया। यहां अनेक गांवों में आज भी बिजली नहीं है, अंधेरे में आधुनिक संचार कैसे काम करेगा। हम सिर्फ सूचना संचार तकनीक से ही समस्याओं का निदान नहीं कर सकते। मीडिया क्षेत्र में कार्यरत लोगों को भी विज्ञान संचार के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है। आज भी अपने देश में एक भी विज्ञान केन्द्रित समाचार पत्र नहीं है।
उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की समस्याओं और आवश्यकताओं को जानने-समझने की कोशिश होनी चाहिए, फिर इसी के अनुकूल विज्ञान संचार को विकसित किया जाना चाहिए। भारत में भारतीय द्ष्टि से विज्ञान संचार की रूपरेखा बनानी होगी। भारतीय ऋषियों ने ध्वनि विज्ञान, भाषा विज्ञान पर काफी काम किया है।
योजना आयोग के सलाहकार ए.के. वर्मा ने कहा कि सभी सफल प्रधानमंत्रियों ने विज्ञान के महत्व की बात स्वीकर करते हुए इसे बढावा दिया है। आज मोबाइल, कम्प्युटर और टीवी जैसे आधुनिक संचार साधन गरीब और पिछड़े लोगों को भी मदद दे रहे हैं। आज इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि विकास और संचार को कैसे जोड़ा जाए। वैज्ञानिकों और संचारकों को मिल कर काम करने की जरूरत है। विज्ञान को लोकप्रिय बनाना भी एक चुनौती है, खासकर भारत जैसे देश में जहां अनेक भाषा, समुदाय और भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का समाज है। श्री वर्मा ने कहा कि भारत सरकार का योजना आयोग 12 वीं योजना की तैयारी कर रहा है। इसमें भी विज्ञान और विज्ञान संचार को देश की जरूरतों के मुताकिब शामिल किया जा सकता है। विज्ञान के क्षेत्र में लोक जागरण और लोक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने में मीडिया की बड़ी भूमिका हो सकती है।
मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्के महानिदेशक प्रो. प्रमोद कुमार वर्मा ने कहा कि हमें लोगों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति का विकास करना है। हमारी संचार की विशिष्ट परंपरा रही है। इस परंपरा को संरक्षित और विकसित करने की जरूरत है। हमारी दादी ने ‘काजल’ बनाना और आंखों में लगाना हमारी मां को सिखाया। झारखंड राज्य में बनने वाले हंडिया और मध्यप्रदेश के मंडला जिले के वैद्यों द्वारा किए जाने वाले उपचार विधियों का उल्लेख करते हुए डॉ. वर्मा ने भारतीय परंपराओं में विज्ञान और विज्ञान संचार से प्रतिभातियों को रूबरू कराया। उन्होंने कहा कि भारत ने वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए समय, सामग्री, प्रक्रिया और उत्पाद को हमेशा महत्व दिया। भारत में ओझा-वैद्य शायद पढ़ना-लिखना नहीं जानते लेकिन उपचार की श्रेष्ठ विधियों से वे भलि-भांति परिचित थे। हमारे पास आज संचार के अनेक आधुनिक साधन उपलब्ध हो गए हैं लेकिन अभी भी संचार की कमी है। बच्चों के लिए विज्ञान शिक्षा के लिए काुी समय से प्रयास चल रहा है। अभी इस दिशा में वांछित सफलता के लिए और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। विज्ञान की जटिलताओं को सहज और सर्वसुलभ बनाने की काफी आवश्यकता है। मध्यप्रदेश सरकार इस दिशा में काफी प्रयास कर रही है। सरकार के प्रयासों से विज्ञान को एक वर्ग विशेष से आम लोगों का विषय बनाने में काफी सफलता मिली है। मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौैद्योगिकी परिषद् की कोशिश है कि विज्ञान सबके लिए हो, विकास के प्रत्येक पहलू में विज्ञान को शामिल किया जाये। देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञों ने विज्ञान संचार से संबंधित अनेक प्रस्तुतियां भी दी। कार्यक्रम का संचालन परिषद् के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संदीप गोयल ने किया।
खजुराहो से अनिल सौमित्र

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

कांग्रेसी कमीनापन कहाँ से लाओगे

सुरेश चिपलूनकर
Friday 26 November 2010
भाजपा के लिये "जगीरा डाकू" का एक सामयिक संदेश…

पहले कृपया यह वीडियो क्लिप देखिये, फ़िल्म का नाम है “चाइना गेट”, राजकुमार संतोषी की फ़िल्म है जिसमें विलेन अर्थात डाकू जगीरा के साथ एक गाँव वाले की लड़ाई का दृश्य है… जिसमें उस ग्रामीण को धोखे से मारने के बाद जागीरा कहता है… “मुझसे लड़ने की हिम्मत तो जुटा लोगे, लेकिन कमीनापन कहाँ से लाओगे…”… फ़िर वह आगे कहता है… “मुझे कुत्ता भाया तो मैं कुत्ता काट के खाया, लोमड़ी का दूध पीकर बड़ा हुआ है ये जगीरा…”… असल में डाकू जागीरा द्वारा यह संदेश भाजपा नेताओं और विपक्ष को दिया गया है, विश्वास न आता हो तो आगे पढ़िये -

डायरेक्ट लिंक - http://www.youtube.com/watch?v=KRyH0eexMpE
भाजपा से पूरी तरह निराश हो चुके लोगों से अक्सर आपने सुना-पढ़ा होगा कि भाजपा अब पूरी तरह कांग्रेस बन चुकी है और दोनों पार्टियों में कोई अन्तर नहीं रह गया है, मैं इस राय से "आंशिक" सहमत हूं, पूरी तरह नहीं हूं… जैसा कि ऊपर "भाई" डाकू जगीरा कह गये हैं, अभी भाजपा को कांग्रेस की बराबरी करने या उससे लड़ने के लिये, जिस "विशिष्ट कमीनेपन" की आवश्यकता होगी, वह उनमें नदारद है। 60 साल में कांग्रेस शासित राज्यों में कम से कम 200 दंगों में हजारों मुसलमान मारे गये और अकेले दिल्ली में 3000 से अधिक सिखों को मारने वाली कांग्रेस बड़ी सफ़ाई से "धर्मनिरपेक्ष" बनी हुई है, जबकि गुजरात में "न-मो नमः" के शासनकाल में सिर्फ़ एक बड़ा दंगा हुआ, लेकिन मोदी "साम्प्रदायिक" हैं, अरे भाजपाईयों, तुम क्या जानो ये कैसी ट्रिक है। अब देखो ना, गुजरात में तुमने "परजानिया" फ़िल्म को बैन कर दिया तो तुम लोग साम्प्रदायिक हो गये, लेकिन कांग्रेस ने "दा विंसी कोड", "मी नाथूराम गोडसे बोलतोय" और "जो बोले सो निहाल" को बैन कर दिया, फ़िर भी वे धर्मनिरपेक्ष बने हुए हैं…, "सोहराबुद्दीन" के एनकाउंटर पर कपड़े फ़ाड़-फ़ाड़कर आसमान सिर पर उठा लिया लेकिन महाराष्ट्र में "ख्वाज़ा यूनुस" के एनकाउंटर को "पुलिस की गलती" बताकर पल्ला झाड़ लिया…। महाराष्ट्र में तो "मकोका" कानून लागू करवा दिया, लेकिन गुजरात में "गुजकोका" कानून को मंजूरी नहीं होने दी… है ना स्टाइलिश कमीनापन!!!

इनके "पुरखों" ने कश्मीर को देश की छाती पर नासूर बनाकर रख दिया, देश में लोकतन्त्र को कुचलने के लिये "आपातकाल" लगा दिया, लेकिन फ़िर भी तुम लोग "फ़ासिस्ट" कहलाते हो, कांग्रेस नहीं… बोलो, बराबरी कर सकते हो कांग्रेस की? नहीं कर सकते… अब देखो ना, कारगिल की लड़ाई को "भाजपा सरकार की असफ़लता" बताते हैं और एक "चेन स्मोकर" द्वारा पंचशील-पंचशील का भजन गाते-गाते जब चीन ने धुलाई कर डाली, तो कहते हैं "यह तो धोखेबाजी थी, सरकार की असफ़लता नहीं"…। चलो छोड़ो, अन्तर्राष्ट्रीय नहीं, देश की ही बात कर लो, संसद पर हमला हुआ तो भाजपा की असफ़लता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद अफ़ज़ल को फ़ाँसी नहीं दी तो इसे "मानवता" बता दिया…। एक बात बताओ भाजपाईयों, तुम्हारे बंगारू और जूदेव कहाँ हैं किसी को पता नहीं, लेकिन उधर देखो… 26/11 हमले का निकम्मा विलासराव देशमुख केन्द्र में मंत्री पद की मलाई खा रहा है, CWG में देश की इज्जत लुटवाने वाला कलमाडी चीन में एशियाई खेलों में ऐश कर रहा है, जल्दी ही अशोक चव्हाण की गोटी भी कहीं फ़िट हो ही जायेगी… तुम लोग क्या खाकर कांग्रेस से लड़ोगे? ज्यादा पुरानी बात नहीं करें तो हाल ही में अरुंधती ने भारत माता का अपमान कर दिया, कोई कांग्रेसी सड़क पर नहीं निकला… पर जब सुदर्शन ने सोनिया माता के खिलाफ़ बोल दिया तो सब सड़क पर आ गये, बोलो "भारत माता" बड़ी कि "सोनिया माता"?

हजारों मौतों के जिम्मेदार वॉरेन एण्डरसन को देश से भगा दिया, कोई जवाब नहीं… देश के पहले सबसे चर्चित बोफ़ोर्स घोटाले के आरोपी क्वात्रोची को छुड़वा दिया, फ़िर भी माथे पर कोई शिकन नहीं…। अब देखो ना, जब करोड़ों-अरबों-खरबों के घोटाले सामने आये, जमकर लानत-मलामत हुई तब कहीं जाकर कलमाडी-चव्हाण-राजा के इस्तीफ़े लिये, और तुरन्त बाद बैलेंस बनाने के लिये येदियुरप्पा के इस्तीफ़े की मांग रख दी… अरे छोड़ो, भाजपा वालों, तुम क्या बराबरी करोगे कमीनेपन की…। क्या तुम लोगों ने कभी केन्द्र सरकार में सत्ता होते हुए "अपने" राज्यपाल द्वारा कांग्रेस की राज्य सरकारों के "कान में उंगली" की है? नहीं की ना? जरा कांग्रेस से सीखो, देखो रोमेश भण्डारी, बूटा सिंह, सिब्ते रजी, हंसराज भारद्वाज जैसे राज्यपाल कैसे विपक्षी राज्य सरकारों की "कान में उंगली" करते हैं, अरे भाजपाईयों, तुम क्या जानो कांग्रेसी किस मिट्टी के बने हैं।

एक चुनाव आयुक्त को रिटायर होते ही "ईनाम" में मंत्री बनवा दिया, फ़िर दूसरे चमचे को चुनाव आयुक्त बनवा लिया, वोटिंग मशीनों में हेराफ़ेरी की, जागरुक नागरिक ने आवाज़ उठाई तो उसे ही अन्दर कर दिया… भ्रष्टाचार की इतनी आदत पड़ गई है कि एक भ्रष्ट अफ़सर को ही केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त बना दिया… कई-कई "माननीय" जजों को "ईनाम" के तौर पर रिटायर होते ही किसी आयोग का अध्यक्ष वगैरह बनवा दिया…। भाजपा वालों तुम्हारी औकात नहीं है इतना कमीनापन करने की, कांग्रेस की तुम क्या बराबरी करोगे।

डाकू जगीरा सही कहता है, "लड़ने की हिम्मत तो जुटा लोगे, लेकिन कमीनापन कहाँ से लाओगे…?" गाय का दूध पीने वालों, तुम लोमड़ी का दूध पीने वालों से मुकाबला कैसे करोगे? अभी तो तुम्हें कांग्रेस से बहुत कुछ सीखना है…

सोमवार, 29 नवंबर 2010

मीडिया को भी आर.टी.आई.के दायरे में लाया जाए

सेवा में,
विषय: लोकतंत्र के चौथे खंभे (पत्रकारिता) को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने के संदर्भ में
महोदय/महोदया,
मैं अफ़रोज़ आलम साहिल पत्रकार के साथ-साथ एक आर.टी.आई. एक्टिविस्ट हूं। मेरी मांग है कि लोकतंत्र के चौथे खंभे यानी मीडिया को सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के दायरे में लाया जाए। लोकतंत्र के पहले तीनों खंभे सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के दायरे में आते हैं। यह कानून कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों पर लागू होता है। इसका मक़सद साफ है कि लोकतंत्र को मज़बूत किया जा सके। इसी मक़सद की मज़बूती की खातिर मेरी ये मांग है कि लोकतंत्र के चौथे खंभे यानी मीडिया को भी सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के दायरे में लाया जाए, ताकि लोकतंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता को हर स्तर पर लागू किया जा सके।

दरअसल, पिछले कुछ दिनों में कई ऐसे वाक़्यात हुए हैं, जिन्होंने मीडिया में पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे कई मीडिया समूह हैं, जिनकी आमदनी और निवेश संदेह के दायरे में है। ऐसे कई पत्रकार भी हैं जिनकी संपत्ति उनकी आय के ज्ञात स्त्रोतों से कई गुना ज़्यादा है और ये सब उसी मीडिया के हिस्सा हैं, जो समाज के तमाम तबकों से लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करता है। ये उसी मीडिया के लोग हैं, जो राजनेताओं से लेकर अधिकारियों और न्यायपालिका के प्रतिनिधियों की आय के स्त्रोतों की छानबीन में खासी दिलचस्पी दिखाता है और उस पर तमाम तरह के सवाल खड़े करता है। मीडिया इस बात की वकालत करता है कि समाज और लोकतंत्र के ये तमाम तबके अपनी आय का ब्यौरा सार्वजनिक करें। सार्वजनिक तौर पर अपनी ईमानदारी और पारदर्शिता का सबूत दें। फिर सवाल ये उठता है कि आखिर ये मानक खुद मीडिया पर लागू क्यों न हो। समाज और लोकतंत्र के दूसरे तबकों की खातिर जवाबदेही और पारदर्शिता की वकालत करने वाला मीडिया अपनी जवाबदेही और अपनी पारदर्शिता के सवाल से क्यों बचना चाहता है। आख़िर मीडिया इस बात की मांग क्यों नहीं करता कि ख़ुद उसे भी सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के दायरे में लाया जाए।
यहां हाल की कुछ घटनाओं के जरिये मैं कुछ सवाल आपके सामने रख रहा हूँ-
1. अगर NDTV 24X7 की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त और हिन्दुस्तान टाईम्स ग्रुप के एडिटर वीर सांघवी का नाम टेलीकॉम घोटाले के मामले में सीबीआई के दस्तावेज़ों में बतौर दलाल दर्ज है, तो इन लोगों की आय का ब्यौरा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाना चाहिए या इस घटना (या दुर्घटना) के सामने आने के बाद सभी पत्रकारों और माडिया हाउस को स्वेच्छा से अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक क्यों नहीं कर देना चाहिए?
2. अगर संसद नोटकांड मामले में CNN-IBN के एडिटर-इन-चीफ और मालिक राजदीप सरदेसाई का नाम बतौर सीडी मैनेजर सामने आता है तो उनकी संपत्ति की छानबीन क्यों नहीं की जानी चाहिए? एक पत्रकार के मालिक बनने की राह में लिए गए तमाम फायदों की कलई सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के ज़रिए क्यों नहीं खुलनी चाहिए? क्या पत्रकारों को पत्रकार होने के नाते सूचना के अधिकार का इस्तेमाल सिर्फ दूसरों के खिलाफ करने का कोई विशेषाधिकार हासिल है?
3. अगर इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटर रहे प्रभु चावला अमर सिंह की चर्चित सीडी में डिलींग करते हुए सुनाई दे रहे हैं और उनके बेटे अंकुर चावला का नाम सीबीआई के दस्तावेजों में बतौर वित्तीय घालमेल के दलाल के तौर पर दर्ज है तो क्यों नहीं प्रभु चावला की वित्तीय और ज़मीनी संपत्तियों का ब्यौरा सामने लाया जाए?

ये तीन सवाल तो सिर्फ उदहारण भर हैं। ऐसे न जाने कितने मीडिया हाउस और पत्रकार हैं, जिन्होंने लोकतंत्र के चौथे खंभे की आड़ में भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहा रखी है। इन तमाम तथ्यों और लोकतंत्र की प्रतिबद्धता के नाम पर मेरी आपसे ये मांग है कि कृपया मीडिया को भी सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के दायरे में लाने की पहल की जाए। ये लोकतंत्र की आत्मा के हक़ में होगा।
आपके सकारात्मक जवाब का आकांक्षी
अफ़रोज़ आलम साहिल
leaksehatkar@gmail.com

शनिवार, 20 नवंबर 2010

सुदर्शन के आरोप और सोनिया की चुप्पी !

अनिल सौमित्र
10 नवम्बर को राष्ट्रव्यापी धरने के दौरान भोपाल में संघ के पूर्व प्रमुख सुदर्शन ने जो कुछ कहा उसके बाद बहुत कुछ बदल गया। संघ जो चाहता था नहीं हुआ। जो नहीं चाहता था, वही हो गया। सोनिया संबंधी अपने वक्तव्य के बाद सुदर्शन चुप हो गए। मीडिया के लाख प्रयासों के बावजूद वे उपलब्ध नहीं हुए। सुदर्शन जिसके कभी प्रमुख हुआ करते थे, उसने भी उनके बयान को निजी करार दिया। बाद में संघ के सरकार्यवाह का खेद प्रकट करने वाला आधिकारिक बयान जारी हुआ। लेकिन मामला शांत नहीं हुआ। कांग्रेस के महासचिव और कांग्रेसी सेक्यूलरिज्म के नए ठेकेदार दिग्विजय सिंह ने कहा - संघ प्रमुख मोहन भागवत और भाजपा को देश की जनता को यह बताना चाहिए कि वे श्री सुदर्शन के बयान से सहमत हैं या असहमत हैं। कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रकोष्ठ प्रमुख और प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने आग में बारूद डालने का काम किया। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उकसाते हुए कहा - ऐसे लोगों के खिलाफ समाज की प्रतिक्रया ऐसी होनी चाहिए कि भविष्य में कोई भी इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करने की हिम्मत न कर पाए। द्विवेदी ने कहा कि इस तरह की बातों से अगर देशभर में कांग्रेसजन उत्तेजित होते हैं तो इसकी जिम्मेदारी किस पर होगी? कांग्रेस के नेताओं पवन कुमार बंसल से लेकर रीता बहुगुणा, अशोक गहलोत, सुरेश पचैरी और कल्पना परुलेकर तक सभी में बयान देने और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उकसाने की होड़ लग गई। जनार्दन द्विवेदी के बयान के तत्काल बाद कांग्रेसियों ने संघ के दिल्ली स्थित कार्यालय केशवकुंज पर हमला कर दिया। कांग्रेस ये भूल गए कि जहां जूते-चप्पल और पत्थर फेंक रहे हैं वहां भारतमाता का चित्र भी है। लेकिन उन्हें कांग्रेस-माता के समक्ष भारतमाता की केाई कद्र नहीं। मध्यप्रदेश समेत कई प्रदेशों में कांग्रेस के नेता बड़बोले हो गए। वे अपना विरोध सोनिया-माता तक पहुचाने के लिए इतने उतावले हो गए कि एक ही स्थान पर कई-कई दफे पुतले जलाए जाने लगे। कांग्रेस के जहां जितने गुट वहां उतने ही पुतले जलाए गए। केन्द्र सरकार में राज्यमंत्री अरुण यादव ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि वे पार्टी के झंडे के साथ डंडा लेकर सडकों उतरें।
इधर संघ और भाजपा के नेता कांग्रेसी योजना की सफलता पर सिर पीटते रहे। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर संसद में और संसद के बाहर हिन्दू विरोधी दुष्प्रचार की राजनीति को लेकर कांग्रेस की घेरेबंदी हवा हो गई। कांग्रेसियों को पता था कि सुदर्शन के बयान पर जितना हल्ला मचेगा विपक्षी घेरेबंदी उतनी ही कमजोर होगी। भाजपा के मध्यप्रदेश अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय प्रवक्ता तक सुदर्शन के बयान को तूल न देने की सलाह कांग्रेस को देते रहे। कांग्रेसियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
संघ और भाजपा के नेता यह भूल गए कि जिसे फांसने चले थे, उसी ने अपनी चाल में फंसा लिया। कांग्रेस के नेताओं के बयान पहले से ही भड़काउ थे। चाहे वह गृहमंत्री चिदंबरम का हिन्दू-भगवा आतंकवाद संबंधी बयान हो या दिग्विजय सिंह का संघ पर आईएसआई से पैसा लेने का आरोप। बाद में राहुल गांधी ने संघ को सिमी जैसा कह दिया। यह सब कुछ हिन्दू संगठनों को उत्तेजित करने के लिए ही था। कांग्रेस चाहती थी कि संघ या अन्य हिन्दू संगठन उत्तेजित हो जाएं और कुछ ऐसा कर बैठें कि उन्हें अपने आरोपों को जायज ठहराने का बहाना मिल जाये। एक टीवी चैनल पर चर्चा करते हुए मध्यप्रदेश सरकार के मंत्री और भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय बार-बार कह रहे थे कि संघ का हिंसा में विश्वास नहीं है। संघ कांग्रेस के लाख भड़काने के बावजूद शांति से अपना कार्य कर रहा है। संघ रचनात्मक कार्यों और लोकतांत्रिक पक्रिया में भरोसा रखता है। लेकिन दूारी तरफ कांग्रेस के नता सज्जन वर्मा लगातार चुनौती दे रहे थे। वे बार-बार ललकार रहे थे - भाजपा-संघ में दम हो तो राजस्थान, महाराष्ट्र या फिर आंध्रप्रदेश में हमले करके देखें। वे चाहते हैं कि कांग्रेस के लोगों ने जैसे देशभर में संघ कार्यालयों पर हमले, प्रदर्शन और पथराव किए वैसा ही कुछ संघ के कार्यकर्ता भी करें। फिर उनके दिग्विजय सिंह जैसे नेता यह कहते फिरें कि देखो ये संघी आतंकी कैसा आतंक फैला रहे हैं। बहरहाल कांग्रेस के इतना सब प्रयास करने के बावजूद भी देश में कोई बड़ा तूफान खड़ा नहीं हुआ। संघ के वरिष्ठ लोगों ने कांग्रेसी आग में पानी डाल दिया। कांग्रेस के नेता ऐसा कुछ चाहते थे जिसे देख कर मुस्लिम समुदाय भड़क जाये। वे समर्थक मुसलमानों का धु्रवीकरण चाहते हैं। शायद यह अभी तक हो नहीं सका।
एक समाचार पत्र ने लिखा कि कांग्रेसियों को तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी के प्रति निष्ठा दिखाने का बहाना चाहिए। आरएसएस नेता सुदर्शन ने सोनिया के खिलाफ टिप्पणी क्या कि, पार्टी के नेता सोनिया और राहुल के दफ्तर में फैक्स भेजकर बताने लगे कि उन्होंने आरएसएस के दफ्तर और उनके नेता सुदर्शन के खिलाफ किस-किस तरह से विरोध प्रदर्शित करने की योजना बनाई है। समाचार पत्र के मुताबिक कांग्रेसियों ने अपने नेता को इतने सारे फैक्स भेजे कि कई बार फैक्स रोल बदलने पड़े। सोनिया के दफ्तर में तो फैक्स मशीन को सामान्य फैक्स नम्बर से हटाकर दूसरे नम्बर में लगाना पड़ा। जब नेताओं ने सोनिया-राहुल को फोन करके अपने विरोध कार्यक्रमों के बारे में बताया तो सोनिया-राहुल ने इसमें कोई रूचि नहीं दिखाई। पार्टी से जुड़े वकीलों ने भी हमदर्दी दिखाते हुए आरएसएस और उनके नेता सुदर्शन के खिलाफ मुकदमा दायर करने की अनुमति चाही तो उस पर भी सोनिया खामोश बनी रही।
खबर यह भी है कि सोनिया गांधी को अगले कुछ दिनों में अपनी नई टीम का ऐलान करना है। इसी महीने पार्टी की बैठक में सोनिया ने कई नेताओं को टीम से बाहर रखने का संकेत दे दिया था। इन नेताओं के लिए सुदर्शन का बयान संजीवनी की तरह है। आरएसएस नेता सुदर्शन के बयान के बहाने दिल्ली में जगदीश टाइटलर, भोपाल में सुरेश पचैरी और जयसवाल जैसे नेताओं ने संघ विरोध की कमान संभाल ली। अखबारों की कटिंग ‘कांग्रेस-माता सोनिया निवास तक पहुचायी गई। लेकिन सोनिया ने न तो कांग्रेस नेताओं के इस दिखावटी विरोध को तवज्जो दी और ना ही आगे बढ़कर मानहानि की शिकायत ही की। बयान के बाद जैसे सुदर्शन ने चुप्पी साध ली वैसे ही सोनिया ने भी।
यह सच है कि कांग्रेस-माता सोनिया के बारे में कांग्रेसियों को पता हो या न हो स्वयं सोनिया अपने बोर में तो जानती हैं। वे जानती हैं कि सुदर्शन के वक्तव्य की भाषा, शैली और उनके वक्तव्य की परिस्थितियों पर ही हंगामा मचाया जा सकता है, उनकी कही बातों पर नहीं। सोनिया के बारे में दुनियाभर के लोग, खुफिया एजेंसियां बहुत कुछ जानती हैं। आखिर कांग्रेसी सोनिया के बारे में सच का सामना क्यों नहीं करते! कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ताओं ने सुदर्शन-संघ को जितना भला-बुरा कहना था कह दिया। किसी ने उन्हें पागल कहा तो किसी ने मानसिक दिवालिया। लेकिन कांग्रेस के नेता तो मानसिक श्रेष्ठता का परिचय दें। एक बार तो बतायें कि जिसे वे पूजते हैं, जिनके लिए एक बार नहीं बार-बार मरने की कसमें खाते हैं उस कांग्रेस-माता का चलताउ नहीं, असली और पूरा नाम क्या है? कांग्रेसी क्या उन सोनिया माता जिनके लिए वे पलक-पांवडे बिछाए रहते हैं उनके मां-बाप के बारे में भी उतने गर्व और स्वाभिमान से दूसरों को बता सकते हैं? संघ के स्वयंसेवक भारतमाता के आराधक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, श्री माधव सदाशिवराव गोलवरकर, श्री कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन या फिर डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत को अपना नेता मानते हैं। वे गर्व और स्वाभिमान से इसे सार्वजनिक रूप से बताते भी हैं। क्या इतने ही गर्व और स्वाभिमान से कांग्रेसी भी यह स्वीकार करते हैं कि उनकी नेता स्टीफेनो माइनो की पुत्री एंटोनिया सोनिया माइनो हैं। सोनिया शायद इसलिए चुप हैं कि उन्हें अपना सच मालूम है। वे भले ही अपने भक्तों से ये सच छुपा लें। लेकिन इस लोकतांत्रिक देश में जहां सूचना का अधिकार हरेक नागरिक को प्राप्त है कोई भी सच ज्यादा दिन छुपाया नहीं जा सकता। कांग्रेसी भले ही सच का सामना करते हुए अपनी आंखें भींच लें, हरेक भारतीय सोनिया के सच को जानने के लिए उतावला है। कांग्रेस के विरोधी भी तो जानें कि एक सोनिया भक्त कांग्रेसी अपने नेता की जीवनी कैसे लिखता, पढ़ता और सुनता है। कांग्रेस के नेता संघ-सुदर्शन को कोसने, उन्हें भला-बुरा कहने और उनका पुतला-अर्थी जलाने से उबर गए होंगे। चाहें तो भले ही कुछ पुतले और जला लें, एकाध मुकदमे और कर दें, लेकिन एक बार हिम्मत करके सोनिया के सच का सामना जरूर करें। भले ही सुदर्शन चुप रहें, सोनिया तो अपनी रहस्यमयी चुप्पी तोडें!
(लेखक पत्रकार और मीडिया एक्टिीविस्ट हैं। )

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

राहुल गांधी, सुदर्शन जी और कांग्रेस

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

कांग्रेस पार्टी सुदर्शन जी की टिप्पणिय्ाों को लेकर प्रचण्ड रोष में है। कांग्रेस के प्रवक्ताओं में से सर्वाधिक सौम्य्ा और सुशील श्री जनार्दन द्विवेदी जी तक ने प्रेसवार्ता में य्ाह कह दिय्ाा बताते है कि य्ादि कांग्रेस कायर््ाकर्ता राष्ट्रीय्ा स्वय्ांसेवक संघ पर सुदर्शन जी की टिप्पणिय्ाों के कारण हमले करते हैं तो इसकी जवाबदेही कांग्रेस पार्टी की नहीं होगी।
कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय्ा पार्टी है। हालांकि उसकी निरंतरता नाई के उस प्रसिद्ध उस्तरे की भांति है जिसे उक्त नाई ने कभी बेंट और कभी उस्तरा बदलते हुए दसों बार बदल लिय्ाा था, परन्तु फिर भी वह उसे बाप-दादों का पुराना उस्तरा ही बताता था। कांग्रेस पार्टी दस बार बदली गई है और उसके नेतृत्व, संगठन के ढांचे, दल के लक्ष्य्ा, राष्ट्र संबंधी धारणा, समाजवाद के आदर्श आदि विषय्ाों में पचासों परिवर्तन अब तक लाए जा चुके हैं। तब भी एक राजनैतिक दल के रूप में भारत की जनता उसे पुरानी कांग्रेस से किसी न किसी प्रकार संबद्ध ही मानती है । अतः हर एक को उसे इसी रूप में देखना चाहिए। ऐसी पुरानी राष्ट्रीय्ा पार्टी के कई राष्ट्रीय्ा दाय्ाित्व होते हैं। सर्वप्रथम तो य्ाह कि उसका नेतृत्व जो कुछ कहे और दूसरों के लिए जो भी आचरण की कसौटिय्ाां तय्ा करे, उस पर वह स्वय्ां श्रद्धा रखे।
राहुल गांधी देश के राष्ट्रीय्ा नेता हैं, क्य्ाोंकि कांग्रेस ने उन्हें अपना महासचिव बनाया है। उन्हें जो लोग य्ाुवा कहते हैं, वह उनका शौक है, परन्तु आय्ाु की दृष्टि से वे एक प्रौढ नेता हैं। 40 वर्ष की उम्र प्रौढता की उम्र कही जाती है। डॉ. राममनोहर लोहिय्ाा 32 वर्ष के थे जब उन्हांेने भारत छोडो आन्दोलन में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय्ा भूमिका निभाई थी। जब वे 40 वर्ष के थे तब तक वे एक परिपक्व विचारक के रूप में ’ख्य्ााति पा चुके थे और माक्र्सवादी दर्शन को जड-मूल से नकार चुके थे। जब वे 42 वर्ष के थे, तब उन्हें माक्र्सवाद के विरोध के कारण ही श्री जय्ाप्रकाश नाराय्ाण और आचायर््ा नरेंद्र देव ने सोशलिस्ट पार्टी से निकाल दिय्ाा था और तब उन्होंने एक नए राजनैतिक दल का गठन किय्ाा था, जिसने भारतीय्ा इतिहास में देशभक्ति और समतामूलक राजनीति के क्षेत्र्ा में अत्य्ांत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय्ा भूमिका निभाई। फिर राहुल गांधी तो देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल के एक पूर्णतः प्रौढ राजपुरुष हैं। उन्हें हजारों लोगों से ’फीड बैक‘ मिलता रहता है। कांग्रेस की परम्परा है कि उसके सभी प्रमुख नेता नेहरू परिवार के उत्तराधिकारिय्ाों को अपनी सम्पूर्ण बुद्धि और हृदय्ा से सेवा समर्पित करते रहते हैं तथा पार्टी के हित में परामर्श देते रहते हैं। अतः राहुल गांधी जो भी कहते हैं वह कांग्रेस पार्टी की आवाज है, कांग्रेस की नीति है। उसे हल्के से नहीं लिय्ाा जा सकता। अगर वह कोई अनुचित बात कहते हैं तो वह अत्य्ांत गंभीरता से लिए जाने य्ाोग्य्ा है, क्य्ाांेकि उसमें देश के सबसे बडे राजनैतिक दल द्वारा अनुचित राजनीति की नई तैय्ाारी का लक्षण और प्रमाण दिखता है।
राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रीय्ा स्वय्ांसेवक संघ और सिमी दोनों ही समान रूप से देश के लिए खतरनाक संगठन हैं। उनसे प्रेरणा लेकर रीता बहुगुणा, दिग्विजय्ा सिंह सहित अनेक कांग्रेसी राजपुरुष नितांत अमयर््ाादित और आपत्तिजनक अपशब्दों का प्रय्ाोग राष्ट्रीय्ा स्वय्ांसेवक संघ के लिए करते आए हैं। य्ाह अत्य्ाधिक आपत्तिजनक है। डॉ. राममनोहर लोहिय्ाा, श्री जय्ाप्रकाश नाराय्ाण, आचायर््ा कृपलानी, श्री नीलम संजीव रेड्डी, डॉ. अब्दुल कलाम सहित सैकडों शीर्षस्थ राष्ट्रीय्ा नेताओं, महापुरुषों के साथ ही हिन्दू धर्म के शीर्षस्थ धर्माचायर््ा, संस्कृति पुरुष और ज्ञानीजन राष्ट्रीय्ा स्वय्ांसेवक संघ को एक अद्वितीय्ा देशभक्त संगठन मानते हैं। उसकी राष्ट्रभक्ति असंदिग्ध है। भारत वर्ष में देशभक्तों का उससे अधिक बडा कोई भी संगठन नहीं है। राष्ट्रीय्ा स्वय्ांसेवक संघ के प्रचारक समर्पित देशभक्त हैं। उसके अब तक के सरसंघचालक भारत वर्ष के अद्वितीय्ा महापुरुष हुए हैं। पूजनीय्ा सुदर्शन जी एक धर्मज्ञ तत्ववेत्ता, इतिहास के विद्वान और समर्पित देशभक्त हैं। लाखों नवय्ाुवक उनके चरणों में भक्तिभाव से नत होते हैं। मेरी दृष्टि में भी वे एक प्रणम्य्ा महापुरुष हैं। साथ ही मेरी दृष्टि में श्री राहुल गांधी से भारतीय्ा राजनीति को बडी आशाएं हैं, बडी अपेक्षाएं हैं। उनसे गंभीर जिम्मेदारी भरे राजनीतिक व्य्ावहार की ही आशा की जाती है।
य्ादि किसी एक व्य्ाक्ति के विषय्ा में कोई आपत्तिजनक बात कहना अनुचित है तो किसी एक विराट संगठन के विषय्ा में अप्रमाणित, असत्य्ा और अत्य्ांत आपत्तिजनक टिप्पणी करना उससे भी अधिक अनुचित है। देश में सुव्य्ावस्था और सदाचार की प्रतिष्ठा के लिए आचरण की सार्वभौम कसौटिय्ााँ तय्ा की जानी चाहिए। य्ादि सुदर्शनजी की किसी टिप्पणी के लिए उनसे माफी की उम्मीद की जा रही है तो फिर श्री राहुल गांधी को राष्ट्रीय्ा स्वय्ांसेवक संघ जैसे देशभक्त संगठन के विरुद्ध टिप्पणी के लिए तो अविराम एक वर्ष तक क्षमा मांगनी चाहिए। आखिर किस आधार पर य्ाह सब चल रहा है। कांग्रेस देश से बडी नहीं है। हालांकि वह एक बडी पार्टी है। इसलिए उससे अच्छे आचरण की ही अपेक्षा है। विराट देशभक्त संगठन को देश के लिए खतरनाक बताना सार्वजनिक संवाद और विमर्श की सभी मयर््ाादाओं को तोड डालना है। केवल तोड-फोड में विश्वास रखने वाले कम्य्ाुनिस्टों को य्ाह देश कभी भी गंभीरता से नहीं लेता। परन्तु कांग्रेस के नेतृत्व से गंभीर आचरण की अपेक्षा है। आप इस प्रकार एक विराट संगठन को अनाप-शनाप बोलकर समाज में सार्वजनिक संवाद की सभी संभावनाओं को रौंद रहे हैं। एक तरह से खुली मुठभेड और मारपीट को उकसावा दे रहे हैं। य्ाह भारतीय्ा विधान के अनुसार तो अनुचित है ही, राष्ट्रीय्ा सांस्कृतिक परम्परा के अनुसार अत्य्ाधिक आपत्तिजनक है, निंदनीय्ा है। य्ादि आज आप राष्ट्रीय्ा स्वय्ांसेवक संघ को देश के लिए खतरनाक बता रहे हैं तो कल य्ादि प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठ लोग कांग्रेस को हिन्दू धर्म की विनाशक, हिन्दूद्रोही, संस्कृत भाषा और भारतीय्ा गषिय्ाों-मुनिय्ाों की सम्पूर्ण महान परम्परा की उच्छेदक और इस प्रकार राष्ट्रद्रोही कहते हैं तो आप किस मुंह से उनकी निंदा कर पाएंगे। आज आप सुदर्शन जी के बय्ाान के विरुद्ध जगह-जगह मानहानि के मुकदमे दाय्ार करने को अपने कायर््ाकर्ताओं को उकसा रहे हैं तो कल सारे देश में जगह-जगह श्री राहुल गांधी के विरुद्ध इसी प्रकार के मुकदमे य्ादि दाय्ार किए जाएं और य्ाही सिलसिला चल पडे तो फिर राजनैतिक संवाद कैसे होगा। राजनैतिक वक्तव्य्ाों का उत्तर राजनैतिक वक्तव्य्ा ही हैं। न मुकदमेबाजी और न ही गाली-गलौज।
जहां तक क्रिश्चिय्ान चर्च के षडय्ांत्र्ाों की बात है, संपूर्ण य्ाूरोपीय्ा इतिहास इसका साक्षी है कि वहां मध्य्ाय्ाुगीन चर्च ने ऐसे भय्ांकर पापाचार और षडय्ांत्र्ा किए कि अंततः प्रबुद्ध य्ाूरोप को उसके लिए लांछित होना पडा और उस सम्पूर्ण य्ाुग को ’अंधकारय्ाुग‘ घोषित करना पडा। आज भी सेंट टेरेसा जैसी महिला मृत्य्ाु के क्षण तक इस बात को दोहराती गई हैं कि धरती चपटी है क्य्ाांेकि बाइबिल में य्ाही लिखा है और मरते हुए व्य्ाक्ति को भी किसी प्रकार समझ्ाा-बुझ्ााकर ईसाई बपतिस्मा दिलाना एक पुण्य्ा कायर््ा है क्य्ाोंकि इससे वह व्य्ाक्ति ईसा के साम्राज्य्ा का अंग बन जाएगा और ’लास्ट डे आॅफ जजमेंट‘ के दिन शैतान के साम्राज्य्ा में कम आत्माएं होंगी तथा ईसा के साम्राज्य्ा में अधिक आत्माएँ होंगी। इसका अर्थ है कि शैतान क्रिश्चिय्ान ’गॉड‘ का प्रतिस्पर्धी है। भारतीय्ा दृष्टि से इसे नास्तिकता कहा जाएगा। स्वय्ां महात्मा गांधी ने य्ाह बात कही है। इसी प्रकार गांधी जी ने गैर ईसाई लोगों को सामूहिक रूप से बपतिस्मा दिलाकर ’प्रोसिलिटाईजेशन‘ (धर्मांतरण) करने को मानवता के लिए हलाहल विष से भी अधिक भय्ांकर क्रूर-कर्म और अक्षम्य्ा पाप कहा है। गांधी जी ने तो य्ाह भी कहा था कि मैं स्वाधीन भारत में धर्मांतरण पर कानूनन पाबंदी लगी देखना चाहूंगा। मध्य्ाय्ाुगीन चर्च ने य्ाूरोप में जो अमानवीय्ा पाप किए हैं उसी के कारण आज प्रबुद्ध य्ाूरोप मध्य्ाय्ाुगीन ईसाइय्ात में तनिक भी आस्था नहीं रखता। परन्तु पोप भारत आकर इस सहस्त्र्ााब्दी में भारत सहित सम्पूर्ण एशिय्ाा को ईसाई बनाने की अपनी य्ाोजना की सार्वजनिक घोषणा करते हैं। जबकि चीन में ईसाई मिशनरी निरंतर ठोंके-पीटे जाते रहे हैं, इसी कारण वहां ईसाइय्ात नहीं बढ पाई। भारत के प्रति सभी ईसाइय्ाों को गहरी कृतज्ञता रखनी चाहिए कि य्ाहां उन्हें पंथ प्रचार की सुविधा प्राप्त है। य्ाह कृतज्ञता भाव य्ादि सच्चा हो तो कभी-कभार किसी दुखी य्ाा क्षुब्ध हिन्दू नेता द्वारा उनके ऊपर की जाने वाली कोई भी टिप्पणी सर्वथा सहनीय्ा है, क्य्ाोंकि ऐसी छिटपुट टिप्पणिय्ाों तक को न सहना उस कृतज्ञता के भाव का सर्वथा अभाव है जो कि एक हिन्दू बहुल राष्ट्र में उन्हें प्राप्त सुविधाओं से सहज ही मनुष्य्ाता के नाते उनके भीतर जागना चाहिए।
कृतज्ञता के इस भाव का प्रमाण न मिलने पर किसी भी गंभीर हिन्दू विचारक को कभी-कभी भारत में ईसाई षडय्ांत्र्ाों की आशंका होना सामान्य्ा मानवीय्ा प्रवृत्ति है। न्य्ाू टेस्टामेंट, विशेषकर ’सर्मन आॅन द माउंट‘ के उपदेशों को मानने वाले ईसाइय्ाों को ऐसी आशंका को दूर करने के लिए बडी विनम्रता से आगे आना चाहिए, सौम्य्ा और मधुर ढंग से स्पष्टीकरण देना चाहिए। इसके स्थान पर भारत में कुछ ईसाई पादरी नक्सलिय्ाों तथा अन्य्ा आतंकवादिय्ाों से गहरी साजिशन मिली भगत कर सच्ची, सौम्य्ा और विनम्र’ ईसाइय्ात को कलंकित कर रहे हैं। अतः किसी हिन्दू विचारक के चित्त में उपजने वाली ऐसी किसी भी आशंका की पूर्ण जिम्मेदारी उन गलत किस्म के ईसाई पादरिय्ाों की है जो नक्सलियो सहित विभिन्न आतंकवादियो से सांठ-गांठ कर तथा वामपंथी उग्रवाद की भाषा बोलते हुए हिन्दू नेतृत्व पर आए दिन अपशब्दों की बौछार करते हैं। य्ाह उन्हें शोभा नहीं देता। य्ाह सच्ची ईसाइय्ात की निशानी भी नहीं है। य्ाह क्षमाभाव के सम्पूर्ण विलोप का भी प्रमाण है और सच्ची विनय्ा के अभाव का भी प्रमाण है। सुदर्शन जी ने यदि किसी प्रकार की आशंका व्यक्त की है तो उस पर पूरी गंभीरता और विनम्रता के साथ प्रतिवाद करना ही शोभाजनक है। यदि उसके विरुद्ध कोई राजनैतिक वक्तव्य वैचारिक स्तर पर दिया जाता है तो यह् उचित है। परन्तु अपशब्दों की भरमार, कार्यकर्ताओं को आक्रमण और तोडफोड के लिए उकसावा तथा घृणामूलक प्रचार का सहारा लेना देश में गृहयुद्ध की ज्वाला भडकाने की कोशिश है, जो लोकतंत्र्ा को नष्ट करने का प्रय्ाास सिद्ध होगा। भारतीय राज्य केवल भारतीय राजपुरुषों की वस्तु नहीं है। वह कार्यपालिका, न्यायपालिका और संपूर्ण भारतीय जनता का भी उतना ही अपना है। राजपुरुषों को राज्य का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।
स्पंदन फीचर्स । लेखक धर्मपाल शोधपीठ के निदेशक हैं।